Wednesday, 11 October 2017

लोचन

लोचन
तरूण के शादी कइला दु साल हो गइल बाकि अबहीं कवनो फर फूल ना लागल बा एह से उनकर माई मन ही मन उदास रहली। संग हीं के बिआहल रजमतिया के गोद भर गइल आ ना जाने हमरा घरे कबले छीपा बाजी। तरूण के मेहरारू सुशीला रसायन शास्त्र से एमएससी एमएड रही , आ घर से दस कोस दूर पो एगो इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ावत रही ।रोज उनकर सवांग मोटर साइकिल से छोड़के अपना काम पो जात रहन। तरूण के आपन दवाई के दोकान रहे।जिनिगी बाड़ा हँसी खुशी में बितत रहे।एक दिन सवितरी फुआ तरूण के घरे आइल रही , आ तरूण के माई से कहले रही " ए भउजी , अरे बचवा बो के कतहीं देखाव दु बरीस से जादा हो गइल कवनो लइका थोड़े बा लोग हमार त काम तोहरा से कहे के बा बाकि तोहार मर्जी दोसरा के घर में हम दखल ना देनी "
ओह दिन से तरूण के माई के मन में शंका पैदा होखे लागल पता ना पतोहिया बांझ त नइखे , अपना लइका के बेरे में केहु खराब ना सोचेला एह से सभ दोष सुशीला के उपर थोपा गइल।एक दिन सभे बइठल रहे त तरूण के माई आपन मन के बात बतवली तब सुशीला कहली कि अम्माजी परेशान काहें होत बानी अपना हाथ में थोड़े बा जब होई तब होई।
बहू के जबाब से सासजी के मन ना मानल कहली " ए बहुरिया ना होखे त एक दिश ब्रह्म बाबा के देवल अगोर के आवल जाय बड़ी उनकर चलती ह , जे गइल बा उ खाली हाथ नइखे लौटल।" बहुरिया सासजी के मंशा समझ गइली आ इहो जान गइली कि के कान भरले बा कहली कि अम्माजी हम एह में विश्वास ना करेनी। आ कवनो बाबा में अइसन शक्ति नइखे जेकरा आशीरबाद से केहुके दिन चढ़ जाई हम विज्ञान पढ़ले बानी आ इ सब ढ़ोग के मरम हम जानतानी। ओही दिन से सास बहू में खटपट चले लागल। सासूजी तरह तरह के गारी देके आपन भड़ास निकाले लगली। अब उ बचवा बो ना कहके बंझिनिया कहे लागल रही जे सुनत रहे निक ना लागत रहे। एक दिन सासूजी तरूण से कहली कि एह बंझिनिया के हम मुँह देखतानी त हमार दिन खराब हो जाता एकरा के नइहर पेठा आव । माई के एह बेवहार से तरूण तिलमिला गइलन उ जानत रहले कि कमी केकरा में बा आ ओकर इलाजो करावत रहले। पहिले त माई के कबो जबाब ना देले रहले बाकि ओह दिन माई से कहले " हम शादी कइले बानी त हम साथे रहब नइहर कहें भेजी आ जब तु ओकर मुँह नइखु देखल चाहत त हम ना देखाइब आ काल्ह से हमनी के दुनो बेकत घर छोड़तानीजा।"
माई जोर से बात करत रही ताकि सुशीला भी सुन लेस , सुशीला संस्कारी बहू रहली अपना जबान से माई के कुछो जबाब ना देली खाली सुसुक के रोवत रही। अगिला दिन तरूण आ सुशीला शहर में जाके रहे लगले लोग ।उहाँसे सुशीला के स्कूल भी नजदीक रहे आ तरूण के दोकान भी , सुशीला मरद के नास्ता खाना बनाके पैदले स्कूल चल जात रही , खाना भी जब टिफिन होत रहे त घर हीं में लोग आ के खात रहे। सुशीला शिक्षक रही त उनका पो समाज के बहुत उत्तरदायित्व रहे आ आपन निजी दुख के कबो स्कूल में ना ले जात रही। काफी इलाज करवला के बाद आशा के कुछ किरन देखाई पड़ल , दुनो बेकत के खुशी के ठेकाना ना रहे । बड़का अस्पताल में जाके जाँच करावल लोग त खुशी पो डाकटर ठप्पा मार देलस। सुशीला पति से निहोरा कइली कि ए जी इ खबर आम्माजी के दे दीं ना ।तरूण साफ मना कर देलन त सुशीला जादा जोर ना देली।
पन्द्रह अगस्त के पुरा देश स्वतंत्रता दिवस के जश्न मनावत रहे ओही दिन सुशीला के भी बाँझपन से स्वतंत्रता मिल गइल। अस्पताल के दाई तरूण से नेग लेबे खातिर नखरा करे लागल।तरूण भी ओहदिन बगली में जतना पइसा रहे देखलन ना मुठ्ठी में लेके दाई के पकड़ा दिहलन। तरूण आज लइका के बाप रहले। अस्पताल में सुशीला के माई बाबूजी साथे रहले बेटी के माथ से बाँझिन के टीका मिटिक गइल रहे खुशी के मारे उहो अपना काबू में ना रहलें। अपना गाँव के नाउ के बोला के खुशी के लोचन लिखके तरूण के घरे पेठवा देले।
जब नउआ लोचन लेके तरूण के घरे चहुँपल आ उनकर माई सुनली त धाधा गइली , ओह घरी उ छत पो कपड़ा पसारत रही तले तरूण के बाबूजी जोर से चिल्ला के कहले " ए मलकिनी सुनतारू पोता भइल बा हो पोता " एतना बात जब कान में परल त सभ कपड़ा उपर छोड़के लोचन पढ़े खातिर सीढ़ी से उतरे लगली । खुशी के मारे लामे लामे डेग बढ़ाके दु दु गो सीढ़ी एके साथे उतरे लगली तले गोड़ छटक गइल आ पलटी मारत निचे गिर गइली , अब घर में हाहो दइया मच गइल फटाफट कार में बइठा के अस्पताल लोग ले गइल। डाकटर जाँच क के बतवलस कि इनका दिमाग में चोट लागल बा आ खून के थक्का जम गइल बा अपरेशन करे के परी। कुदरत के खेल देखीं ओही अस्पताल में सुशीला भी रही बाकि उनकर छुट्टी मिल गइल रहे घरे जाहीं वाली रही तले तरूण उनका के खबर देलन ।तरूण पहिलहीं माई के सेवा में हाजिर हो गइल रहले। माई होश में रही बाकि हाथ गोड़ ना चलत रहे , कवनो नस दब गइल होखी एही से लकवा जइसन मार देले रहे। सुनिता सुनली त लइका के उठाके आम्माजी भीरी आ गइली आ रोवते आँख से कहली आम्माजी हई लिहीं आपन थाती आ आशीर्वाद दीहीं। माई के आँखी से ढ़र ढ़र लोर चुवे लागल । सुशीला लइका के छाती पो सुला देली । माई अंदर से टूट गइल रहली उनका सोझा वंश बिलात लागत रहे आ जब सुनली के सुशीला के बाबुजी लोचन भेजले बाड़े त खुशी के बटोर ना पवली। उनका आँखी के सोझा सुशीला के गरियवल , बाँझिन कह के घर से निकालल छन भर में सभ लउके लागल । पोता के मुँह देखली त हिरदेया जुड़ा गइल , लइका के भर आँख देखते देखत एक देने मुड़ी ढ़रका देली।

~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~

संस्कार

संस्कार   
 जब बिरिधा आश्रम से सनेस मिलल कि बाबूजी के दुनो किडनी खराब हो गइल बा आ तोहार भाई अनुराग से कवनो संपर्क नइखे होखत । जदि तु चहतारू कि बाबूजी के जान बाचो त अपना से इलाज कराव लोग, बिरिधा आश्रम एतना बड़ इलाज खातिर समर्थ नइखे। तब बिरिधा आश्रम से अपना बाबूजी के निकाल के कुसुम कार में बइठा के अपना पति राजन से पसगयबत में बात करे लगली। बाबूजी के घरे ना ले जाके अस्पताल में भरती करा देहल जाव आ हम आपन एगो किडनी बाबूजी दान करे के सोचत बानी राउर का आदेश बा । कुसुम अपना पति के विचार जानल चहली , कुछ देर तक उनकर पति के कठेया मार देलस आ लोर बहावे लगलन। एह से लोर ना बहावत रहले कि उनकर पत्नी किडनी दे दीहें त आगे उनका तकलीफ हो सकेला । बाकी अपना पत्नी के कर्तव्यपरायणता पर खुशी से आँसू बहावत रहलें । कुसुम के भी एके लइकी रहे आ घर के लोग एगो लइका खातिर कुसुम पर दबाव डालत रहे। कुसुम दोबारा देह से भइली त उनकर ससुर एगो जान पहचान के डाक्टर से जाँच करवलन त लइकिये रहे , फिर का डाक्टर से बतिया के साफ करा देलन । इ बात के ओह घरी कुसुम के पता ना चलल रहे आ ना उनका पति के हीं , उ समझली कि कवनो क गलती हो गइल होई एहीसे नुकसान हो गइल ।
            यह बात के पता तब चलल जब एक दिन उ अपना माई के मुह से उनका करम पो कोसत सुनले , उ कहत रही कि "बुझाता इहो निसतानिये होई का दो।" फिर बाबूजी से पुछलन त बाबूजी साफ साफ बता देलन । ओह घरी राजन के समझ में ठीक लागल रहे उहो चाहत रहले कि एगो लइका चाहता। बाकि कुसुम से कुछ ना बतवले रहलन। आज उहे घटना इयाद आ गइल रहे। हमनी के समाज में लोग लइका खातिर हाय हाय करता आ लइकी के हीन समझता लोग आज उहे कुसुम अपना बाबूजी खातिर हीन से महीन हो गइल बाड़ी । कुसुम के बाबूजी के साथे उ बात ना रहे उ बेटा बेटी में दु भाव ना करत रहन। फिर भी बेटा खातिर त पेयार उपरवछिये जाला । कुसुम के अपना भाई अनुराग पो नाज रहे , उ अगरा के कहत रही कि उनकर भाई विदेश में रहेला । कुसुम के ससुरा चल गइला के बाद बाबूजी के बड़हन घर भकसावन लागत रहे , उनकर माई त पहिलहीं गुजर गइल रही आ जले बाबूजी के हाथ गोड़ चलत रहे तले घर हीं में एगो नोकर राख के रहत रहन ।
             कुसुम के बाबूजी के नाम बिसेसर रहे आ गाँव में उनकर एगो जिगरी दोस्त नारयण रहन।दुनो जाना एके संगे काम करत रहे लोग आ एके दिन रिटायर भइल रहन जा । नारायण के लइका बेरोजगार रहे घर के खेती बारी देखत रहे बाकि सेवा के नाम पो जहरे उगिलत रहे। एक दिन उ कहलस कि बाबूजी तु काहें नइख बिरिधा आश्रम चल जात तोहारा के निमन से देख भाल करीहेंसन।आ तोहार मनवो लागल करी , इहाँ दिन भर टरटरइला से त जान बाची ।
    नारायण इ बात बिसेसर से कहलें त बिसेसरो बिरिधा आश्रम जाये के तइयार हो गइलें ।बिसेसर आपन दोस्ती के फरज निभावल ना भुलइले अपना साथे साथे नारायण के भी खरचा खुदे उठावस। पिनिसिन के पइसा आ जवन खेती के नगदी करत रहन उ सभ आश्रम में दे देत रहन साथे साथे केहु के कवनो परेशानी होत रहे त बढ़ चढ़के लागल रहत रहन । एह सुभाव से बिसेसर के सभे आश्रम में चाहत रहे । कुछ दिन पहिले नारायण , नारायण लोक में चल गइलन त बिसेसर अकेले पड़ गइलन , आपन संघतीया बिनु उदास रहे लगलन आ उनका अकेलपन काटे धावे लागल । एही बिच उनका एकदिन बोखार आइल आ पेशाब बंद हो गइल डाक्टर घून पेशाब जाँच कइलस त उनका पेशाब में इंफेक्सन रहे , खून में किरिटिन बढ़ गइल रहे एह से किडनी काम कइल बंद क देले रहे ।
         कुसुम किडनी दान करे खातिर सभ टेस्ट करा लेली सभ सही निकलल त खुसी के ठेकाना ना रहे, उ अपना सवांग से कहली " लागता भगवान हमनी के सुन लेलन अब बाबूजी के कुछ ना होई । अपरेशन के दिन तय हो गइल आ अपरेशन करेवाला डाक्टर परितोष रहले । डाक्टर परितोष लंदन रिटर्न रहन आ उनकर बहुत चलती रहे।बाकि अभी तक परितोष के पता ना रहे कि उ केकर अपरेशन करे जात बाड़न।
      अपरेशन सफल हो गइल करीब एक सप्ताह तक दुनो बाप बेटी एगो स्पेशल कमरा लेके लोग रहे । डाक्टर साहेब रोज देखे आवस आ बड़ा प्रेम से बतियावस । बाबूजी  के अइसन बुझात रहे कि उ अपने लइका से बतियावत रहले।
     दुनो बाप बेटी के अस्पताल से छुट्टी मिल गइल रहे बस बिल चुकता करे के रहे , राजन (कुसुम के पति) जब काउंटर पर गइलन त उनका अचरज के ठेकाना ना रहे कहें से कि बिल केहु भर देले रहे । उ कैशियर से पुछले कि बिल के भरल हि त कैशियर के जबाब रहे आप डाक्टर परितोष से जाकर पुछिये। राजन डाक्टर परितोष के केबिन में जा के पुछले सर हमार बिल के भरल हा। त डाक्टर बोलले कि केहु आपन फर्ज अदा कइले बा बिल भर के। राजन कुछ समझ ना पवलन फिर से पुछलन , बाकि के ?
       डाक्टर परितोष कहले कि चलीं बाबूजी भीरी हम उहँवे बताइब। दुनो जाना बाबूजी भीरी गइलें डाक्टर सहेब के देख के बाबूजी हाथ जोर लेलन आ कहलन " रउआ भगवान बानी ।" डाक्टर साहेब बाबूजी के पैर छुवलन आ पुछलन कि " बाबूजी हमरा के पहचानतानी ? " बाबूजी ना में मुड़ी हिला देलन।
         तब डाक्टर कहले हम परितोष हईं राउर लइका अनुराग के इसकुल में पढ़त रहीं हम उनका से एक कलास पीछे रहीं आ जवन भी उनकर छोड़ल किताब कापी आ टिउसन के नोट रहे रउआ हमरा के दे देत रहीं। हम एक बे रउआ से पुछले रहीं कि कितबिया के आधा पइसा लेलीं त राउर जबाब रहे कि  " विद्या के दान कइल जाला बेंचल ना जाला ।"ओह घरी हमरा घर के हालत अइसन ना रहे कि हम किताब किन के पढ़ लीं ओह घरी रउआ हमरा खातिर  भगवान बन के सहायता कइले रहनी। बारह पास क के हम डाक्टरी के इंतिहान देनी त पास हो गइनी, छात्रवृति मिले लागल आ छोट मोट खरचा लइकन के टिउसन पढ़ाके चलावत रहीं आज हम एह स्थिति में रउआ कृपा से बानी। पहिलहीं दिन जब रउआ के देखनीं त पहचान गइल रहीं ।आज हमार मोका आइल बा राउर सेवा करे के  ।हमहीं राउर अपरेशन कइले बानी आ हमहीं सभ खरचा उठाइब हाथ जोरके बिनती बा रउआ मना मत करब । बाबूजी के आँख लोरा गइल आ परितोष के अंकवारी में भर लेलन बाबूजी आ कुसुम के छुट्टी हो गइल आ अपना घरे लोग चल गइल।
    एक दिन सुतला राते फोन आइल त कुसुम हड़बड़ाके उठली रात में दु बजे के बेरा रहे, उनका हैलो करे के पहिलहीं आवाज आइल दीदी हम अनुराग बोलतोनी , "हँ बोल कह का कहतार" कुसुम कोहना के बोलली ।
अनुराग समझ गइलन की दीदी गुस्सा में बाड़ी बाकि उनका दुख ना लागल। आपन गलती के उनका अनुमान त रहले रहे फिर भी कहलन दीदी हमार मोबाइल भुला गइल रहे एह से हमरा केहुसे संपर्क ना भइल, बाबूजी कइसन बाड़न बड़ा मुश्किल से त तोहार नंबर उपरजले बानी। कुसुम बात करेके तरीका से समझ गइली कि अनुराग झूठ नइखन बोलत फिर सउँसे कहानी अनुराग के सुनवली। अनुराग फोने पो भोकार पारके रोवे लगलन  हमरा बाबूजी पो अतना संकट परल आ हमरा तनिको खबर ना मिलल। फिर कहलन दीदी हम परिवार साथे अगिला महीना आइब ।
         आज खूब चहल पहल रहे अनुराग के घरे आ काहें ना होई बेटा विदेश से आइल बा आ बाबूजी के दोसरका जनम भइल बा दुगना खुशी बा चहल पहल त रहबे करी । अनुराग सतनारायन भगवान के काथा सुनके संउसे गाँव के भोज खिअवलन  आ रात में भजन कीर्तन के मंडली आइल रहे, एही बिच अनुराग माइक लेके सभके से चुप रहे के गोहार लगवले। सभे चुपा गइल त अनुराग कहलन आजकल हमनी के विज्ञान पो जाता भरोसा क के आपन जिनिगी के अनमोल पल छोड़ दे तनी जा आज चिठ्ठी पतरी लाखात रहित त एको महीना में समाचार मिलिये जाइत , हमार मोबाइल भुला गइला से छव महीना से हमरा कवनो अता पता ना मिलत रहे के कइसन बा कुछ ना पता चलत रहे एही बिचे बाबूजी पो अतना बढ़ संकट परल । केहु सुनी  त इहे नु कही कि बिसेसरो बाबा के लइका नालायक हो गइल । हम बितल समय के फेरसे ना ला सकेनी बाकी आगे अइसन संकट हमरा जियते ना आई, हम अपना साथे बाबूजी के भी विदेश ले जाइब, आ एह में बाबूजी रावा मना मत करब , बाबूजी के तरफ इसारा क के अनुराग कहले। सबहर गाँव ताली पीटके अनुराग के बारे में कानाफूसी करे लागल , " बेटा होखे त अनुराग जइसन "
    आ हँ बाबूजी के गाँव से बहुत लगाव रहे उहाँके लइकन से बहुत पेयार करत रहीं त इ आपन घर में लइकन के पढ़े खातिर पुस्तकालय खोल देतानी जवन लइका पढ़ल चाहीं हमार सहयोग ओकरा खातिर रही । परितोष भी जलसा में शामिल रहले उ अनुराग के बात बिचे में काटके कहले , हमहुँ एह नेक काम में अनुराग के साथ देत बानी आ एह गाँव के केहु के तकलीफ होई त हम उनकर इलाज मय दवाई  मुफुत में करब। पुरा गाँव खुशी से नाचे लागल आ अनुराग , परितोष आ कुसुम दीदी के जयकार होखे लागल । इ दृश्य देखके बाबूजी के आँख में खुशी के लोर ढ़रके लागल । राजन के अपना पत्नी पर गर्व रहे आ आगे से निरनय कइले बेटा बेटी में फरक ना करीहें एगो बेटी बड़ी उहे हमार धनसुत रहीहें ।