मोबाइल
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खा गया सुख चैन सारा , हाथ में आया मोबाइल
बढ़ गयी हैं दूरियाँ अब , घर तलक आया मोबाइल।
हो गए अनजान आशिक , मैं तो सच्ची कह रहा हूँ
ढेर सारा दर्द लेकर , आ गया दर पर मोबाइल
दोस्तों की महफ़िलों में क्या खूब गुजरा था जमाना
साथ ही बैठे रहे कल सांस पर पसरा मोबाइल।
दस कदम के फासले पर यार की दुनिया बसी है
सन्न सी अधखुली आँखें गजल का मिसरा मोबाइल।
घूमता अहले सहर था पैर फिसलें दूब की दरी
दाब शोणित चढ़ा ऊपर हाथ थरथर धर मोबाइल।
रसिक साजन छोड़ दे अब अँखियाँ लड़ाना गैर संग
देख बीबी पास बैठी हाथ में जकड़े मोबाइल।
के पी तिवारी
परिचय
नमः कन्हैया प्रसाद तिवारी " रसिक "
गाँव: हथडीहाँ
पोस्ट: सकरी रामनगर ( हसन बाजार )
थाना : दावथ
जिला : रोहतास
नोट : फिलहाल हम बैंगलोर में रहेनी ।
जब लोग जुटी तब रंग चढ़ी,
अरु भोजपुरी सनमान बढ़ी।
सभ आपस में मिलिहें-जुलिहें,
सहभाव के रीति मिसाल गढ़ी।
चूपे रहला में भलाई बा
लोग इहाँ काटत मलाई बा
जेकर जुबान पो तीर कमान
आ कर में दीयासलाई बा
राम के मुखौटा में रावण घूम रहल बा
जनता जनार्दन के चरण चूम रहल बा
साध्वी सीता के भावना से खेले खातिर
बेर बेर आपन रूप के जूम (zoom) रहल बा
Unspoken languages spoken by agiles
are tears and smiles
संझिये के बेरा से अनेरा काहें भइल
तनी बोलऽ ए सजनवा रतिया रहबऽ कि ना ।।
बिधना बनवले जोड़ी कवन बाटे मजबूरी
दूरी काहें तु बढ़वल भेद खोलबऽ कि ना ।।
काटे धा वे सेज संइया कइनी परहेज
अब ना होखता अंगेज
षष्ठी सूर्योपासना, तीन दिवस त्योहार।
मनसा-वाचा-कर्मणा, तन-मन का उपचार।
स्व साक्षात्कार
सार्वभौम स्वयंभू
शरणागति
गाँव के विकास खाति बदलल जरूरी बा
देह शिवाला देह देव बा , देहिए चारो धाम ।
देहि भूलि के भरमत भागे , जोगिया आठहुँ याम।।
एहि देह में दइब-बसेरा , भीतर जाके देखऽ ।
लउकी मय ब्रह्मांड ब्रह्म के , अंतर आँख निरेखऽ ।।
सभके मन हरियर रहे , मंगल होय बिहान ।
मन के दुविधा दूर हो , लोग बने इंसान ।।
लोग बने इंसान , प्रेम का पदक बँटाये ।
नारी का सम्मान , स्वर्ण से मोल बढ़ाये ।
सहजे मुफुती माल , अगते केहू न लपके ।
भरल रहे भंडार , खजाना घर में सभके
आईं तनी अजमावल जाय
दोस्ती का हऽ बतावल जाय
कबो बोली के गोली लग जाय तऽ
दिल के दुआर पो रंगोली बनावल जाय
कलुष काल ना गाल बजावे ,
राम नाम जब मुख पर आवे ।
सीताराम रसायन बूटी ,
बैर भाव मन से ले छुट्टी ।।
जवानी के झमेला में बुढ़वा धराइल बा
बुधनवा के जनमे से बुद्धि पकठाइल बा
बुढ़ऊ के बोली पर चल जाता गोली देखीं
नान्हे में सुलछना त चतुुरी कहाइल बा
पचासी के उमिर में पूड़ी पो टूट परस
पँचवे में पाड़े जी के धीरज धराइल बा
कत कहीं हाल हम रसिक बेवहार के
तुरही बजावे मन तन गर्हुआइल बा
पुरंदर के नखरा हेरा गइल छन में
परबत के पल में उठवले कन्हइया
सात दिन पवनार लगले बहावे जब
ग्वाल बाल ढ़ोर सभ बचवले कन्हइया
चुटकी भर टस मस भइल ना सुविधा
खीर पूड़ी ग्वाल के खियवलन कन्हइया
एका में बल बा साकार कइले गिरधर
इनर के पगरी झुकवलन कन्हइया
लाज बचाई कृष्ण ने , कुपित हुए जब इन्द्र
आज भी तिलकहरू के लाइन लग जाई ।
एतना सुनके सांझ खानि दुगो तिलकहरू चहुँप गइलन
फिर का ? बबुआजी के बहुरिया बेलना से बतियावे लगली । आ कहली, हे बेलन देवता ,
जे हमरा घर में डाका डाली ,
उनुकर भेजा करऽ खाली ।
बबुआ के बोली बदल गइल आ अगुआ के दाल जल गइल ।
मलकिनी हई दुर्गा जी हम हईं शेर
ऊ हई बहेलिया हम हईं बेटर
दाह ना लागेला पर्स के सतावे में
बाकी हँस देली इचिका त हो जाईं ढ़ेर
कानन कोंख कुजन का डेरा ,
कुपित कंक कुम्हलाये ।
कंकड़ मारत उड़े परिंदा,
बनमाली मुस्काये ।।
अपने आप गेह में जाके
छोड़े माल खजाना ।
बहुरि लवट ना अइहें बन में
बाटे सभ अनजाना ।।
चतुर शिकारी जाल बिछवले
डलले पुरहर दाना ।
जे जाई बन रास रचावे
मिली कतो न ठिकाना ।।
कइसे कहीं कि रस गगरी बा
उलिचत आन सबेरे।
ठोपे ठोपे ठाड़ दुआरी
भेंवत गात अनेरे ।।
दुर्गम राह सुगम चलवैया
साथ निभावे सुघर खेवैया
भले तन के पाँव में बेड़ी , मन तुरंग कबहुँ ना अकड़े
पथ में परबत आवे कतिनो , आगे बढ़े , कबो ना झगड़े
शांत सरोवर में पड़ जाई , एगो ढेला धीर धरीं
लहर सतह पर उमगी बाकि , ताल भितरिया ना बिगड़े
रामदुअरिया मुरुगा बोलल , भइल भोर अगवानी।
आजा संगे बुतरू जागल , सुगहन राति परानी ।।
घुमरी खेले काल चकरिया , गोल-गोल घुरनाइल।
अनछूअल साबुत कतहीं बा , कतो धूरि भुसुराइल।।
कहीं डाढ़ि में अँखुआ फूटल , पुहुप कहीं मुसुकाइल ।।
एक फली कुछ कँचगर कोमल , आन कहीं पकठाइल।
परकिति बइठल बिंब रचावे , कीरति बनल अनोखा।।
पानी भीतर अगिन लुकारी , झाँकल किरिन झरोखा।
छिटपुट बदरी आसमान में , पीछे परल इँजोरा।।
सुगना के संसर्गे आते , समुद उठल हिलकोरा।।
परानी = भाग जाना
घुरनाइल = चक्कर काटना
भुसुराइल = भुरभुरा
पुहुप = पुष्प
अहले भोरे ठाड़ कछारे , लउकल एक अजूबा।
बीच समंदर खेलत रहुवे , लालरंग पनडुब्बा ।
तरे सतह पर, गोता मारे , मलिमलि देह नहाए।
लगे हकासल खलिहा पेटे , चुनचुन तम के खाए।
छुधा शांत करि बहरी झाँकल , चलल खेत हरजोरी।
गाछ बिरछ लतई फुलवा सभ , उमगल आँगन खोरी।
रसिक
बाबा दिहले बेलना ऊ हम नाहीं तेजबो
बलमुआ कइसे कूटब रे मोरी सखिया
हमार जिया बोले रे मोरी सखिया
घरवा दुअरिया अँगना ओसारा
दीपोत्सव के आइल बारी
देत बधाई रसिक तिवारी
रहीं जरावत जोत से जोत
घर में पइसे खुशी के सोत
आत्म चिंतन
मन रहे अकेला
भोर के बेला
सूरज सहचरी
मन में हरियरी
बुर्ज पो लागे
सोझा लउकस
रवि अलबेला
तन के छूए
बाबा गूगल क देले, बतिया के बतंगड़
अइसन बजरल देह पो , कि हो गइनी लंगड़
जानेलु हमके लिखनी , लिखाइल जान मारेलु
रउआ कहाँ जातानी , कहाइल हमें जारेलु
केहु कहे बजरंगबली के , किरिपा हमरे ऊपर।
कहल केहु कि शंकरजी ले , हम बरियारा भू पर।
छूँछ रसिक छछबेहर बनि के , सबके से बतियावस
आठो याम बिना ईंधन के , चाॅपर रोज उड़ावस।
पूछत रहीं हम कि जानतारु
लिखा गइल जान मारेलु
भागल बा विबेकवा गाँवे हमनी के छोड़ के
हम हईं उत्तम पति
पत्नी के इशारा पो नाचेगी
फेसबुक पो लिखल सभ
चुप्पे चोरी बेचेनी
हम शेर हईं ऊ दुरूगा माई
का मजाल जे बात उठाईं
फेसबुक पो आवत नइखीं
चौबीस घंटा टहल बजाईं
पत्थर में डाल दे जान
यही है ईश्वर की पहचान
बुरबक बनके रहल ठीक बा
शीत ताप सब सहल ठीक बा
बइठल माछी मारे से तऽ
प्यार सिंधु में बहल ठीक बा
रसिक
शनि सोम अतवार मोबाइल , दुश्मन रिश्तेदार मोबाइल
बाप मतारी लगे दुधारी , मन के पहरेदार मोबाइल
पास पड़ोसी लागे दोषी अइसन छवले बा मदहोशी
सरवन बेटा दूर परइले , मरले बा तलवार मोबाइल
रक्तचाप चीनी धड़कन दिल , साथ रहेला आपस में मिल
योग जाप सभ छूट गइल बा , जीये के आधार मोबाइल
केकरा से कहीं दुख मिले नाहीं कबो सुख
बेलना चलावतिया हमरो मेहरिया ।।
दुरूगा भवानी बन शेर के सवारी करे
रोज लतियावतिया हमरो मेहरिया ।।
फेफरी परल बाटे भिरी नाहीं तनी साटे
रकति रोवावतिया हमरो मेहरिया ।।
गजटेड बोका बानी खूब करे मनमानी
हाड़ चटकावतिया हमरो मेहरिया ।।
रोना-धोना छोड़ दो , जश्न मनाओ यार
हाथ मिलाना सीख लो , कहता है सरदार
कहता है सरदार , स्वयं को उम्दा मानो
हीन भावना त्याग , शान से सीना तानो
सत्य करो स्वीकार , भूल जा जादू-टोना
जीवन है अनमोल , गलत है रोना-धोना
सुकवा के उगतहीं , चौंकि चले पौन-पंथी,
उत्तरी तलइया में , नहाले तीनडँड़िया,
कजरी रम्हाति बिया , निरखि के बछरू के
पोंछ ठाड़ कुरुचेली , अँकरे के पड़िया।
काँचे नीनि चुरूंगन , चहके उमंग भरि
घंटा धुनि गूंजे सुन , बाबाजी के मढ़िया
उषा के लिलार बिन्दी , ललछौहीं दीपति से
पुरुबी आकाशे जड़े , मूँगा कौन गढ़िया?
तीर्थ धाम कर लो सारे पर मंजिल नहीं मिलेगी
अपने अंदर भ्रमण करो तो घर में आँख खुलेगी
पूर्ण समर्पण जिस दिन होगा बाजेगी शहनाई
सत रज तम सब मिट जायेगा अंतस शून्य सगाई
भाखा भोजपुरिया के कम जन आँक भाई
एकरे भरोसे कहऽ छतरी छवाइल बा
गोदी में बइठि के आकाशबेल लहरे ले
ओसहीं तोहार आज मति भरमाइल बा
मेरुदंड टूट जाई आना-कानी करबऽ तऽ
बाड़ऽ तू भभूका काहे जीव छपिटाइल बा
चाउर बा पुरान पंथ खाति तू संगोर लऽ
ना तऽ होई घोरमठ्ठा असहीं बुझाइल बा
बेटी आपन , बहू पराई , हरपल होई हाथापाई
आपन माई मोती झारी , पति के माई घर में भारी ।
बेटा कुल में जोत जरावे , अनकर घर बिटिया बिलगावे ।
बहू बेकहली पाले परल , सास के मुँह से निकसे जहर ।
बेटा मेहर के गुन गावे , पोंछा घरे दमाद लगावे ।
समझ न आवे बेटा बाउर , कइसे भइल जँवाई जाउर
बदलऽ आपन सोंच कन्हइया , नीमन होई तबे समइया
सास बहू के बेटी माने , बहू सास के माई
घरसे तबहीं जाई जहमत , साँच बात बा भाई
अनबोलता क दिल मिलल , बोलता
थके-माँदे नँवमाथ सूरुज चलल जाले,
धरती आकाश मधे पसरे सँवर रंग।
बन के तलाई में ललाई काँपे थोरी-थोरी,
झुरमुट ओटे कुछ चिरईं करेली जंग।
खेतवा के आरी कहीं दादुर भुजंग धरे,
साँसत के टर्र धुनि सुनि सिहरेला अंग।
क्षितिज के छोरि चारु ओरि होखे धूँआ-धूँआ।
टापाटोईं तरई से भरेली आकाश गंग।
लागे अँखिया के धाह , बाटे लोगवा तबाह
नइखे कौनो परवाह , भोरहरिया में
लागे धरती धमस , मन रहेला ना वश
जमल जाता खून नस , दुपहरिया में
चाँटा मारेले अनंग , गोर गोर बाटे रंग
पीयले बिना चढ़े भंग , फरहरिये में
जूड़ा चिरँई के खोंता , रटे राम राम तोंता
जाप आठो पहर होता , मुसेहरिये में
पैर पखारत पपुआ पाकल खइनी मलत माहाराज
बेग उठाके चलल बबुआ दुशमन बने अनाज
फोकटचन गिरधारी मिलले कइले बंटाधार
आपस में पटरी बइठेला हवें लंगोटिया यार
एक के घर में खीर बनेला दूजा घर में जाउर
बा मजाल जे कह दे केहू उनही लोग के बाउर
करे देश के काज
जलहरण। 32 मात्रा। अंत में (।।)
कल्हुए झरोखे चढ़ि चाननी के चदरी में,
रजनी चोन्हात रही तनिका-सा बन ठन।
अइसे समुझि परे अँचरा के डोलले से,
सिहरि समीर मदमत्त धावे रन बन।
पूनो के उजास से दमके देह बदरी के,
लपकि झपकि लिपटावेली पवन तन।
खुलि जाला ब्रह्मरंध्र सुधारस पीयले से,
शरद निशा के कर परस जीवन धन।
सारी गलती देश की , मुझे हो रहा देर
रक्षक तो भगवान हैं , शासन में अंधेर
चलनी में सौ छेद बा , पानी ठहर न पाय
परशासन के कारने , जान हजारों जाय
हई देखीं अगुआ के माथ चकराइल बा
कुचुरन के दुनो ओरीं तम्मू तनाइल बा
बेटिहा से कहे कि लइका हऽ काना
लइकी के लागेला हरकत बचकाना
दुनो ओरि पीन मारि दीयर में पराइल बा
हई देखीं अगुआ के माथ चकराइल बा ।।
लइका के बोली के लोग नाहीं बुझेला
लइकी के
एह जिनिगिया के काहें जिया करतारऽ
अपना पो काहें गुमान करतारऽ
भारा भखाइल रहे आवेला तोहरा
अइल तऽ छँट गइल जिनिगी से कोहरा
बड़ होके काहें परेशान करतारऽ
सोचल बात दिमाग में , ना जाई बेकार
समय बहुत बलवान बा , करीं तनि इंतजार
करीं तनि इंतजार , सोच ना खाली जाई
रही नेक ईमान , लोग सभ पीछे धाई
हिम्मत कबो न हार , छोड़ दे कचरा कोचल
होई काल्ह बिहान , आँख के सोझा सोचल
हौसला बुलंद रही त ना परी पाला
बतावऽ ए विधना का हो रहल बा
समुझता सभ लोग तबो बेकहल बा
तान सुनली मुरलिया के भोरे भोरे
छोड़ सजना के सजनी पराई गइली
जलता रहे चिराग प्रेम का
तेल की कभी कमी न हो
पोता के हम संगें रहब
वाट्सएप के टाटा कहब
भुखल पेट पंडित नाऊ लो , जादोजी घर गइलन
सभ चालाकी जादोजी तब , चुटकी बजत भुलइलन
ए जजमानी जादोजी के , भइल भूत के भान बा
ऐरू गैरू भूत न हउए , बड़का ऊ हनुमान बा
गदा मार के जादोजी के , बनवलसि पेट कोठार
पूजा पाठ न होई जबले , जाई नाहीं हेंठार
शुभ मुहूर्त में पाठ न होई , घर के अन्न ओराई
बिन खइले भरपेटा उनुकर , मस्तक रोज फोराई
जादोजी से कहली तऽ ऊ , मंद मंद मुसुकइले
पंडित जी के फेर में पर के , आपन मुंड मुड़इले
जादोजी के अकिल हेराइल , घर में आइल तबाही
पंडित जी के मना ना कइले , नउआ देलस गवाही
पंडित नाऊ आँख मिलाके , जादो घरे लो पावल
खाँटी घी में हलुआ पूड़ी , छलीगर दही जमावल
दुई मन चाउर दछिना मिलल , नगद मिलल एकावन
असली घीव के भोजन रहे , मजिगर आ मनभावन
सतनारायन काथा होई , तबहीं किसमत जागी
बारह पूरनमासी पूरा , तबे भूतवा भागी
हिरदानंद विशाल चेत जा , रसिक से जन ल पंगा
पाप न छूटी सात जनम में , हजार नहइब गंगा
दादाजी हुक्का पियस , पापा धइले नेट
मम्मीजी के गोद से , कहिया होई भेंट
भइया बइठल खाट पो ,
स्वाति राजकुमार की
सब पर माँ ममता बरसाये
साधू बनके सोने की लंका में रहता
सफाई के अइसन बोखार चढ़ल बा
गोर मरद के माँग बढ़ल बा
भोरे भोरे कहली ऊ कि झाँवा रगड़ नहाईं
फिर चूना के लेप लगाके ओके धूप सुखाईं
लगते चूना दोदरा उठल भइल मुँह भकाऊँ
गोरका के चक्कर में करे करियावा हाऊ हाऊ
दसवाँ दिन जब चोंइटा छूटल मुँह भइल चितकाबर
ना करिया ना गोरे भइले लागस अब बिछखापर
चंचल चक्षु चारु चपला सा , ताने भौंह कमान
बिंबा अधर सुधा रस सरसे , हरषे सकल जहान
मी टू में धराइल बाड़ें रिंकिया के पापा
हाहो दइया होत बाटे घर में सियापा
तनी आव रे बिचरवा आव।
का लिखीं ई बतलाव?
कलम हाथ कुछ सूझत नइखे
इचि खोपरिया खजुलाव।
झूठो रार बढ़ावत बा लो',
आपुस में गरिआवत बा लो',
सुनल न चाहे बतिया साँची,
अनकथ पचरा गावत बा लो'।
आठो घरी वंचना जारी,
इन्ह झूठन के झुठलाव।
अपना घर में बमबम भोला,
अनकर घर बारूद के गोला,
छापा परे पथल कोइला पो,
ओढ़ि चले सतवादी चोला।
सजलसि मोरपंख में कागा,
भगता बन फिरे बिलाव।
चउक प अइले सियरम पंडित
सखियन संग सियारी मंडित
कहलन पंडित हईं नायाब
ज्ञान से सभके दिहनीं दाब
देखऽ लो सरकारी सोत
ए से सभकर बढ़लस जोत
कागज के पतरी दिखलवलें
अपना केरि सरेख बतवलें
हिरदानन इनरे में गिरलें
सियरू पंडित दाँत चिअरलें
डाँड़े रसरी बान्हऽ भाय
मारि हुमाचा खींचल जाय
ऊपर अइले उबरल जान
सियरू पंडित बड़ बुधिमान
जर-ज्वार में चरचा भारी
एकदिन तरकुल चढ़े तिवारी
नीचे तकते भइलसि भान
कंठे में अझुराइल प्रान
भर हियाव चिचिआए लगले
देखते लो किंचिआए लगले
सुनि के सियरू धावल अइले
अवते आपन मगज लगवले
तरकुल प सीढ़ी लगवइलें
रसिक डाँड़ रसरी बन्हवइलें
दस जन मिलिके मरले झोंका
भुद से धबकल बजल भड़ोका
खाँटी भोजपुरी के बखान होई अमही में
अठारह ग्यारह जुटान होई अमही में
भाखा भोजपुरी बा जरूरी काहें लोग जानी
ज्ञानी लोग बोलिहें तऽ ज्ञान होई अमही में
दुनिया आभासी बाकी लोगवा बा सचहुँ के
सोझा सोझी सभसे मिलान होई अमही में
अंजनजी अनुभूति के आत्मा संतुष्ट होई
दुनो दिव्य नाम के सम्मान होई अमही में
रसिक
खुश होते थे दंपती , पति दिखते भगवान
अब तो पत्नी लग रही , खड्ग निकाले म्यान
खड्ग निकाले म्यान , सामने है बेचारा
सबकुछ दे दी दान , दीन दीखे दुखियारा
बदल गया है वक्त , बहू नहले पे दहले
इज्जत की पहचान , मूँछ होती थी पहले
तेरी गरीबी
ऊँचाई देती मझे
दान करके
जान जाये जमाना
एक सेल्फी दे देना
कन्हैया
छोड़िके गुमान लाव स्वामीजी से नेहिया
दिने दिने दुबर होता उमिरिया के देहिया
भइया भाखा भोजपुरिया सजइब कि ना
अठारह नवंबर के अमही में अइब कि ना
पलक में खार ना आए
कुछ ऐसे कर्म हों जग में।
जमाना पीर ना पाए
सँभल ऐसे चलो मग में।
पूर्वजों से मिली तुमको
विरासत नेकनीयती की।
संचरित है वही शोणित
तेरे हर वक्त रग-रग में।
चाकू मारा जब कोई सहन किया सब पीर
नफरत के एक फूल से घायल हुआ शरीर
आशा की उज्वल किरन छोड़ गयी निज गात
जीने से क्या फायदा अपने करे आघात
जरता जवानी जइसे खनहन पात जी
सैंया बिना उमड़ेला आँखि बरसात जी
उपकार कइलका पहिले के, सरग में सीढ़ी लगवता
उमर बढ़ल अब जहमत लागे , बाबावा मुँह छिपावता
हीरो बनके पैंतीस में जे फेंकल रहे जाल
अब पैंसठ में पचरा गा के करत बाटे हलाल
आईं अबहीं खाइल जाव गुरहा गरम बताशा
दस बरीस के बाद नु होई मी टू खेल तमाशा
रसिक
तनी बोलऽ प्रेम के बोली , ना तऽ होई छीछालेदर
मारल जइबऽ एने ओने , अवरू घर में घुसी दलिद्दर
रोइब फूँका फारि तऽ बाबा के बोलावे के परी
छोड़ के नयका राह लौटके घरवा आवे के परी
इज्जत पुरुखन क बा कमाई , फेंकब वापस लौट न आई
ज्ञान के गगरी भरल नइखे , झूठे डफ पीटाता
माई बहिन क इज्जत रोजे , सरेआम बिकाता
पीएचडी क डिग्री लेके , पपुआ पान बनावे
बड़े शान से अपना के ऊ , सुरसती पूत बतावे
रसिक
बूझन बाबा गाँव में , बाड़ें बड़ बिदवान
कवनो भी आफत परल , उनुके पास निदान
कलुआ गिरल इनार में , दिहलन मगज प जोर
सीढ़ी डाल इनार में , डाँड़ में बन्हलन डोर
जोर लगाके हई सा , कइले बाबा शोर
खिंचत भुभुन टूट गइल , कहलस गम बा थोर
पूजल गइले गाँव में , बाबाजी पुरधान
बुद्धि के बलिहारी बा , उच्च कोटि के ज्ञान
बिरिजा पासी चढ़ गइल , तरकुल तूरे ताड़
पतई ध के लटकल बा , बाटे अलग पछाड़
बाबा आके जुगुत लगवले , लोगन से बतिया के
डाँड़े ओके बान्हऽ रसरी , कह देलन समझा के
सीढ़ी लागल ताड़ पेड़ पो , कमर जोर बन्हाइल
जय श्रीराम क लागल नारा , झट से भुँइया आइल
दाँत चिहरले आँख तड़ेरले , बिरिजा गइल सुरधाम
सुविधा सरग क भोग रहल बा , परी संगे आराम
होकर बड़ा सपूत ने , कर ली प्रेम विवाह
पढ़ी लिखी पत्नी मिली, मम्मी हुई तबाह
मम्मी हुई तबाह , बहू ना माने कहना
हीन भावना व्याप्त , साथ है मुश्किल रहना
सास न छोड़े अकड़ , बीते दिन मचिया सोकर
पुत्रवधू हैरान , बिलखे विदूषी होकर
बेलन फोरे माथ के , करम फोरे रफाल
ए बाबा किरिपा करीं , मुड़ी गड़ाइल खाल
केकरा पो करीं विश्वास हो सभे बा दुशमनवा
छोड़ देनी कइल हम आस हो केहू नइखे समनवा
नाया पुरान सभे टाही लगवले बा
मुफुत के माल मिले लार टपकवले बा
काटेला आन खेत घास हो मोर तड़पे परनवा
संजय दुलरूआ सिरिफ दुख हमार बुझेलन
हमरा ला लोगवा से दिन रात जुझेलन
उसे त बाड़न हमार खास हो सभे बा दुशमनवा ।।
जय भोजपुरी जय भोजपुरिया हम कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक रउआ सभके स्वागत करत बानी । 18 नवंबर 2018 के गोपालगंज जिला के भोरे प्रखंड के जिगना दूबे पोस्ट के अमही मिश्र गाँव में भोजपुरिया जुटान हो रहल बा ।रउआ सभ से हाथ जोड़ के आग्रह बा सभ कोई एह भोजपुरिया महाकुंभ में जरूर आईं ।साफ सुथरा भोजपुरी के आनंद लेबे खातिर । एह उतसो मे भोजपुरी के ब्याख्यान बिदवान
हाथ जोर बिनती बा परीं माई पँउआ
बड़ा नीक लागे सतीशजी के गँउआ
कार्तिक शुक्ल पक्ष तिथि बाटे दशमी
दिन अवतार शोभी अमही के रश्मि
जगमग करे लागी गलियो के झँउआ
बड़ा नीक लागे सतीशजी के गँउआ ।।
जय भोजपुरिया परिवार उहाँ जुटिहें
उतसो भोजपुरी के आनंद लोग लुटिहें
करीहें विदवान उँचा माई के नँउआ
बड़ा नीक लागे सतीशजी के गँउआ
प्रीति संजोली राकेश शशि अइहें
मदनजी मंचवा के शोभा बढ़इहें
नेवता पेठावे सभके नेटवाला नउआ
बड़ा नीक लागे सतीशजी के गँउआ
प्यारी साथ तनी चले दऽ हमके
साथ रहब तऽ सेवा कऽरब
गोड़ दबाइब जमके
प्यारी साथ तनी चले दऽ हमके ।।
कहते करेजा फाटे पियवा ना संगें बाटे
नयका मोबाइले निशानी बा बलमुआ
गाँव में दुतल्ला घर डमरू बाजे दुआर
सभ शास्त्र दर्शन के ज्ञानी बा बलमुआ
सिंधु एके साथ मिली पियवा के तन खिली
घड़ी में लकीर अभिमानी बा बलमुआ
शालीग्राम धोई पीहीं पतिवर्ता हम हईं
आदि देव रक्षा करीं दानी बा बलमुआ
चारो वेद पाठ करे अविरल जोत जरे
सभ अंग योगवा के ज्ञानी बा बलमुआ
लाठी रहे हाथ मोटा, कबूला के पँखिया
नवरातर में नौ दिन होखेला पूजइया
बड़ा नीक लागेला माई के नइया ।।
जगत जननी रउआ हईं जग तारन
के केकरा के सहता
सभ केहू दिन रात
अपने धुन में रहता
के केकरा के सहता ।।
बबुआ के बाबूजी लागतारे बाउर
माई के डँटला पो खात बाड़े माहुर
जनितीं कि होइत हमरा संगें अइसन घतिया
मनतीं ना बतिया तोहरो जिगरी संघतिया
काठ के करेज क के सहतानी साँसत
सभे देखे तन केहू मन नइखे बाँचत
खरा बात बोले सभी , खरा न सूने कोय
शब्द बान लागे हिया , आपा जल्दी खोय
आपा जल्दी खोय , जाय अपनापन छन में
लगे करेजा बान , कलुषता उपजे मन में
मतिया मारी जाय , जख्म दे जिगरी गहरा
हो मधु सिक्त जुबान ,
रसिक
आइल बा सीमा पो संकट बड़ भारी
जायेद हमरा के एहो प्रान प्यारी
नथुनिया हेरा गइल हाय मोरे सैंया
हमरो नथुनिया में हीरा जड़ल रहे
दाम रहे सोना से सवैया ।।
नथुनिया हेरा गइल हाय मोरे सैंया ।।
मैं के भीतर भीड़ समाइल
मैं के समझ में कुछ न आइल
कटल सोर तऽ मैं मैं करते
फुनगी के पतई मुरझाइल
रसिक
देशवा के हमनी के शान बानीजा
देखीं दुनिया में कइसे महान बानीजा
सभ खेला बा पइसवा के
जे अपना से अपनापन छोड़ावता
आ आन के आपन बतावता
दिल के भाखा लोग भुला गइल बा
आ अरथ के अरथी पर लो बन्हा गइल बा
इज्जत हाल का कहाला नइखे शउर
अपने से धरे लोग अपने माथे मउर
पइसा बा त जयमाल बा
ना तऽ लोग कंगाल बा
कुँवार लइकी अब कोंहड़ा के भाती नइखे
चाँद पो जात बिया
कंधा से कंधा मिलाके
फाइटर पलेन उड़ावत बाड़ी धीया
तरसावऽ जन बालम बतिया बनाके
दस साल हो गइल गवना कराके ।।
मुँह के देखाई उधार बाटे अबहीं
सिकरी बनावे के करार रहे तबहीं
चलतानी चानी के चीज चमका के
तरसावऽ जन बालम बतिया बनाके
आइल ना कबहीं ऊ मजिगर समइया
छूँछही के दे देल दु बेर बधइया
काम तूँ बना लेल मोहे फुसलाके ।
तरसावऽ जन बालम बतिया बनाके ।।
हमरा के छोडऽ तूँ बुचियन के देखऽ
चान नियन मुखड़ा के जी भर निरेखऽ
इतराइल जाई अब बेटी पढ़ाके ।
तरसावऽ जन बालम बतिया बनाके ।।
झूमका दुतल्ला चाहीं सउर अगोराई
दे के दस टकिया जन भउजी टरकाईं ।
झुमका दुतल्ला चाहीं सउर अगोराई ।।
बाड़ा रे रकटना से वंश बढ़िआइल बा
बीस बरिस बाद घरे खुशी ढ़ेर आइल बा
सोनवा के हार दे दऽ हमुँ झमकाईं ।
झुमका दुतल्ला चाहीं सउर अगोराई ।।
राम करस बबुआजी दिने दिन बढ़स
नीमन कमाई से चोटी पो चढ़स
देत बानी तोहरा के अनघा बधाई ।
झुमका दुतल्ला चाहीं सउर अगोराई ।।
बबुआ के चूम लेली गोदिया उठाके
ननदी के खुश कइली सिंकड़ी पेन्हाके
गोतिन लो गावे खेलवना बधाई
झुमका दुतल्ला चाहीं सउर अगोराई ।।
कबो माटी पो महल त कबो माटी में सुताई
ना जाने ई जिनिगी कवन कवन रंग देखाई
झूठो के लोग गुमान करेला अपना काया पो
झटपट रीझ जाला लोग कुदरत के माया पो
बाकी उहें पट खुलेला जे आइल बा से जाई
ना जाने ई जिनिगी कवन कवन रंग देखाई
प्रकृति का मित्र बनो
सबसे विचित्र बनो
पाँव हो जमीन पर
गगन में इत्र बनो
~ रसिक ~
नुमाइश हमें भी अच्छा लगता है
पर वजूद को गिरवी रख कर नहीं
गाय के लोगवा गोरू कहे कुकुर के कहे पूत
माई घर में काई काँछस मेहरी काते सूत
कइसन आइल उलट जमाना धूरी जोर बराता
असली माल क मान न होला नकली खूब बिकाता
रसिक
प्यार जीये के जरिया हऽ
प्यार माटी के नरिया हऽ
दु दिल क आपस में बान्हेला
प्यार राधा के सँवरिया हऽ
रसिक
दिल दरवाजा खोल , नेह का दीप जलाओ
जीतो दिल मुस्कान से , फैलाओ ये रोग
नमन करो परमातमा , श्रेष्ठ बने संयोग
आगे बढ़के बनऽ सरेख
तुरिके पगहा बदलऽ भेख
राम रतन धन आगे मिली
मिट जाई जिनिगी के मेख़
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