शिव शक्ति के शरण में , अंजन गाथा गान ।
अमही बाँके गाँव के , भइलें पूत सुजान ।।
राधा मोहन चौबेजी के ।
पुष्प चढ़ाईं नीके नीके ।। 1।।
लोग सहेजीं अंजन थाती ।
अलख जगाईं होत पराती ।।2 ।।
गुड़ के भेली सरस सनेसा ।
दिव्य जोति के जाने देसा ।। 3 ।।
परमानंद मिले अमही में ।
जस पकवान बनल बा घी में ।। 4।।
मातृ शक्ति वंदन हर बारा ।
दे असीस हरखित बहुबारा ।।5 ।।
पूत पिता के पैर पखारे ।
भविता होत सदा उजियारे ।। 6 ।।
धरती उरवर सरस रसायन ।
हरपल जिनिगी हो मनसायन।। 7 ।।
भाखा भूमिक भवन भिखारी ।
शिथिल होत बढ़िहें दुख भारी ।। 8 ।।
चंचल चित्त न करहुँ तिवारी ।
चंदन चाब चना गुणकारी ।। 9 ।।
मधुरी बानी मेल करावे ।
अन परिचित के गले लगावे ।। 10 ।।
आस्था केन्द्रम सीस नवाईं ।
भाखा के सनमान बताईं ।। 11 ।।
दिव्य पुरुख के उत्तम बानी ।
राह दिखावे गुरुबल ज्ञानी ।। 12 ।।
नेह छोह पावे मिलला पर ।
परसे गंध पुहुप खिलला पर ।। 13 ।।
जोत बढ़ावे आँख क अंजन ।
ताज कवि भोजपुरिया अंजन ।। 14 ।।
तारागण में धुरुब समाना ।
कवि अंजन लख मन हरसाना ।। 15 ।।
प्रेम पारखी अद्भुत बानी ।
हँसमुख मुख मकरंद निशानी ।।16।।
वेद शास्त्र सिद्धांत विशारद ।
धवल चरित जस चमके पारद ।। 17 ।।
बा अफसोस दरस ना पवनी ।
सूक्ष्म रूप विस्तारित अवनी ।।18 ।।
पूत परस्पर प्रेम अगाधा ।
हरऽ नाथ उनुकर भव बाधा।। 19 ।।
सेवक जननी जनक दुलारा।
संस्कार ससरे संसारा ।। 20 ।।
धरा धूर के सीस चढ़ाईं ।
दिव्य शक्ति के पास बुलाईं ।। 21 ।।
वीणापाणी कर माथा पर ।
मुँह से निकसे ममता के स्वर ।। 22 ।।
बात बात में वेद बखाना ।
सादा जीवन बड़ बेख्याना ।। 23 ।।
राधा मोहन स्वयं सरूपा ।
उलिचत प्रेम प्रसंग अनूपा ।। 24 ।।
सगुन ब्रह्भ निरगुनिया गायन ।
शब्द लगे सुन्दर मनसायन ।। 25 ।।
ज्ञान क गगरी छलकत जाये ।
श्रोता सुनत अमर फल पाये ।। 26 ।।
तिसना तुच्छ तलैया भागे ।
भल संतोख सुहागिन लागे ।।27 ।।
ज्ञानवंत सिर तान उताना ।
ऊ रावरि प्रतिभा पहिचाना।। 28 ।।
रसिक नवांकुर जोरे पाणी।
सिद्ध करहुँ मम निर्मल वाणी ।। 29 ।।
रस के धनिक धुरंधर नायक ।
राउर गीत सदा मन लायक ।। 30 ।।
पुरुख एक अरु रूप अनेका ।
साधक सेवक सिद्ध भभूका ।। 31 ।।
रचना संतन के सुखकारी ।
पढ़त मिटाये दुविधा सारी ।। 32 ।।
उर के अंदर प्रेम अगाधा ।
भेंटत मिट जाये मन बाधा ।। 33 ।।
तात धरीछन गुरुवर राउर ।
मन उपजल कबहुँ ना बाउर।। 34 ।।
कुशल पारखी लछुमन पाठक ।
राधा मोहन अद्भुत साधक ।।35 ।।
जय जगदीश चंद्र माथुर की ।
अंजन नाम किन्ह कविवर की ।। 36 ।।
अमही बाँके जय जय ग्रामा ।
अंजन किरिति चले अविरामा ।। 37 ।।
प्रभावती देवी पद वंदन ।
शक्ति स्रोत माने कवि अंजन ।। 38 ।।
प्रेम सुमन रउआ के अरपित ।
जिनिगी भर हम रहब समरपित ।। 39 ।।
हे योगी ! साहित्य पुजारी ।
राउर रचना समय सँवारी ।। 40 ।।
नेह पुष्प अरपित करे , रसिक नवावे माथ ।
हम राउर सेवक सदा , रउआ श्री रघुनाथ।।
भोजपुरी चर्चा चलल , गाँवा गाईं शोर।
माई भाखा मान से , सबहीं भइल विभोर।।
रउरे बारे में लिखीं , का हमार औकात ।
दीप देखाईं दिन में , ई हमार जज़्बात।।
आस्था केन्द्रम जोस से , चढ़ल विचार विमान।
माटी के परभाव बा , ठूँठा फूँके जान ।।
भोजपुरी के मान ला , जुटले सज्जन ढ़ेर ।
उमगल प्रेम पहाड़ सन , इज्जत भइल घनेर ।।
बल बलराम राम मरजादा ,
सरस कृष्ण जस राउर जीवन ।
मात शारदे जीभ प रहली ,
गमकवली भाखा के उपवन ।।
दुर्गा माई दिव्य कृपा कर,
अद्भुत दृष्टि दान में दिहली ।
पूत के अपना उच्चासन प ,
देखत मन हीं मने बिहँसली ।
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