वक्त की चाल
अस्ताचल सूरज
क्षीण क्षत्रप
प्रेमाकर्षण
प्रकृति-पुरुष का
अवर्णनीय
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
वर्ण पिरामिड़ पूरा हो गया
Kanhaya Prasad Tiwari
20/06/2016 21:11
Kanhaya Prasad Tiwari
हाइकु पर रचना से मेरी रचना पूरी हुई
1
रेत का टीला -
अटखेलियाँ करे
अल्हड़ हवा
2
फौजी सन्यासी
जाने जान का मूल्य -
निष्पक्षता से
3
अहं ब्रह्मास्मि -
हर शाख पर है
तेरा वजूद
4
जीत का जश्न
ऊर्जा से भरपूर -
इच्छा मरण
5
नमन नारी -
सर्व गुण संपन्ना
हृदय ग्राही
6
नर पुंगव -
प्राकृतिक संयम
आर्ष चिंतन
7
कोमल पुष्प
आनंदित जीवन -
क्षण भंगुर
8
आत्म मिलन -
बूँद हुयी सागर
अस्तित्व खोयी
9
शब्द मंजूषा -
प्यार की अमानत
मुख मुस्कान
10
झेल न पायी
असामाजिक दंश -
गर्भ में बेटी
11
मयूर पंख -
मन चढा अटारी
पडे फुहार
12
शून्य सदन -
स्वयं का साक्षात्कार
निरभ्र मन
~ कन्हैया
भरा हुआ है
जहर जुबान में
दोष सर्प का
लपलपाती जीभ
स्वार्थ सुस्वादु
खंड खंड व्यक्तित्व
मुखौटे का स्वामित्व ।
पारा का नारा
लो पेड़ का सहारा
लोलुप इंसा
नल का जल
पताल गया पानी
बूझ अज्ञानी
खेत में मेंथा
मुँह छुपाये भागा
भू जल स्तर
कठपुतली
आदि से अंत तक
बगैर शिक्षा
निखर गया सोच
पढ़ी बिटिया
जीवन में उजाला
हर क्षेत्र में
पूर्ण सहभागिता
नमन नारी
अब अबला नहीं
प्रेम प्रतिमा
दुर्गा अवतार भी
जीवन में सार भी
कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक
शक की सूई
अशान्ति का पहरा
ता उम्र चुभे
नफरत की आग
दिल में जले
झुलसे तन मन
क्षीण हो काया
विस्तर पर दूरी
इच्छा अधूरी
समर्पण के बिना
जब भी बढ़े
दिमाग की दौलत
दिल कराहे
दग्ध होता भविष्य
प्रेम बना हविष्य
कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक
कच्चा मकान
सुकून जिन्दगी में
चैन की बंशी
पिउ बाँह तकिया
बित जाये रतिया
नशा में धुत
शक की शाकी पर
मय में पानी
धान का ढ़ेर
जल समाधी लिया
रोये मुहल्ला
सरकार निठल्ला
गरीब मुँह ताला
शक की सूई
अशान्ति का पहरा
ता उम्र चुभे
विकल्प नही
संयमित जीवन
कठिन श्रम
ख्वाबों मे किया
अधर रस पान
बैरी बिहान
एक हीं लक्ष्य
मस्तक ऊँचा रहे
नमो भारत
हम रहे ना रहे
दुनिया गाये
हिन्द की शौर्य गाथा
गर्व से उठे
तिरंगे पर माथा
समान अभिलाषा
पतोह पियासल
रानी बनके
चाँप फफेली
अगते सतावल
अब ई झेली
आरे बम्मड़!
धर नस पकड़
दे दु तकड़
तसला तोर?
कि मोर नीके कह
ना गठजोर
ततैया छत्ता
जो जाके लुको हाली
कतो अलोत
जँगला झाँक
बछरुआ के बान्ह
हरही हाँक
मुख दुर्गंध
वस्त्र मनमोहक
उपला ज्ञान
जाति की जंग
खोया है जनतंत्र
भैंस को बीन
छूदर लोग
भभीख के मालिक
यक्ष सवाल
मुँह मुखौटा
वचन सुभाषित
हाथ कटारी
भूआ उड़ल
किरपिन के भोज
भूखा बाभन
भूल गइनी
विचार के मेला में
आपन रूप
मन में बैठा
जल थल अंबर
प्रकृति प्रिया
त्रिविध ताप
पसरे तन पर
उपाय करऽ ।
चलऽ लगावे
तिरबेनी में गोता
बान्हऽ मोटरी ।
तन बा कुंभ
मन कर्म वचन
तीनों के तारऽ ।
काल के गाल
जिन्दगी करे जंग
रहो मलंग
इहँवे सभ
भरम भटकावे
ऊँच नीच में
शून्य विस्तार
विस्तारित ब्रह्माण्ड
सोच अलग
देखत बानी
नाटक में नाटक
दृश्य सुहाना
बान्ह लंगोटा
बे पेनी के लोटा
प्रवचन दे
पराग कण
चारो ओर सुगंध
मुँह प हास
उर्ध्व गमन
छद्म छितराइल
अंजोरिया में
सोचल जाव
पुरइन पतई
हवे जिनिगी
बोल बैखरी
दुविधा के दागल
के के भागल
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