30 / 06 /17
खोरनी
से दगले बा , लेके
सारा दाम
हाड़
माँस सब सुखल बा , छोड़त
नइखे चाम
छोड़त
नइखे चाम , राम
अब कहँवा जाईं
हाथ
गोड़ सब थकल , लोक
में जल्द बोलाईं
लागल
तन में रोग , कहे
बाउर बा करनी
यम के ना संयोग , दागे
हर पल खोरनी
रसिक
बुढ़पा
के अनिष्ट से डेराये के नइखे
जवानी
के जोश में हेराये के नइखे
होश
में रहला पो करहा बन्हाइल रही
जिनिगी
के संघर्ष से पराये के नइखे
रसिक
गाँव
***
एहो
बटोही डेग बढ़ावऽ अपना गाँव के ओर
काहें
भगलऽ छोडके घर का इहँवा नइखे अँजोर
ललकी
किरिनिया स्वागत करी देह में फूर्ति लाई
भुअरी भँइस के मीठ दूध ह तन के ताप बढ़ाई
टुअर ना रहब इहँवा तु हित मीत सभे साथे बा
लउकी चहुँ ओर हरियरी ललका गमछा माथे बा
शहर में सभ साधन बा मिलल गाँव के मत गरियावऽ
बाप माई के दर्शन खातिर कबहुँ गाँव में आवऽ
बिजली आइल बिया गाँव में सड़क सुनर लागत बा
ए बबुआ तु साथे नइख बुढ़वा इहाँ अभागत बा
पहिले जइसन गाँव नइखे सब साधन मौजूद बा
पेट भरेला शहरी के गाँव के अभी वजूद बा
गाय के गोबर निमन बा माथे तिलक लगावेलन
रसिक कन्हैया खुश होके गाँव क महिमा गावेलन
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
गलती
से मेरे सास को , डँस
दी काला नाग
सासूजी
सुमिरन करे , वो
लगा फेंकने झाग
पूंछ
पटक कर रो रहा ,नही
था कुछ एहसास
ऐ
नागिन की माँ बख्श , लोग
करे परिहास
ऐसा
जहर है बदन में , विषदंत
कठुआय
बोली में मिश्री तेरी , मन
में कलुष समाय
चौसठ कला प्रवीण हो , कर
सोरह सिंगार
देख ससुर लट्टू भये , अब
करते हैं बेगार
मैं भी हूँ असहाय अब, मति
गयी है मारी
सब निर्णय वो ही करे , मौनी
रसिक तिवारी
बस
इतना हीं कहा कि सासू जहरीली
सुनी
लुगाई बैन तो हो गयी लाल पीली
फिर
तो किया उद्धार मेरे दस पीढ़ी को
मैं
रह गया हकबका तोड़ दिया सीढ़ी को
मत
करना हे दोस्त कभी ऐसी गलती
बिन
मांगे माफी अब दाल नहीं गलती
कन्हैया
प्रसाद रसिक
जलील
किये हो शब्द बाण से
जरा
मेरी जगह आकर पीर महसूस करो
~ रसिक ~
काश
! हम भी मूर्ख होते
और
पत्नी मिलती विदूषी
उसकी
फटकार से बन जाता विद्वान
तो
बढ़ जाती खुशी
सुनकर
मेरी बात पत्नी खिलखिलाई
और प्यार से मुझे समझायी
आपने मुझे विदुषी कहा ये आपकी विद्वता है
पर खुद को विद्वान समझते हो ये आपकी••••••
छोड़ो जाने दो अब तो जीएसटी भी लग गया
यानी एक देश एक कर
एक बीबी स्वीकार कर
रसिक
प्रेम
***
प्रेम
तपस्या खोजता , बिरह आसनी बैठ
और
तड़प के मार्ग से , उर में करता पैठ
उर
में करया पैठ , आँख में नींद न आती
पुनि पुनि पग लपटाय , जैसे
बेंग बरसाती
जग बैरी हो जाय , पूछता
कोई न क्षेम
फिर भी रहता अडिग , बिहंसता
पल पल प्रेम
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
गाजर
मूली महंगा भइल , परवल
छोड़े परान
गेहूँ
खेत कोहनाइल बा , खुलल
खेसारी आन
आज
जोर से गरजत बाटे , पडल
रहे जे कोना
अइसन
बहल बयार गजोधर, बड़का
भइले बौना
रहर
के अब अंइठल छूटी , मटर
के बढ़ले भाव
भँइस गइल अब पानी में जब , चढ़ल
अनाड़ी नाव
खिसिअइला में कुछऊ नइखे , खोंच
बा धोती लगल
मुखियाजी के मुँह में माहुर , ढ़कना
से बा ढ़ाँपल
कइसे चली विकाश क गाड़ी , बनल
घुरहुआ चालक
रसिक उठावऽ छाता डंटा , नइखे
कवनो पालक
कन्हैया
प्रसाद रसिक
नहीं
विश्वास अपने आप पर बकवास करते हैं
पुजारी
शारदे तो हर समय कुछ खास करते हैं
वतन
अपना चमन अपना सभी सुख दुख यहाँ अपना
जिसे
लगता पराया है सतत परिहास करते हैं
~ रसिक ~
गुरू
के चरणों में चंद पंक्तियाँ:-
इश्क
का जलवा मरने के बाद शुरू होता है जिन्दा रहकर इश्क अश्क बहाता है
मौका
परस्त दुनिया को देता है पैगाम अपनी कहानी हर जुबान पर लाता है
मिटने
से क्यों डरता है ऐ रसिक मिटना तो जहाँ में है अवश्यंभावी
जो मिट गये मुहब्बत के राह में रब उसके रूह पर सुमन बरसाता
है
मत
समझना कि बच्चों का खेल है मुहब्बत
न तो
दो नश्वर शरीर का मेल है मुहब्बत
चलती
है सत्ता ब्रह्मांड़ में मुहब्बत की
पथरीला
पथ पर पथिक का सेल है मुहब्बत
~ रसिक
~
सहर
हर शख्स से कहता खज़ाना भर लो खुशियों से
मगर
एक शर्त है रब को सदा खीसे में रखना है ।
~ रसिक ~
सोच
में हो शुचिता तो , सफल
होते है काम
सरिता
के तट पर , मेला
लग जाता है
प्यास
नहीं बुझती है , सिंधु
के शरण जाके
पवन
पसंद पर , तन
अलसाता है
मानव
की रचना तो , सृष्टि में है सर्वश्रेष्ठ
सुन्दर
सुकर्म पर , देव ललचाता है
रखना
तू तन मन , रसिक सँवार कर
वरना
क्षण भर में , मान लूट जाता है
कन्हैया
प्रसाद रसिक
है कोई ताबीज़ जो इंसान बना दे
इस नफरतों के दौर में प्यार सीखा दे
~ रसिक ~
रे
मन
चले
जा
एकांत
में
प्रभु
स्मरण
छूकर चरण
अज्ञान संवरण
~ रसिक ~
बाउर के पथ में ढ़लान होला
जे निमन चाहे उ महान होला
जे फिसल जाला सस्ता देखके
समझीं उ मनई नादान होला
~ रसिक ~
ढ़ूँढ़ते हैं रोज हम भगवान को
रब ढ़ूँढ़ लिया क्या किसी इंसान को ?
रोज जाते हैं खुदा के कक्ष में
क्या याद करते हैं कभी ईमान को ?
~ रसिक ~
पाप
न जाई गंगा जल से , धवल
वस्त्र मन मइल बा
अपने
करनी आगे आई , सब
धन धरम के धइल बा
आँख
प पट्टी बन्हले बाडऽ , बोली
में बडुए आग
जहिया
लिही काल करवटिया,ओह
दिन फेंकबऽ झाग
रसिक
जवन
याद रहे भुला दिहनी
जवन
सँचल रहे उडा दिहनी
अब
घुमींला कटोरा लेके
जोश
रहे होश गवाँ दिहनी
रसिक
का कसूर बा आँख के
जे
ढ़र ढ़र लोर बहावे
दिल
के दिहल दरद ह ई
आँख
पर दोष लगावे
~ रसिक
~
किरिया खियालऽ जान रही तोहरे सम्मान
में
चाहे जमाना जुल्म से जख्मी करे मुझे
~ रसिक ~
सोच
रहा हूँ कहीं से चुल्लू भर पानी मिल जाये
जमाना
क्या कहेगा गर कहीं दरिया में डूबा तो
~ रसिक ~
वक्त
***
वक्त
बोलावेला वक्त दुरदुरावेला
वक्ते
अलसइला पो गरवा लगावेला
वक्त
के महिमा के सगरे जहान जाने
वक्त ही लोगन के माथ प बइठावेला
~ रसिक ~
निकलना गवारा नहीं
जब से इश्क हुआ
अब डोलना छोड़ दिये
पीपल के पात भी
~ रसिक ~
न जाने क्यों देखते हीं मदहोश हो जाता
हूँ
सुना है दारू की दरिया उसके आँखों में है
~ रसिक ~
नजर के कसूर बा कि मन में केहु और बा
जियरा जरावत बाडऽ अँखिया तरेर के
बइठल बानी बगले में झांके लऽ दुआर दोसर
डहँकत बिया मुर्गी आ ताकेलऽ बटेर के
~ रसिक ~
नजर से नाराजगी और सफर से बैर
बोलो
खुशियाँ कैसे मनायेगी जीवन में खैर ।
~ रसिक
~
कुछ
याद आवेला तोहरा के देखके
ओह
दिन चप्पल चलवले रहु
आज
हमरा के चाहेलु।
सब
समय के फेर आ नजर के धोखा बा
ओह दिन दूरी बढ़ावत रहु
आज हँसके बतियावेलु ।
पहिले
हम आश लगावत रहीं
तऽ
तु घास कहले रहु
दु
पइसा पास में का आइल
हमरा
के खास बतावेलु ।
का
कइल जाव ,
पहिले
मन अधीर रहे
आज
आँख में नीर बा
आग त
अभीओ जरऽता
आ
करेजवा में पीर बा ।
हम
ठूँठ बानी
तु
झाखाड़ हो गइलु
हमार
जिनिगी तोहरा लाग जाये
आज
देखके तऽ मुस्कइलु ।
बेवजह
केहुके जलील ना करे के चाहीं
ना
जाने कब के का हो जाई
आज
रसिक रोवेलन हालात पर
तऽ
काल्ह ठठाके हँसीहन कन्हाई ।
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
चारो तरफ रिस्तेदारों का मेला है
फिर भी आज आदमी अकेला है
~ रसिक ~
असहज सहभागी लक्ष्य वाधित करती है
दादूर
का दंभ आईना नहीं दिखाता
~ रसिक
~
मन को मंदिर बनाओ तन धाम बन जायेगा
गिरे
को गले लगाओ अभिमान धुल जायेगा
रसिक
रश्म आदायगी रोज रोज करता है
तू
भी तो कर ले जरा पहचान बन जायेगा
~ रसिक
~
साजिशों का ये दौर है दामन कैसे
बचायें
कोई
गैर तो नहीं है हैं अपने हीं पराये
जिस
पर भरोसा की थी वो ईमान बेचता है
कान्हा
करे क्या बोलो सैयाद घात लगाये
~ रसिक
~
भोगी जोगी जस लगे , करे रोज उत्पात
बात अगर माने नहीं , देत दनादन लात
देत दनादन लात , प्यार से सब कुछ लूटे
करे शिकायत लोग , करम उनके जो फूटे
मूक बधिर विद्वान , सभी बन जाये रोगी
मौज उड़ाये रोज , मुखौटा पहने भोगी
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
कल
जिसको गले लगाये थे आज गला घोंटके चल दिया
सुन्दर
सी इस फुलवारी को बेरहमी से वो मसल दिया
बात
न करो जी अब ,लात से वो मानता हैं
रहम
की भीख न दो , गोली उसे चाहिये
कपटी
दुराचारी वो ,सभ्यता को जाने नहीं
कफ़न
में लिपटी हो , डोली उसे चाहिये
देर
किस बात का है , छोडो न संहार करो
नरक
में एक छोटी , खोली उसे चाहिये
रसिक
नयन भरे , देख कृत्य पातकी का
संयमी
सुसभ्य नहीं , बली उसे चाहिये
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
सहनशीलता अब नहीं , डट जाओ मैदान
पकड़ो तोड़ो कमर को , जो बदले ईमान
जो बदले ईमान , हो जिसकी नियत खोटी
फैला दो पैगाम , नोच लो बोटी बोटी
बहुत दिखाया धैर्य , चमन में फूल न खिलता
अरि से कर
संग्राम , छोड़के
सहनशीलता
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
चुल्हा चौका घर आंगन में घिरे
रहेंगे कब तक
कुछ
तो सोचो देश है अपना उसको आगे बढ़ाना है
~ रसिक
~
मिलन तो आम होता है जुदाई खास होती
है
तराने
जब छिड़े तो आँख से बरसात होती है
मिलन
की आस लेकर राह में पलकें बिछाती हूँ
जुदाई
में जहर घोले कटीली रात होती है
~ रसिक
~
चाबुक
तो चला नहीं खूब तिलमिलाते हैं
चोर
सीनाजोर सब पारखी बताते हैं
पसीने
की कमाई चली जाय नाली में
जंगल
में आग लगी कुँआ खोदवाते हैं
~ रसिक ~
आधा चना आधा खेसारी
किससे करे बताओ यारी
कौन पातकी कौन सयाना
किससे मांगे पानी दाना
सांच झूठ का निर्णय कैसे
जहर दवा बन जाये
जैसे
~ रसिक ~
बहाकर
पसीने भी पेट नहीं भरता है
किसी
को खैरात में खजाना मिल जाता है
हाल
चाल पुछे कोई हो जाता है लाल गाल
कहनेवालों
को तो फ़साना मिल जाता है
कोई
नहीं करना चाहे सत्य से साक्षात्कार
बैठे
बैठै गोली का निशाना मिल जाता है
देश
जा रसातल में चिंता नही किसी को
रसिक
को दर्द का तराना मिल जाता है
~ रसिक
~
जूता
****
जूता जब जबरन चले , तब बहुते इतराय
करके इज्जत मिट्टी में , मंद मंद मुस्काय
मंद मंद मुस्काय , बढ़ाये कीमत अपनी
सत्य देत समझाय , देखलो अपनी करनी
गलती करे महान , है ना कोई अछूता
उनके ही सम्मान , चलाया जाता जूता
~ रसिक ~
पाँव
सत्य के फटी बेवाई
झूठ
सड़क पर करे लड़ाई
न्याय
बंद कर ली है आँखें
चौकस
चमचे करे बड़ाई
~ रसिक ~
सखी
आया सावन
झूला
सैंया झुलाये
लागे
मन भावन
हरी
हरी चूड़ियाँ
खेतों
में हरियाली
प्यार के गीत गायें
आओ मीत बनायें
~ रसिक ~
असामान्य परिस्थितियों का भी स्वागत
करता हूँ
आखिर
जिन्दगी की चुनौतियों का सामना करना भी एक कला है
~ रसिक
~
स्वीकार करो प्रणिपात नाथ
कर
दो सावन को हरा हरा
मतभेद
भूलकर मिले सभी
सबकी
बोली हो प्यार भरा
रसिक
मैं
मेरी
इच्छायें
परस्पर
संवाद करे
जीतना है सृष्टि
आधार हीन तुष्टि
~ रसिक ~
पानी का है बुलबुला , मिट्टी का है
शेर
मारे जभी दहाड़ तो , हुआ बुलबुला ढ़ेर
~ रसिक ~
भाग्य भरोसे जो रहा , उसका विस्तर गोल
कर्म कनस्तर रस भरा , सत्य वचन अनमोल
~ रसिक ~
गावत गावत जिनिगी गुजरे , रौशन रहे दुआरी
पो
मरते दम चहके के चाहीं , करत गुमान बुढ़ारी पो
रसिक
बिक रहल बा रोज इहँवा हर समय ईमान बा
पूर्वजन के नाम ना पइसा इहाँ पहचान बा
श्राद्ध से संबंध नइखे खाली ख्याति सामने
रसिक पकड़स रीत त लोगवा कहे नादान बा
~ रसिक
मिट्टी से बने हो, मिट्टी में
मिलके, मिट्टी बन जाना
है,
ज्ञान की गगरी से प्यास बुझाओ गिरे हुये का
~ रसिक ~
बा जिनिगी तऽ कबहुँ सँवरबे करी
बा पानी में तन तऽ पँवरबे करी
हरीह ना हिम्मत कठिन काम से
बा देले उ दुख तऽ उबरबे करी
~ रसिक ~
बातचीत में करीं गोहार ,
बहुते निमन बा संसार
एकरा में मत दाग लगावऽ ,
सबके से हँसके बतियावऽ
जिनिगी बा पानी के बुल्ला ,
कभी न करीह
हल्ला गुल्ला
प्रेम के दियना
रह जरावत ,
हँसके लोगन से
बतियावत
रसिक पुरनिया
करेले बात,
भईया हो मत करऽ
आघात
~ रसिक ~
मैं
कविता लिखने में व्यस्त था
तभी
पत्नी बोली
एजी
चार सीटी के बाद
कुकर
बंद कर देना
"मैं
छत पर
कपड़े डालने जा रही हूँ"
मुझे सुनाई पड़ा
बंद कर देना
जैसै अश्वत्थामा नाम
नरो , मरो वा कुंजरो
के बाद कृष्ण का शंख
बज गया था
वैसे ही शंख बंद
होने के बाद
मुझे सुनाई दिया
" बंद कर देना "
तत्काल प्रभाव से
लिखना बंद करके
घर में घूमने लगा
इस तलाश में कि
कोई खुली चीज
दिखायी पड़ जाय
आज पत्नी को
खुश कर देना है
कि रिटायरमेंट के
बाद भी मैं सक्रिय हूँ
घूमता रहा घर में
पर कुछ भी
खुला नही दिखा
तो जो बंद था
उसे पुनः खोलकर
बंद किया ताकि
सब अच्छी तरह
बंद हो जाय
उधर चिल्ला चिल्लाकर
कुकर शांत हो गया
इतने में पत्नी
दौड़ी आई
तो देखी दाल के साथ
कुकर की
समाधी लग चुकी थी
अब कहने कि बात नही
कि क्या हुआ होगा
मैं अभी तक उस
खुले की तलाश
कर रहा था
सामने पत्नी दिखी
तो पुछ दिया क्या खुला था ?
फिर तो पारा
थर्मामीटर तोड़ दिया
प्यार से मेरे पास आई
और बोली
जरा मोबाइल देना तो
मैं सोचा कि
मैके से बात करनी होगी
हँसते हुये मोबाइल दे दिया
तड़ाक ! और मोबाइल शांत ।
यही खुला था
मुझे माजरा समझ नहीं आया
और पत्नी समझा नहीं पाई
दाँत चिहारे मोबाइल
टुकुर टुकुर ताक रहा था
मेरा भी स्वाभिमान जागा
और जोर से चिल्लाया
तूने मोबाइल तोड़ दी
पर पत्नी के ताप के सामने
ठंढ़क महसूस कर रहा था
वो बड़बड़ाते हुये बोली
मर गयी मेरी सौत
जबसे घर में आई है
मैं पराई हो गयी हूँ
और मुँह फुलाकर
सोफे पर बैठ गयी
मैं किंकर्तव्यविमूढ़
प्यार से पूछा
क्या बात हो गयी
कि इतनी आग बबूला
हो रही हो
उसने मेरा हाथ पकड़ कर
रसोई में ले गयी
मैं माजरा समझ गया
जलने की बदबू
अपना वर्चस्व
दिखा रही थी
पता नहीं चलता था
कि कुकर जला है कि दाल
क्योंकि दोनों ने ही
कर दिया था कमाल
दोस्तों,
पेट में चूहे कूद रहे थे
पर कुकर देखकर
सब भाग गये
अभी खाली पेट
कुकर रगड़ रहा हूँ
और पत्नी का पैर
पकड़ रहा हूँ
मेरे हालात पर
किसी को दया आये
तो दो प्लेट
समोसे भेजवा देना
और पत्नी से
सुलह करवा देना
अब खुद को
मैं रसिक लिखूँ या निरीह
आज न हो पाएगा फिलबदीह
कन्हैया
प्रसाद रसिक
काहें नेह लगवलीं हम नसीब से
काहें लो मुँह फेर लेता करीब से
मानव मानव में फर्क ना होला तऽ
काहें लोग ठुकरावता गरीब के
~ रसिक ~
आदमी आदमी को जलील करे आदमियत नहीं
किसी जख्म पर न मरहम लगाये इंसानियत नहीं
अपना कलेजा काढ़के कोई दे दे भलाई में
सच्चे इंसान का ये धर्म है हैवानियत नहीं
~ रसिक ~
दूर
कहीं बज रही शहनाइयाँ
आज
मेरे दिल में तूफान है
वक्त
ने बर्बाद किया वक्त को
रो
रहा इस वक्त में इंसान है
गैर
तो आया नही सम्मान में
कर
गया ऐसा करम ये कौन है
बख्श
दी तन को लहू निचोड़कर
पूछने
पर सर झुकाये मौन है
ऐ
रसिक तु सोच मत कर , न बहा आँसू यहाँ
दिख
रहा इंसान लेकिन , इंसानियत है कहाँ
~ कन्हैया
प्रसाद रसिक ~
राम नाथ कोविंद की , हुयी भयंकर जीत
पग जमीन छोड़ा नहीं , गगन बनाये मीत
गगन बनाये मीत , द्वार पर बाजा बाजे
मगन हुये मानिंद , ताज सर पर जो साजे
मन हीं मन मुस्काय , बनाये सब विधना
काम
तिलक लगाये भाल , सुमन बरसाये राम
~ रसिक ~
नारी तू महान हैं
************
बीबी के कई काम है शासन और प्रबंधन
लगते मियाँ आजाद हैं चौबीस घंटा बंधन
बीबी बोल बिलायती करती नव फरियाद
घर में करते
चाकरी कहते मियाँ आजाद
मैं गुलाम बीबी
का यारों ताल ठोक कहता हूँ
धौंस जमाऊँ ऑफिस
में घर मौन सदा रहता हूँ
कटु वचन अब
प्रिय लगे जब से घरनी आयी
अकड़ छोड़के पड़
गया चरण में रसिक कन्हाई
सब मर्दों की
हाल यही है कोई मुँह ना खोले
देवी के पीछे सब
प्राणी पूंछ हिलाये डोले
सारी सृष्टि में
हे नारद नारी की पहचान है
एक साथ बहु रूप
में सजती नारी तू महान है
~ रसिक ~
दिल का सौदा दिमाग से नहीं करता हूँ
भाव भूमि को झाग से नही भरता हूँ
जो भी निकलता है कुँवारा होता है ,
सारे जहाँ से प्यारा होता है
~ रसिक ~
आईना टूटता है तो आवाज आती है
जब विश्वास टूटता है तो कराह आती है
~ रसिक ~
किस
पर करें भरोसा सब श्राप दे रहे हैं
अपना
बनाके मुझको परिताप दे रहे हैं
जिसको
गले लगाया दिल में जिसे बिठाया
सब
सब्र को सुलाकर संताप दे रहे हैं
नयनों
से नीर निकले , फिर भी नहीं वो पिघले
किससे
करूँ गुजारिस , सब ताप दे रहे हैं
मंजिल
जो पास आयी, तब प्यार से बुलाया
गर्दन
पे रखके खंजर , सब थाप दे रहे हैं
~ कन्हैया
प्रसाद रसिक ~
मैं मुक्त भगवान को मानता हूँ
इसलिये
लोग मुझे नास्तिक कहते हैं
~ रसिक
~
थरिया
*****
थरिया
में खात बानी, थरिया
के छेदब ना
थरिया
के साफ कर , थरिया
बजाइब
छोट
छोट थरिया से, पोर पोर बढ़े रोज
बड़
होयी थरिया तऽ , बड़का कहाइब
थरिया
के कर्ज केहु , कइसे उतारी भला
थरिया
जब सजी त , देवता बोलाइब
काहें
गरियावेलऽ तु , बबुआ हो थरिया के
मुअब
तऽ थरिये में , पिंड़ा परवाइब
~ रसिक ~
टिक न जाऊँ आसमान पर
इसलिये जमीन पर आया करता हूँ
मिट्टी की महक सहक जाती है
जब माँ के आँचल में समाया करता हूँ
~ रसिक ~
रूपसी
की जुल्फ देख , उसी
में उलझ गयी
काजल
की कोर पर , अटक
गयी कविता
मदमाती
चाल पर , चंचल
हुआ जो मन
बल
खाती कमर पे , भटक
गयी कविता
शब्द
के किलोल को न , समझे अनाडी लोग
बेवजह
बवाल से , सटक गयी कविता
सरस
रसिक जन , प्रमुदित हुआ मन
खोली
जब कुंतल तो , पटक गयी कविता
~ कन्हैया प्रसाद रसिक
मत
करो खिलवाड़ भावनाओं से ,
सारा
विस्तार सिमट जायेगा ।
उजड़
जायेगी रक्षित जागीर ,
इतिहास
कलंकित कर जायेगा ।।
~ रसिक ~
आँख के ढ़ेढ़र आपन देखऽ , फिर
टोकऽ काना के
बिगडल
काम सब बन जाई , ई सलाह विधना के
~ रसिक
~
जियते जिनिगी जश्न मनावऽ
फूल
खिलावऽ परती पर
दिल
के दरवाजा के खोलऽ
मोक्ष
बा एही धरती पर
~ रसिक
~
बगुला भगत महान हैं , मछली को भरमाय
गर्दन कर्क पकड़ लिया , अंत समय पछताय
~ रसिक ~
जय भारत जय भारत माता ,
जय जवान जय देश महान |
हे भारत के जनता जागो ,
साहस का दो प्रबल प्रमान ||
~ रसिक
करिये रोज तकरार , न
पड़े गाँठ कभी
बीबी
रहे बुलंद
भाड़
में जाय सखी
~ रसिक
~
ऐ
जिन्दगी मुक्त कर दे कर्ज से
तेरा
अंतिम किस्त चुका रहा हूँ
फँस गया
था तेरे बहकावे में
आज तेरी
हक़ीकत बता रहा हूँ
जब सुनी
अंतरात्मा की आवाज
तूने
तुनक कर चादर तान ली
तेरी
औकात अब समझ गया मैं
इसलिये
अलविदा कह जा रहा हूँ
~ कन्हैया
प्रसाद रसिक ~
आ जाओ आस्तीन से बाहर ,
लावा दूध परोसा है |
आओ तुमको गले लगाऊँ ,
तुमपर अभी भरोसा है |
जब तक साथ रहोगे तबतक ,
वैर न मन में
उजेगा
ना जाने कब
समझेंगे जन
किसने किसको
दोषा है
~ रसिक ~
विश्वास नहीं होता फूल खिल गया
मैने तो जड़ में जहर डाला था
~ रसिक ~
भव्य
भवन पूछा झोपड़ी से,
तुम
हमेशा परेशान रहती हो
हर
मौसम की मार कैसे सहती हो
इतराकर
झोपड़ी बोली,
मैं
अरमानों को पालती हूँ
हतास मन में हिम्मत डालती हूँ
संतोष को संबल बनाकर
विश्वास को सम्भालती हूँ
जबाब
सुनकर भव्य भवन
शर्मिंदा
हो गया क्योंकि
उसके
अंदर
प्यार
का पवन नहीं बहता है
रहते
तो बहुत लोग थे पर
कोई
साथ नहीं रहता है
सब
महत्वाकांक्षा पलते हैं
और
फायदे के लिये डोरे डालते हैं
~ रसिक ~
एक गणिका गगन से गरज कर बोली
जमीन पे रहनेवालों
मेरी तुलना राजनीति से न करना
~ रसिक ~
तुम
इतना जो मुस्करा रहे हो......|
ऐसे
लगता है कि खुद को प्यार में कहीं उलझा रहे हो
तुम
इतना जो मुस्करा रहे हो......|
ये
तुम्हारी है शरारत या कि खुशबू प्यार की
जो
भी हो कातिल अदाओं से सनम तुम ढ़ा रहे हो
तुम
इतना जो मुस्करा रहे हो......|
नरगिसी
नयनों के कातिल नमन तुमको दूर से
गैर
के महफिल में बैठे यूँ हीं तू आजमा रहे हो
तुम
इतना जो मुस्करा रहे हो......|
ऐ
रसिक तुम हीं बताओ दिल का देना है खता
खेलने
वलों से मेरे दिल को क्यों उलझा रहे हो
तुम
इतना जो मुस्करा रहे हो......|
~ रसिक
~
ये कैसा सिद्धांत है , पैसे पर बिक जाय
राष्ट्रवाद के नाम पर , राष्ट्र बेच कर खाय
राष्ट्र बेच कर खाय , झोली का मुँह बढ़ाया
जनता टोके अगर , जोर से डांट पिलाया
थाली में कर छेद , मगर आँसू के जैसा
पद के भूखे लोग , राष्ट्र सेवा ये कैसा
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
भोजपुरी
से जन भेद करीं
दीं
संविधान में दरजा
दिहले
रहीं जवन वचन चुनाव में
आज
उतारीं करजा
हुक्मरानों
से कह दो अब जनता का हुक्म चलेगा
अगर
हुये ना सहमत तो सांसों का डोर थमेगा
भिष्म
प्रतिज्ञा याद करो जब रचने चले इतिहास थे
प्रतिपक्षी
को किसके दम पर करते तुम परिहास थे
इ मत
समझऽ भूल गइला से हमहुँ अतीत भुलाईब
आगे
आई मौका हम भोजपुरी में समझाइब
~ रसिक
~
न बिसारे कभी नाम रब का कोई
हर कदम पर सहारा मिलेगा उसे
वक्त पीछे चलेगा चरण चूमते
ज्योत्स्ना की चमक में वो हरदम हँसे
~ रसिक ~
अब तऽ अइसन हाल भइल बा
लिखे बिना रहात नइखे
बिना दरद के जिनिगी बाउर
खरहर खुशी सहात नइखे ।
~रसिक ~
उधार की शोहरत मुझे पसंद नहीं है
सत्य को समर्पित भावना मंद नहीं है
जमाना लाख कीचड़ उछाले झूठ का
घबराकर भाग जाने में आनंद नहीं है
रसिक
जिस दिन हम इंसान बनेंगे ,
उस दिन मजहब मिट जायेगा
मानव मन का पाप धुलेगा ,
वतन स्वर्ण खग बन जायेगा
~ रसिक ~
याद आ रही बचपन की
जवानी से बढ़के जोश थे
आज सब कुछ पास है
परन्तु लब खामोश हैं।
~ रसिक
धरती अपनी अंबर अपना
अपना है यह देश
मनभावन हैं लोग यहाँ के
काहें करत कलेश
जाति धरम मजहब की पीड़ा
पल पल रसिक
सताये
लहू सभी का एक
रंग है
नफरत समझ न आये
थोड़े से
कुत्सित विचार के
लोग भरम में
डाले
बरगला रहे हैं
जन को
संसय मन में
पाले
हैं धवल कुछ लोग
जो
नाली को गंगा
कहते हैं
छोड़ पुष्प मकरंद
घृणित दुर्गंध
सहन करते है
वक्त आ गया है
अब
उन्हें बदलना
होगा
छोड़के दलदल
मार्ग
राजपथ चलना होगा
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
कुटिलता को कभी करामाती न कहना
करामात होता भलाई के खातिर
जनता के हक कोई डाका ना डाले
होती लड़ाई अच्छाई के खातिर
मुखौटा लगाये जो जनता को चूसे
तू कर दो उजागर
मुखौटा हटाके
कलम की धार है
कटारी से कम नहीं
चलती कभी न जग
हँसाई के खातिर
~ रसिक ~
हर
नारी को हरितालिका तीज की बधाई
बेटी
बहन भावज भौजाई
हरितालिका
तीज की बधाई
लगे
सुहावन मेंहदी रंग
रहे सुहागिन पति के संग
मिले अहर्निश पति का प्यार
कभी न हो लंबा तकरार
पत्नी पीडित पति पछतावे
रूप देख घर लौट के आवे
नयी पुरानी जोश वही है
पति पद वंदन होश सही है
आज पति भगवान बनेंगे
सुबह से सारा काम करेंगे
रसिक रूग्ण ना होते राम
पत्नी चरण पादुका धाम
जो
पत्नी सेवा करे, सुबह दोपहर शाम
उनके
घर माँ परवती , सिद्ध करे सब काम
सिद्ध
करे सब काम, न खटपट होवे ज्यादा
करे
लुगाई राज , रसिक बन बैठे प्यादा
जग
में वही महान , और बुद्धिमान है वो
लक्ष्मी
जैसी रूप , हो जोरू शारदा जो
~ रसिक
~
गैर के धन पो टाही लगावल ठीक ना होला
हाथे माला ले भाला चलावल ठीक ना होला
कमर ओढ़के घीव पियला पो छेरछेरी ले ली
रसिक के बढ़ंति पो टिहुरी मारल ठीक ना होला
~ रसिक ~
वक्त
आगे
का वक्त , वक्त
बतायेगा हम क्यों रहें उदास
आज
कह रहा है हमसे हर वक्त मस्त रहना है
तन
की पीड़ा मिट जायेगी वक्त लगेगा
मन
की पीड़ा कब जायेगी वक्त नहीं कहेगा
चिंता
रहती है भविष्य कैसा होगा
वर्तमान
को कभी नहीं सम्मान दिये
जो
वर्तमान के सुख दुख को अनुभव करता
भविष्य
उसी को सादर आलिंगन करता
भाग
रहे हैं हर पल हम अपने दुख से
कारण
दुख को अभी तलक नहीं समझा है
दुख
तो है मानव की अपनी मन: बोध
समझो
उसको तो सरल मार्ग मिल जायेगा
पथ
आलोकित करता है जलकर दीपक
बोलो
तुम उसको कष्ट नहीं क्या होता है
दोस्त
बनाओ दुख को नित संवाद करो
रसिक
बजाओ डफली मत फरियाद करो
~ रसिक
~
जिनिगी
*****
जिनिगी
जंग ना ह जे जीतल जाव
जिनिगी
पतंग ना ह जे खिंचल जाव
जिनिगी
त दरिया के बहत पानी ह
एह से सुनर समाज के सिंचल जाव
सुख
दुख के ऊँचा खाला से ना रूकेला
आफत
के ताप से जिनिगी ना सूखेला
रसिक
पो भरोसा रखऽ गलत ना बतइहें
जिनिगी
तऽ बाँस ह नववला पो ना टूटेला
आपन
अनकर के भेद मिटाव
सभ
केहु के अपने सवांग बताव
ढ़ेला
फेंकेवाला के हाँथ दुखा जाई
सभ
लो के अपना करेजा में सटाव
अनघा
बिटोरला के का जरूरत बा
आँख
तरेरला के का जरूरत बा
सभ
काम मीठ बोलले से होता त
जहर
घोरला के का जरूरत बा
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
मतिया
मराइल रहे मेहरी डाँट देनी
मुँह
लटकवले बिया बैठ के चुहानी में
चौका
चूल्हा बंद बाटे तनिको ना भीरी साटे
भाई
के बोलवले बिया बैठ के चुहानी में
ढ़र
ढ़र ढ़रकेला अँखिया के कोर लोर
किली
बंद कइले बिया बैठ के चुहानी में
रसिक
बाबा आईं रावा रसगर फुंकी हवा
गुरूजी
बनवले बिया बैठ के चुहानी में
हँसी
खुशी सभे रहे मन पो ना बात गहे
रानी
खिलखिलात बाड़ी बैठ के चुहानी में
नारी
नर से ह श्रेष्ठ कहे बात देव जेष्ठ
सभे
करे हाथ जोर बंदना चुहानी में
~ रसिक
~
जबान
कीमती बा तउल के बोलऽ
सोच
समझ के आपन मुँह खोलऽ
लोग
का से का समझ लेता , बिना
कुछ समझवले
बात
के अर्थ निकाल लेता , बिना
कुछ बतवले
प्यार
के परिभाषा मिट गइल बा
सभ
प्यार तन पर सिमट गइल बा
हाहो
दइया लागल बा नोट खातिर
चेहरा
पो उदासी फिट भइल बा
रिस्ता
नाता तार तार भइल जाता
अपने
खातिर सभ कइल जाता
पुरनिया
के पैर छुवल भुला गइल बा
देखलऽ
इ नयका जमाना आ गइल बा
घर
के खाना निमन नइखे लागत
देखऽ
लोग होटल में बा भागत
दाल
भात तरकारी आउट औफ डेट हो गइल बा
देखऽना
पिज्जा खा के बबुआ अप टू डेट हो गइल बा
चुप
ना रहऽ का टरटराइल बाड़ऽ
धीरज
धरऽ का घबड़ाइल बाड़ऽ
रसिक
छोड़ऽ कविता लिखल
जांगर
चलावऽ काहें मेहराइल बाड़ऽ
~ कन्हैया
प्रसाद रसिक ~
दीपों की माला से घर को सजाओ
चौखट पे लिख दो श्रीराम
अंतस में सहस्र कमल खिलाओ
जागृत हो आठो याम
रटना रटे नित आजा सँवरिया
हृत् पट पे कर
लो आराम
वरदायिनी के वरद
हस्त हो सिर
ऐसे हो सुन्दर
काम
पूर्वज की
परिपाटी माटी न मिल जाये
ऐसा करो इंतजाम
कर जोर करता कमल
ले कन्हैया
आओ करें हम
प्रणाम
आज है दिवाली हो
दिल का भी सौदा
द्वेष को हो दूर
से सलाम
दीपों की माला
से घर को सजाओ
चौखट पे लिख दो
श्रीराम
गजटेड बोका
***********
गजट में आइल बा नाम एहीसे गजटेड बोका कहाए लाा
पढ़ल लिखल बा ढ़ेर बाकि बोले में अझुराये ला
इ ना बुझाला कि कहाँ का बोले के चाहीं
फिर भी अपना के
कहेला कलम के सिपाही
एगो दुर्घटना
में एक आदमी मर गइल रहे
गाँव के लोग
परिवार के धीरज धरावत रहे
तबले चहुँपले
बोका महराज फिर कुछ बोले के सोचले
आपन पद
प्रतिष्ठा देखके नया विचार दिमाग में कोचले
फिर मुँह लटका
के बोलले, दुर्घटना
में जोर से धक्का लागल बा
भगवान के कृपा
कहीं जान त गइल बाकि आँख सोगहग बाँचल बा
इ बात सुनके सभे
कहे लागल हई सुन गजटेड बोका के बात
आँख बाच के का
होई जब कुचा गइल संउसे गात
ओही दिन से नाम
पड़ गइल गजटेड बोका
रसिक बाबा के
दिमाग के ह मसखरी के झोंका
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
नोट:- इ कविता
सिर्फ और सिर्फ हास्य विनोद के लिये लिखल गइल बा
तीत
साँच
*******
साँच
कहीं त तीत बुझाला
झूठ
पो सभे करेला हाला
साँच
झूठ से का मतलब बा
अहं के पियत बा सभ प्याला
हमहीं
बानी सबसे निमन
करम
अछूता बाटे तोहार
बात
हमार ह चौबीस कैरेट
तोहरा
बात में बा तकरार
फेंटा
बाँधके जब अइब त
हमहुँ
पेन्हले बानी लंगोट
तु
हमरा के लंगी मरब ब
हम
ईंटा से फोरब कपार
रसिक
छोड़ द तु समझावल
बेवहार
में कवनो लासा नइखे
अपने
राग में मस्त बा सभे
सुर
में दम दिलासा नइखे
हाथ
जोड़के हट जा पीछे
केहु
ना पूछनहार बा
तोहार
बोली केहु ना सुनी
बात
में कवनो झाँसा नइखे
~ कन्हैया
प्रसाद रसिक ~
पूर्ण
सत्य
*******
चिता
पर लाश है मेरी
तमाशा
बन रहा हूँ मैं
आठ
सौ वोल्ट की देवी
कृपा से जल रहा हूँ मैं
न
पढ़ पाया कभी भी मैं
राम
का नाम सच्चा है
रटाया
जा रहा हूँ मैं
सामने
सुबोध बच्चा है
खाक
हो गया तन
फिर
भी कुछ जिन्दा था
जो
देख रहा था सबकुछ
आखिर
वो कौन परिंदा था
समझो
उसको मनन करो
मृत्यु
दर्शन का वर्णन करो
अब तो
छोड़ो हेरा फेरी
प्रभु
के आगे समर्पण करो
आई
है अब गोधूली वक्त
सब
इच्छाऐं हो जाये त्यक्त
परिवेश
विमल करने खातिर
रसिक
तू हो जा परम भक्त
अरमान
बाँधके रखता है
पुनरागमन
का फल चखता है
मार
लो डुबकी जीते जी
वह
दिव्य पुरूष निरखता है
~ रसिक ~
रसिकोद्गार
*******
मुसाफ़िर हूँ अंजान सफर का
मंजिल नहीं आसान है
साथी कोई साथ नहीं है
साथ सिर्फ भगवान
है
ना पूजा ना पाठ
करू मैं
ना विनती अरदास
ना जाने कैसे बन
पाया
परम पिता का खास
कान पकड़कर कहता
मुझसे
माँ बाप को चरण
स्पर्श करो
ता पीछे विचरो
समाज में
जीवन का संघर्ष
करो
आनन पर मुस्कान
बिखेरो
चंदन गंध घनेरे
लिपटे रहेंगे
अरि भुजंग
तेरे तन से
बहुतेरे
शब्द साधना कभी
न त्यागो
जीवन में बस
जागो
हीत मीत अरि और
दुलारे
कुशल क्षेम बस
माँगो
स्रष्टा का
अनुपम रचना जग
सबको वही
सम्भाले
शब्द शरों से
क्यों करते हो
अपने मुह में
छाले
सबका शुभ हो कहे
कन्हैया
सेवक बनके धाये
रस की गगरी रसिक
उड़ेले
सबके मन को भाये
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
अउंजा
पथार
सब
छितराइल बा
मनवा
धाधाइल बा
कइसे
बिटोरी हम
केतना बिटोरी हम
दम नइखे पाँव में
लोग छूटल गाँव में
जवन मिली ठीक बा
उहे बारीक बा
ढ़ेर अउंजाइला से
भाग के परइला से
चढ़ल बोखार बा
जवन आइल मुट्ठी में
उहे हमार बा
लउकत बा दूर दूर
निशा में चूर चूर
बाजू के भरोसा बा
टटका परोसा बा
हाथ हे पकड़नी त
मुठ्ठी भर दाना बा
उहे खज़ाना बा
जे आपन कहाई
बाकि सब छन में
असहीं बिगाई
जिनिगी के चक्कर में
चुटकी भर शक्कर में
रोंआ गनगनाला
रसिक के धरती पो
सबकुछ बुझाला
जामल बा पाँख त उड़बे करी
जहिया आँख खुली जुड़बे करी
बात मान भा मत मान केहु मनावे ना आई
मुहूर्त अइला पो अपने आप बुझा जाई
तबले थपरी बजाव
आपन मन बहलाव
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
कुछ
हँसल जाव
सिधवा
मेहरी खोजत रहीं मिल गइली सधुआइन
रसिक
के रस फीका पड़ल अइसन देली रसाइन
पहिले
घर में छकड़त रहीं अब अकड़न बा टूटल
बिना
पैर धोवले घर में घुसे के आदत छूटल
सूर्योदय
से पहिले घर में सभे होत पवित्तर
सपरिवार
आरती होला तब सभ देवता पित्तर
का
मजाल जे एने ओने घूमे जूता चप्पल
बाहर
दरबा में दुबक के सब लो रहेला तोपल
टायलेट
से बाहर अइला प तन पो पानी पड़े
गलती
से केहु भूल गइल त फेंटा बाँधके लड़े
बबुआ
मत नखरा करीह तु रसिक के मान कहना
छोड़
द अपना भाग भरोसा सीख प्रेम से रहना
कन्हैया
प्रसाद रसिक
मानव
भइला से गइल
पद
परतिष्ठा मान
एहसे
निमन बा बनल
मूर्खन
के भगवान
सत्य
सत्य सब लो कहे
सत्य
न बोले कोय
सत्य
क जब झापड़ लगे
गरियावत
सब रोय
ऊँचे
पद पर बैठ के
करे
नीच का काम
राम
नाम लब पर रहे
अंदर
उबले काम
भरी
सभा में दे दिया
नग्न
सत्य पैगाम
लोग
वहाँ से चल पड़े
हुआ
रसिक नाकाम
झूठी
फोंफी फूंक के
मन
को दिया उड़ान
एक साथ
जय जय हुआ
मिलन
हुआ भगवान
परदा
हटलसि आँख से
लूट
गइल संसार
जेकरा
के सही कहीं
कइलस
बंटाधार
क्षणिक
लाभ को त्याग दो
लो
भुजबल से काम
आग
पाछ के चाक में
मत
बिसराओ राम
~ रसिक ~
बाकी
सब ठीक बा
*********
पिया
गइलें परदेश कमाये,घर
में बानी अकेली
ना
देवर ना ननदी घर बाड़ी नाहीं केहु सहेली
आँख
के कोर से लोर गिरेला ससुई पीर ना जाने
पतिया
लिखके रसिक से भेजली गतिया हाल बखाने
माई
के कपार दुखे , बाबूजी
के टंगरिया
हम
कदहीन बानी , बाकी
सभ ठीक बा
छत
चुवे टप टप , नभ
घोंघियाला जब
लउके
ला ना छत में दरार बारीक बा ।।बाकि सब ठीक बा ।।
बढ़ल
बा उधारी त , बनिया
तगादा करे
हाँथ
बा सकेत अभी , मुँह
में ना झींक बा ।।बाकि सब ठीक बा ।।
गाय
बिया बिसुखल , मिलेला
ना दही दूध
खाये
खाति चोकर के रोज बने लीट बा ।।बाकि सब ठीक बा ।।
ठेला
परल हाथ में , करते
करत काम
बात
नइखे मानत , छोरा
बड़ा ढ़ीठ बा ।।बाकि सब ठीक बा ।।
सांसत
में जान बाटे केहुके ना ज्ञान बाटे
छेड़खानी
केस में बबुअवो शरीक बा ।।बाकि सब ठीक बा ।।
केतना
ले हाल कहीं कम लिखीं जादा गहीं
धइल
बा चुहानी में खखरी आ सींक बा ।।बाकि सब ठीक बा ।।
रसिक
के सहारा बाटे पापी पेट भरता
साफ
हवें बाबा दिल उनकर नीक बा ।।बाकि सब ठीक बा ।।
रसिक
गुरू
के टंगरी तुरत बा
माई
बाप के थुरत बा
बबुआ
भइल बा जवान अब
राह
में लइकी घूरत बा
कबो
कबो मुख पूजन होला
चाँटा
चप्पल से सूजन होला
तबहुँ
आपन चाल ना बदले
रोज
बाप के गिंजन होला
रसिक
देखके रोवत बाड़े
आपन
इज्जत खोवत बाड़े
सभ्य
समाज में उठऽ बइठऽ
नया
सोंच के जोहत बाड़े
~ रसिक
~
काका
कागा उचरेला , लागता
सनेसा आई
ढ़ेर
दिन पर मिली , जिनिगी
के संपदा
घरे
आई बेटा बहू , नौकरी
से छूट्टी लेके
दूर
होई बाबूजी के , मनवा
से विपदा
रसिक
के रस मिली , जियरा
में फूल खिली
गोद
में बईठी जब , नातिन
प्रियंवदा
काका
के कलम चले , सबसे
निहोरा करे
सद्य
सद ज्ञान स्व उकेरते रहें सदा
******
सदा
पास बैठी रहो , कुछ
मैं कुछ तू कहो
इक
दूजे की निराली , बोलने
की हो अदा
अदा
तेरी देखकर , मन
रहे काबू में न
दीखती
हो गोरी तुम , जैसे
लगे मैकदा
मैकदा
में जाके मस्त काकाजी कमाल करे
काकी
की कमान सदा लगता है लाभदा
लाभदा
हरेक काम सत्य पथ खोजता है
निज
धर्म ज्ञान को उकेरते रहेें सदा
~ रसिक
~
जुर्म
केहुके नइखे बस मनवा बेचैन बा
जब
से देखले बानी चंचल हमार नैन बा
दोष
केकर दिआई जब दुनो बेकरार बा
दिल
पो हाथ ध के कहीं केकर पीर अपार बा
~ रसिक
~
काका
- काकी
************
बात
बात पो ताना मरली
खोरना
से काका के जरली
घर
से काका गइले पराई
काकी
आँख में आँसू भरली
जाड़ा
से कठुआइल बाड़न
घरे
से काका खेदाइल बाड़न
ककिया
के गुस्सा के डर से
गाला
में लुकाइल बाड़न
खाये
के मांगलन ताजा गुझिया
काका
सुभाव के हवन सोझिया
काकी
के कहलन फुहरी के नानी
तबहीं
से बढ़ गइल बा परेशानी
रसिक
से कहलन बात सझुराव
ना
फरिआई त दुअरिका के बोलाव
काकी
के नाव से गाँव भर डेरात रहे
काकावा
बेचारा रोजे रोजे पेरात रहे
काम
ना करे कवनो अकिल कन्हईया के
काका
सबूर धरीं निमन समईया के
काका
- काकी ( भाग -2 )
नखरे
उठाइये
काका
काकी लड़ पड़े , बिन
बात आपस में
उनकी
लड़ाई देख , लुत्फ
न उठाइये
काका
बोले काकी से कि, चाय
में चीनी है कम
चुटकी
में चीनी जरा , जल्दी
लेके आइये
काकी
बोली रूक जाओ, आदमीं
हूँ यंत्र नहीं
जल्दी
है तो खुद आके , चीनी
लेते जाइये
फेंक
दिये काका चाय , काकी
मैके चली गयी
काका
अब काकी जी की , नखरे
उठाइये
उठाइये
न काकीजी कर में कटार कभी
गुस्सा
कर काकाजी पे हाथ न चलाइये
चलाइये
न राज नित अपने हीं घर में
नयी
पीढ़ी सोच नया, जिया
न जलाइये
जलाइये
न रक्त को गुस्सा कर रात दिन
चढ़ती
जवानी में बुढ़ापा मत लाइये
लाइये
मधुर भाव अपनी आचरण में
रक्त
चाप सुगर की रिस्क न उठाइये
काका-काकी
(भाग - 3)
मुझे
देना उतना
काकी
घर में अकेली , काका
पंड़िताई करे
ब्रह्ममुहूर्त
बेला में , दोनों
का है उठना
गऊ
माता सेवा सुख , नित्य
करे गीता पाठ
जिन्दगी
में जानते हैं , गिरना
सम्भलना
जितना
मिला है रखो , उतना
सहर्ष तुम
गैर
के समान देख , कभी
न मचलना
याद
करो नित्य रब , प्राण
जाये छूट कब
धर्म
निभता हीं रहे , मुझे
देना उतना
******
काका
काकी की इच्छा
उतना
सम्मान मिले , जितना
का हक मेरा
ज्यादा
कुछ मिल जाये , मुझे
नहीं रखना
रखना
न मुफ्त माल , बन
जाये जी जंजाल
हलाल
की कमाई से , नेकी
को परखना
परखना
सभी शब्द , कर्ण
प्रिय लगता हो
लोग
करे वाह वाह , सत्य
का हो सामना
सामना
हो प्रभु तेरा , रहते
हो साथ नित
जितना
है हक मेरा , देते
मुझे उतना
~ कन्हैया
प्रसाद रसिक ~
जब
मिलल नजरिया त कुछ कह गइल
एह
जवानी के चोन्हा से मन भर गइल
निंद
अचके में खुलल जब छुवलें रसिक
फिर
न जानें कहाँ निंद उधिया गइल
रसिक
कंचन
की काया कमाल करे
पनघट
पर गोरिया धमाल करे
बिखर
जाला लट खोले घूँघट के पट
देख
मुखडा के दुखडा सुनावेले भट्ट
काहें
अँखिया से अँखिया सवाल करे
पनघट..............
गगरी
से सगरी छलकत बा नीर
बूँद
बूँद चुवला से भिंजल शरीर
अँखिया
के कोर से हलाल करे
पनघट...…..
बल
खाये कमरिया अँजोरिया उगे
होंठ
लाली के प्याली से मनवा पगे
रात
सेजिया पर निंदिया बवाल करे
पनघट...............
कन्हैया
प्रसाद रसिक
बलगर
के ना दोष बा , दुबर
झांके दुआर
पिडुरी
चढ़लस पोंछ में , नइखे
जान उबार
नइखे
जान उबार , धार
चढ़ल तेगवा में
आँख
बचावे यार , ना
केहु बा जगवा में
बोटी
बोटी बँट गइल , बात
न बनल रसगर
मद
से भरल ह देह , दिखावे
जग में बलगर
~ रसिक
~
**********
सभे
बा भोजपुरिया सिपाही
पतन
के सभे रोकी
जे
भी चली कुमारग भाई
सभे
ओहके टोकी
भोजपुरी
ह रसगर भाषा
केहु
न दाग लगावे
कतहु
केहु काम करे
भोजपुरिये
में बतियावे
रसिक
जहिया
से हमरा इश्क हो गइल बा एगो परी से
ओही दिन
से हम मरत बानी भूखमरी से
बाकी उ
तनिको हमरा के घास नइखे डालत
हमरा के
आपन आशिक समझ के भी नइखे पालत
चालीस बरीस से पीयतारी रानी हमार खून
फिर भी
हमरा लउकेला उनका चेहरा में प्रसून
एने ओने
सरकींला त चुभुर चुभुर गड़ेली
कहल बात
ना मानेलीं त पनही सिर पो जड़ेली
जीभ लपलपाता तनि खइतीं गुरगोझिया
डाक्टर
समझ लेलस हमरा के सोझिया
जाँच के
बतवलस कि चीनी चिचियात बा
खायेके
मनाहीं बा आलुओ के भुंजिया
ना मिली खाये के बुढ़ारी में रसगर
सूखल
रोटी खा के रसिक रह फरहर
रख द
दीयाराखा पो जीभ के सवाद के
ना त
पड़ी विस्तर पो सुते के लमहर
रसिक
चिचिरी कबो परल ना
ज्ञान
के गगरी भरल ना
गड़कियाइल
रहल गोबर में
आँख के
आपन फरल ना
बनल रहल इनार के बेंग
खुशी से
नाहीं मरल पेंग
ढ़ींढ़
भरेके चिंता खाली
सभके से
कइल तु गेंग
तन के अस्सी मन के आठ
हिरदय
से तु बाड़ काठ
चिरईं
के गरदन ममोरेल
रूस के
बरतन फोरेल
अबहीं तलक ना कइल काम
टुकरा
खात पकवल चाम
आन के
देख बढ़ंती कुहुक
आपन
गोबर चोत पो चहक
रसिक
नया जमाना
*****
नया
जमाना आइल बा
घुघुनी
मुर्ही भुलाइल बा
चोखा
माड़ भात सटकउआ
लउके ना
तेली के पउआ
अब पाउच
में सभ भराता
नइखे
लउकत लउर से नाता
हल्दीराम
के भुजिया आइल
माई के
नमकिन भुलाइल
काठ के
चटकी चटकत नइखे
गाय
हेंड़ा से भटकत नइखे
दूध
दूहके डेयरी जाता
अमूल के
महंगा मक्खन किनाता
माहटरजी
के छड़ी हेराइल
ओह दिन
से पपुआ पगलाइल
आइल जब
जियो के सेट
बचवा से
ना होला भेंट
फगुआ
चईता चुनरी धानी
बितल
समइया के बा कहानी
पियत
नइखे तेल चमरूआ
बनके
बइठस बाबा उरूआ
केहु ना
सुने रसगर बात
रसिक के
कुंद भइल जज्बात
शब्द
शिरोमणी मलले हाथ
ऊँच भइल
छूछबेहरा माथ
केहु ना
गावे राम रमईया
पईसा ला
बा ताता थईया
~ रसिक ~
माई के दरद
*****
माई कबो
बेटा के प्यार में ना कमी कइली
बबुआ के
माई अब बोझा बुझाली
कहेलन
भाई से माथा बदल ल तनि
छव माह
माई बिन हमहु सुस्तालीं
तोहरो त
माई हिअ तोहरो बा फर्ज कुछ
तुहु
आशीर्वाद लेल घरवा में राखिके
छोड़ऽ ए
भईया लोग हमरा के दे द माई
तोहरा
ला बोझ हमार माई बुझाली
सेवा करब माई के हमरा ना चाहीं कुछ
माई से
बाटे हमार होठवा के लाली
माई के
करजा ना केहुए चुका पावल
उ का
चुकाई जेकर बाटे बदहाली
सभ कुछ
लउकता साफ साफ हमरा के
कारन बा
कवन जे करावता नदानी
हमहु त
बानी बहुरिया एगो घर के
सास आ
ससुर के ना रहे पेट खाली
बिगड़ल बा हाल अब जमाना के
कर्म के
लो नापेला स्वार्थ के पैमाना से ।
~ रसिक ~
बाप से निहोरा
बाप से निहोरा बा मत सहकाव
काँच बा
उमरिया त बाइक जन धराव
बिना
लइसेंस के रोड़ पो मत जाये द
यातायात
के नियम के बबुआ के बतावे द
लोगन से
मत कहऽ बबुआ स्मार्ट बा
हाथ
छोड़के गाड़ी चलावे में सम्राट बा
फर्ज ना
निभइब तु आपन बाप बनला के
रसिक से
मत कहीह बबुआ के बिगड़ला के
रहऽ
अनुशासन में लइकवो के राखऽ
अनचलावन
बात के जुबान से न भाखऽ
~ रसिक ~
फुहरी
*****
नाक के
नेटा आँचर पोछली
छाड़ी
छोड़ ना पावेली
जे केहु
टोके त बबुनी
घर में
आग लगावेली
नइहर के
उ हई लड़ाकिन
ससुरो
में शरमाली ना
उनकर
छुवल केहु ना खाये
गोबर से
गर्हुआली ना
पियवा
सेज के मुँह ना देखलस
फोकराइन
महकेली
केहु
आके मुँह लड़ावे
शेरनी
जस हँकड़ेली
रसिक
बाबा के चेली हई
रूपेया
नाहीं अधेली हई
रसिक
मछरी
*****
मछरी
खाइल भइल काल
आजी देख
लगवली जाल
जीभ के
मिलल स्वाद भुलाइल
जब
जाड़ा में गइल नहाइल
एकइस
दिन बाहर में डेरा
आजी
लगावस रात में फेरा
तिरिया
ताना मारत रहली
हमर करम
जारत रहली
अब ना
खाइब मछरी भात
पड़ल
जवानी पो बरसात
उनकर
ताना तीर सा लागे
तीतर
बनल रसिकवा भागे
का
दीलिप तु काम बिगड़ल
बनके
यार अरमान खखोरल
अबना
तोहरा साथे रहब
इ घटना
सुभाष से कहब
बाभन
होके माछ खियवलन
उपर से
दु पैग पियवलन
अब कइसे
हम मुँह देखाइब
मेहरी
के अब का बतलाइब
उ त हीय
बड़का पंड़ा
तेल
पियावल दीही डंड़ा
हास के
बात ह खुशी मनइह
मेहरी
से इ मत बतलइह
सभके घर
में बजे नगाड़ा
रसिक
कन्हैया पढ़स पहाड़ा
~ रसिक
कन्हैया प्रसाद ~
पेट में
समा के अंतड़ी निकाल लेलस
कहत रहे
हमरा के आपन संघतिया
हँस हँस
घरवा के भेद सब लेके
दगा दे
गइल बा आधी आधी रतिया
घर के
सवांग सभ सुतल रहन निंद में
जाड़ा
के दिन में ओढ़के रजाई
ना जाने
कइसे आइल खिड़की के सांसी से
रह
गइलें सुतल रसिक क देलस घतिया
*******
ससुरारी
के रंग में, रंगल बाड़े पूत
अपना
घरके लोग सब , भइल बाड़न अछूत
*******
फूफा का
फन तब उठे
जब होता
परिहास
बिना
मोल कीमत बढ़े
जगत
सिद्ध इतिहास
*****
इश्क
जहर है देह का , पल छिन होत हरास
जा दिन
रब से इश्क हो , मिटे रसिक की प्यास
~ रसिक ~
रसिक के अगुअई
सुभाषजी खोजिहन सोपट कनिया
दीलिपजी
खोजिहन दुबर
रसिकजी
खोजिहन रसगर कनिया
जग में
सभसे सुघर
बाकि
तनिका खरचा लागी
आश्रम
एगो बनावे के बा
ओकरे में
औकाद मुताबिक
आपन धन
लगावे के बा
जेकरा
चाहीं विश्व सुन्दरी
कंचन
महल बनवा दे
जेकरा
चाहीं कामकाजी
उ पहिले
से बतला दे
दसवाँ
हिस्सा दान में देके
काटत रह
चानी
इक दूजे
में प्रेम बढ़इह
करीह मत
बेईमानी
प्यार
मुहब्बत साथ रही त
कवनो
कष्ट ना होई
शक के
सूई सरौता कटब
तबहीं
तृप्ति होई
सभसे निमन गुनगर कनिया
जे
इज्जत के करे लिहाज
आपना से
परसून खिलावे
तबहीं
उन्नत होई समाज
~ रसिक ~
जब से मन लागल भोजपुरिया
सबकुछ
रसिक भुला गइले
अपना रस
में डूब के भईया
पियत
पियत अघा गइले
सबके भीतर जोश रहे
चहकत
रहे चौबीसों घंटा
माथ पो
पगरी बान्ह के बाबू
कसके
पकड़ हाथे डंटा
अपने अंदर राम जगाओ दौड़ नहीं करना है
अंतर घट
के वासी को बाहर नहीं सँवरना है
रसिक
तन के कपड़ा चिथड़ा भइल रोटी रोज कमाये
में
घर आ के
संतोष मिलेला मुनिया से बतियावे में
छोट उमर
में बात करेले जइसे होखे दादी
हे
विधना तुहीं बतलाव कइसे मिली आजादी
बिंबा फल जस ओठवा लागे
तिरछी
नजर कजरारी
रसिक
निहारस भाल के मटकी
लागे
हिया कटारी
लटकल
बाल गाल के छुये
तरसे
देख नियंता
बीस बदन
गदराइल जइसे
मरू भू
बीच अटारी
दु गो अंग टकराइल बाटे
तीसरा
उपर पड़ल बा पाला
जीभ
कहेले सुन्दर बबुआ
बाकि
आँख कइलस घोटाला
तिरिया
के किरिया से लागल
तीर लगल
बा बीच करेजा
कान चोट
से कहरत बाटे
अंदर
नइखे जात निवाला
~ रसिक ~
बोलला के काम नइखे देखत रहीं लीला
बनल
रहीं फोसबुक पो बाबाजी रंगीला
टुकुर टुकुर ताकत रहीं तरकश बा खाली
अब त
सिर्फ बने के बा बगिया के माली
अबहीं ले बाचल बा दियना के बाती
सभ केहु
खोखा बा केहु ना संघाती
जपेे के बा राम राम सुत के बईठ के
देखीं
हई छंवड़ा कइसे चलता अंईठ के
ए बबुआ हमरो जवानी में जोत रहे
चहकत
चिरइयाँ से खोंता अलोत रहे
आज जे देखावत बाड़ रहत रहे तोपल
नयका
समाज में बा का कादो रोपल
सुनर तु फल देख करs हुँआ
हुँआ
दाँत से
जब कटब त फूट जाई भुआ
रसिक के बात मान ध ल सोझ रहिया
उमिर बा
उफान पो समझबs अब कहिया
मुँह के काम ह बात बिगाड़ल
दिल के
काम ह जोड़ल
दिल से
दिल क गठजोर कराव
छोड़ द
बाँह ममोरल
रसिक
हमार मलकिनी
**********
छन छन
छन छन करेली
जरत तवा
पो पानी जइसन
बाकि
बड़ी मनभावन लागस
रसिक के
लिखल कहानी जइसन
केहु
कबहुँ तुर ना पाई
इ गठजोर
पुरनका बा
चहकत
रहेली चौबीस घंटा
हम चकवा
उ चकोरी जइसन
रउआ ससुरारी में रस घोरीं
आ हम
देखके लड्डू फोरीं
हहरत मन
के मनवले बानी
शब्द से
लोगन के झकझोरीं
रसिक
अपना
कमिनी से खखरी भी खोआ लागे
मुफुत
के माल में मसाला तनि कम बा
भोज
में भकोस लेले चालीस गो चपोती
चार
दिन ना मिली त कवनो ना गम बा
भाव
क सम्हारीं त शब्द छूट जात बा
शब्द
के सम्हारीं त मन झिंझुआत बा
कइसे
सम्हारीं हम कविता प्रवाह के
छोड़के
जे हटीं त अँखिया लोरात बा
रसिक
ए
बदरी तु जइह जयपुर ,
पिया
हमार भुलाइल बाड़े
गरज
तड़प के शोर मचइह
लागे
कहीं अझुराइल बाड़े
कहीह
घर में बइठल बिया
उनकर
बियही बिरहिन बनके
बीत
गइल मधुमास इहाँ पो
केकरा
से लपटाइल बाड़े
तन
के ताप तुरंग भइल बा
ओह
पर जेठ जरावेला
ए
बालम तु आजा जल्दी
आषाढ़
आग भड़कावेला
सावन
में सगरो बा पानी
टप
टप चुवत पलानी बा
भादो
भरमावत बा मन के
कुआर
देह लसिआवेला
कातिक
में जब करीं सफाई
संउसे
देह करिया जाला
अगहन
में नेवान ना होखे
बीच
करेज लगे भाला
पूस
फूस जस दिन होखेला
हाथ
गोड़ रूखराइल बा
ए
बालम तोहरा बिन देख
कोंढ़ियो
अब मुरझाइल बा
रतो
भर सिहरावन लागे
कतनो
ओढ़ीं रजाई
माघ
बाघ जस झपटे तन पो
केकरा
के गोहराईं
अब
त घर आ जा फागुन में
ना
त तन जर खाक होई
लागी
जब बेयार फगुनहा
बाँचल
तन नापाक होई
एकरा
के धमकी तु मनीह
अंग
अंग खिसिआइल बा
आ
जा ना त एह फागुन में
ठोहर
देहिया भाप होई
बिरह
आग में धधकत सुनके
धइले
धधाइल गाड़ी
सजनी
के ओरहन पर कहले
अब
ना बनब अनाड़ी
तोहरे
खातिर करम कमाई
तु
अब मत मुरझइह
बाबा
रसिक बतवले बाड़े
उहे
राह अपनइह
चइत
में चकला बेलना लेके
साथे
साथ चहकल जाई
तु
सेवकाई करीह घर में
हम
बाहर में करब कमाई
बैसाख
में बारहमासा पुरा
ताल
छंद लय लगे अधूरा
सजनी
से साजन मिल गइले
खास
कन्हैया भांग धतूरा
रसिक
खाड़
बानी उनके दुअरिया पो
टकटकी
बा उनके नजरिया पो
केहु
कहे लिख लिख
केहु
कहे निमन लिख
हम
कहीना उपर वाला
हमरा
से लिखवावेला
चादर
तान के सुतल रहनी घोड़ा रहे बेचाइल
अचके
में संदेशा ओकर हमरा मगज में आइल
करवट
फेरके महटियाईं त
मेहना
मार जगावेला ।।
हम
कहीना उपर वाला
हमरा
से लिखवावेला ।।
अक्षर
ज्ञान से रसिक अधूरा
कबो
ना लिखल होखे पूरा
राह
में रोड़ा आवेला त
उहे
राह देखावेला ।।
हम
कहीना उपर वाला
हमरा
से लिखवावेला
लिखत
लिखत शब्द ओराला
मन
में पश्चाताप घोराला
शब्द
पिटारा खोलके उहे
नया
शब्द बतलावेला ।।
हम
कहीना उपर वाला
हमरा
से लिखवावेला
बुढ़वा
बानर नइखे छोड़त गुलाटी मारल
सउओ
सभे कबो ना छोड़ीं थपरी पारल
जिनिगी
रही जवान जान के देखत रहीह
रसिक
बनावस मौज से कबो ना हारल
~ रसिक
~
छोड़त
करेजा के करेजवा में हूक उठे
काढ़
के करेजा मोर , करेजा
चल गइली
रसिक
के रस के गगरी ढ़रक गइल
निरस
बनाइके , करेजा
चल गइली
कुहुके
ले रात दिन तरसेले पानी बिन
बरगद
के छाँह के , तरकुल
बनवली
बेटी
के परेम के कबो ना भुलाई बाप
अंगुरी
छोड़ाइके , करेजा
चल गइली
~ रसिक
~
काँच
गगरी के पीट के पटावेला
उ
कोंहरा कादो खिंच के सटावेला
बंद
क देला चौमुहानी के सभ रहिया
आ
अंगुरी के इशारा से पास में बोलावेला
गढ़के
भेजले बा नमूना
लोगवा
लगवले बा चूना
पाकल
बेहुंड़ी फूट गइल
जब
कहे लोगवा मैं हूँ ना
गिरत
पतई नाच दिखावे
कहे
कि गम मत करऽ
जनम
के बेरा थरिया बाजल
अब
जश्न ना मोन्हा धरऽ
छितराइल
बा छंवड़ा छवंड़ी
माई
बाप मेहराइल बाड़े
रसिक
के रग में बा सुरहुरी
प्रेम
के रसरी बरऽ
जे,
चमचन
के चक्कर में आई
ओकर
हम परबत चढ़ जाई
फिर
त कवनो राह ना सूऽझी
इक
दिन गुडुही अपने जाई
~ रसिक
~
सभ
कुछ रह गइल इहँवे तंवाइल बा
देखऽ
सुगनवा सभ छोड़के पराइल बा
पाई
पाई नेह छोह रखनी संगोर के
कइनी
सुवागत हम जिनिगी में भोर के
अब
काहें लोगवा में मन अझुराइल बा ।।
देखऽ
सुगनवा सभ छोड़के पराइल बा ।।
माया
के बजरिया के करके कगरिया
चल
ए मन अब पियावा नगरिया
राम
राम रटले में फयदा बुझाइल बा ।।
देखऽ
सुगनवा सभ छोड़के पराइल बा ।।
रसिक
रोवाव जन चार दिन ठहर जा
दुअरिका
के संगे तनि घूम ल शहर जा
अब
ना बहाना चली पलकी सजाइल बा ।।
देखऽ
सुगनवा सभ छोड़के पराइल बा ।।
~ रसिक
~
जनम
भईल घर में आ बाजल रहे थरिया
लोग
कहे बबुआ बाटे कान्हा जस करिया
का
फरक पड़े ला चेहारवा के रंग से
बबुआ
बाटे खांटी जवान भोजपुरिया
बोले
बतियावे में लाजो ना लागेला
लोगन
के बीच में भोजपुरिये भाखेला
ना
हुटहुटाला इ बोले में भोजपुरी के
माटी
के मान के इयाद सदा राखेला
लोग
कहे रसिक, धारा
रस के बहावेला
अनका
के देखते हीं आपन बनावेला
कहें
अझुराइल बाड़ आपस में भाई हो
रहे
खातिर प्रेम से रहिया देखावेला
~ रसिक
~
केहु
नइखे छिनले बाकि छिना गइल बा
लउकत
बा सोगहग बाकि मउरा गइल बा
अभी
लागल बा जरोह से पियर होके
कहियो
टप से टपक जाई पाझा गइल बा
सांच
केहु ना बताई सभे चेहरा पो चेहरा लगवले बा
किरिन
कइसे लउकी सभे विस्तर पो महटिअवले बा
आपन
सवारथ खातिर भाई भाई के खोंता उजारऽता
रसिक
हो प्यार कहिके नोह से नश्तर चलवले बा
~ रसिक
~
लाईक
होता पोस्ट से नादारत
कवनो
टोना कइलस
भोरे
भोरे होता माहाभारत
कवनो
टोना कइलस ||
बाबा
हो तिवारी तनि
पतरा
उचारीं
जादू
टोना कइले बा जे
कउड़िया
से मारीं
बढ़ल
जाता मन ओकर
कबो
नइखे हारत ||
कवनो
टोना कइलस ||
लाईक
होता पोस्ट से नादारत
कवनो
टोना कइलस ||
नजरी
लगवले बा नजरिया मिलाके
मार
देला चाकू कादो पेट में समाके
नइखे
आवत सोझा खाली
थपरी
बा पारत ||
कवनो
टोना कइलस ||
लाईक
होता पोस्ट से नादारत
कवनो
टोना कइलस ||
छोड़
ओझा गुनी बाबा रसिक के बोलाव
उनुके
से दिल के आपन बतिया बताव
बइठल
बा अन्हरिया में
दीया
नइखे बारत ||
कवनो
टोना कइलस ||
लाईक
होता पोस्ट से नादारत
कवनो
टोना कइलस ||
~ रसिक ~
रोवला
के उ मोल ना जनलस भोंकलस पीठ में छूरा
अँतड़ी
सटल त दाँत चिहरनी मरलस पेट में हूरा
रसिक
के रोंवा कलपता अनेत बा अब बरदास के बाहर
संउसे
माल बिटोर के छंवड़ा बाप के फेंकलस घूरा
चेट
गरम त मीत बा सभे
खाली
पेट बा दूरी
हीत
मीत सभ प्रीत करेला
रखले
दिल से दूरी
जहिया
आफत आई तन पो
सभे
भाग पराई
समय
के बदलत चाल रसिक बा
मन
में रखऽ सबूरी
छोड़ला
से ना छूटी आदत
सजग
रहला के काम बा
होश
गइल त गलती होई
कइल
धइल नकाम बा
मन
के भाव से घाव न दीह
सभे
केहु अपने बा
बाबा
रसिक बतावत बाड़े
जिनिगी
के पैगाम बा
~ रसिक
~
एक
माई के चार गो बेटा , चारो
बा अधिकारी
माई
कोना में परल बड़ी जइसे माल सरकारी
रख
रखाव के चिंता नइखे सड़ी त आमद बढ़ी
जीवन
बिमा के पइसा पो सभे नजर उतारी
भाई
भाई में प्रेम कहाँ बा आपन आपन चेतता
पलखत
पा के बाप के पईसा दुनो हाथ समेटता
सेवा
के जब बेरा आइल माई बाप के कुदी लागल
रात
दिन कइलन जेकराला उहे आज अंगेजता
दऊरत
आइल बिटिया सुनलस बाबूजी के गाथा
चारो
भाई के करनी सुनके पीटे लागल माथा
कहलस
हमरा कुछ ना चाहीं सेवा खाली करब
बाबूजी
के बरद हाथ के माथ पो अपना धरब
रसिक
सुनावस उनका के जे बाप माई के फिंचत बा
दिल
के आह कलम से कहे गलती नाहीं हकीकत बा
छोड़
अब लतियावल बाबू तोहरो दुगो बाड़ेसन
जेकरा
खाली बेटी बाड़ी समझीं उनकर गनिमत बा
~ कन्हैया
प्रसाद रसिक ~
खांखर
भइल बा पांजर ना जान बा ना परान बा
बाकि
एह टूटही कलमिया में विचार के खान बा
जहाँ
ना जाले रवि ऊहाँ इ झट से के चहुप जाला
भले
लो भुला जा बाकि एही में भोजपुरिया शान बा
ए
बाबा बुढ़ऊती में हरे नइखे चलेके
जे
फटफटाता उनका जरे नइखे चलेके
रसिक
के त मन बा दुअरिका दउरत रहस
अपने
पलानी में मस्त केहुके घरे नइखे चलेके
तूफान
त मन में चलता वेग अभी कम नइखे
पतई
पियराइल बाकि हवा के रूख नम नइखे
गिरल
नइखे शाख से तनि-मनि रसगर बा
कुइया
के पानी पताल धइले बा आ रसिक के रसरी में दम नइखे
~कन्हैया
प्रसाद रसिक ~
बात
कहल साँच बा
कि
रूपेया में आँच बा
जेकरा
पार रूपेया नइखे
समझीं
कि उ काँच बा
बुद्धि
के बटलोही चाहे
हेखे
केहु टुइयाँ
रूपेया
नइखे पास त
सभे
बइठल बाटे भुइयाँ
रूपेया
बा त खरकटहा भी
आपन
तन के अंइठता
हिन
रूपेया के बाट बटोही
उजबुक
घरे पइठता
~ रसिक
~
जब
अपने लोगवा दोषी बा
त
दोसरा में का दोष बताई
आपन
घर में काँट बिछाके
आन
के घर कइसे सुख पाई
दु
दिन के मेहमान बा सभे
अपना
के अपनावल करऽ
आपन
बोली बोल के भईया
मन
के भरम मिटावल करऽ
सभके
माई सुखिया बाड़ी
गोड़
छुवेल दाँत चिहार के
आपन
माई के करऽ सुआगत
राख
लाज बिहार के
मुह
फेरला से काम ना चली
आवे
के परी मैदान में
श्रेष्ठ
बा सगरो बबुआ बचवा
जामल
भोजपुरिया खानदान में
गाड़
के रखले खूटा सगरी
रसिक
अपना जवानी में
रत्ती
भर भी दोष ना बाटे
एह
भोजपुरिया पानी में
~ कन्हैया
प्रसाद रसिक ~
बा
कुआँ में भांग घोराइल मन सभके बउराइल
मुह
छुपाके घुमस कन्हैया ना सोपट केहु भेंटाइल
सभ
केहुके अलगे शान बा सिर पो ताज बा लागल
मार
ठहाका लोग कहेला रसिकवा बा पगलाइल
साँच
के आँच जे सहेला उ पकठा जाला
ए
रसिक झूठ के एसी बेसी दिन ना चलेला
~ रसिक
~
लोगन
के झुकावत झुकावत
ना
जाने कब काठ हो गइनी
बोले
के सहूर ना भइल तले
ना
जाने कब झरनाठ हो गइनी
अभी
मन के कुहेस नइखे फाटल
उपर
उपर पपड़ी पड़ल , नीचे
आग धधकत बा
जियत
जिनिगी नफरत के नस्तर लोग चलावत रहे
मुआला
के बाद लोग रसिक के महान कहे लागल
रसिक
अईसे
काहें देखेलु तु अँखिया के कोर से
हमरा
के कहे लोग मछरी के काँट ह
कतनो
भगवला पो भागी ना दुआर से इ
हमरा
के कहे लोग रोड प के चाँट ह
कई
बेर रचके थुराइल बानी थोक में
लोगवा
कहेला कइसे खाड़ बा रसिकवा
रहिया
में खाड़ होके बड़ बढ़ बोलिला त
हमरा
के कहे लोग जनमे के भाट ह ।
रसिक
आव
गला मिलके हमनी के नफरत मिटावल जाव
जे
हट गइल बा ओकरा के पंजरा सटावल जाव
बहुत
हो गइल हमार तोहार मुह फुलउअल
आव
जात पाँत आ मज़हब के दीवार गिरावल जाव
रसिक
रिसिया के केहु से ना बोलले बाड़न कबहु
आव
रसिक के रस में डूबकी लगावल जाव।
~ कन्हैया
प्रसाद रसिक ~
लोगवा
बाटे स्वार्थी, झुक
जाला तत्काल
सिर
पो जब लाठी बजे , करिया
होला भाल
करिया
होला भाल , चाल
ना केहु सुधारे
आफत
पड़ते चोर , शिवाला
डेरा डारे
रसिक
बतावस राह , स्वार्थ
के छोड़ऽ रोगवा
मन
से करब प्रणाम , प्यार
पथ चली लोगवा
~ रसिक
~
मन
करतारे खायेके आचार रजउ
जाके
ला दीह संझिया बाजार रजउ
जीभ
लपलपाता देख अरूवी के पात हो
कइसे
बनी गिलवछ सैंया नइखे बुझात हो
करेला
करैला तकरार रजउ ।।
मन
करतारे खायेके आचार रजउ
जाके
ला दीह संझिया बाजार रजउ।।
कटहर
के कोआ नइखे निक लागत खाये में
डर
लागे सैंयाजी अकेले कहीं जाये में
बइठल
बडुए कोंहड़ा पहरदार रजउ।।
मन
करतारे खायेके आचार रजउ
जाके
ला दीह संझिया बाजार रजउ।।
रसिक
बाबा रोज रोज चटनी चटावेले
आधा
घंटा आके रोज रोज बतियावेले
भिंडी
देखी घुमता कपार रजउ। ।
मन
करतारे खायेके आचार रजउ
जाके
ला दीह संझिया बाजार रजउ।।
जल्दी
जल्दी जाके सैंया हाट से ले आव
हमरा
के चटक मटक रोज तु खियाव
ना
त चुवे लागी बबुआ के लार रजउ ।।
मन
करतारे खायेके आचार रजउ
जाके
ला दीह संझिया बाजार रजउ।।
रसिक
फेसबुकिया
रोग
************
जब
से हमरा फेसबुकिया रोग लागल बा
तब
से जिनिगी तबाह हो गइल बा
पुरा
सुनला पो भी आधभेसरे बुझाता
एक
दिन के बात ह
मलकिनी
कहली
ए
जी तनी !
कुकरवा
चार गो सीटी मार दी
त
बंद क देब
हम
छत पो कपड़ा पसारे ज तानी
हमरा
बंद क देब
ओसहीं
सुनाइल जइसे
द्रोणाचार्य
के,
" अश्वत्थामा
नाम नरो •••••••• "
सुनाइल
रहे
ओह
घरी कृष्ण के शंख बाजल रहे
आ
"बंद क देब" के पहिले
पोरफाइल
के पतरा देखत रहीं
फटाफट
मोबाईल हाथ में पकड़ले
आ
पोरफाइल पो नजर अटकवले
घर
में घूम घूम देखे लगनी
कवन
चीज खुलल बा
जेकरा
के बंद करेके
मलकिनी
कहले बाड़ी
मने
मने अगरात रहीं कि
आज
मलकिनी के मोका ना मिली
हमरा
में छीब काटेके
ना
त कतनो निमन काम क दीं
छीब
काटे के उनकर आदत रहे
पुरा
घर छान मरनी
कवनो
चीज खुला ना मिलल
या
त ढ़कल रहे भा बंद रहे
हमरा
आँखी के सोझा
कुकर
चिचिआत रहे
हमरा
से कहत रहे
अरे
बुड़बक!
हम
ही खुला बानी
जल्दी
से बंद कर
ना
त बकोटा जइबे
बाकि
हमरा
कुकर
के आवाज
ना
सुनाइल
तले
देखतिनी
मलकिनीया
दउरल आवत बिया
हम
पुछ देनी
का
खुला बा
जेकरा
के बन करेके कहले रहलु
तले
उकहलस
तनि
आपन मोबाइल दीं त
हम
जननी कि
अपना
नइहर से
बतियावे
खातिर
मोबाईल
मांगतिया
बाकि
इ का
मोबाइल
के त
पटकउआ
मोड में चल गइल
बेचारा
मोबाईल
आपन
बोटी बोटी तुरवा के
टुकुर
टुकुर ताकत रहे
आ
हमरा के ललकारत रहे
मालिक!
आपन मरदानगी दिखाईं
आ
दुचार झाप मलकिनी के लगाईं
ललकार
सुनके
हमार
हाथ त उठल
बाकि
तेवर देखते जुड़ गइल
अवरू
कुछ पुछे से पहिलहीं
जबाब
मिल गइल
इहे
खुला रहे हम बन क देनी
आ
एफ एम रेडियो शुरू हो गइल
इ
मोबाइल ना हमार सौत हिअ
जब
देखीं त एही में
लपटाईल
रहतानी
जइसे
घर में अवरू केहु
हइले
नइखे।
हम
चुप चाप टुकौर टुकुर
ताकत
रहीं कबो मोबाईल के
त
कबो मलकिनी के
बात
सब समझ में आ गइल
सभ
गजटेडई
गोबर
में गड़ा गइल
पुरे
घर में पता ना चलल कि
दिल
जरला के गंध बा कि दाल
चुपचाप
रसोई में जाके
कुकर
खोलनी त भक मार देलस
पते
ना चलल कि एह में
दाल
बनत रहे
बिना
कहले लाग गइनी
एक
घंटा रगड़े में हाथ चढ़ गइल
आज
हमार
फौजी
वाला हिम्मत के
भरम
टूट गइल
फिर
से कुकर में दाल रखके
देखावे
गइनी
एतना
दाल ठीक नु बा
अइसे
पुछनी जइसे
जंग
के युद्ध बंदी होखीं
जबाब
मिलल
सोझा
से हटीं ना त••••
समझ
गइनी
आज
सबहरिये एकादशी व्रत बा
बाकि
हम त व्रत ना करेनी
आ
हिम्मत नइखे कि
बाजार
जाके कुछ खालीं
सभके
से निहोरा बा
चार
गो समोसा भेजवा दीं हाली
केहुके
लागत होखे
कि
हमरा के
पढ़े
बिना मन ना लागता
त
एगो चालिस हजार वाला
हलुक
फलुक मोबाइलो
भेजवा
दीं
कहें
से कि एक महिना
हमरा
हिम्मत के
यथास्थान
आवे में लाग जाई
तले
विदा लेत बाड़े
बाबा
रसिक कन्हाई
~ कन्हैया
प्रसाद रसिक ~
माटी
में मिलवलस बबुआ हमरो कमाई के
फेल
होके रोवस अब धके आँचर माई के
जबसे
किनाइल रहे फोर जी के जियो सेट
बबुआ
ना कइले रहन पोथी पतरा से भेंट
आठो
पहर खिंचस फोटो मुँहवा बनाई के
फेल
होके रोवस अब धके आँचर माई के
समसंग
के फोर जी आईल बा बाजार में
कम
पईसा लेके देता बनिया उधार में
बबुआ
के लत लागल आँख मटकाई के
फेल
होके रोवस अब धके आँचर माई के
रसिक
बाबा लेलऽ तुहुं फोर जी मोबाइल
आईल
बा बुढ़उती बदलऽ आपन स्टाईल
खून
मत जरावऽ जबरन देखके पढ़ाई के
फेल
होके रोवस अब धके आँचर माई के
के सुतल
के जागल
बाबा उठि परभाती गावस
अपने से बतियावस
छउक मुँड़ेर प घेंच उठाके
मुरूगा बोले
चिरी-चुरुँग चिचियात
वेग से पछिम भागे
सुग्गा मारे ठोर आम में
भाग पराइल
छँवड़ा ले गुरदेल आम के
दिहस गिराई
बकुली बाबा लोटा लेके धावस खेते
धुँआ धुआन बा भइल गोंएड़ा
दूर से लउके
खाये खातिर कोमल दूब
खरगोश के टेल्हा छउके
आजी के खोंखी से पूरा टोला जागल
तें अबहीं ले सुतले बाड़े ।
गरियावत बाबुजी मुँह पो पानी छिरिकस
तोप रजाई मुँह फिर से
घुड़कल बा
इ नयका पीढ़ी का करिहें
आगे जा के
बड़बड़ात बाबाजी ज्ञान बघारत बाड़े
रसिक
भोजपुरी भाखा सरस , डाले
अमृत कान ।
भाईचारा प्रेम से, एकर बा
पहचान ।
एकर बा पहचान , जगत
में धूम मचावे ।
अपने घर में लोग, बेवजह
नजर लगावे ।
माई के सनमान , देल बा
बहुत जरूरी ।
सनमत बा सब लोग , त
बोलीं जय भोजपुरी ।
सरसावन सुनते लगे , भाव न
होय भदेस ।
रचना में हो सादगी , देवे
शुभ संदेश ।
देवे शुभ संदेश , नारि-नर
सबहिन भाए ।
बिना हिचक संवाद , सभे
निज भाव बताए ।
पुरुखन के ई बात , लगे
अति ही मनभावन ।
बढ़े लोग में प्यार , सुने
हिय सुर सरसावन।