Thursday, 26 September 2019

भोजपुरी 2




दोहा नइखे

ए रँवो तनी बोलीं ना

मन करे अगुआनी के खाना के नास दीं
कुकुर के झउरा में ओहनी के फाँस दीं



*************

चान जस चमकस विकास , हरदी कुटले बानी ।

बबुआ विकासजी के जान से जादा जनले बानी
दिने दिने करस उजास, हरदी कुटले बानी ।।

अवाइन ज्वाइन से नजर उतारस माई
बाबुजी के पगरी ऊँचास, हरदी कुटले बानी ।।

सातो रे बहिनिया के पुजीले चरनिया के
बबुआ के लागे ना बतास, हरदी कुटले बानी ।।

***************

गेहुँम के नइखे दरकार , मेंथा रोपले बानी
पइसा के होई भरमार , मेंथा रोपले बानी

एही रे मेंथवा से बाल बच्चा मौज करे
मौज करे हमरो रिश्तेदार, मेंथा रोपले बानी

मुफुत के बिजुरी से दन दना दन मोटर चले
कोड़नी करेला बनिहार, मेंथा रोपले बानी

केतना बड़ाई करीं दसो नोह घीव में बाटे
चमके लुगाई के लिलार, मेंथा रोपले बानी





मंजूर ना समुंदर के , हाथ गोड़ चलावल
शांत होके अइब त सिर पर बैठाई
रसिक
राम राम के बेला में सबके बा परनाम
दईब दया से चमके चेहरा बनल रहे सब काम
गम के दरिया पुल बन्हाये खुशहाली के दउरे रेल
केहु ना हो बदरंग ए भईया सुबह करावे सबसे मेल
~ कन्हैया


पत्थर प दूब नाहीं सागर से पनिवट ।
बात के बतंगड़ से लोग ना बिगड़िहें ।।
झूठ के मिलावट से महल अटारी बने।
साँच के बयार बही छने मे उजड़िहें ।।
बिराग श्मशान छूट जाई घर गइला प ।
हम के प्रभाव पा के लोगवा अकड़िहें ।।
रसिक के बात मान करम कुकाठ छोड़ ।
जादे अझुरइला से लोगवा लतड़िहें ।।

फूल खिली त एक दिन झुरइबे करी
पात पीपर के कबहुँ थिरइबे करी
ए जिनिगी के का बा भरोसा रसिक
ई समइया त सभके धिरइबे करी


मत्तगयंद

कंत बसंत अनंत कथा सजनी रजनी
बनि गैल बिघाती।
अंग अनंग करे नखरा तन होखत बा सरकंड सँघाती।
डाल हिँडोल लली सुकली लखि देह बने पुरईन क पाती।
काँपत नार समेटत आँचर ओट करी उसुकावस बाती।
~ रसिक ~


बुद्धि के बरियारी कहीं कि ज्ञान के हतेयारी
मानर पुजवावे खातिर डीजे खोजात बा।

गला लगावल ठीक बा , दिल से दिल मिल जाय ।
मुँह बिजुकावल ठीक ना , हाथ खजाना आय ।।
हाथ खजाना आय , लोग औकात प आवे । अपना के चालाक , आन के मूर्ख बतावे ।।

तेगा से अगते कलम चलित, तऽ जहर-जंग होइत काहे ?
हम से पहिले गम खाइत तऽ, अपुआ आपा खोइत काहे?
राम दुआरे सेवक बनिके, सुमिरन करिते जे रामरतन ।
भैंस क आगे बीन बजाके , पपुआ पछुआ धोइत काहे?

उल्टी लत लागल ए भइया ,
सेतिहा माल उड़ावे के ।
के आपन के गैर बुझाता ,
दुनिया के बतलावे के ।
देशवा मोरा सोन चिरइयाँ
कुछ लो घात लगवले बा ।
मोका आइल बा बम बोलs
फिन से लाज बचावे के


शारदा भवानी माई, विनती करे कन्हाई
मन के विकार धोईं , सकल समाज के

इरिखा से लोग मरे , मन प ना काबू करे
अँखियाँ से लोर ढ़रे , हाल देखि आज के

साँच प ना आवे आँच , झूठ के न नंग नाँच
केहू के ना जान जाये , भरे में बेयाज के

बेटा-बेटी पढ़े-लिखे , नीके-नीके गुन सीखे
करे लो बड़ाई रोज , बबुआ के काज के

~ रसिक ~


जब ले भेंटी सीटी मारी
मोका पा के काम बिगारी
बीच भँवर में नाव क जगहा
अपने सुगना बंसी डारी

जब ले भेंटी मारी सीटी
दोसर खाली थपरी पीटी
जहिया ना कहब त लोगवा
पलखत पाके मारी झिट्टी

दिल कहलसि बतियाव तनिका
दिमाग कहे निपटाव जल्दी
दिल दिमाग में मेल ना भइल
सोचीं समझीं सत्य उगल दीं
~ रसिक ~

कौल करार कनस्तर गइल
अब त जिनिगी फोंफी भइल
परुआ बैल कोंखियावल जाता
खुद के सही बता़वल जाता

जन जा विदेश सैंया करे खातिर नोकरी
घर में ना कमी बाटे बाबा के बा टोपरी

कोड़ीह कमइह खइह बनीह किसान हो
किसनवे से बढी अपना देशवा के सान हो
गड़ल बा खजाना लइह भरि भरि धोकरी

देता सरकार अब सुविधा हजार हो
नाया नाया सुविधा के होता अविष्कार हो



सोझा आवे में जे दिन पोर पोर जलेला
ओह दिन के लोग पोर पोर जल दिन कहेला

जीयल कइलसि मोहाल
दिने राति खोजता सिपहिया ।

पियवा से चुपे चोरी नोट तहिअवनी
सखिया सलेहर मिली सच के छुपवनी
अचके में कइलसि बेहाल
दिने राति खोजता सिपहिया ।



आव ए मलकिनी
हई गुलाब लेल
दिन गुलाबी बा
भर हफ्ता पगलाये के बा
आ चउदह फरवरी के
कुंभ नहाये के बा


माई सुरसती जी के , चरन में माथ धरीं
जय भोजपुरी कहे , मय भोजपुरिया

बोली में मिठास घोरे , हुलसेला पोरे पोरे
बाबूजी के गोड़ धरे , मय भोजपुरिया

आन जाने इचिको ना , सभके करेज रहे
काम करे, डरे नाहीं , मय भोजपुरिया

ओही भोजपुरिया के होखता जुटान भाई
नेवता दियाता जुटे मय भोजपुरिया


हाथ बान्ह के राशन बाँटे
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे


साँच के आँच बरदास ना होला
लोग के चाहीं भाँग के गोला


सभ कुरसी के खेल बा , आन्हर लंगड़ यार ।
आफत में सभ साथ बा, बिल्ली कुकुर सियार ।।
बिल्ली कुकुर सियार , सुबह गावे परभाती ।
फोंफी फूँके काक , कबूतर बाज दे पाती



बितल जाता रोज दिन

रहि रहि जीयरा जरावेला फगुनवा


अजगुत लउकल अजगर के घर
नेउर नाल बजावे,
मिरिग मधे मृगराज मगन हो
बन में जग्ग करावे ।
चुटरी ले गुलदस्ता चलली
बिलरू के अगवानी,
गहुमन बेंग घरे फुफकारत
लावसि भरि-भरि पानी।
बगुला भगत रामधुन गावस
मछरी मुरकी पारे,
नीन तेज बादुर बदजायी
बनठन चलल सकारे।
घोघी बान्ह हुँड़ार चबेनी
पड़रू सङ्हे खेले,
भेंड झुंड से तनिका ताने
घूमे राति अकेले।
पुछलें भोलानाथ बताईं
अचरज कइसे होता?
बानर पुनुई पेड़ बनावे
काहें चिरइन खोंता ?
एके सुर में सभजन कहलें
बन आइल इक पंडा,
उहे सभे के सकदम कइलसि
लेके सत के डंडा।

कहलें भोलेनाथ बतावऽ
के झूठा के सच्चा?
कइसे एकर निरनय होई
पकठाइल भा कच्चा?
सभ लो दसखत करे करार पऽ
ओके मार भगाइब,
के करिहनि अगुआई बोलऽ
ओ से हाथ मिलाइब।
बनल रही ई भइवध ना तऽ
प्रेम पनारे जाई,
होखे अगर कबूल तऽ कहऽ
अबहीं गले लगाईं।
अतिना सुनते सभजन छटकल
मंच भइल बा रीता,
कहे कन्हैया सोझ बात ई
भल मीठा भल तीता।


एने ओने दुनो ओरि भइया सतीश हो
दुलहिन के उजुबुक आ हमर भाई ईश हो
बैंक वाला लउकत बा तन से कंगाल हो
धँसली बाटे जबड़ा में ओकर चिकन गाल हो
देखऽ रिसिआइल बाड़ें केश खउराइल बा
हउअन चुहाड़ हमरा ओसहीं बुझाइल बा
गाल बाटे पुआ जइसन पूरी काहें कहेला
देखते निरोग काया नाक ओकर बहेला
बेटिहा विबेक बेलबटम पेन्हके नाचेले
बबुआ विबेक मोर वेद रोज बाँचेले
देखऽ हऊ पगरियावाला खा के करे पगुरी
बाबाजी दुअरिका के धइले बाटे अंगुरी

सफर में कट गये तैंतालीस बसंत, तकरार कम न हुआ
होता रहा नित नया वाग्युद्ध पर नयन नम न हुआ
कटु वचनों के तीर निरंतर चलते रहे दोनो तरफ से
दागते रहे रॉकेट, अनार लेकिन पटाखा कभी बम न हुआ


तेतालीस बरीस पहिले खुलके हँसले रहीं
तबसे अब तक हँसी प टैक्स भरत बानी
का कहीं केकरा से कहीं कइसे कहीं
हाथ बा बान्हल ए से फैक्स करत बानी



चेहरा प हँसी नाहीं सभ कुछ बा मनाही
अजुए के दिन एगो घटल रहे घटना

उनइस छिहत्तर साल चानी प के उडल बाल

घञ


चालीस तीन पहिले के एगो बाटे घटना

आदि भवानी शेष महेश गनेस के सिर नाईं
कुँवर कुमार कर जोर बिनयी हम एह महफिल में आईं
सुर देवी माई सुरसती रउए शरन में बानी
कंठ बिराजीं आके मइया तब हम शंख बजाईं

राम सिया सुमिरो नित सुबहे, शंकर अवरू भवानी
सेवक रसिक समरपित तन मन, धन अरू सकल निसानी
संत जनन सुरसरी सभ सरिता , पावन पवन नूरानी










आगे आगे चोंच चलावे
ओके लो अगुआ बतलावे
बइठल बइठल पान चबावे
ओके लो अगुआ बतलावे
दाब ओलार अँगेज करावे
ओके लो अगुआ बतलावे
छः के छब्बीस कह समझावे
ओके लो अगुआ बतलावे
बेटहा बेटिहा झउर करावे
ओके लो अगुआ बतलावे


एने ओने जन देखऽ इहे ह अगुआवा
बड़े बड़े आँख जाइसे ताकता ऊरूआवा
बतबनावना भसुरवा देखऽ पी के ढिमिलात बा
चोरवले बा जिलेबी ए से मुँह चटचटात बा
बम्बेवाला भसुरा के भारी भइल पेट बा
बंगलोर वाला भसुरा गाड़ी काहें लेट बा
दाँत नइखे मुँहवा मे गते गते खात बा
टपर टपर बोले लबलबिया बुझात बा
मोछवाला भसुरा भुलाइल बा बिदेस में
टुकुर टुकुर मुँह देखे नवहिन के रेस में
नटुरा भसुरावा बइठल नेटा पोंछे नाक के
खेखर नीयन हँसत बाटे छने छने ताक के
दुलहा के छोट भाई ठर्रा लेके बइठल बा
कुकुरा के संगें काहे ओकर देहिया अंइठल बा



रउआ घरे जाइब तऽ का का खिआइब
हमरा घरे आइब तऽ का लेके आइब

दोस्त हईं तऽ दुआर प अइबे करब
जवन पुआ पकवान मिली खइबे करब
हमरा घरे आईं थरिया भर लेके
दोस्ती निभावे खातिर सभ धरबे करब

नेता खइहें चाय पकौड़ा
खुद पर मत बरसे दऽ कोड़ा
प्रेम परस्पर जन बिलगावऽ
आवऽ मिलके जोत जलावऽ


छोड़के गइल केकरा भरोसा 18
परोसा नाहीं बाहर में मिली 18
रोपलऽ जे नया फूल गेंदा 17
पटवला बिना फूल ना खिली 16

बियाबान में बल मिलल, अइनी रउआ साथ
लमहर पथ दूबर भइल , जब फैलवनी हाथ
जब फैलवनी हाथ , बढ़ल हिम्मत चरगुन्ना
गावे मेघ-मल्हार , मगन मन ले झुनझुन्ना
पावन भइल परान, पाँखि लागल जहान में
हमरो मिटल पियास , पाई घन बियाबान में

लागत बा मरले बिया , झटके अइसन लात
रितु बसंत में का भइल , दरद करे मय गात
दरद करे मय गात , न बाबा बात बतावस
अपना के भगवंत , आन अछरंग लगावस
लउकत नइखे राह , जोस जियरा दागत बा
अब ना होय उड़ान, भभिख चउपट लागत बा

काम सतावल आम बा , काहे के अवसाद
सभकर एके हाल बा, बिगरल मुँह के स्वाद ।
बिगरल मुँह के स्वाद, हूब अब तन में नाहीं ।
मन के अनगढ़ चाल , उमिरियो करे बिसाही
करे न तन संवाद , हरिन-मन कुरचे धावे।
रसिक ल माला हाथ , जा घरी काम सतावे ।

फँसरी डालल ठीक ना, मन पऽ राखीं जोर।
कसीं खाट के ओरचन, सुतरी छान सँगोर।
सुतरी छान सँगोर, हिए में हरि के धरलीं।
पउआ पाटी ठोक , चूर के चौबन करलीं।
रेसा छोड़े साथ , न अइठन आई रसरी।
धावल अइहें राम, निवारे गर के फँसरी।


दस में मिलल नौ
हमके चाहीं परसेंट सौ
आपन करनी काठ के हाँड़ी
कबहुँ ना कुछ पाकल
तोहर पतुकी आँच लगाके
जाता चूल्हा झांकल




ढ़िबरी के पेनी में जइसे अन्हार बा ।
पिया बिन ए सखी ओसहीं सिंगार बा ।।


अपना मन के बात चली तऽ, सभ लो थपरी पीटी
साँच बात बतियावल जा तऽ , छिपके मारी झिट्टी
अपने करम के फल मिले तऽ , आन नजर खराब बा
नाली में मुँह अउन्हल बाड़न , ढरल पेट शराब बा


शांति घर में बइठल रहीं
भाव आइल घनघोर
अइसन लागल सुनर रचना
नाचत बा मन में मोर
जसहीं धोवनी हाथ का कहीं
भावो साथ धोआइल
छाती पीटत रह गइनी हम
लवट के फिर ना आइल


दुनिया से लाज बा
अइसने समाज बा

कइसे आईं सोझा सैंया, सासूजी अंगनवाँ जी
देखतीं सुरतिया राउर , छछने परनवा जी ।।

रतिया के बतिया से चोट बड़ा लागल बा
देखे खातिर दिनवा में



परदा में कुछ हो रहल , मुंड मुंड मति भिन्न
देख देख अंतर्वसन , लोग हो रहे खिन्न
लोग हो रहे खिन्न , समझ में कुछ ना आवे
कोई कहे अनर्थ , कोई मन भ्रम बतावे
धोबिया करे काम , पड़े न वसन पे गरदा
उपजल मने विकार , पड़ल बुद्धि प परदा
~ रसिक ~

नाम तिरंगा रंग पाँच बा ,
अचरज होता बोले में ।
बाकी बतिया साँच कहीले
कठुआ लागे बोले में ।।

रंग पहिलका केशरिया बा
रग रग जोस जगावेला
उज्जर रंग बीच में बडुए
शांति मार्ग समझावेला
सरहद पर तैनात सिपाही
पग पग लगल टटोले में ।।

हरा रंग बा खुशहाली के
मिट्टी के महिमा गावे
चउथा रंग चक्र विकास के
सागर नीला बतलावे
चक विकास के मोद मनावे
सरपट पथ पऽ डोले में ।।

बबुआ सीमा पर जागल बा
देखके दुसमन काँपता
घात लगाके गोली दागे
आवते सोझा भागता
पँचवा रंग रक्त के धब्बा
दिखल तिरंगा खोले में ।।
~ रसिक ~


जेकरा के हम गोद खेलवनी उहे कइलसि घात ।
देत रहीं परतोख पुन्य के उहे बिगड़लसि बात ।।



कल जो सरकारी दफ्तर में देह चुराते थे
आज अपने दफ्तर में वफादारी की पाठ पढ़ाते हैं ।

क्या ये देश उनका नहीं है ?


के साधू के जोगी ?
के स्वस्थ के जोगी ?

सधल बा जे ऊ साधू
जागल बा जे ऊ जोगी
अपने आप में मस्त स्वस्थ बा
रोवत रहे हरदम ऊ रोगी


जब मोका मिले
विचार के अदला-बदली
क लेबे के चाहीं

दुर्गेश मिसिरजी के घर
जुटल लोग कवि प्रवर
श्रेष्ठ कविवर दादा राश
सुनवनी आपन वृतांत खास
राजेंद्र जी राही
देखवनी आपन सियाही
का कहीं कवि जवाहर लाल के
पढ़नी कविता कमाल के

भावुक होके विभा दीदी
सभके आँख भिंजवली
और रसिक बबुआ के सिर पर
आपन हाथ लगवली

सेवा में तत्पर रहे
दुर्गेश मिश्र परिवार ।
अपनापन पुरहर मिलल
सपना भइल साकार।।







सनेहिया के थाती हम कहँवा संगोरीं
जभो जभो जागल परिवार के अगोरीं


बतिया के निमन आगाज रखीह
हमरो सेनुरवा के लाज रखीह
छलकत जवनिया के ताख रखीह
सवतिनिया के रहिया में काँट रखीह
आँचरा के पतरा में रहब हम बन्हाइल
देखब ना गोरी हो तोहार कुम्हलाइल
हमरा पो तुहु बिसवास रखीह
चढ़ल जवनिया आबाद रखीह
छलकत जवनिया के ताख रखीह
सवतिनिया के रहिया में काँट रखीह।।
छछनेला तोहरा ला हमरो परान हो
जब जब मेरेल नजरिया के बान हो
कसके पकड़ले तु रास रखीह
रतिया के बतिया इयाद रखीह।।
हमरा पो तुहु बिसवास रखीह
चढ़ल जवनिया आबाद रखीह।।
करब ना कबहु करम से नादानी
छलकी ना कतही जवनिया के पानी
आपन कमरिया कटाह रखीह
हँसके रसिक से संवाद रखीह
छलकत जवनिया के ताख रखीह
सवतिनिया के रहिया में काँट रखीह।।

भामा भरम मिटवले बाड़ी
दरपन आज दिखवले बाड़ी
साठ बरिस के हम हो गइनी
हमरा के बतलवले बाड़ी

मुँह के चउकठ टूट गइल बा
चढ़ल अटारी झूठ भइल बा
पाणिग्रहण से गरहन लागी
अब ना जिनिगी सरपट भागी

आपन औकात भुलाईं जन
जौहर झूठो देखाईं जन
हम जानीं कतिना पानी में
तरुआर प धार चढ़ाईं जन



बेचारे पति का करस , पत्नी मिललि कटाह ।
बाते-बाते मात दे , जिनिगी कइलि बिदाह।।
जिनिगी कइलि बिदाह, अंत ना फ़रमाइश के ।
बलम चलीसा पार , बहुरिया मध बाइस के ।।
भइलन अस बदहाल, फिरस सगरी मतिमारे।
धनी अर्हावस काज , पुरावस पति बेचारे।।
~ रसिक ~

जवन बा तव हबेखऽ
आन के जन निरेखऽ
दइब समरदसी हवें
पर के दुख भी देखऽ









दागदार सभके चुनर,
राउर परम पवित्र।
आन घरे फाँकाकसी,
रावरि चित्र-विचित्र।।

लोग अवरि होइहें दुखी,
आपन बिपत धनेर।
जिनिगी भरि लगले रहल,
सै से कम के फेर।।

छाड़ि निहारल आन के,
खुदहीं के पहिचान।
गाँठि गेंठि हिंहईं रही,
पीछे छुटी जहान।।

रहि जाई गठरी हिहें,
करनी जाई संग।
पढ़ लीं पोथी प्रेम के,
रसिक लगइहें अंग।।




सभके बदन में आग बा

त्रिविध ताप
पसरे तन पर
उपाय करऽ ।

चलऽ लगावे
तिरबेनी में गोता
बान्हऽ मोटरी ।

तन बा कुंभ
मन कर्म वचन
तीनों के तारऽ ।

काल के गाल
जिन्दगी करे जंग
रहो मलंग





जिनिगी हरपल हऽ उतिम, हरपल जिनिगी जंग।
कहईं राहे काँट-कुश, कहईं रंग-विरंग।
कहईं रंग-विरंग, कबो इतिहान सरेखे।
चंचल मन के साध, बुद्धि से जोखे-लेखे।
मंजिल टेढ़ी खीर, जरे हर पग पऽ चिनिगी।
होखे मन निरदुंद, सफल कट जाए जिनिगी।




काजर नइखी कइले , अँखिये कजरारी हऽ
अस्त्र के का जरूरत , कनखिये कटारी हऽ
बिजुरी के झटका जस , करेंट मारस झट से
भवजाल में फँसाके , परान लेली पट से


बेचारे पति का करस , पत्नी मिललि कटाह ।
बाते-बाते मात दे , जिनिगी कइलि बिदाह।।
जिनिगी कइलि बिदाह, अंत ना फ़रमाइश के ।
बलम चलीसा पार, बहुरिया मध बाइस के ।।
भइलन अस बदहाल, फिरस सगरी मतिमारे।
धनी अर्हावस काज , पुरावस पति बेचारे।।


गोबर भरल दिमाग में, कइसे सूझी राह।
गुरु गइले परयाग लग, सिस के धइलसि ग्राह।
सिस के धइलसि ग्राह, ज्ञान के हँड़िया फूटल।
कइसे उबरी जान, पसेना सभकर छूटल।
झूठ बजावे ढोल, साँच के लटकल थोबर।
से लोगो पतियाय, मगज में गाँजल गोबर।
~रसिक ~

सबका मालिक एक है,
सत्य वचन सुविचार ।
संसय मन में ना रहे ,
दिल में हो उद्गार ।।
~ रसिक ~


बोले तो मुँहफट न बोले तो गूंगा ।
कहानी सभी की हीं उलझन भरी है ।।

एगो घूँघट डलले आवे
दूजा घूँघट डालल जाला
दरब दियाला मुँह देखाई
रूप देख लो डाले माला
डोली लेके चले कहँरिया
अर्थी आपन कान्ह उठावे
सगुन उठेला हरदी लागे
जात घरी मय तन पियराला
रसिक


नई फसल के गुर चूरा से ,
खिचड़ी आज मनाईं ।
राजनीति के रहरेठा से ,
जमके करीं धुनाई ।।
प्रेम भाव जे बिसरल कहऊँ,
ओके हिये लगाईं ।
कहे रसिक कि संक्रांति के
खूब पतंग उड़ाईं ।।

~ रसिक ~

आपके सुवास से सुवासित मैं हो गया
विचार के स्पंदन में मन मेरा खो गया
आनन पर हास लिये खास आप लगते हो
आपका व्यक्तित्व देख आपका हीं हो गया


आपके नाम संग जी लगाना चाहता था
पर सुना है दिल को दिखावा पसंद नहीं

दिल मिले दिल से मुहब्बत की लीक है
आशिक के


फलनिया के लइकी के चार गो लइकन से बा चक्कर
चिलनिया के पतोह सास के घर में देले टक्कर
बुढ़वा रसिक बनल बा बछरू देखते आँख मिलावेला





दर्द को मत कुरेदो
बहुत गहरा है
वैसे तो जीवन
दीखता सुनहरा है
पर प्रत्येक मोड़ पर टाँके है
फूल अभी खिला नहीं
काँटे ही काँटे हैं
कन्हैया

दीहीं लाख बधाई रविशंकर तिवारी के
भोजपुरिया बिहारी के ना ।

युग युग जीय बबुआ ढ़ेर
सुख में बिते रोज सबेर
किरिपा बरसत रहे शंभु त्रिपुरारी के
भोजपुरिया बिहारी के ना ।

जौ जौ आगर मिले स्नेह
आफत आवे ना कबहुँ गेह
सर पे हाथ बा सुरसती महतारी के ।
भोजपुरिया बिहारी के ना ।

देले असीस सतीश सुभाष
पूरा होखे तोहरो आस
लेलऽ खाँची भर सनेह रसिक तिवारी के
भोजपुरिया बिहारी के ना ।






जार्जेट के साड़ी प पीयर बा बूटी

धन कुबेर समझे नहीं , स्वेद बूँद का मोल ।
लक्ष्मी वाहन ना दिखे ,


झूठ के पहाड़ बनता तऽ बने दऽ,
जरला से सोना के कीमत कम ना होला ।

दिल और दिमाग में बस तूँ हीं तूँ रहते हो
अंजान बनके मुझसे कुछ भी नहीं कहते हो
दिल के रिश्ते को दिल क्यों न मानता है

ये रिश्ता है जब दिल का तो दिल क्यों नहीं मानता है

शहर के धन होशियारी में
गाँव के धन कियारी में

अपने पडोसियों को कभी गिरने न दिया
इसलिए वो शख्स महान है

जलने से सोना को डर कैसा ?
भस्म बनकर भी महत्ता कायम रखता है ।

हरि बोल रे मनवा घरी घरी ।
बाड़ ना कबहुँ खेतवा चरी ।।

मन में विचार के ताँता लागल बा
काहें दो पकड़ला पो परा जाता
रसिक
स्वागत बा सरकार राउर

पति में सबकुछ मिल गया , मालिक सेवादार ।
पूरा पैसा सौंप दे , फिर भी करज उधार ।।
फिर भी करज उधार , रोज फरमाइस होला ।
चिंता चढ़े कपार , रोज मासा से तोला ।।


भाव के संभालऽ
लगाव बढ़ जाई
उतरल भँड़ेहर
फिर से चढ़ जाई


मउअत से डर काहें,
जिनिगी के जसन काहें ना?
घुट-घुटके जीए से
मउअत रहता ना बदल ली
अबहीं खुलिके हँस लऽ
लोगन के दिल में बस लऽ
कउआ नहान से भगवान ना भड़किहें
लइका बन जा भगवान ना घुड़किहें ।


मन में विचार के ताँता लागल बा
काहें दो पकड़ला पो परा जाता
रसिक


जेकरा के हम पाठ पढ़वनी उहे पाठ पढ़ावत बा
जेके खातिर बिगहा बेचनी उहे टाँग अड़ावत बा
आन भरोसे आगे बढ़ल परहित समझ ना आवेला
पेट साटके खोभ कटारी तबहुँ आपन बतावेला


जल्दी करऽ जाये के तैयारी इयारी में लस अब नइखे


भोजपुरी के मान्यता , दीहीं ए सरकार ।
कोटि लोग के आसरा, जल्दी करीं साकार ।।


चढ़ल भँड़ेहर उतर गइल
पपुआ खा के पलर गइल
माई के तपसेया सभ
घुंसारी में लहर गइल

पढ़ाई में तेज रहे
पापा के करेज रहे
सिधवा श्रीमान जस
लड़ाई परहेज रहे


दिलवा में माई के बसेरा बा ए सैंया जी
उनुके आशीर्वाद से सबेरा बा ए सैंया जी

भोरे भोरे माई के सिंगार हम करेनी
चुनरी चूड़ी सेनुर लाले मंगिया में भरेनी
बिना माई सगरे अन्हेरा बा ए सैंया जी ।।

सातो रे बहिनिया के शक्ति लोग जानेला




नयका साल
नयकी बहुरिया
हर्षित हिना

कल्हुए ऊ साल गइल
भीतर ले साल गइल।

सालो भर साथ रहल
सुख दुःख के बात कहल
अचके में पपनी प
पानी ऊ डाल गइल ।

कहला के मनलसि के?
जनलसि ऊ सबहिन के
आपन बनावहीं में
पेट तनी खाल भइल ।

अब ना ऊ कबो मिली
नाहीं ओकर तन हिली
करनी से जन-जन के
साँसत में डाल गइल


अँखिया के सोझा रहब जिनिगी के राह में


मी के ला दऽ मोबाइल हमार पिया
हमरो बदली इस्टाइल हमार पिया


गये साल को दर्द दो अपना
नये साल साकार हो सपना
बैर भाव सब भस्मीभूत हो









सरसों साग मकइया रोटी ,
भर जाड़ा नीके सरपोटीं ।
गरमा गरम दूध के साथे ,
गुड़ मिलाके भूँइयाँ लोटीं ।।

ऊपर पुअरा नीचे पुअरा
ओढ़न और बिछावन पुअरा
लेवा जगदेवा कहलाला
देसी एसी होला पुअरा




कइसे लहलहाई गमला
जब छापर परल बा कमला


चोखा खा के ऊब भइल बा
अब लोगन के चोखा चाहीं
काया रोग रहित बा सभके
अब लोगन के पोखा चाहीं
आगे बढ़िके काम न होई
बाछा बैल हरिस अवगाहीं
बपसी बलु खोभाड़ अगोरस
बबुआ रामझरोखा चाहीं

चोखा = एक ब्यंजन
चोखा = बाँक, चटखारा , नीमन
अवगाहीं = निकाल बाहर।
पोखा =पुष्ट, पोढ़ाइल
झरोखा = खिड़की
रामझरोखा = ए सी ( एयर कंडीशनर)



ढेला ओइँछि आपन दुख के,
करऽ पुरनका साल विदाई ।
सुख-समृद्धि संतान प्रफुल्लित ,
नया बरिस नूतन छवि छाई।।
बीत गइल ऊ बात बिसारऽ ,
आगे पाँय बढ़ावल जाई ।
का राखल बा मुँह लटकवले ,
सबहिन के समुझावल जाई ।।


उदबेगले बा उल्टी करब
अनका कान्ह बनुखिआ धरब
जब आई खुद माथे ऊपर
पोंछ सटाके सरपट धरब

टिटकारी प काँखस भरकस
हुरवठलो प तनिक न सरकस
भरल नाद में गवत देखते
पोंछ उठा अलबत्ते छरकस

करिया मुँह पो कजरी कइलसि
पान मगहिया मुँह में धइलसि
धपधप उज्जर कोट पहिन के
गाँव के दखिन भाग परइलसि




रेंड़ी गिनके तिथि बतावस , छिंक मारके जतरा




एहि नयका साल
कुछ करऽ
अइसन कमाल
जेकरा से चमके
माई के भाल

रोकऽ रकतपात
भेव मिटे जात-पाँत
घरके बहुरिया
जरे जनि
राखऽ ना जाँत-जाँत

किसान कठुआए जन
बिसमाद ना रहे मन
आन के भरोसे ना
उजियाय कवनो तन

स्वेद बहे खून ना
शोर रहे सून ना
फौजिन के छाती पर
तमगा चढ़े
प्रसून ना

बेटिन के राह-बाट
बिरिधन के ठाट-खाट
हरदम निर्बाध रहे
शासन, समाज के
उन्नति के साध रहे



दिखावा के जिनिगी
हथौड़ा कपार पर
सिंगार-पटार सभ
बइठल किछार पर
जर जमीन के ऊपरे बा लउकत
एही विकास प बबुआ बा फउकत
रंग पहिलके ठीक रहे
अब तऽ बुझाते नइखे
लाल बा कि पियर
खाली लिखा जाता कागज प
हैलो माई डियर
कादो कहल जाता कि
बबुआ अप-टू-डेट बा
हमरा त बुझाता ल
सबकुछ अगतहीं से सेट बा
ए बाबा, आँखि मूँने से पहिले
आँख मूँन लऽ।
~ रसिक ~

लाल चाका देखके भोर के भरम हो जाला ।
धूप में रहला पो ताजा भी नरम हो जाला
हम तऽ फिरिज के कठुआइल सब्जी हईं
खाये से पहिले इचिका गरम हो जाला

आना-कानी ना मनमानी , लइकन संगे लइका हो जा ।
छोड़ऽ बुढ़ऊ बात पुरानी , कर मोबाइल लेके खो जा ।
जोड़-घटाव आ गुना भागा , जाड़ा में कठुआए दीहऽ ।
करऽ आपन सोच रूहानी, जनमतुआ जस पावन होजा ।

अंग लगला पो जियरा जुड़ाइल रहे ।
रतिया कइसे कटल लो भुलाइल रहे
एह परिवार में बाटे जादू भरल
सोझा अइला प मनवा थिराइल रहे

का बताईं कि केतना खजाना मिलल
चान क देख दिल में कुमुदिनी खिलल
रहे देह राह में कचटाइल तऽ का
केहू जगे से अपना न इचिको हिलल

रसिक

मलि मलि अंग नहाय
कामिनी फुर्सत के पल

हाय दैया अचके में छूटल घरिलवा

पिया दिल में समाके दिल तोड़ देलऽ
काहें मुँह मोड़ लेलऽ ना

चरचा होता गाँवे गाँव , तोहर टिकत नइखे पाँव
कादो नाता सवतिया से जोड़ लेलऽ ।
काहें मुँह मोड़ लेलऽ ना ।।

जबले रहीं हम कुँवार ,रोज कोड़ऽ तूँ दुआर
जोड़ि नेहिया के गरदन मरोड़ देलऽ
काहें मुँह मोड़ लेलऽ ना ।।

जाके करब हम रिपोट, रउआ मन में बा खोट
काहें प्रीति के बबलु तूँ छोड़ देलऽ
काहें मुँह मोड़ लेलऽ ना ।।


मन में बैठा
जल थल अंबर
प्रकृति प्रिया


जिनिगी के मैदान में पँइचा उधार ना होला
आपन पूँजी लगवले बिना बेपार ना होला
लोग त सपना देखेला तरई तूरके लइतीं
बाकी बे पगलइले सपना साकार ना होला

छोड़ीं लिखल अरकच बथुआ राम नाम गुन गावल जाय
जिनिगी के सुख बा एही में मन के भरम मिटावल जाय



मुख दुर्गंध
वस्त्र मनमोहक
उपला ज्ञान

जाति की जंग
खोया है जनतंत्र
भैंस को बीन

छूदर लोग
भभीख के मालिक
यक्ष सवाल

मुँह मुखौटा
वचन सुभाषित
हाथ कटारी

भूआ उड़ल
किरपिन के भोज
भूखा बाभन

भूल गइनी
विचार के मेला में
आपन रूप

मन में बैठा
जल थल अंबर
प्रकृति प्रिया

भकभउँजा
छेहर जिनिगी के

जे भइया के नाच नचावे ,
उनुकर महिमा कान्हा गावे ।
भइया राम सिया भौजाई ,
माथ झुकावे अनुज कन्हाई ।
जिनिगी में ना बाधा आये ,
ढ़रकत सांझ अनत सुख पाये ।
आजु क दिन गंगा जस पावन ,
सौवा साल लगी मनभावन ।
जय जय जय गंगा महरानी,
भइया भाभी काटस चानी ।


मुँह खरकटल बा लोसन लगाली
पाटी खाति तैयार होईं हाली



बेटी के बिआह खाति बाबूजी तबाह बाड़ें ।
बेटा मोबाइल प इन्टरनेट चलावता ।।

हाड़ तूरि काम क के छोंड़ भरस घर के।
अपना के छँवड़ा अपटूडेट बतावता ।।

हड़री में पेंडुरी चढ़ जाता उठला पर ।
जवानी के जोम में ऊ सेंट गमकावता ।।

कबो कबो
का दो हो जाला




विचार नइखे मिलत कि माल नइखे मिलत
नीति अनीति को कौन सोचता है ?
प्रीत की रीति किसे पसंद है
सबके सब


किच-किच बधार बा
पड़त फुहार बा
तनि तनि लउकता
घेरले अन्हार बा
माटी के चपल पेन्ह
चलता मँगरूआ
काठी मेहराइल बा
बंद बा दोकान सभ
बाबा के लागल बा
बीड़ी के तलब



सरिता के समुंदर से भेंट हो गइल
इसपरेस रहे जवन बुलेट हो गइल




खुशी के पल
विचरे गगन में
मन परिंदा

रसिक

केकरा मिली फयदा ?
आसमान के परिंदा के ,
कि धरती के बसिंदा के ।
दाना छिंटाइल बा
छँवड़ा भुखाइल बा
बींडी पी के खटिया प
बाप लोंढ़िआइल बा
माई के करेज फाटे
बिनतिया भोरे से
दोसर ना बिन लेबे
बबुआ अगोरता
मुरूगा के बोली से
जीयरा कचोटता ।


मतिया ना काम करे माथा चकराइल बा
ठूँठ भइल जिनिगी पो काल मेंड़राइल बा

बात माने घरनी न , बबुआ सम्मान करे
राति खा बँड़ेर देखि , जियरा डेराइल बा

मन के मुराद मन हीं में कुम्हिलाई गइल



लोग कहेला कि बुढ़वा सठिआइल बा
आँखि के सोझा सभ बिगहा बेचाता
निमिया डार पर गिद्ध के बा खोंता


। । ऽ । । ऽ । । ऽ । । ऽ

पढ़ि के मन में अनुराग उगे ,
अस पाठ पढ़ावल नीमन बा ।
जवना जुगुती सभ लोग जगे ,
अस बात बतावल नीमन बा ।
सच पूछि त पीर भरे मन से ,
उधियान सरीसहिं खौलत बा ।
चिपका उनुका क हिया भितरे ,
कुछ बात बढ़ावल नीमन बा ।

खल खल के मानुख धरती पर ,
अपने हीं धुन में मस्त रहे ।
दोसर के बात चलाइब ना ,
अपने करनी से पस्त रहे ।
अरकठिया तन कठुआइल बा,
सरकार क असरे ढींढ़ भरी ।
ऊ ताकस रोज बँडेरी पर ,
मलिकाँव मिलल जे व्यस्त रहे ।





केकरा से करीं बात , लोगवा लगावे घात
रहि रहि जीयरा डेराल मोर बाबूजी

दुअरे प दुख खाड़ , अचके में टूटे डाढ़
कोल्हू जस जिनिगी पेराला मोर बाबूजी


केकरा प करब भरोसा , परोसा में प्यार ना मिली ।

सभ लोग लागल बाटे अपने हीं फेर में
रूप रंग रूपेया बा असहीं अनेर में
कोइला के खदान में कछार ना मिली ।।
हो परोसा में प्यार ना मिली ।।

जिनिगी जवानी में नादानी ढ़ेर कइले बा
संझिया खा सभ आके गरदन धइले बा
चाभे ला चुहानी में सुतार ना मिली ।।
हो परोसा में प्यार ना मिली ।।

एक हीं उपाय बाटे मनवा के मार दऽ
तनवा के तुरही बजावल अब टार दऽ
कान्हा जस तोहके इयार ना मिली ।।
हो परोसा में प्यार ना मिली ।।


हमरा आदत लागल बा मुफुत में खाये के ।
बिसवास ना होखे तऽ आजमा के देख लऽ ।।



चार दिन ला नइहर गइनी , घर के भइल कबाड़ा।
साँच-साँच पूछीं त हमके , झारे लगैं पहाड़ा ?

चीनी चाय चबेनी चटनी , चारे दिन में चट भइलस।
चूल्हा पर चीकट बइठल बा ,भरल सिलेंडर पट गइलस।

का पेटे भन्सार झोंकाइल , कि भंभा पेट समाइल।
बोलऽ ना तऽ देब कपारे , खोरनाठी खपचाइल।

थर-थर काँपत हाँथ जोड़ के , कहलें कथा तिवारी ।
हमरो नइखे दोष खखोरनी , ई परिनाम इयारी ।

पाँच गो पांड़े आइल रहलें , कहलें जसन मनाइँजा।
घर में नइखीं काली माई , रूचिगर भोग लगाइँजा।

हम ना जननी चारे दिन में , लवटि के अइबू घरे।
एक महीना कह के गइलू , नइहर अपना चरे।

अब ना होई कवनो गलती , आगे टहल बतावऽ।
कहली अब पाँचों पँड़वन से , घरवा के चमकावऽ।

No comments:

Post a Comment