हर नारी को हरितालिका तीज की बधाई
बेटी बहन भावज भौजाई
हरितालिका तीज की बधाई
लगे सुहावन मेंहदी रंग
रहे सुहागिन पति के संग
मिले अहर्निश पति का प्यार
कभी न हो लंबा तकरार
पत्नी पीडित पति पछतावे
रूप देख घर लौट के आवे
नयी पुरानी जोश वही है
पति पद वंदन होश सही है
आज पति भगवान बनेंगे
सुबह से सारा काम करेंगे
रसिक रूग्ण ना होते राम
पत्नी चरण पादुका धाम
पत्नी की सेवा करे, सुबह दोपहर शाम
उनके घर माँ पार्वती , सिद्ध करे सब काम
सिद्ध करे सब काम, न खटपट होवे ज्यादा
करे लुगाई राज , रसिक बन बैठे प्यादा
मन पर लगे लगाम, मिले घर हीं में मेवा
पति को यह फरमान, करे पत्नी की सेवा
जग में वही महान , और बुद्धिमान है वो
लक्ष्मी जैसी रूप , हो जोरू शारदा जो
~ रसिक ~
जन्म, जवानी जरा ज्योति लय
जीवन के है चार पड़ाव
हे मानव तू लिप्त न होना
कहीं भी रखना नहीं लगाव
सब आयेंगे बारी बारी
रंगमंच पर है तैयारी
रसना से नित राम राम रट
जन्म सफल तुम करो तिवारी
गीता का यह ज्ञान अलौकिक
जीवन मिलन चेतन व भौतिक
काल खंड़ में इसकी सत्ता
जीवन की है यही महत्ता
~ रसिक ~
हर प्राणी की भर दे झोली होठों की मुस्कान से
उर्जा इतनी दे दे दाता कोई न रूके थकान से
सुख सुविधा को स्वयं संभाले बैर न मन में पाले
किसी के आगे हाथ न फैले प्रेम करे भगवान से
कन्हैया
जन्मदिन की ढ़ेर सारी बधाइयाँ
खिलाते हैं आपको सतरंगी मिठाइयाँ
आपके जीवन में खुशियों की बहार आये
जीवन में नहीं आये कभी भी रुसवाइयाँ
हम मिलते रहें तो अच्छा है
हम तुम बचपन में साथ पढ़े
सम्मान शिखर पर साथ चढ़े
वैश्विक बाजार में तू खोया
माँ बाप के चरण को मैं धोया
तू शान से सम्पत्ति अर्जित की
मैं चमक से खुद को वर्जित की
हो गया पराया अपनों से
जब नेह लगाया सपनों से
तेरा वैभव विस्तार हुआ
संतोष मेरा संसार हुआ
लौटके घर अब तू आ जा
माँ के आँचल में तू सो जा
अभिमान तुमाहारा गच्चा है
हम मिलते रहें तो अच्छा है
घर अपना कोई न छोड़ सका
गैरों से नाता न जोड़ सका
अपना अपनत्व दिखायेगा
गिरने पर तुझे उठायेगा
कटु लगे अभी कर्कश वाणी
पके नहीं , हो अभी अनाड़ी
निंदक मार्गदर्शक होता है
जीवन में अनुभव बोता है
उस निंदक को सम्मान करो
अपने पथ में प्रकाश भरो
विधि का विधान सब सच्चा है
जो होता है वह अच्छा है
जीवन का अनुभव कच्चा है
हम मिलते रहें तो अच्छा है
- कन्हैया प्रसाद " रसिक "
चल फुलेसर बाबा बने
भोजन भेंटी कपड़ा भेटीं
चेला बनी लो अपने मने ।
चल फुलेसर बाबा बने ।।
तु बन जइह मउनी बाबा
बनब तोहार हम चेला
दूध मलाई चापल जाई
लागी नाहीं अधेला
एक बात बस धेआनें रखीह
मत करीह कुछ अपने मने
चल फुलेसर बाबा बने ।।
उकडूँ बइठ के सांझ सबेरे
उल्टा पुल्टा देह बनइह
दु चार गो भगतन के साथे
गांजा चरस के दम लगइह
कवनो केहु लोभ देखाई
छटकिह मत तु अपने मने
चल फुलेसर बाबा बने
~ रसिक ~
जे ना पढ़ल आँख के भाषा , ओकर जिनिगी बेकार बा
अँखिये से समझावे वाला लोगवा कई हजार बा
नौ रस के सब भाव भौंह से , एके छने कहा जाला
बिना बोलले लसेया के सब लास समझ में आ जाला
रसिक
लसेया = लास्या = नर्तकी
लास = लास्य = नृत्य में भाव की प्रस्तुति
मार ठहाका हँसल जाव , सुबह सांझ दुपहरिआ
रस बुनिआ जस रसगर रही, सभके रोज मेहरिआ
तन में कवनो कष्ट ना आई, ना मन में रही कलेश
आइसन सुख त गाँव में मिली , मिली नाहीं शहरिआ
जब से अइली घर में रानी ,
बदल गइल बा दाना पानी
पहिले सूखल रोटी खाईं ,
रसगर रोजे मिले मलाई
मंदिर जइसन घर लागेला ,
देख लुगाई दुख भागेला
छबिलिआ रगड़े पति पतीला ,
छोड़ेे कवनो नट ना ढ़ीला
सुनर लागे नैन कजरारे
बतिअवला पो झटका मारे
रसिक रसायन रसगर बानी
बबुआ रट दुनो परानी
रसिक
नफरत के बाढ़ में डूबल इंसान बा
स्वारथ के नाव से केकरा के बचइबऽ
सभे चिचिआत बा चोन्हा काहें करेलऽ
मुअला के बाद बोलऽ का लेके जइबऽ
चोरी सीनाजोरी के कहानी के साच क के
कुरता के कलप चकाचक बनावेलऽ
लोग चाहे मुवे जिये मतलब बा तोहरा का
मुआवजा के रकम अपना खाता में डलावेलऽ
कुरसी पो बइठऽ चाहे बइठऽ पसर के
धुरी में जोर बर पइसा बनावेलऽ
चमचन के संगे जाके गरीबन के लास पो
क के राजनीति बड़ नेता कहावेलऽ
~ रसिक ~
कुनैन के गोली हीअ लुगाई , झट बोखार उतारे ले
अपना मरद के दरद मिटाके , जिनिगी खूब सँवारे ले
गोड़ में पएकड़ डालके मेहरी , हरिअरी ना चरे देले
ऐरे गैरे सूपनेखिआ के खोरनाठी से जारेले
~ रसिक ~
वो उनका प्यार लगता है जिसे लाचार कहते हैं
लगाये पाँव में बेड़ी उसे तकरार कहते हैं
यही कुदरत का नियम है तमाचा मारता वो है
तपा कर जो खरा कर दे उसे सोनार कहते हैं
~ रसिक ~
आयुर्वेदिक पत्नी
पत्नी अदरक सी लगे , कड़वा कर दे स्वाद
पर अपने तासीर से , कर दे दूर मवाद
कर दे दूर मवाद , वचन कड़वा सा लागे
रसिक झुकाये सीस , कष्ट पल में सब भागे
घर में है सुख शांति , सही है उसकी करनी
करूँ बड़ाई रोज , ओज की दरिया पत्नी
~ रसिक ~
पत्नीजी
पत्नीजी जब बोलती , होती बोली बंद
डाँट मुझे ऐसा लगे , बरस रहा मकरंद
बरस रहा मकरंद , मगज कुछ नहीं समाये
थरथर काँपे पैर , याद नानी की आये
सदा रहा हूँ मौन , कहूँ बीती अपनीजी
मैं तो करता काम , मजे करती पत्नीजी
~ रसिक ~
लोगं कुछ भी कहते हैं तो कहने दो
अपने बाड़े में किसी को मत रहने दो
अपनी हँसी को परवान चढ़ाओ
लोग नफरत करते हैं तो करने दो
उनका काम है नफरत करना
अपना काम है हँसते रहना
हँसमुखी को गुरू बनाओ
हँसकर पीड़ा हरते रहना
कन्हैया
बात करे जब सखियन से तब
नैन के कोर से नैन मिलाये
नैन मिले जब नैनन से तब
नैन झुकाकर वो शरमाये
नैन की गति पुन पुन दोहराये
खोज करे उन नैनन को
बिछुरत नैन कटारी लागे
हाय हिया करे बयनन से
कन्हैया
मन बा तबे मजाक बा , बिन मजाक सब सून
मन पो केहू मत लिही , खिले समाज प्रसून
ए मलकिनी मन करत बा बन जाईं सन्यासी
तोहरो किच-किच मन ना भावे लागे गरदन फाँसी
बन जाईं सन्यासी रउआ हम ना रोक लगाइब
झाडू पोंछा करे खातिर बाकिर रउआ आइब
माथ छिलाईं चाहे राखीं लामा लामा झोंटा
फिरके रउआ घरे ना आइब रखले बानी सोंटा
सात जनम के ठेका रहे एही जनम में टूटल
कारन का सन्यास के बाटे हमरो करम बा फूटल
एटीएम पेटिएम और मोबाइल हमरो हाथ थमाईं
लोटा डंटा बिहटी लेके जहँवा मन बा जाईं
चेला भले बनाइब रउआ चेली नाहीं चली
जे दिन मन में पाप समाई चल जाई दुनली
फिर त हमर पलानिंग कैंसिल तोहरे गोड़ दबाइब
सन्यासी सनकाई अब ना गिरहतिये मुक्ति पाइब
रसिक
पतिता पति को मार कर , बन गयी जोगन आय
पतिव्रता पद है बड़ा , दे सबको समझाय
दे सबको समझाय , स्वर्ग का भेद बताये
पति का हो सम्मान , सभी को अदब सिखाये
रसिक ज्ञान से हीन , आह से निकली कविता
बदल गया परिवेश , आज पूज्य हुयी पतिता
हैं धवल कुछ लोग जो नाली को गंगा कहते हैं
छोड़ पुष्प मकरंद घृणित दुर्गंध सहन करते है
वक्त आ गया है अब उन्हें बदलना होगा
छोड़के दलदल मार्ग राजपथ चलना होगा
~ रसिक ~
वाह रे जिन्दगी,
तू ही है जन्नत , कयामत भी तू है
तू ही है किस्मत , अदावत भी तू है
तेरी हर अदा से , वाकिफ हूँ लेकिन
तू ही है मुजरिम , अदालत भी तू है
~ रसिक ~
हमनी गरीबवन के तुही ए विधाता
केतना ले सही दुख सहे ना सहाता ||
गरमी में जरे तन भुआ जइसन होला मन
ककरी के भाती जस सभे मउराता |
केतना ले...............................||
आइल बरसात चूए ठठरी के टूटल बात
गठरी में बान्हल सब दाना भुअराता |
केतना ले....................................||
हाड़ कंपकपावे जाड़ चाँचर भइल बा केवाड़
लेवा फाटल टाटी ओढ़के लइका टुअराता |
केतना ले........................................||
देखके कन्हैया हाल मनवा भइल बेहाल
कइसे कहीं जिनिगी के माटी छितराता |
केतना ले ......................................||
~ कन्हैया
हीर छोड़के कंकड़ पकड़े
भरम मोह माया में जकड़े
काल कवल कब केहु न जाने
फिर भी बेमतलब के अकड़े
लुगरी भइल बा सुनर साड़ी
कहे सजनवा बाड़ु अनाड़ी
मांकल चलेलु धूरिया राह
नहीं पकड़लु धरम के गाड़ी
बात बात में घात लगवलु
अपने तन सुन्दर बतलवलु
सटलु ना सजना के पास
अब काहें खोजत बाड़ु खास
कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक
कवनो इलाज नइखे ए बुढ़उ, बुढारी के
मन के काबू में राख, प्रेम के बिमारी से
ना त सब जोत कलम से जोता जाई
पकड लेब. कटोरा भूख के लाचारी से
घर गृहस्थी के मत चरमराये द
परिवार से संबंध मत गड़बड़ाये द
समाज में बाबा के फर्ज निभाव
आपन करनी से बेटा बेटी के मत शरमाये द
कन्हैया प्रसाद तिवारी
पानी से खेलवाड़ करब त पानी आसमान से ना आँख से बरसी
ताकत रह जइब आकाश में करेजा बूँद बूँद पानी खातिर तरसी
अबहीं समय बा ए भईया जल के जियान मत करS
पेड़ पौधा लगाके , जंगल के बचाके धरती के कर्ज भरS
~ कन्हैया
तसला में पानी परी , जब कहिहें जुवराज ।
केहू कोठी के भरे , उनुके सिर पर ताज।।
उनुके सिर पर ताज , बैल बूढ़ा पिठवाही ।
धइलसि बछरू मेंहँ , केहु ना करी मनाही ।।
सोचल सभ बेकार , सुधारी अब के मसला ।
का करिहें श्रीराम , आँच से तलफे तसला ।।
रसिक
धरती धूमिल हो गयी, मनु ने किया हलाल ।
दिव्य भवन खाली हुआ , पानी गया पताल।।
पानी गया पताल , स्वार्थ परचम लहराया ।
जंगल हुआ विरान , काटकर महल बनाया ।।
चौड़ा हुआ दरार , खेत सब पड़ा है परती ।
कैसे देगी दान , स्वयं प्यासी है धरती ।।
कन्हैया प्रसाद रसिक
जहाँ देखऽतानी उहाँ पानी पानी
खेत खरिहाने मुहाने में पानी
घरवा में रहल ना निकलल बुझाता
चेहरा के उड़ल बा अँखिया में पानी
टपकेला टुटही पलानी से पानी
भरल बा दादा दलानी में पानी
ठिठुरत करेजा के कोंखी में साटीं
पंवरता उपर मुहानी से पानी
~ रसिक ~
बंटवारा
पानी लेने जब पनघट पर पहुँचा, तो पानी घट चुका था
अनायास आये हुये आगंतुकों मे, पानी बंट चुका था
पर्चा मिला था मुझे पाँच लीटर पानी का
तब पता नहीं था ऐसी मनमानी का
पर्चा में लिखा था,
साढे दस बजे पनघट पर पानी बंटेगा
पर दस बजे ही पानी बंट चुका था
हम पहुँचे तो पानी घट चुका था।
राशन की दुकान पर खाली पेट पहुँचा तो
सिर्फ बिखरा हुआ दाना पाया
दुकानदार से पुछा तो
उसने बडे प्यार से समझाया
तुम आज भी खाली पेट आ गये ?
सारे राशन तो खाते पीते लोग खा गये।
कन्हैया प्रसाद तिवारी
जाड़े हिम्मत हार गइल बा
देखऽ पानी ठार भइल बा
तन पो पानी कइसे डालीं
हमसे सबके जार भइल बा
चना फेड़ पो लोग चढ़ावे
भोर स्नान के लाभ बतावे
अपने गांती बान्हे घूमे
हमरो तन के हाड़ गलावे
कुक्कुर जइसन कुहुकत बानी
कइसे डालीं देह प पानी
बाभन के मतलब ई ना हऽ
रोज नहाईं ठंढ़ा पानी
कवनो रहिया रसिक निकालऽ
एह बिपत से तनि बचालऽ
दह चूरा के नेह निमंत्रण
दम आलू संग आके खालऽ
रसिक
मोबाइल से बुढ़वो भी फेल बा
************************
लेटेस्ट के फेरा में ओलडेस्ट अरुआइल बा
बइठत नइखे पटरी तऽ मन खरुआइल बा
नेट जब चलेला तऽ फेंटा बन्हा जाला
मुँह के फुलवला से मन अकुलाइल बा
लइकन के के कहो बुढ़वो भी फेल बा
मेहरी से खटपट मोबाइल से मेल बा
गिंजन कराई अब मोबाइल बुढ़ारी में
एटीएम छिनाइल आ घर हीं में जेल बा
सिलवट पो कूच दऽ रसिक मोबाइल के
प्यार से पकड़ लऽ पुरनका स्टाइल के
बन्धुआ मजदूर बाड़ऽ औकात मत भूलऽ
मेहरी के दरद के दरकार बा स्माइल के
~ कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक
गमछा से लोर पोछ छाती पीट डहँकी ले
भोरे भोरे सोचिला कि सांझ कइसे होई
लिखल विधाता भाग कवनी कलमिया से
सुखवा में सभे दीखे दुखवा ना कोई
गमछा से झापी तापी ओढ़ना जोड़ात बाटे
जिनिगी भइल बाटे आटा के लोई
कइल मजूरी मजबूरी बा गरीबवन के
पाले ना परे असो खेतवा का बोई
माटी
****
माटी के तन बा माटी में मिल जाई
माटी के आपन बनावल करऽ भाई
गगन से बात करे महल बा माटी पर
माटी के सिर से लगावल करऽ भाई
माटी के बैरी माटी में मिल गईल
माटी के प्यार में लो गर्दन कटाई
ई मत जनिहऽ कि माटी खराब होला
माटी से होला तोहर पेट भराई
रसिक के रसना माटिये के गुन गावे
उठते कपार देले माटी प झुकाई
माल खजाना सब माटी से आइल बा
अंतिम समय में सब माटिये में जाई
कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक
माई
***
चरण में सैकडों जिसके , माँ गंगा समाई है
धरा पर ध्यान से देखो , तो वो साक्षात माई है
नहीं कोई चुका सकता , जिन्दगी में कमाई से
कहीं भी चैन ना मिलता , होकर दूर माई से
~ कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक
लउकत नइखे आन्हर बानी
चरण कमल के सानी बानी
छड़ी हाथ से छूट गइल बा
मन में राउर नाम धइल बा
तन के तुरही बाजत नइखे
सुतल सर्प बा जागत नइखे
साधन योग भोग में बदलल
दरब देखके मन बा मचलल
आठों पहर पपीहरा बोले
मन में मधुर सुधा रस घोले
ऊपर शब्द समुंदर बाटे
नीचे सुगना चुन चुन छाँटे
जिनिगी जहमत तबहीं लागे
जब पहचान प ताला लागे
अंदर हीरा रत्न कन्हाई
बाहर सुनो न शब्द सवाई
राम से मिलन करावस राम
राम राम जै जै सियाराम
~ कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक
गरमी रे गरमी
नइखे बरतत नरमी
जे भी निकलत बा बधारी में
उनका के झोंक देता घुंसारी में
गोर चमडी के कर देता करिया
लोग घर में रहत बा भर दुपहरिया
श्रीफल और सत्तू आसमान चढ़ गइल बा
संतरा मौसम्मी जूस के भाव बढ़ गइल बा
लगन के पूड़ी पेट के रास्ते खेत में जाता
परान लेली इ गरमी अइसने बुझाता
कन्हैया बाबा के बंद हो गइल बा मनमानी
जलेबी छोड़ के खाली पियत बाड़न पानी
अंगूरी बदन अंगूरी नहीं रह गयी
उसकी लाचारी सबकुछ कह गयी
अपने वजूद को बचाने के लिये
लड़ते झगड़ते दिन तो किसी तरह
कट गया
पर रात कैसे कटेगी
अंगूरी क्या राम राम रटेग?
राम सर्वशक्तिमान है
हाँ ! सर्वशक्तिमान हीं राम है
रटना रटे या न रटे
परन्तु रटना पडता है
सर्वशक्तिमान के साथ
सटना पडता है
यही तो कहानी है लाचारी की
जिसे हर कोई दुहराता है
एक दूसरे के सामने
शेखी बघारता है
दर्द समझता नहीं
दूसरों के दिल का
खुद घायल होने पर भी
सिर्फ राहत महसूस करता है
दुसरों को सताकर
अपनी चुनर में साबुन लगाये
बर्षों बीत गये
क्योंकि सदावर्त में साबुन बाँटता है
दुर्गंध कहाँ से आ रही
समझ नहीं पाता
सिर्फ दूसरो को डाँटता है
आँखें भी बंद कर ली है
बुद्धि के साथल साथ
तब समझ कहाँ से आये
अंगूरी बेचैन है
उसे कौन समझाये ?
कन्हैया प्रसाद तिवारी
एगो किसान के दरद
****************
रोउ रे फुलेसरी तोर मरद मुअल जाता
सोझिया के गोंइठा में घीव अब सोखाता
काठ के करेज मेज चकाचक सफेद बा
कलम तऽ बा एके बाकी लिखे में भेद बा
धरती के धरम अब धरन पो टंगाता
रोउ रे फुलेसरी तोर मरद मुअल जाता
एक से हजार तोर मरदा बनावेला
हँसके पसीना रोज माई के पियावेला
पापी पहरूआ के अंतड़ी मोटाता
रोउ रे फुलेसरी तोर मरद मुअल जाता
कबो कबो दइबो के दया नाहीं आवेला
कबो सरकार के सिरमौर लो सतावेला
रसिक कादो मुअला पो रूपेया बंटाता
रोउ रे फुलेसरी तोर मरद मुअल जाता
हाथ ना पसारे ना बिसारे भगवान के
भुइंया पो सुतल बा उजर चदर तान के
साहेब के कुरता पो कलफ़ दियाता
रोउ रे फुलेसरी तोर मरद मुअल जाता
टुकुर टुकुर ताके देखे अपना सवांग के
केहु ना संवारलस फुलेसरी के मांग के
एके साथे दु न अब दूर देश जाता
रोई ना फुलेसरी अब रोवेले बिधाता
सोझिया के गोंइठा में घीव अब सोखाता
~ कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक
पाप की कमाई अभिशाप बन बैठ गयी
फल पक गये तब शोर क्यों मचाते हो
सत्ता जब हाथ में था पाप भरपूर किये
खुल गया भेद तब लोर क्यों बहाते हो
असहाय दीन हीन जनता जनार्दन का
तोड़के भरोसा भीड़ जोर क्यों दिखाते हो
रक्त बीज बनकर फलें फूले चहुँ ओर
देख विकराल रूप पोर क्यों कंपाते हो
कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक
हम ना रहबि ए रानी तहरी पलानी
सानी मिलत नइखे
घोंटऽतानी छूँछे-छूँछे पानी
सानी मिलत नइखे
बाते बाते बात गढ़के करेलू लड़ाई
निंदा ससुरारी केरी नइहर के बड़ाई
नइहर के बड़ाई
टोटले निकाल देलू मय बाल चानी
सानी मिलत नइखे
घोंटऽतानी छूँछे-छूँछे पानी
सानी मिलत नइखे
करियट्ठ कहि कहि हमे निहसावेलू
अपने हिरोइन हऊ लोग के बतावेलु
लोग के बतावेलु
गोड़वो के धोवन नइखीं रावा राजा जानी
सानी मिलत नइखे
घोंटऽतानी छूँछे-छूँछे पानी
सानी मिलत नइखे
तोहरा से नीमन बाटे देवरा रसिकवा
दोना में जिलेबी लेके बइठेला पंजरवा
बइठेला पंजरवा
काल्हुए ऊ देले रहे मुनरी निशानी
सानी मिलत नइखे
घोंटऽतानी छूँछे-छूँछे पानी
सानी मिलत नइखे
~ रसिक ~
एक हो गये हैं सब नेवले और भुजंग
रोटी छिनी सियासत की दिखे सभी अपंग
अपने कर्म दिखे नहीं दुर्जन दोषे पीर
संचित सब स्वाहा हुआ नींद हो गयी भंग
~ कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक
एमसीडी चुनाव से एकर कवनो संबंध नइखे
चढ़ल भँडेहर जल्दी उतरल , मनमानी बेवहार से
भइल विदाई दुलहिनिया के , जल्दी एह संसार से
गवने आइल गीत गवाइल , परिवार क मन हर्षाइल
करम बहुरिया अइसन कइली , चल गइली ससुरार से
रसिक
बिहारी
*****
बिहारी जहाँ रहेला , बहार उहाँ आवेला
देशवा के शान बान , महान बा बिहरिया
ताल ठोक करे काम , दिल में रहेले राम
बुद्धि के विरासत से , प्रधान बा बिहरिया
सीधा साधा बा बसन , काम में लगावे मन
कठिन परिश्रम में , ईमान बा बिहरिया
रसिक बिहारी संग , अंग में उमंग धरऽ
श्रेष्ठता में वेद और , कुरान बा बिहरिया
******
नाहीं करब दहेज के , किरिया बानी खात
जेके लागल रोग बा , पिछवाड़े दीं लात
पिछवाड़े दीं लात , सम्भल ना पाये कबहुँ
माथ समाज कलंक , रसिक कहेलन सचहुँ
बेटा बेटी एक , प्यार के परचा भऽरब
आगे बढ़ी समाज , दहेज के नाहीं करब
*******
पतई गिरल जमीन पर , देलस कुछ संदेश
जिनिगी बीतल नाचते , नाचत छूटल देश
नाचत छूटल देश , न कवनो शिकवा बाटे
जीयत देनी छाँह , मरत तन धरती साटे
जीवन मरन सुभाव , सृष्टि के हउए सत ई
बिरिथा बाटे मोह , मनुज बन जा तू पतई
*****
बइठल रहीं जमीन पर , कबो न लागी चोट
अहंकार पहुँची गगन , मन में उपजी खोट
*****
बिहारी
*****
बिहारी जहाँ रहेला , बहार उहाँ आवेला
देशवा के शान बान , महान बा बिहरिया
ताल ठोक करे काम , दिल में रहेले राम
बुद्धि के विरासत से , प्रधान बा बिहरिया
सीधा साधा बा बसन , काम में लगावे मन
कठिन परिश्रम में , ईमान बा बिहरिया
रसिक बिहारी संग , अंग में उमंग धरऽ
श्रेष्ठता में वेद और , कुरान बा बिहरिया
******
अलकों से टपके पानी
यूँ नयन लगे मस्तानी
बदन पर झीना पड़ा लिवास
तो समझो आया है मधुमास
नयन पुनि पुनि दोहराये चाल
बेमतलब करवट लेत कपाल
अंग का रंग जगाये आस
तो समझो आया है मधुमास
चाल में चंचलता जब आये
होठ रह रहके जब मुस्काये
जोर से आये जब उच्छवास
तो समझो आया है मधुमास
कवि की कलम करे किलोल
पिलाये सबको मिश्री घोल
लेखनी से जब करे परिहास
तो समझो आया है मधुमास
******
ना त रिश्तेदारी में रस ना रंगदारी में रंग बा
खोट होता रिश्ता और नोट खातिर जंग बा
अपनापन सभे भुलाके खानापूर्ति करत बा
खजाना भरल रहे एही खातिर लो मरत बा
सोझिया के घर परोजन त सभे मलिकार बा
अपना माथ प परे त उल्टा बेवहार बा
सभे शिक्षा देता नेक बनेके
पर करत बा लो अपने मने के
भाई भाई के परेम पुरान हो गइल
आपन सुन्दर लुगाई के गुमान हो गइल
माई के सेवा सुत गइल चुहानी में
सभके रस मिलेला आन के कहानी में
एह चाल से समाज के काया पलट ना होई
आज खुश बाड चल्हाकी पो त काल्ह सभे रोई
कन्हैया बाबा केहु से कुछ ना कहीहन
आज खुश बाड़न काल्हो खुश रहीहन
खुश रहला में ही जीवन के अर्थ बा
नाहीं त एह धरती प सबकुछ ब्यर्थ बा
***
सड़क सुरक्षा
जिये के अधिकार बा सभके , मुवल केहु ना चाहे
जिनिगी में हो हँसी ठिठोली , लोर केहु ना चाहे
खुद से ज्यादा प्यार करेला , सभे अपना जान के
कोई रानी के कबहूँ ना मांग धोवल चाहे
जीवन से सभे प्यार करेला
दुर्घटना से सभे इन्कार करेला
सड़क सुरक्षा के अपनाव लोग भाई
घरो में एगो परिवार रहेला
उत्तेजना ऊर्जा के प्रवाह होला
दुर्घटना में ओकरा के बर्बाद मत कर
पहिया के सड़क पो सरपट चलेद
बाई के बेग में खराब मत कर
उ तेज रफ्तार के दीवाना रहल हा
ओकर चेहरा पहचाना रहल हा
खाक में मिला देलस खुदके
काहें से कि उ मनमाना रहल हा
सड़क पो सरकल ठीक लागेला
खुशी खुशी घर चहुँपल ठीक लागेला
तेज रफ्तार दुनिया बदल देला
मुठ्ठी में परान लेके चल देला
कायम राखेला जिये के इच्छा
सड़क सुरक्षा
खोल देला मौत के द्वार
तेज रफ्तार
आईं सभे सड़क सुरक्षा अपनावल जाव
अपना के दुर्घटना से बचावल जाव
समय पर सुरक्षित अॉफिस जाके
खुशी खुशी घर आवल जाव
मोड़ पो गाड़ी धीरे हँकिह
आँख खोल संकेत के बँचिह
गियर ब्रेक के करे द काम
रफ्तार से पहिले कस लगाम
आज्ञाकारी बन सड़क पो
ध्यान न द तु तड़क भड़क पो
बंद रखीह आपन मोबाइल
रखीह इयाद चालक स्टाइल
लइकन के मत दिह गाड़ी
उ बाड़न सन बहुत अनाड़ी
सड़क सुरक्षा उ ना जनिहन
थाना मे उ रात बितइहन
~ रसिक ~
मोबाइल
*******
खा गया सुख चैन सारा हाथ में आया मोबाइल
बढ़ गयी हैं दूरियाँ अब घर तलक आया मोबाइल।
हो गए अनजान आशिक मैं तो सच्ची कह रहा हूँ
ढेर सारा दर्द लेकर आ गया दर पे मोबाइल।
दोस्तों की महफिलें थी क्या ही था गुजरा जमाना
साथ ही बैठे रहे कल सांस पर पसरा मोबाइल।
दस कदम के फासले पर यार की दुनिया बसी है
सन्न सी अधखुली आँखें गजल का मिसरा मोबाइल।
घूमता अहले सहर था पैर फिसलें दूब की दरी
दाब शोणित चढ़ा ऊपर हाथ थरथर धर मोबाइल।
रसिक साजन छोड़ दे अब अँखियाँ लड़ाना गैर संग
देख बीबी पास बैठी हाथ में जकड़े मोबाइल।
रसिक
माई के चरनिया में चारो धाम बसेला बाबूजी के छाया बा अपार
बाबाजी क बोलिया से राम रस टपकेला होला रोज शक्ति के संचार
भईया भाभी जिनिगी में जोन्ही जस चमकेले रहिया में कइले उजियार
गोदिया के बबुआ के चेहरा सोहावन लागे सुख पावे पूरा परिवार
ए बबुआ गँउआ में बहुते बा प्यार
घरवा के लक्ष्मी के पछिमी ना होखे दीऽह
भूलिहऽ न अपन संस्कार
ए बबुआ गँउआ में बहुते बा प्यार
आजी माई किरपा करीहें दुख हरिहें
दुआ दीहें दिल से अपार
ए बबुआ गँउआ में बहुते बा प्यार
रसिक के रोंवा रोंवा राम राम रटे लागे
रामजी करीहें बेडा पार
ए बबुआ गँउआ में बहुते बा प्यार
रसिक
औरत
*****
रब ने बनाई मूरत उसमें प्यार का रंग चढ़ाया
धरती पर जब भेजा उसको सबने गले लगाया
माँ बेटी बनिता अौर बहना सब है रूप निराला
प्रेम पयोधि तृप्त करे उर मन मंदिर बैठाया
प्रात: नमन करूँ नारी को सारा दुख टल जाये
मुस्कान जो देखूँ बिटिया की तो क्रोध वही जल जाये
माँ की ममता हमे बताये सत पथ पर चलने को
और बहन की छीना झपटी कहे धैर्य धरने को
रूप जाल में बांध के रखती वो नारी घरवाली
कदम न बहके गलत मार्ग पर करती है रखवाली
नारी का सब रूप कन्हैया बंदनीय हर काल में
जो नर करे निरादर उसकी समझो फँसा जंजाल में
~ कन्हैया
चौसर बिछा विभेद का , नेता खेलें खेल।
जो पहले थे जिगर में , आज हुए बेमेल।
आज हुए बेमेल , घिनौनी हरकत करते,
जिसके थे वे शिष्य , आँख में आँसू भरते।
शिकवा किससे करें , माथ पटकें किसके दर।
नेता मालामाल , पसारे भेदक चौसर।
आज भी शिशुपाल की आत्मा कोहराम मचा रही है
कृष्ण को गुंडा मवाली सरेआम बता रही है
शायद उसे पता नहीं कि गिनती शुरू हो गयी है
इसिलिए अपने कृत्य पर मंद मंद मुस्करा रही है
प्रभु ,
आनंद दाता हो तो दुनिया दर्प में क्यों घूमती है
निज खुशी को छोड़ गैरों की कलह को चूमती है
ज्ञान पाकर हे प्रभु क्यों विष वमन है कर रही
छोडकर सुन्दर सुमन दुर्गंध को क्यों सूंघती है
जिनिगी के पल सुखद हो , संतन देसि असीस
आठो पहर उपासना , होखसि परगट ईश
होखसि परगट ईश , जरइले मन में जोती
अंतस् होय इँजोर , मिले परसादी मोती
रंग खिले कचनार , काँट के लागे चिनगी।
काल करावे जोग , फरे - फूले ई जिनगी।
मैं मूर्ख हूँ ,
फिर भी मुझे मूर्ख बनाना चाहते हैं ?
मैं मना नहीं करूँगा
काले को काला रंग लगाना
रंग की बर्बादी है
मूर्ख को मूर्ख बनाना
......को आजादी है
शायद समझ गये होंगे
मैं तो कुछ नहीं समझा सकता
क्योंकि मैं समझदार नहीं मूर्ख हूँ
तो फिर किसी समझदार से समझ लीजिये
रसिक तो कहता है कन्हैया को माफ कीजिये
मुझे सबकुछ मिल जाय से देश का उत्थान नहीं होगा
देश को सबकुछ मिल जाय से देश का उत्थान होगा
~ रसिक ~
लोग कहेला लउकत नइखे
बाकी ऊ त पंजरे बाटे
भलहीं केहू भागे कतिनो
ऊ अपने में सभके साटे
करम कमाई लेखा जोखा
सभके खाता रखले बाड़े
केहू के घर दूध मलाई
कतहीं जूठन चखले बाड़े
आपन अनकर भेद ना करस
सभके अंगुरी कस के धरस
छल से छलनी होत करेजा
तबहूँ सभके धोकरी भरस
बेमतलब लो दोष लगावे
ओकरा के निजी बतलावे
माल मिले तऽ चढ़े चढ़ावा
ना मिलले अछरंग लगावे
बइठ कन्हैया हँसत बाड़े
धोकरी में धन कसस पांडे
रसिक के दिहल हँसी डोज हऽ
पीयऽ ना तऽ लगिहें कांडे
लोग कहेला लउकत नइखे
बाकी ऊ त पंजरे बाटे
भलहीं केहू भागे कतिनो
ऊ अपने में सभके साटे
करम कमाई लेखा जोखा
सभके खाता रखले बाड़े
केहू के घर दूध मलाई
कतहीं जूठन चखले बाड़े
आपन अनकर भेद ना करस
सभके अंगुरी कस के धरस
छल से छलनी होत करेजा
तबहूँ सभके धोकरी भरस
बेमतलब लो दोष लगावे
ओकरा के निजी बतलावे
माल मिले तऽ चढ़े चढ़ावा
ना मिलले अछरंग लगावे
बइठ कन्हैया हँसत बाड़े
धोकरी में धन कसस पांडे
रसिक के दिहल हँसी डोज हऽ
पीयऽ ना तऽ लगिहें कांडे
हनुमान जयंती के अवसर पर एगो रचना बा
बोलऽ जय श्रीराम ए भइया ,
बोलऽ जय श्रीराम ।
बोलबऽ राम तऽ हनुमत अइहें ,
देखते उनुके दुख परइहें
हवा बतास के भय मत करीह
हिम्मत से ल काम, ए भइया
बोलऽ जय श्रीराम ।
अंचरा कचरा मन से निकालऽ
नाम के अमरित अंदर डालऽ
रसिक के बा पैगाम ए भइया
बोलऽ जय श्रीराम ।
वीर हनुमान के भगति करिके जिनिगी सुफल बतावऽ
प्रभु के खातिर बड़े प्रेम से तन मन दाँव लगावऽ
जय हनुमान कहत दिन बीते
सुबह दुपहर शाम ए भइया
बोलऽ जय श्रीराम ।
दाँत के दरद
******
भाग रे मरदे!
इहवाँ अदिमी मूअल जाता
दाँत के दरदे।
सवख बड़ुवे नाचे के त
नाच बेपरदे।
कउँची कहीं?
ना बोलले कुछुओ सोच सोच
सीधे मरले लाम चोंच
आ लागल जब धोती में खोंच
का उपाय बा?
रफ्फू कर दे।
इहाँ रात भर छपिटइनीं हँ,
मइल बलिस्ते लपिटइनीं हँ
चटकन चटकन गाल थुराइल
तबहूँ ना कुछ नरम बुझाइल।
अब त हो गइनीं बदहाल
कवनि चुरइल फेंकलि जाल
अइसे दरद न जाई
चलऽ करादीं तनी ओझाई।
मरिचा के धूकुन से भइया
आँख बड़ी पपराता
फीका बा दाँतो के पीरा
थोरिक नीक बुझाता
छोट लकीर के बगले खींचल
बड़हन रेख जनाता।
डँकदर त तकते रहि गइलें
ओझऊ आपन पीठ पूजइलें
मूरगा दारू सभ घपिअइलें
ऊपर से सीधो सरिअइलें
बाकी दुइए दिन का बाद
उपटल तेज दरद उदमाद
भइले शुरू दोहइया हइया
ओझऊ छरपस ता ता थइया
तोबड़ा मरिचा के चढ़वइले
अबकी राम कहाँ सहि पइले
भाग रे मरदे!
ऊ ओझवा के तू का करबे?
भइलस उनुकर अइसन पूजा,
सात पुहुत तक इँकसे चूजा।
हमरो नीक दवाई भइल,
चारि दाँत फिन बोअल गइल।
~ रसिक ~
पुरवा बयार बहे काहें गोरी दुख सहे
रहि रहि जियरा जरावे रे चइतवा
रसे रसे रस चुवे महुआ के कोंचिया से
कोइली के बोली बउरावे रे चइतवा
गेहूँ के कटनिया में टूंड़ गड़े कनिया में
टभ टभ टभ टभकावे रे चइतवा
देवरा दुआर झाँके बात कहीं साँचे साँचे
मन के मुराद के मिटावे रे चइतवा
नीन लागे भोरे भोरे देह दुखे पोरे पोरे
मनवा के रोज भरमावे रे चइतवा
~ रसिक ~
# कनिया = कानी अंगुरी
आव मईयाजी के घरवा सजाऽव ए भाई
माई आवतारी अंगना लिपाऽव ए भाई
रोज नव दिन दुआरा गुलजार रही हें
सुबह शाम दुपहरिया झनकार रही हें
आव चुनरी में गोटा लगाऽव ए भाई
माई आवतारी अंगना लिपाऽव ए भाई ।।
बाजी झांझ ढ़ोल तासा , रही सगरो परकाशा
धूप दीप गंध फूल , मिटी जियरा के शूल
घर में चहकत चिरईं उडाऽव ए भाई
माई आवतारी अंगना लिपाऽव ए भाई
कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक
पढ़ि के मन में अनुराग उगे,
अस पाठ पढ़ावल नीमन बा ।
जवना जुगुती सभ लोग जगे,
अस बात बतावल नीमन बा ।
सच पूछि त पीर भरे मन से ,
उधियान सरीसहिं खौलत बा ।
चिपका उनुका क हिया भितरे ,
कुछ बात बढ़ावल नीमन बा ।
खल खल के मानुख धरती पर ,
अपने हीं धुन में मस्त रहे ।
दोसर के बात चलाइब ना ,
अपने करनी से पस्त रहे ।
अरकठिया तन कठुआइल बा,
सरकार क असरे ढींढ़ भरी ।
ऊ ताकस रोज बँडेरी पर ,
मलिकाँव मिलल जे व्यस्त रहे ।
रसिक
तूती बोलत रहे जवानी में , अब तू तू होता
मलेछुआ के बस गइल उजड़ल खोंता
मलेछुआ अब हो गइल महालक्ष्मी प्रसाद
चौकीदारी में लागल बा चौधरी के औलाद
पढ़ लिख के बन गइल पीएचडी डाकदर
बनके आइल बा जिला मे कलकटर
रसिक
जेकरा दिल में प्रेम की दीया जर गइल
समझीं कि ओकर जिनिगी सुधर गइल
रह रह के जवन हूक उठत रहे करेजा में
उ छन भर में देखते देखत गुजर गइल
कन्हैया बाबा के आँख तबे खुलेला
जब प्रेम के प्रसाद अंजुरी में मिलेला
सुबह सुबह बाबूजी के चरण रज
आ नन्हका के मुखारविन्द खिलेला
~ कन्हैया
अँउजापथार
अटर-पटर कतिना खोभार,
मगज महल मध परल पथार।
अँउजापथार।
बेतरतीब बहारन झारन,
लगले सँउसे देह लसारन,
बइठ खटोले करस गुहार।
अँउजापथार।
बद बेकहल टहल टिकोरा
अनगूतहीं से तोरा - मोरा,
पाँव फटल बदहाल बिवाई,
फेंकलि जाल बायमत माई,
हउवे ऊ नइहर के नार।
अँउजापथार।
नीम के डहुँगी लवँग फूल
लगते झापड़ भागल शूल।
मूँड़ी झूमल आँखि घुमावल
फारि नरेटी पचरा गावल
भाठा के बनि गइल सियार।
अँउजापथार।
ईहे मंतर जपिहऽ पूत
कहले बात रसिक अवधूत
बाजी माथ चमरुआ जूत
भाग परइहें परिकल भूत
लतखोरन के अस उपचार।
अँउजापथार।
~ रसिक ~
मन की कटुता जब जुबान पर आती है तब जंग होता है
नफरत का व्यापार पनपता है, सामाजिक सौहार्द्र भंग होता है
प्रेम की परिभाषा जानबूझ कर समझ में नही आती है
समाज में भाईचारा और सहिष्णुता का पहनावा तंग होता है
कन्हैया
धइले बा बबुआ के, प्यार के बुखार हो,
लइकी सँघतिया बनल, जिया के आधार हो।
जगल - सुतल बबुआजी जप माला फेरस हो,
सजल - धजल सपना में, बबुनी के हेरस हो।
कुल मरजादा लागे छाती के पहार हो।
नया जुगे नया सोच बाकिए बेकार हो।
जाति - पाति सभे कुछो, छान्ह प धराइल हो।
प्रेमवा क रसरी में नवही बन्हाइल हो।
रसिक के मगज धइले एकेगो सवाल हो।
कुछे दिन बीतला पऽ, काहे बा बवाल हो।
उतरल हाली काहे देही के खुमार हो।
पड़ गइले हिरदा में बित्ता भऽ दरार हो।
मन भ कुँखौनीं लेके गइली खामखाह हो।
दिलवरजानी धइली अपन अउरी राह हो।
कइलनि बाबूजी से बाबू अब गुहार हो।
गँवईं सुलछन चाहीं रूपवन्ती नार हो।
लवटि के बुद्धू भगत अइले आपन घरे हो।
चान सूरुज ललना दू अंगना में बरे हो।
प्यार कइल बबुआ हो दइबा के दुलार हऽ।
तन के सिरावे महज छनिका के जुआर हऽ।
~ रसिक ~
हे नारद ! तू रहो नदारत वरना सत्य उगल दोगे
बनी बनाई फुलवारी की फुनगी तुरत मसल दोगे
झूठ का जंगल पनप रहा है सबको झूठ पसंद है
चमचागिरी और चुगली में ही लगता परमानंद है
चुगलखोर चुगली करते हैं समय की कोई सीमा नहीं
हाँ में हाँ मिलाते रहिये इसकी कोई बीमा नहीं
जब पड़ जाये उल्टी चाल तो हँसकर दाँत दिखा देना
चुगली के फायदे अनेक हैं क्षण भर में समझा देना
सत्य का दामन थाम के रोया पतली मेरी लाठी
कैसे करूँ प्रहार पुरोहित कुंठित है परिपाटी
आस लिये मैं डटा हुआ हूँ वक्त कभी तो आयेगा
सत्य का विजय पताका होगा झूठ वहाँ शरमायेगा
कन्हैया
रूह निकल गयी तन से
मन घुमता है गली गली
सुन रहा है अपना अतीत
लोगों के मुँह से बुरी भली
जिन्दगी का मतलब समझ आया
मरने के बाद क्या खोया क्या पाया
समझ आया मरने के बाद
मन भटक रहा है तन पाने को
खूबसुरत दुनिया को गले लगाने को
जीते जी जो भटक गया था
वो मरकर मन को भटका रहा है
साथ कोई नही देता मन उलझन में अटका रहा है
इसी को कहते है संसार का झमेला
आना है अकेले और जाना है अकेला
दुनिया के लोग उलझन बढ़ाते है
मरने के बाद "राम नाम सत्य है " पाठ पढ़ाते है
कन्हैया
मैने श्यामपट पर एक लकीर खींच दी,
और लोगों से पूछा ये क्या है ?
किसी ने लाइन बोला ,
किसी ने लकीर तो किसी ने रेखा ।
पर मैने तो कुछ और हीं देखा
बिंदुओं का आपसी मिलन
एक दूसरे के संपर्क में आकर
अपना नाम स्वरूप यहाँ तक कि
अपनी पहचान बदल दी
अब वे सब मिलकर
लकीर या रेखा कही जाने लगी।
ऐसा नहीं कि बिंदुओं का महत्व नहीं है
हर बिंदु का अपना अलग अस्तित्व है और अपनी पूर्णता को यथासम्भव परिलक्षित करती है
और सम्मान पाती है।
हर व्यक्ति बिंदु है और समाज रेखा
उसे अनदेखा मत करो ।
जीवन से कटुता हटा कर
दिल में प्यार भरो ।
~ रसिक ~
हाथ जोड़ रहत बानी राम राम कहत बानी
बेडा पार सभके लगइहें श्रीरामजी
मन के भरम मिटी तन में उमंग दीखी
जिनिगी में जोत के जरइहें श्रीरामजी
राम राम कहला से पानी जस बहला से
मन के मुराद सब पुरइहें श्रीरामजी
रसिक के जबान जागे राम नाम रस पागे
आगे आगे रहिया बतइहें श्रीरामजी
काहें तलाक बा
************
बबुआ के लागल बा प्यार के बोखार
लइकी संघतिया बिया प्रान के आधार
सुतल जागल बबुआजी जाप ओकर करेलन
सपना में सज धज के मांग ओकर भरेलन
अपना पुरनिया के पुरनका विचार बा
नयका जमाना में नयका अवतार बा
जात पांत सबकुछ छान्ही पो धराइल बा
प्यार के बन्हन में नवही बन्हाइल बा
रसिक के मन में एगो सवाल बा
साल भर बितला पर काहें बवाल बा
उतर गइल जल्दी लभिआइल बोखार
पड़ गईल मन में लमहर दरार
लेके मुआवजा अलगा हो गइली
प्रान के आधार अब नया राह धइली
बाबूजी से करेलन अब बबुआ गोहार
गाँव के लछनउतिन के बनब भतार
सभ कुछ गंवाके गाँव में अब अइले
दुगो मनबसिया के पापाजी कहइले
प्यार कइल बबुआ हो दइब के दुलार हऽ
तन के तड़पावे वाला आनंद के फुहार हऽ
प्यार के बंधन तऽ फेविकोल के जोड़ हऽ
तन पो उताराला पो पेट के मरोड़ हऽ
जात पांत बबुआ हो बाबा ना मनेलन
दिलवा के भाषा बाबा दिल से पहचानेलन
बाबा कन्हैया के बोली कटाह बा
दिल में उतरबऽ तऽ गरमी में छांह बा
कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक
एगो छठ के गीत
*******
तन बा बिदेश मन गाँवे बा ए माई
रहि रहि याद आवे छठ के पुजाई ।।
उखिया शरीफा फल
दउरा लेके माथे चलल
रहि रहि याद आवे ठेकुआ बनाई ।।
तन बा बिदेश मन गाँवे बा ए माई
रहि रहि याद आवे छठ के पुजाई ।।
जोड़ा कलसूप नरियर
धोतिया पहिरी पियर
रहि रहि याद आवे घाट के लिपाई ।।
तन बा बिदेश मन गाँवे बा ए माई
रहि रहि याद आवे छठ के पुजाई ।।
बहंगी के लचकन
याद आवे बचपन
भिखिया में मिले फल ठेकुआ मिठाई
तन बा बिदेश मन गाँवे बा ए माई
रहि रहि याद आवे छठ के पुजाई ।।
बाबा भूंइपरी करस
बबुआ के भारा भरस
देख देख हुलसेले रसिक कन्हाई ।।
तन बा बिदेश मन गाँवे बा ए माई
रहि रहि याद आवे छठ के पुजाई ।।
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
सखी पीर सहल ना जाये
जबसे गइलन छोड़ कन्हैया
मन मोरा अकुलाये,
सखी पीर सहल ना जाये
पनघट गगरी कंकड़ पूछे
काहें बाड़ी राधिका छूछे
एह फागुन में प्रेम के साबुन
मल मल नहीं नहाये ।।
सखी पीर सहल ना जाये ।।
ए सखी कवन कसूर भइल बा
मन में विरह नासूर भइल बा
सुसुक सुसुक के बीते रतिया
अँखियन नींद न आये ।।
सखी पीर सहल ना जाये ।।
आँख मूंद के बइठे राधा
छन में दूर भइल सब ब्याधा
मन के अंदर श्याम समइले
बात कहल ना जाये ।।
सखी पीर सहल ना जाये
कन्हैया
जरले पर दिलवा जरावऽता
ई फागुन आग लगावऽता ।।
सभके आपन सेज सुहाला
हमरा सेज प लागे भाला
जाने कबले साजन अइहें
रही रही चाप बढ़ावऽता ।। ई फागुन ••••••।।
देवर के तेवर तुरंग बा
चढ़ल जवानी खिलल अंग बा
होली में टोली टपकेला
अंगिया छुवत कंपावेला ।। ई फागुन •••••••।।
अबीर-गुलाल गाल प लागे
सुतल मैना चिहुक के जागे
ए बालम हम सांच बताईं
सेजिया तोहे बोलावऽता ।।ई फागुन ••••••••।।
रसिक सुनावस गीत मनोहर
मनवा चाहें सुनल सोहर
बोलऽ कहिआ आस पुरइबऽ
तोहके मन गोहरावऽता ।।ई फागुन ••••••।।
रसिक
कान्हा बन गइलें नार
ए गोरी गोदना गोदइबु
अइसन गोदऽब कि तनी ना दुखाई
खिल जाई तन मन मने मुसुकाई
नगद नाहीं गोदबो उधार हो
आ हे नगद नाहीं गोदबो उधार
ए गोरी गोदना गोदइबु ।।
कान्हा बन गइलें नार
ए गोरी गोदना गोदइबु ।।
कान्हा जब पकड़ेलन रधिका कलाई
मनवा के तार गइल छुवते गनगनाई
निक लागे लागल संसार हो
आ हे निक लागे लागल संसार
ए गोरी गोदना गोदइबु ।।
कान्हा बन गइलें नार
ए गोरी गोदना गोदइबु ।।
राधिका पो रंग चढ़े लागल धीरे धीरे
भूल गइली सुध आपन जमुना के तीरे
जान गइली हवन इ ईयार हो
आ हे जान गइली हवन आ ईयार
ए गोरी गोदना गोदइबु ।।
कान्हा बन गइलें नार
ए गोरी गोदना गोदइबु ।।
कन्हैया
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