Friday, 27 September 2019

भोजपुरी दोहा




मन में भरल बिभेद बा, चतुरानन चौपाल ।
भेड़िया लउके शेर जस, ओढ़ झूठ के खाल ।।

का सूतल का जागरन, जब कइले मदपान।
कहाँ ज्ञान हमरा नियन, कहाँ सरिस रसखान?

माहुर मीठ जुबान के, समुझे कहवाँ लोग ।
छैल छबीली पातकी, मिलन बढ़ाये रोग ।।

दो पइसा संतोख के , रसिक चबावस पान ।
शीश महल में स्वान के, भउँकत निकसे प्रान ।।


ना होला ऊ मतलबी , जेकर दिल में राम
वैसे सज्जन को सदा , नित उठ करीं प्रणाम

होना जिन्दादिल सदा , गम को गोली मार ।
आज बनालो आपनो , कल की फिकिर बिसार ।।

बिथा सतावे रामजी , कवनि गति उध्दार ।
अँखिगर आन्हर हो गइल, चतुर्मास के मार ।।

जिनिगी दोजख में परल , सूझत नइखे राह ।
रतना गइली मायका , के करिहें परवाह ।।

भकसावन रतिया लगे , करिया मेघ अकास ।
तन के सगरो ठौर बा , मन के कहाँ निवास ?

पुतरी बइठलि भामिनी, डाढ पात सिहराय।
झिंगुर धुनि कंगन लगे, हियरे आस थिराय।।

चोट परे जब मूल पर , बल भुजंग बढ़ जाय ।
पलखत पा के जीव तब , छप्पर पर चढ़ जाय ।।

आपहुँ मरो बिलाय जग , खुले तिपथ का द्वार।
सुगना उड़े अकाश में , धरती पर सुख सार ।।

नदिया उफनत वेग से , ता में शव उतराय ।
शव से जब शिव मीलिहें , जड़ चेतन बिलगाय ।।

नोटा कोटा ले गइल , पानी परल पथार ।
भरल डाँठ बा अन्न से , बदबू भरल बधार ।।

******* 10

मन के बान्हन तूरिहें, सबद रूप भगवान।
इहे मंत्र के देशना , कहले सिद्ध सुजान।।

नीमन दिन के आस में, दिन-दिन दूबर गात ।
आगत के जनिते पिया, बनल रहित अहिवात ।।

राम नाम के जपन से , बानी बिख बिलगाय ।
मन से बानी कर्म से, किरपिन लेख मिटाय ।।

सतवादी बइठल रहस , कुलटा करसि किलोल ।
इहे रीति कलिकाल के, व्यर्थ बजावत लोल ।।

आतम नदिया प्रेम के, सरस सोत भगवंत ।
चौकस चौपट अस लगे, बुड़बक लागे संत ।।

जाड़ ना लागे सैंया के, जोग करीं बहु ढंग
टाट बिछौना खाट पर , गाँती गरवा अंग

राम नाम के जाप से , बानी बिख बिलगाय ।
मनसा वाचा कर्मणा , किरपिन लेख मिटाय ।।

प्रेम पयोधि आतमा , सोत मिले भगवंत ।
चउपट चौकस सा लगे , बुड़बक लागे संत ।।

सतवादी बइठल रहस , कुलटा करे किलोल ।
कलियुग के ई रीति हऽ , लोग बजावे लोल ।।

मन में हीं रखना सदा , अपने मन की बात ।
लोग कसेगें फब्तियाँ , कर दिल पर आघात ।।

********* 20

मन को तारे मंत्र है , शब्द रूप भगवान
अपनी-अपनी देशना , कहते सदा सुजान

जभो जभो परिवार के , पात पात लहराय ।
बूढ़ा बरगद छाँह तर , सभके मन हरसाय ।।

सभके जिनिगी राम जी , बढत रहे सद्भाव ।
इरिखा दोख दरख्त का , गड़े न भुइयाँ पाँव।।

पत्नी पूत परेम के , होय परस्पर मान।
सन्मति हो परिवार में , अपनापन के भान।।

प्रेम हाथ अमरित कलश , पीयत चढ़े खुमार
आपन सुधि बिसराय के , प्रीतम के गर हार

चलनी के चालल सभे , झटकरले बा सूप ।
केहू नइखे छोटहन , सबहिन बाटे भूप ।।

सिधवा करे त पाप बा , दुष्ट दिखावे राह।
पद पावर पइसा कहे , हमरे होई चाह।।

गैरों का चुंबन गरल , बेलन मार पसंद ।
अपनी बीबी कर्कशा , फिर भी सेहतमंद ।।

नैतिकता के बात पऽ , सइ-सइगो उपदेस
संस्कार जोहत फिरीं , गइल बिबेक बिदेस

प्यारी दीदी अंजुला, बारंबार प्रणाम ।
सौ बरसों तक जिन्दगी, करे नहीं विश्राम ।।

********* 30

गंगा मइया के शरण , आइल बानी आज ।
पुत्र पहरुआ हो सदा , सेवा केवल काज ।।

स्वारथ में सभ चल गइल , तन मन के अरमान ।
सोचल हमरो ना भइल , बचवन के उत्थान ।।

संग सखी सुख हो अधिक , बिछुड़त टूटे शाख ।
विरह व्यथा पल-पल रहे , बसंत लगे बैसाख ।।

हरपल पति पर जो तनी , वह पत्नी आदर्श।
मीठी वाणी बोल के , खाली कर दे पर्श।।

रिश्तों में रस तब मिले , जब हो प्रेम प्रगाढ़ ।
जिनिगी बीते जश्न में , जेठ भी लगे आषाढ़ ।।

शिक्षा उत्तम है वही , मिले ज्ञान का सार ।
जिसकी सीमा पेट तक , वह शिक्षा बेकार ।।

शिक्षा जीवन में सही , कर दे जो उपकार ।
शिक्षा बने विलासिता , मन पर करे प्रहार ।।

मोल नहीं उस सीख का , करे सदा उत्पात ।
कर्कश वाणी कान में , करे हृदय आघात ।।

रसना में रस हो सदा , मुख पर हो मुस्कान ।
अंतस में सरिता बहे , कोई नहीं अजान ।।

शिक्षा नाम न योग्यता , जो कागज बंध जाय ।
असली शिक्षा है सही , गिरते गले लगाय ।।

******** 40

रसिक रसायन देत है , जिह्वा लियो लगाय ।
सार्थक शब्द सुनाय के , मंद मंद मुस्काय ।।

सार्थक शब्द सुनाय के , सभके मन बस जाय ।
घिरिना घट से दूर कर , बंशी चैन बजाय ।।

बुद्धि में खलबली मचल , टूटल दिल के तार ।
जीव पड़ल बा फेर में , खोज रहल बा प्यार ।।

मन निवास बा गाँव में , पिया बसे परदेस ।
गँवई माटी नीक बा , काहें कहीं भदेस ।।

फूल मूल बा धूल में , गंध उड़े असमान ।
बबुआजी परदेश में , अँचरे माई जान ।।

पंच तत्व बा गाँव में , बसे पारखी दूर ।
मूलबंध के शोध से , उर्जा हो भरपूर ।।

मन के सोंच सुवास बा , तन ना करी आघात।
कमल कीच के ना छुवे , बा अचरज के बात ।।

गाँव गाईं शोर बा , घुरहू के घर राम ।
के बा अइसन शहर में , जे चहुँपल बा धाम ।।

संग-संग दोनों पले, अश्रु और मुस्कान।
एक हरे जीवन थकन, एक ईश वरदान।।

निर्मल जल-सी जिंदगी, अलग रूप आस्वाद।
मिश्री के रस में मधुर, माहुर में अवसाद।।

********50

तन के चरफर ठीक बा , मन पो लगे लगाम ।
सुखिया के घर सांत बा , दुखिया घर कुहराम ।।

सभके मन हरियर रहे , मंगल होय बिहान ।
मन के दुविधा दूर हो , लोग बने इंसान ।।

अहंकार पर्वत बड़ा , तारो हे गोपाल ।
निर्मल उच्च विचार का , मन आये भूचाल ।।

हम कहनीं त झूठ बड़ , राउर कथनीं साँच।
हमता के तोसन बदे , इचिको लगे न आँच।।

बा बिबेक बनगोंइठी , आसमान में दंभ।
तन के सत्ता साँच बा , इहे गड़ी मलखंभ।।

उज्जर धपधप वस्त्र बा , मन कारिख भँड़सार।
लंपट लठधर संग में , चहुँदिसि जय जयकार।।

चापलूस पीछे पड़ल , चाँपे अनघा अन्न।
अरकठिया के भाग में , उहे कसैला कन्न।।

सरग-तरैयन तूरि के , आन दिहें महराज।
कवन परोजन कष्ट के , परल खुजाईं खाज।।

सागर मथले पा रतन , मगज मथाई ज्ञान ।
धनतेरस शुभ कामना , बने सभे धनवान ।।

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी , नरकासुर संधान ।
मुक्त करवले भामिनी , चकधारी भगवान ।।

*******60

काहें के चिंता करीं , जब मस्ती बा साथ ।
पर के चिंता छोड़के , पकड़ीं प्रभु के हाथ ।।

धर्म की धुरी प्रेम है , नफरत मन से टाल ।
मानवता को पुष्ट कर , उन्नत करो कपाल ।।

मास नवंबर सुखद हो , रखना गरम लिबास ।
साठा पाठा मत बनें , मन में रहे उजास ।।

रहना इसी जहान में , होना नहीं उदास ।
देख धरा के रूप को , ना करना उपहास ।।

मन मतवाला भृंग का , कली कली मँडराय ।
उत्पल अंक प्रवास कर , मंद मंद मुस्काय ।।

सबका मालिक एक है, अलग-अलग इंसान ।
कोई कपटी क्रूर है , कोई संत समान ।।

रावण रावण सब करे , रावण रूप हजार ।
सबके अंदर पैठ कर , रावण करे प्रहार ।।

आँख कान पट खोल दीं , मुँह के बंद कपाट ।
काने अंगुर डाल के , लोरकी गाईं खाट ।।


ब्रह्भचारिणी माँ करे , सब जन का कल्याण ।
औघड़ दानी के प्रिया , होखे मगज बिहान ।।

अइली माई गगन से , धइली धरती पाँव ।
शैलसुता के नाम से , पूजल जाली गाँव ।।

********70

चंद्रघंटा माई के , मणिपूरक बा वास ।
सिंह वाहिनी मात दे , दिव्य घोष अहसास ।।

माई के दरबार में , सभी तरह के लोग।
कोई माँगे बाहुबल , कोई सरबस भोग ।।

सूक्ष्म रूप स्वीकारिये, मन में रहे निवास ।
तन तुरंत दौड़े भले , मन अविचल का आस ।।

नव द्वारे को कर नमन , दसवाँ पुंज प्रकाश ।
ताहि द्वार से अंत में , सुगना उड़े आकाश ।।

खरा बात बोले सभी , खरा न सूने कोय ।
शब्द बान लागे हिया , आपा जल्दी खोय ।।

आमद बोली खर्च से , तेरी क्या औकात ।
मैं सूरज की रोशनी , तू अमावसी रात ।।

पूजा होत समाज में , डंका बाजे नाम ।
खर्च करे तबहीं बढ़े , आमद सुबहो शाम ।।

माया ममता छोड़ के, राधे राधे बोल ।
महाकाल के द्वार पर , दिल दरवाजा खोल ।।

सभ कुरसी के खेल बा , आन्हर लंगड़ यार ।
आफत में सभ साथ बा, बिल्ली कुकुर सियार ।।

राम मड़इया राम के , पुरहर बा संतोख।
ऊँच अटारी का कहीं , लउके खाली चोख ।।

**********80

खोजत खोजत राम के, खोंखड़ भइल शरीर ।
मन के खोंखा साफ ना , बढ़ल अंत में पीर ।।

साफ करत अनकर चुनर, खुद में हमता-दाग।
सभ गइले पूरब दिशा , हम रहनीं हतभाग ।।

मलय परस अनमोल बा , बिखधर आसन खास।
सज्जन नेक सुभाव से , दुजन लगाये आस ।।

शूल भरल सत के डगर, जबर जिगरिया जाय ।
जेकर हिरदय पुलपुला, छाहाँ परि पछिताय।।

उरझि परल भँवजाल में, चक्करघिन्नी प्रान।
दरस-परस झटकनि लगे, बिजुरी देह बितान।।

अंध गली की दौड़ में, जीवन हर पग प्रश्न।
छोड़ वांछना द्रव्य की, चलो मनाएँ जश्न।।

सभकर आशा लालसा, उहई खासमखास।
सजनी भर धरती रमस, उनुके संग हुलास।।

बिन आँजे काजर-कुजर, साँवरि चंचल नैन।
सखी कटारी का करी, चुनि-चुनि मारत सैन।

सभके चुनरी दाग बा , राउर चुनरी पाक ।
बंद तिजोरी माल बा , रउआ घर में फाँक ।।

दुनिया में सभ बा दुखी, आपन दुख पवनार ।
दु पइसा क लाई में , जगती सुख भरमार ।।

********90

देखल छोड़ द आन के , पइबऽ अद्भुत ज्ञान ।
खाली कर बिन गाँठ के, छोड़े सभी जहान ।।

दो कौपीन फकीर के , शहंशाह शरमाय ।
हीरा भरल सनूख के , झटके में ठुकराय ।।

गठरी रही जमीन पर , करनी जाई साथ ।
प्रेम क पोथी पाठ कर , रसिक नवावे माथ ।।

सभके उनुकर आस बा , ऊहे बाड़ी खास ।
धरती पर ऊहे रमस , उनुके संगत हास ।।

मंगलमय शुभकामना , सबका सुखद बिहान ।
रसिक बधाई लोहड़ी , खिचड़ी के सनमान ।।

मन के निरधन लोग बा , बोलत खरचे शब्द।
समय शाप सर पर चढ़े , दौलत उछले अब्द।।

इज्जत गइल बधार में , दगलस तन बड़बोल ।
नकली शेर दहाड़ के , बचा न पवलसि खोल ।।

खइलस फसल क खेत तब , झरगा कइलसि बाढ़ ।
दाँत तरे इकिड़ा पड़ल , लगल चिलाये दाढ़ ।।

पति में सबकुछ मिल गया , मालिक सेवादार ।
पूरा पैसा सौंप दे , फिर भी करज उधार ।।

भोरे भोर भुलइह जन , ए भइया भगवान।
सुभग सोच संदेश से , समहुत करऽ बिहान ।।

*******100

तन पर लागल चोट सभ , कुछ दिन में भर जाय ।
मन पर लागल चोट के , बाटे कवन उपाय ?

अद्भुत होला प्रेम रस , पियें ठूँठ हरियाय ।
मरणासन पर रामजी, मंद मंद मुस्काय ।।

चुगली चाकर चाकरी , पावत मन हरसाय।
दो कौड़ी के आदमी , पानी कनक चढ़ाय ।।

पाड़ा बनले जाड़ में , चतुरी के मति मंद ।
पाचन किरिया तेज बा , जाँचन किरिया बंद ।।

सेवा भाव सिखाइये , उत्तम बने समाज ।
पैसा तो दोयम रहे , प्रथम रहे गृहकाज ।।

उड़नपरी हँसके कहे , क्या लेंगे श्रीमान।
घर में आके मात से , खा मत मेरी जान ।।

सब पैसे का खेल है , करे दिखावा रोज ।
घर का खाना तुच्छ है , पिज्जा हट में भोज ।।

किसकी हम गलती कहें , यक्ष प्रश्न दुहराय ।
सोचो समझो बात को , रसिक पूछ शरमाय ।।

सेवा में सुख निहित है , चकमक के दिन चार ।
चाल समय पहचानिये , वक्त न मिले उधार ।।

शब्द कभी होता नहीं, उत्तम और निकृष्ट।
मन के भाव उकेरता , अपने अंदर पृष्ठ ।।

********110

प्रतिहारी होता नहीं , सत्ता प्रेम अखंड।
मैं हीं मैं दूजा नहीं , चाहे कष्ट प्रचंड ।।

हेरा-फेरी छोड़के , बदलो अपना भाव ।
पाप पुण्य देहज नहीं , ऊँचे जरे अलाव ।।

दो कौड़ी के आदमी , बात करे उधियान ।
दंतहीन रूखा वचन , खाय मगहिया पान ।।

जेकरा उपर दंभ बा , पल-भर क मेहमान ।
उड़ल चिरँइया शाख से , उज्जर वसन वितान ।।

जीयत मुर्गा बांग दे , मरे होत चटखार ।
पंथ पुजारी पादरी , पल पल करे पुकार ।।

चरवाहन के झुंड में , पोथी के उपहास ।
दिनकर बदरी में छिपे , करिया बादर खास ।।

अंजर-पंजर ढ़ील बा , सूखा परल जुबान ।
खंजड़ी खाला घर बजे , मुँह खोले मेहमान ।।

भावुक मन सौगात में , बाबूजी के प्यार ।
धरती से हरपल जुड़ल , हाउअन हमरो यार ।।

हेरा-फेरी का करे, पलछिन दक्षिण बाम ।
पाप-पुण्य देहज नहीं , मन की गति अविराम।।

व्यर्थ कइल बा चाकरी , पोंछ हिलावे जान।
हईं दुलरुआ नागरिक , मुफुती धन के ज्ञान ।।

*********120

शंकर ब्रह्म समान भये , अनलहक मंसूर ।
जे भी चहुँपल पास में, उनुकर बदलल सुर ।।

भल अनभल के भेद से , उपजल दुरजन पंथ ।
खेद लबेद जबेद के , माने असली ग्रंथ ।।

चंचल मन को थिर करे , चर्चा प्रभु श्रीराम ।
जहाँ जुटे गुणवंत जन , वहीं मिले विश्राम ।।

राम राम के बेरा में , सभके जय श्रीराम ।
सीता माता सुमिरि के , प्रभु के आईं काम ।।

मन में जब श्रीराम हों , भल अनभल बेकार ।
पूर्ण समर्पण से सदा , होता है उपकार ।।

चतुरई के चक्कर में , घरे घरे छिछिआस ।
आपन घरवा फूँक के , आन बुझावस प्यास ।।

सभके एके हाल बा , का वक्ता का मौन ।
तिरिया के तिरशूल से , कहवाँ बाँचल कौन?

नखरा धमकी धाक से , केहु न बाँचल यार ।
नरपुंगव नरके गमन , नार उतारे पार ।।

जेकरा मन में पाप बा , कइसे उतरी पार।
करि कदोर मन के अमल, मुक्त करावे नार ।।

एकरे के तिरिया चरित , कहलें लोग सुजान ।
रसिक टहलुआ नार के , कहीं सहित अभिमान ।।

*********130

धेला मेला में गइल , सांसत परल परान ।
राम दुआरी जे रहल , उनुके मुख मुस्कान ।।


मधुरी बानी बोलके, पइठीं हिय का पास।
धुर बैरी पँजरे रही , अइसन दिढ़ बिसवास ।।

जात-पाँत के ओट में, धूमिल होत बिबेक ।
मनुआँ सभसे ऊपरी, दोसर राह न नेक ।।

खोट निकालि सरेख में, ऊँचा कइले माथ ।
खुद बैरी खुद के बने, का दोसी रघुनाथ?

हमरे पूत सरेख बा , अनकर गोबर लीप ।
मेहराइल काठी जदि, का उजिअइहें दीप ।।

मन के मइल निकाल के , रसिक बजावे थाल ।
पूरनाहुत होई तभी , आपन आहुति डाल ।।









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