अँखिया
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अँखिया मिलावे जब, अँखिया से अँखिया त
मनवा के भावना सँवार देले अँखिया
अँखिया के भाखा सभ , जानेला जहान लोग
कगरी चलेले त उजार देले अँखिया
एकटक सोझा-सोझी, बिलमे जे अँखिया त
दिलवा के दुअरा पुकार देले अँखिया
आँख देख रहिया में , चल जाले अँखिया त
रसिक के झट से लतार देले अँखिया
अँखिया के जोत से अलोत केहू होला त
तकिया के खोल से सवाल करे अँखिया
अचके में चल जाले सभा बिच अँखिया त
महल मोहल्ला में बवाल करे अँखिया
गगरी भ पानी जब गिर जाला आँखि से त
मनवा के गाँठ से निकाल देले अँखिया
तिनका के भार कबो सहे नाहीं आँख बाकी
दिलवा के भार के उछाल देले अँखिया
रसिक
फेसबुकिया रोग
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जब से हमरा फेसबुकिया रोग लागल बा
तब से जिनिगी तबाह हो गइल बा
पुरा सुनला पो भी आधभेसरे बुझाता
एक दिन के बात ह
मलकिनी कहली
ए जी तनी !
कुकरवा चार गो सीटी मार दी
त बंद क देब
हम छत पो कपड़ा पसारे ज तानी
हमरा बंद क देब
ओसहीं सुनाइल जइसे
द्रोणाचार्य के,
" अश्वत्थामा नाम नरो •••••••• "
सुनाइल रहे
ओह घरी कृष्ण के शंख बाजल रहे
आ "बंद क देब" के पहिले
पोरफाइल के पतरा देखत रहीं
फटाफट मोबाईल हाथ में पकड़ले
आ पोरफाइल पो नजर अटकवले
घर में घूम घूम देखे लगनी
कवन चीज खुलल बा
जेकरा के बंद करेके
मलकिनी कहले बाड़ी
मने मने अगरात रहीं कि
आज मलकिनी के मोका ना मिली
हमरा में छीब काटेके
ना त कतनो निमन काम क दीं
छीब काटे के उनकर आदत रहे
पुरा घर छान मरनी
कवनो चीज खुला ना मिलल
या त ढ़कल रहे भा बंद रहे
हमरा आँखी के सोझा
कुकर चिचिआत रहे
हमरा से कहत रहे
अरे बुड़बक!
हम ही खुला बानी
जल्दी से बंद कर
ना त बकोटा जइबे
बाकि हमरा
कुकर के आवाज
ना सुनाइल
तले देखतिनी
मलकिनीया दउरल आवत बिया
हम पुछ देनी
का खुला बा
जेकरा के बन करेके कहले रहलु
तले उकहलस
तनि आपन मोबाइल दीं त
हम जननी कि
अपना नइहर से
बतियावे खातिर
मोबाईल मांगतिया
बाकि इ का
मोबाइल के त
पटकउआ मोड में चल गइल
बेचारा मोबाईल
आपन बोटी बोटी तुरवा के
टुकुर टुकुर ताकत रहे
आ हमरा के ललकारत रहे
मालिक! आपन मरदानगी दिखाईं
आ दुचार झाप मलकिनी के लगाईं
ललकार सुनके
हमार हाथ त उठल
बाकि तेवर देखते जुड़ गइल
अवरू कुछ पुछे से पहिलहीं
जबाब मिल गइल
इहे खुला रहे हम बन क देनी
आ एफ एम रेडियो शुरू हो गइल
इ मोबाइल ना हमार सौत हिअ
जब देखीं त एही में
लपटाईल रहतानी
जइसे घर में अवरू केहु
हइले नइखे।
हम चुप चाप टुकौर टुकुर
ताकत रहीं कबो मोबाईल के
त कबो मलकिनी के
बात सब समझ में आ गइल
सभ गजटेडई
गोबर में गड़ा गइल
पुरे घर में पता ना चलल कि
दिल जरला के गंध बा कि दाल
चुपचाप रसोई में जाके
कुकर खोलनी त भक मार देलस
पते ना चलल कि एह में
दाल बनत रहे
बिना कहले लाग गइनी
एक घंटा रगड़े में हाथ चढ़ गइल
आज हमार
फौजी वाला हिम्मत के
भरम टूट गइल
फिर से कुकर में दाल रखके
देखावे गइनी
एतना दाल ठीक नु बा
अइसे पुछनी जइसे
जंग के युद्ध बंदी होखीं
जबाब मिलल
सोझा से हटीं ना त••••
समझ गइनी
आज सबहरिये एकादशी व्रत बा
बाकि हम त व्रत ना करेनी
आ हिम्मत नइखे कि
बाजार जाके कुछ खालीं
सभके से निहोरा बा
चार गो समोसा भेजवा दीं हाली
केहुके लागत होखे
कि हमरा के
पढ़े बिना मन ना लागता
त एगो चालिस हजार वाला
हलुक फलुक मोबाइलो
भेजवा दीं
कहें से कि एक महिना
हमरा हिम्मत के
यथास्थान आवे में लाग जाई
तले विदा लेत बाड़े
बाबा रसिक कन्हाई
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
मायका में भी मलकीनी के चैन नइखे हमेशा शक रहेला कि कहीं हमार पैर त ना बहक गइल, जब हमरा एह बात के पता चलल त चिठ्ठी लिकके उनका के समझावत बानी-
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इहाँ के लोगन के बात मत पतिअइह
आ उहाँ के लोगन से मत बतिअइहह
युग जमाना बहुते खराब बा
दोसरा के बढ़ंति देखके सभे तबाह बा
इ मत जनिह कि इहँवा कवनो खराब काम करब
तोहरे खातिर जियत बानी
तोहरे खातिर मरब
कवनो गलती हो जाई त रूसीह मत
तोहरा भीरी आइब त कवनो बात के कोसीह मत
तोहार याद हमरा के बहुते सतावत बा
इहाँ के लोग एने ओने जाये के रास्ता बतावत बा
बाकी तोहार परेम रास्ता रोक देता
पैर बढ़ल चाहे त बीचहीं में टोक देता
जहिया से गइल बाडु घर हीं में रहत बानी
घरहीं में लोगन के ताना बाना सहत बानी
तोहरा जतना दिन मन करे मायका में रह
तोहार छोटकी बहिन कईसन बाडी हालचाल कह
कन्हैया
वृहत विदूषक बोल के , सबका मन हर्षाय ।
रंगमंच के मंच पर , अनगिन थपरी पाय ।।
अनगिन थपरी पाय , ताज कबहूँ ना पाये ।
पटाक्षेप पर हास , कृत्य से शंख बजाये ।।
घंट विडाले बांध , खुश हो रहल बा मूषक ।
शरम हया के त्याग तृप्त हो वृहत विदूषक ।।
मय पांडे लोग मिलके कहलें , चलऽ तिवारी तूरे ऊख
अपने लोग डँडार प बइठल तिवारी चढले बूँट के रूख
चार ठो कुक्कुर खेतिहरवा के, चारो कोना लागल
खर खर खर खर खटाक ! सुनके, तिवारिये देने भागल
आइसो दादा जान बचाव, धाव धाव पाड़े आव
गोली मारों ऊख तुरला के एह कुकुरन से जान बचाव
मय पांड़े लो भाग परइले केहू भिरी ना आइल
अचके एगो गोड़ पकड़लस छावा भइल घावाहिल
कान पकड़लन अब ना करीहें पांडे संगें इयारी
चोरी के चक्कर में गइलन जेहल रसिक तिवारी
चार्जर नइखे पास में, छन छन कर ककुलाय।
मोबलइनी क रोग बा , बहुते मन अकुलाय।।
नेहिया लगाल सिरीराम से सुगनवा
होत भिनुसहरा पराती शुरूआती
मान कर ओकर जे मिलल बा थाती
मेहिया बनाल सिरीराम से सुगनवा ।।
रात निहारे
फुरसत के पल
सुध पिया की
देह के गुर्ही
किसान के करजा
छिछली खेल
स्वयं के साथ
अनंत का सफर
भय से मुक्ति
मुझको आदत लग चुकी है मुफ्त में खाने की।
आदमी हूँ काम का आजमा के देखिये ।।
जिनिगिया ना जाने का का दिखाई ।
जवानी के सपना , बुढ़ापा के थाती
बेयाधि बदन के, सतावे दिन राती
अंदर के खल उदबेगले बा ,
रह रह करे चढ़ाई ।
जिनिगिया ना जाने का का दिखाई ।।
ए बबुआ तूँ दारू छोडऽ
ई पुरखन के थाती ना हऽ
एह से आपन मुँह के मोड़ऽ ।
ए बबुआ तूँ दारू छोडऽ ।।
फीचलु अइसन जोर से , धऽ लेनी खरिहान।
भांड़ भँड़इती छोड़के , पवनी पावन ज्ञान ।।
पवनी पावन ज्ञान , राम में मन अझुराइल।
तन के तुमड़ी तोड़ , तपत तन सुगना आइल।।
अब ना लवटबि फेर , रेघारी अइसन खींचलु ।
तन मन भइल उजास , पाट पर अइसन फीचलु
श्वानन के पाटी बनी , होई आज जुटान ।
पट्टा जेकरा घेंघ में , ओकरे चली शान ।।
ओकरे चली शान , रात में ऊहे जागी ।
सांसत में जब प्रान , बेपुछले सभे भागी ।।
ऊहे चली उतान , सँवारी जे आनन के ।
गुटबंदी परहेज , रही हमनी श्वानन के ।।
घर घुसना घूमत रही , ना दी कवनो ज्ञान ।
जतिया तऽ अपने हवें , लागत नइखे श्वान ।।
लागत नइखे श्वान , हमेशा पोंछ हिलावे ।
मुख नाहीं बिख दंत, अदमी से मुँह चटावे ।।
रसिक नाम अधयच्छ , काम बा हड्डी चुसना
हरदम रही कंगाल , न होई ऊ घर घुसना
नयका के फेर में पुरनका पटुआइल बा,
भेंटल ना नयका पुरनको गइल हाथे से ।
रहे अझुराइल कादो अलोता के लत में ,
सोझा ना भइल कबो सालो भर साथे में ।
दिग्गज पीछे पीछे धावे, नवसिखुआ से अरज लगावे
सावन में जनमल सियार के , भादो लगे भकसावन
डइपरओ भी काम ना आइल
पवन देव झकझोरले,
शंख बजावत बहरी आके
सभके नाक भँभोरले
बनियाजी के नाव जे डूबल
पांडे जी उतरइले
श्रोता लोग अनवाध के मारे
आसन छोड़ परइले
तनी हइहो देखीं -
चाँप फफेली
अगते सतावल
अब ई झेली
आरे बम्मड़!
धर नस पकड़
दे दु तकड़
तोर तसला
छुअब हम काहें
होई नज़ला
ततैया छत्ता
जो जाके लुको हाली
कतो अलोता
जँगला झाँक
बछरुआ के बान्ह
हरही हाँक
मिली मिठाई
छकडल नु जाई
नाक बुड़ाके
पीपर पात
तेज ना होला
दर्पन में सूरज
बुझ रे अज
आदत खराब बाटे , उब काहें भइल बा
दिल के दुआर काहें , आनकेहू गइल बा ।
सुनतानी दोसरा के देख मुसुकात बाड़ऽ
तसला में पानी परी , जब कहिहें जुवराज ।
केहू कोठी के भरे , उनुके सिर पर ताज।।
उनुके सिर पर ताज , बैल बूढ़ा पिठवाही ।
धइलसि बछरू मेंहँ , केहु ना करी मनाही ।।
सोचल सभ बेकार , सुधारी अब के मसला ।
का करिहें श्रीराम , आँच से तलफे तसला ।।
सनेहिया के डोरिया पर के डोरा डाली
बात बनावल छोड़के घरे आजा हाली
पांडे अपना ससुरारी में खइलन खूब मलाई
होत फजीरे लोटा लेके घूमस बीच तराई
जजमनिका से नेवता आइल , अजुए पैर पुजाई
पांडे जी संकट में परले अब के शंख बजाई
अस्सी पर जब झूले कंटा
तब चले भोजपुरिया डंटा
जगह बदलके दिखे जवानी
भउरी में भरवावस पानी
लोग कहेला असिआइल बा
ताजा नइखे बसिआइल बा
बाबा के बल बुद्धि बाटे
देख तजुरबा लोगवा साटे
छूँछे नइखे बा भरपूर
बाबावा के बा बड़ा गरूर
नयका नवही कमर हिलावे
बाबावा अँखिये से बतियावे
दाँत नदारत तालू चोखा
कलम दिखावे रंग अनोखा
रसना रसिक क झूठ न बोले
सभके दिल दरवाजा खोले
कहऽत कहऽत कंठ झुराइल कहल न मानल कोई ।
विधना के जब चलल कुठारी सभे देत दिलजोई ।।
रूप जाल में भूप भरमले , भल भामा भुनसारी।
भजन भुलाइल भाँड़न सङ्हे , टूटल रब से यारी ।।
सोझा जब परतोख दिआइल , पल में पुहुप फुलाइल ।
भोगी से योगी बन गइले , अछर साथ जब आइल ।।
बान्ह देली गाँतिये से गतरी के कस के
हाथ नइखे हिलत लोग गिरत बाड़े हँस के
ढ़िमुलिया मार के गोड़ परी हम
ए म मलकिनी आवऽ
गाँठ खोल दऽ गरदन के
हमरो लाज बचावऽ
हीत मीत सभ करे मसखरी
दे दे चट चट ताली
लोग कहत बा हई कलाबिन
कन्हइया के घरवाली
हारल थाकल काम के मारल ,
पड़त पलंगिया निदरी आइल ।
पइसत पियवा के ना देखनी ,
खुलल आँख तऽ भाग पराइल ।
गिहिथिन गलबहियाँ दे बोली,
गरब गुमान न करीह ।
पियवा के पदचाप जे सुनीह ,
आपन छींका भरीह ।
हम बउरहिया जान ना पवनी ,
कहँवा करिखा लागल ।
करि उतजोग कोंख कुहुँकवनी ,
तनहा आये हैं जग में , अकेले चलते रहेंगे ।
समय का चक्र ऐसा है , कारवां बन नहीं सकता ।।
तेरी संगत में रहना , हे प्रिये ! कबूल नहीं है ।
सुना है साथ रहने पर , निगाहें मोड़ लेती हो ।।
हसरतें पाल रखा है , बड़ी वो दर्द देती है
आवेवाला बिना बोलवले आई
थाक हार के नैना लोर ढ़रकाई
उहे राह बतलाई उतर के मन में
तन मन धन जब हिया से सँउपल जाई
रसिक
मौका कभी न दीजिये , लोगों को सरकार
सपनों का सुख है क्षणिक,
सुन ए संघतिया कहीं साँचे साँचे बतिया
मेहरी कइलसि उधार , फोरलसि भोरहीं कपार
मेहरी काइलसि उधार ।।
कहले रहीं जात बानी काम खाति पटना
घट गइल बिचहीं में एगो बुरा घटना
एगो बुरा घटना
बइठल रहे बगले में कइके सिंगार
हौसला हो बुलंद
मरुभूमि में भी
आनंद हीं आनंद
मेहरी के डाँट भइया केहू नाहीं बाँटेला
सभ केहू एके टके रसिक देने ताकेला
मोंछ पर ताव देके सभा बीच बोलेला जे
मेहरी के डर से चुहनिये में झाँकेला
पतनी जी परनाम बा, रचि रचि लिखीं पाती
रूसा फूली छोड़ दऽ , करब ठकुरसुहाती
नइहर जबसे गइल बाडु , देह भइल बा बाती
पापी पेट पाप करवावे , दरद उठेला छाती
बिना काड के भोज में जाके, तूरत बानी पूड़ी
बात समझ ना आवे तबहुँ , दीं घुसेड़ हम मूड़ी
चिमटा बेलना अब ना टूटी कहल टिकोरा करब
बेकहले हम चौंका बरतन अउरी पानी भरब
घर में सभे पीटाला बाकी मोहड़ा प मुसुकाला
मनुआ बाटे रसिक के चेला ताल ठोक घिघियाला
वीर कहाला धरती पर जे बात करेला मेहरी के
अकड़ पकड़ सभ ढ़ीला होला लात परेला मेहरी के
कहते सदा सुजान , लोक मंगल हितकारी
उचरत हिया जुडाय , प्रेम पइसे प्रतिहारी
साधक सिद्ध सहाय, एक टक गिरे न पपनी
गाँव में नइखे लउकत गाँव ,
शहर भइल बा ठाँवे ठाँव ।
चूल्हा चउका बदल गइल बा , बदल गइल बा लोचन ।
लालटेन अब लउकत नइखे , लउके ना बतकूचन ।
सभके बेड़ी लागल पाँव ।
शहर भइल बा ठाँवे ठाँव ।।
घर के अंदर बंद बइठका , लाज शरम बा भागल ।
ससुरे सोझा शंख बजावे , बिया बहुरिया जाँचल ।।
उदास भइल निमिया के छाँव ।
शहर भइल बा ठाँवे ठाँव ।।
गुड़ के भेली मिलते नइखे , कोंहड़ भाजी भोजे ।
पनपियाड़ में पातर बरफी , देले मनई ओजे ।।
हिया से नइखे कतो लगाव ।
शहर भइल बा ठाँवे ठाँव ।।
हमरा घर में लोटा बाटे , तोहरा घरे थरिया।
आवऽ मिलके साझ कइल जा , आपन आपन परिया ।।
दूलम भइल सझिया बरताव ।
शहर भइल बा ठाँवे ठाँव ।।
छूट गइल बा हाथ से लउर , सेल फोन पकड़ाइल ।
हँसुआ टुकुर टुकुर ताकेला , हरभेस्टर बा आइल ।।
बढ़-चढ़ के लोग चले कुदाँव ।
शहर भइल बा ठाँवे ठाँव ।।
साड़ी सूट सहेजल जाता , मैक्सी टीशट आगे ।
बाबाजी के मोटा चश्मा , लेंस देखके भागे ।।
रसिक हऽ नयका सोत बहाव ।
शहर भइल बा ठाँवे ठाँव ।।
सटले रहब बबुआ हो तोहरा के दिल में
देखब हम रोज रोज तोहके महफ़िल में
माई सुरसती के असीस मिले तोहरा के
ए बबुआ स्वागत बा तोहरो परिवार में ।
कबहुँ दरार इहाँ पड़ी नाहीं प्यार में ।।
सभे बा बाबा चाचा भइया आ दीदीया
माई भोजपुरिया के लिलरा के बिंदिया
चमकेला सभ लो अमवसी अन्हार में ।
ए बबुआ स्वागत बा तोहरो परिवार में ।।
बोली से गोली ना केहू चलावेला
आन के भी सभ लोग अपने बतावेला
दूर रहला प भी आपस में मिला दे
भीरी अइला प दिल में कमल खिला दे
इहे जभो जभो परिवार के काम बा
सभ लो के बोली में मिसिरी मिला दे
भोजपुरी उड़ान लिही रउआ अगुआई में
पंजवार में बेयार बही रउआ अगुआई में
फुहरनपन के मुँह पर करिखा पोताई
भोजपुरिया लो बात कही रउआ अगुआई में
कान्हा के मन में उमंग उठी देख के
खुश होई अइसन जुटान के निरेख के
राउर असीस खाति पपीहा पियासल बा
देखता बेर बेर हथवा के रेख के
रसिक
मृदुल मनीषी कवि श्री अंजन
जस भोजन में छप्पन व्यंजन
भोजपुरी उड़ान लिही रउआ अगुआई में
पंजवार में बेयार बही रउआ अगुआई में
फुहरनपन के मुँह पर करिखा पोताई
भोजपुरिया लो बात कही रउआ अगुआई में
कान्हा के मन में उमंग उठी देख के
खुश होई अइसन जुटान के निरेख के
राउर असीस खाति पपीहा पियासल बा
देखता बेर बेर हथवा के रेख के
रसिक
भाखा प्रेम दीलिप के , चढ़ल रहो असमान ।
झंडा गाड़स नाम के , इहे हमर अरमान ।।
स्टार्टर जोर लगवलसि ,
खल खल के खाद खिअवलसि ।
भोजन भइल ओछवाही ,
पूड़ी चलल दुई गाही ।
पोलाव रहे भर थरिया ,
दस रसगर गोलू करिया ।
मत पूछीं का तरकारी ?
रहे मटर पनीर कुँवारी ।
पापड़ पट-पट पटियावे ,
चटनी चटकार लगावे ।
बरफ मलाई मुँह खोले ,
भरपेटा लेलऽ बोले ।
गाजर के हलुआ ललका ,
तुरलसि रेकाड़ पिछलका ।
पाटी में जसन मनवलसि ,
जमके जिभिया तहिअवलसि ।
राती में पेट पुकारे ,
लागल लो के ललकारे ।
अजवाइन चुप करवइलसि ,
तब गरदन जोर चिलइलसि ।
जब परले फेर तिवारी ,
पांड़े से कइले यारी ।
अहथिर होके मुसकइले ,
तब असली राज बतइले ।
भोज में रहीं खाखाइल ,
इयाद ना पेटवा आइल ।
अब ना होई नादानी ,
भरपेटा पीयब पानी ।
नया जमाना आइल बा ,
घुघुनी मुर्ही भुलाइल बा ।
चोखा माड़ भात सटकउआ ,
लउके ना तेली के पउआ ।।
अब पाउच में सभ भराता ,
नइखे लउकत लउर से नाता ।
हल्दीराम के भुजिया आइल ,
माई के नमकिन भुलाइल ।।
काठ के चटकी चटकत नइखे ,
गाय हेंड़ा से भटकत नइखे ।
दूध दूहके डेयरी जाता ,
अमूल के महंगा मक्खन किनाता ।।
माहटरजी के छड़ी हेराइल ,
ओह दिन से पपुआ पगलाइल ।
आइल जब जियो के सेट ,
बचवा से ना होला भेंट ।।
फगुआ चईता चुनरी धानी ,
बितल समइया के बा कहानी ।
पियत नइखे तेल चमरूआ ,
बनके बइठस बाबा उरूआ ।।
केहु ना सुने रसगर बात ,
रसिक के कुंद भइल जज्बात ।
शब्द शिरोमणी मलले हाथ ,
ऊँच भइल छूछबेहरा माथ ।।
केहु ना गावे राम रमईया
पईसा ला बा ताता थईया
कन्हैया प्रसाद तिवारी 'रसिक'
रहे सलामत सबकी दुनिया ,
पढ़े लिखे मुन्ना औ मुनिया ।
किरण सुबह की जोश जगाये ,
लछिमी जी सभके घर आये ।
रसिक
खास तरे के लो बा पढ़ले , खास तरे के लो पढ़ीहन
माई भाखा में विचार के , सारथक सुनर शब्द गढ़ीहन
भले लाख बेअंजन बाटे , स्वाद माई के थरिया बा ।
कवनो भाखा में बतिआईं , जरि हमार भोजपुरिया बा ।।
ना तीखा ना चटपट बाटे , सेहतमंद सुपाच्य भोजन
माई हाथ क लिट्टी - चोखा , रूचे ला सभ केहू के मन
चाहे केहू लोल बजावे ,
बल बलराम राम मरजादा ,
सरस कृष्ण जस राउर जीवन ।
मात शारदे जीभ प रहली ,
गमकवली भाखा के उपवन ।।
दुर्गा माई दिव्य कृपा कर,
अद्भुत दृष्टि दान में दिहली ।
पूत के अपना उच्चासन प ,
देखत मन हीं मने बिहँसली ।
जय भोजपुरी जय भोजपुरिया परिवार हऽ
भाखल भोजपुरी भाखा एकर विचार हऽ
बेलन जइसन यंत्र से , पत्नी जी मुसकाय ।
पियवा लगे सुहावना , इधर-उधर ना जाय ।।
इधर-उधर ना जाय , समय पर घर हीं आवे ।
विधुवदनी को देख , नजर ना कहीं मिलावे ।।
जब भी पड़े कपार , रहे काबू में तन मन ।
देशी हर्बल अस्त्र , रसोई का है बेलन ।।
~ रसिक ~
लदरल बिरिछ न ढ़ेला मरनी ,
कइनी ना कुछ काम गलत ।
तबो लोगवा ताना मारे ,
कवन गुनाहे बा नफरत ।।
सभके धनसुत देख धधइनी ,
केहू ना रहले अनजान ।
तबो लोगवा बान चलावे ,
निकुटी कहे करे अपमान ।।
चदरिया कहँवा दाग लगवलु ×2
सुतल रहलु महल अटारी
सेवक रहलेसन सरकारी
समय प सबकुछ मिलत रहुए
दुअरे बा बइठल चोर , ए सखी
दुअरे बा बइठल चोर।
आवत जात निहारें पल पल
कबो साँवर कबो गोर , ए सखी
दुअरे बा बइठल चोर।
भोरे कहीं राम - राम , बन जाई सभ काम,
छने-छने छछनत , केहू नाहीं रहिहें ।
मन के विकार भागी , तन में उमंग जागी,
शीतल बयार नित , जिनिगी में बहिहें ।
माई के चरनिया के , छुवला प भाग जागी,
भाई के सनेह धारे , असगुन दहिहें।
रसिक सुबोल बात , बेरि-बेरि दोहरावे,
मानऽ चाहे जनि मानऽ , ऊ तऽ रोज कहिहें।
बोलबों ना तोसे हम , हमरो से बोलिह ना,
दिलवा से दिलवा के , होए दीहऽ बतिया ।
अँखियाँ के भाखा तनी , अँखियाँ के पढ़े दीहऽ,
केहू ना रोकी-टोकी , एङ कटी रतिया।
कइसना सुजोग बाटे , दुनो जनी एके संगे,
आवेली ना अँखियाँ में , नीनरी सवतिया ।
हम गुनीं तोहरा के , तुहूँ गुनऽ हमरा के,
जुग-जुग जोड़ी रहे , बनल संघतिया ।
भूचाल , जाली , हाली , ठाली , निठाली ,दीवाली
टकटकी लगाके देखे दीहऽ
रूसा फूली जन करीहऽ
प्रेम पियासल दुनो उर बा
बात मामूली जन करीहऽ
जेकरा खातिर जनम भइल बा
ओकर नेह भुलाइब कइसे
कवनो गलती हो मोर बालम
दोख जुगाली जन करीहऽ
जिनिगी बा तऽ जश्न मनावऽ
चिंता मत कबहूँ चुनियावऽ
गम के कवनो भाव न दीहऽ
काम में हाली जन करीहऽ
समय समय पर समय के सुनीहऽ
कुसमय हाथ न धरीहऽ
जे बा तोहरा खातिर उमगल
जुबान के खाली जन करीहऽ
अँखिया मिलावे जब, अँखिया से अँखिया त
मनवा के भावना सँवार देले अँखिया
अँखिया के भाखा सभ , जानेला जहान लोग
कगरी चलेले त उजार देले अँखिया
एकटक सोझा-सोझी, बिलमे जे अँखिया त
दिलवा के दुअरा पुकार देले अँखिया
आँख देख रहिया में , चल जाले अँखिया त
रसिक के झट से लतार देले अँखिया
होखेले अलोत कबो अँखियाँ से हरि मोरे,
तकिया गिलाफ से सवाल करे अँखियाँ।
अचके में चलि जाले भरल सभा के बिचे,
गली आ मुहल्ला में बवाल करे अँखियाँ।
घइलन पानी जब टघरेला आँखियाँ से,
मनवा के मइल निकाल देले अँखिया।
तिनिको के भार कबो सहसि ना आँखि दुइ,
दिलवा के भार के उछाल देली अँखियाँ।
माई के जयकारा लगावत रहीं
भोजपुरी के पुहुप गमकावत रहीं
केहू कुछो कहे तऽ सुनीं प्यार से
नीक हुनर से चुनर चमकावत रहीं
रसिक
एक बंदर
एक और बंदर
एक बाहर
एक अंदर ।
एक बोला
दुनिया मुझको
बंदर कहती है।
दूसरे ने जबाब दिया
मैं दुनिया को ••••••
और विडम्बना तो यह है
कि दोनों शांत बैठे हैं ।
अमही में अइले विशाल त चेहरा उनुकर चमकल
हम तऽ जननी पकठा हवें रहेले असहीं बमकल
देखनी जब त हमरा लागल मधिम रहे गोराई
ओही बरन के धाक जमवले रहन रसिक कन्हाई
गुरगेठना हँसमुख जवान के बोली रहे कटाह
मंच प बइठल कवि लोगन के भइल सवतिया डाह
मार ढ़िमुलिया कुकुर भगाके जूता के दिहलन सनमान
रसिक देखके गदगद भइले चलत रहे बतिया के बान
माई के बेटा बिटोरले सनेहिया
मनवा के कइले विभोर
भाखा के सुनर सुरतिया सँवार देले
ले गइले गँउआ क ओर
एक एक सबद में रस रहे मिसिरी के
सुनला पऽ मनवा अघाय
कतिना बड़ाई करीं बाबु राकेश के
अमही में भइल अंजोर
मत बेचऽ भोजपुरिया सान
तेल भइल खतम जोतवा त जरते बा
साल भर बितला पो पांडे जी से मिले खाति
आइल बानी पटना में चलके बंगलोर से
गूगल बाबा कहले कि दोस्ती अटूट रही
डेरा हम डल्ले बानी तीन रात भोर से
भावना के भार , शब्द के तराजू
हम कहनी काजू , तूँ पढऽ पिआजू
बात के मेघ से , स्नेह के न सींचऽ
हेंठ करऽ तन के , मनवा के फींचऽ
लोल बजावे के , आदत पुरान बा
पढ़ल करऽ पुस्तक, उहे परधान बा
सुतेलऽ देर से , अबहूँ तऽ जागऽ
डंट बा कपार प , अबहूँ तऽ भागऽ
आन के बात से , नाहीं छेंटिअइह
हर बे अपना के , चक चौकस बतइह
रसिक जी कहिहें त , फोर देब फफेली
ऊ बाड़न बाभन , हम बानी तेली
सूखल सरसों से , तेल हम निकालीं
पंडित के पतरा , हमार घरवाली
सुर के सिंगार करे अइली माई सारदा
संउसे समाज में उजास भइल भइया
सगरी टाँग अड़ाईं जन
अड़ जाये तऽ हटाईं जन
फटफटिया पो फटफट क के
कबो स्टंट दिखाईं जन
बढ़ल उमिर में शक्ति छीन
ए बाबा कुछ चाहीं ?
जवन बुझाय देदऽ
हम ना करब मानाहीं
चाह चाहीं कि कॉफी
बिस्कुट चाहीं कि टॉफी
आ कि चाहीं काजू के पोलाव
जल्दी बताईं केकरा से बा लगाव
ठंढ़ा गरम नरम कठेल
बाबा कइलन रेलमपेल
उड़नपरी मुस्कान प बाबा
कहले भाग जगइलस
दुई हजार के बिल बनल तऽ
बाबा जी खिसिअइलन
पानी के पइसा ना लिहलु
खाये के बा कइसन दाम
पहिले कहले रहितु तऽ
हम ना करतीं अइसन काम
हम तऽ जानी मुफुती माल हऽ
मिलत बा भरपेटा
ना जननी मुस्कान के पीछे
लागी गहन चमेटा
चेट में रहे दस सई टकिया
बिल रहे बिसवार के
पुलिस पकड़ के साथ ले गइल
डांड में रसरी डार के
फोन लगवनी पांडेजी के
आईं फरियाईं ममिला
कइसे अमही गाँव में जाके
रसिक हिलइहें जिला ?
अब ना चढ़ब बिमान पो बबुआ
चढ़ते ठोकर लागल
भइल बेइजती लोग के सोझा
हमहीं रहनी पागल
मुफुती माल के देख कन्हइया
मन के जन ललचइह
आपन अनुभव सभ लोगन से
अमही जा के बतइह ।।
मन बा जवान तन झुर्री परल बा
दिलवा में जोस कूट कूट के भरल बा
मन बा त आव आजमा के तनी देख ल
हमरा में अमरित आ तोह में गरल बा
मन बा जवान बाकी तन घुरचाआइल बा
केकरो ना दिलवा के बतिया बुझाइल बा
लदरल बा फल देखऽ डाली में झोंप झोंप
पाकल बा पात काहें लोग अझुराइल बा
गोड़ तोहे लागिना गँउआ के डीहबाबा
अमही में बाटे जुटान ,
भोजपुरिया भाखा के बढ़ी आज सान।।
बीड़ा उठवले बाड़े सतीशजी पहरूआ
माई भोजपुरिया के हउअन दुलरूआ
संगीत सुभाष संगे सारथी मदन भाई
छेड़ीहन छपरहिया तान ,
भोजपुरिया भाखा के बढ़ी आज सान।।
दीन हीन छीन नाहीं भाखा भोजपुरी
सबका के साथ लेके चलल बा जरूरी
गावँ गाँईं जबले ना जगिहें जवान लोग
मिली ना भइया सम्मान
भोजपुरिया भाखा के बढ़ी आज सान।।
भइया सुरेश जी के माथ पो पगरिया
उदय नारायण धइले गाँव के डगरिया
मुरूगा बोले से पहिले जाग जाले हिरदानंद
करेला पराती गुनगान,
भोजपुरिया भाखा के बढ़ी आज सान।।
माया बहिनियन के माया बिचित्तर बा
माई के सम्मान खाति मानस पवित्तर बा
धरम के धाजा फहरावेली प्रियंका बहिनी
बोलि बोलि मधुरी जुबान,
भोजपुरिया भाखा के बढ़ी आज सान।।
अंजन बाबा के असीस धरे माथ लोग
फौजी कन्हइया के बनल बाटे शुभ जोग
पांडे दिनेश अरु संजय के नजरिया से
भरी भोजपुरी उड़ान
भोजपुरिया भाखा के बढ़ी आज सान।।
~ रसिक ~
पूछे त मुँह फेर लऽ , उमिर अवरु कमाई
तिन्ना होके दूध पीयऽ , बइठल जल दवाई
अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनल ठीक ना बा
आन के घर में झाँकल भइया नीक ना बा
घर में जे आवे ओकरा के नमन करऽ
हाथ जोर के करऽ विदाई अमन धरऽ
थरिया में लऽ अतने जतना पेट में जाये
करऽ अन्न के मान ना इचिको खेत बिगाये
रोटी सब्जी दाल से आपन पेट भरऽ
पइसा आवे पास तऽ नहीं गुमान करऽ
चढ़ल करजा उतरी कइसे मन में सोंचऽ
रोग भइल त झटपट ओकर जुलुफी नोंचऽ
मधुरी बानी बोलऽ कर्कस तजल करऽ
अदिमी के पहचान के पुठ्ठा हाथ धरऽ
आफत आवे केहू पर तऽ दउरल जइह
जसन मनावे बेरा थोरिका तुँ सुस्तइह
अनगुते जय राम राम के भजल करऽ
रसिक के संगे सभके मन में बसल करऽ
मुस्कान हृदय से गायब बा
खाली मुँह दाँत चिहारत बा
आपन आपन स्वारथ खातिर
अनकर मुँह लोग निहारत बा
घर बइठल सान बघरला से
कल्यान जगत के ना होई
तलफत अगनी के मान करऽ
दी तहरा के ऊ दिलजोई
बचवन के उत्थान , लहेंडा भइले चारो
बनल सभ देवदास
मंदिर के चौखट पर नहीं जाओ अनमने
आओ , किसी बेसहारे का सहारा बने
गइल बाड़ी नइहरे मेहरिया
देह में जहरिया बढ़ल ए राम।
के झारी झाडू से लहरिया
आन पो नजरिया गड़ल ए राम ।।
बाटे खरकटल लोटा थरिया
दुअरा पथरिया परल ए राम
जरल बा कराही तरकरिया
नाहीं आलू फरिया मिलल ए राम।।
नीमना पो सभे पुछवरिया
परे पो नजरिया फेरे ए राम
काजर के कोठरी शहरिया
दाग मोर चुनरिया लगल ए राम।।
कवन दो त बहल बा बेयरिया
बोली में जहरिया घोरे ए राम
रसिक बाबा लिखऽ तू शयरिया
सरस भोजपुरिया पगल ए राम
हरपल पति पर जो तनी , वह पत्नी आदर्श।
मीठी वाणी बोल के , खाली कर दे पर्श।।
खाली कर दे पर्श , पिया घोषित खर्चीला।
रंचमात्र प्रतिरोध , पसारे सौ-सौ लीला।
किन्तु समर्पित भाव , हृदय उजला - सा उत्पल
हुए रसिक परितृप्त , देख निश्छल मुख हरपल।
दुलुकी चलींजा नाथ , राम रस पीये खातिर
छोड़ दीं गिनती साथ , राम रस पीये खातिर।।
ढ़ेर कमइनी रुपेया पइसा
कहता जवानी नाता कइसा
चमकत चान देखा के कहे
काहें ककही बा हाथ , राम रस पीये खातिर ।।
दुलुकी चलींजा नाथ , राम रस पीये खातिर ।।
पार गइल बय साठ के उपर
कहल छोड़ दीं सुपर सुपर
गाँठ के गठरी खुल गइल बा
लउके लमहर पाथ , राम रस पीये खातिर ।।
दुलुकी चलींजा नाथ , राम रस पीये खातिर ।।
सकल खजाना ठाँवे रही
मुँह से सुगना कुछ ना कही
राम नाम सत नाहीं सिखलऽ
धाव धाव ए जगनाथ , राम रस पीये खातिर। ।
दुलुकी चलींजा नाथ , राम रस पीये खातिर ।।
सुधियाँ लेलऽ ए कन्हैया रहिया बानी हम अकेल
बानी हम अकेल ए कान्हा बानी हम अकेल
सुधियाँ लेलऽ ए कन्हैया रहिया बानी हम अकेल।।
भादो के अन्हरिया सूना सूना बा डगरिया
तोहरो बंशीया बोल करे मन में कुलेल ।।
सुधियाँ लेलऽ ए कन्हैया रहिया बानी हम अकेल।।
सास ससुर जेठ भाई मेहना मारे महरी माई
खाई पटल नाहीं अंदर बाहर चलेला ना रेल ।।
सुधियाँ लेलऽ ए कन्हैया रहिया बानी हम अकेल।।
आँख लागल बा बिहारी तन पो चले छूरी आरी
रोवे तोहरी दुलारी मतिया भइल बाटे फ़ेल।।
सुधियाँ लेलऽ ए कन्हैया रहिया बानी हम अकेल।।
हिरदानंद के गीत से हिरदा जुड़ा गइल
कविता के भाव में भुलइले कन्हइया
माई सुरसती जी बेर बेर बिनती बा
कलम के धार उनकर बढ़े सवइया
दाँव पेंच शब्दन के सनर सुमंगल हो
मिसिरी समुंदर के पानी घोराये
सुनेवाला आसन से टसमस हिले नाहीं
नाग फुफकार जाके सुरति समाये
ओझा जी अझुराइल बाड़े , सुटुकल फिरस सतीश।
बबुआ तन्मय नोकरी धइले , धर भर करे अशीष।
रसिक के रछया कइली बेटी , माई केरि कहर से।
बृजमोहन के मुहँ ककुलाता , बोले ला दुपहर से।
सूतल शेर सुरेश भयकड़ा , कवन जने जगावस।
हिरदानन मधुरे कुछ गावस , सभके दिल बहलावस।
दइबा दया दिलीप प राखसु ,घरनी के दुख हरसु।
नवही लोगन अपने घर में , चौका चूल्हा करसु।
बछरू लो जादे जनि छरपे , लगने मिली मिठाई।
आज जनमदिन सिरी किसुन के , सभ लो जूटि मानीं।
खबर धमाकेदार आजु के , फैलल गाँवाँगाईं।
हाथ जोरि के कहे कन्हैया , जै भोजपुरिया माई
अनका घरवा पेट पोखरा , अपना घर में टुइयाँ।
मिलल गलइचा नींद पराइल ,घर में सूतस भुइयाँ।
हमरा घर में आग लगाके , मंद-मंद मुसुकाले।
हितई में नदकोले हूरस , तनिको ना सकुचाले।
केकरा से आपन दुख कहीं , सबहीं काटे धावे।
मलकिनियाँ के पाठ पढ़ा के , घर में आग लगावे।
बन्द बा हमरा घरे चूल्हा , मुसरी पेटे दउरे।
मीत हउअऽ तऽ भेजऽ कुछऊ , नइखे लिट्टी भउरे।
सोना अस हमरा धनिया से , हउ बतिया बतला दिहलन।
लौह बेलना नया खरीदी , उनका हाथ धरा दिहलन।
टभकत बा माथा के गूमड़ , अँगुरी पोर टटाता।
रार मचल घर रौरव भइले , जिनिगी नरक बुझाता।
हाय दइया तोहरी सुरतिया सतावे
नजर न लागे मोर फूट जाये अँखिया
मोहे सुरतिया पो बेर बेर सखियाँ
हाय दइया दिल के दरदिया बढ़ावे ।।
चाल मस्तानी कमाल करे मुस्की
जइसे बुझाला रूहअफ़जा के चुस्की
हाय दइया नैना ना नैना लड़ावे ।।
चश्मा के चाल चलन नीक नाहीं लागे
अँखिया के भाखा के अँखिया ना भाखे
हाय दइया रसिकवा ना मोके समझावे।।
झाकाझूमर में झूमका झटक दिहल ।
बड़ा अरमान रहे पेन्हतीं दुतल्ला
पड़ल ना हमरो बुनुकियो से पाला
तिलक के माल सभ गपक लिहल
झाकाझूमर में झूमका झटक दिहल ।।
बाबूजी के रहीं हम अँखिया के पुतरी
जननी ना पपीया ई पाँख मोर कुतरी
डंडा लेके खोजत बाड़ी कवन पढ़वले पाठ बा
पहिले पियवा पँवरत रहे अब लउकत झरनाठ बा
ना जाने केकरा से कइलस लेदरा वाला इयारी
हमरा के विस्फोटक कहे खुद तलवार दुधारी
रसिक
मरले बिआ मेहरी लाते हमरा के चहेट के
आटा नीयन फुलवरा के रखले बिया फेंट के
गरम कराही तेल में मूड़ी हमर डलाई
लाग गइल लुत्ती बरूद में अब लगले फट जाई
कइसे कलम उठाईं भइया हाथ बन्हाइल पट्टी
जुलुमी चटकन मरले बिआ सुन्न भइल कनपट्टी
पेट में चूहा कूद रहल बा भोजन भइल नदारत
देह बारूदी के बतिया से छीड़ल बा महँभारत
बीन संगीत बजावस एने मजिगर हमर कुटाई
अइसन फुंकलन कान में मंतर भगली छोड़ लुगाई
जनतीं अइसन धोखा होई ना करतीं हम यारी
थपरी पीटत लोगवा हँसे खइलन लात तिवारी
हमहु मोका खोजते बानी सरफ डाल झपिलाइब
आवे दीहीं मास नवंबर बढ़िया से बतलाइब
अइसन चुन चुन चुगली करब चउका चना चबइहें
जब जब देखिहन मलकिनी के दाबत पोंछ परइहें
नैतिकता के बात पऽ , सइ-सइगो उपदेस
संस्कार जोहत फिरीं , गइल बिबेक बिदेस
गइल बिबेक बिदेस , ताक पऽ रखले प्रानी
मानवता के प्रश्न , तंगदिल निठुरी बानी
आवे मुश्किल वक्त , निदाने भइल नापता
उघरल छद्म लिबास , सिकुरली सभ नैतिकता
शिक्षा उत्तम है वही , मिले ज्ञान का सार
जिसकी सीमा पेट तक , वह शिक्षा बेकार
वह शिक्षा बेकार , कुटिलता जो उपजाए
अहं भाव अतिरेक , गर्त में लेती जाए
मद लोलुपता त्याग , जिंदगी भले परीक्षा
नम्र निवेदक रसिक , दान में दे दो शिक्षा
शिक्षा जीवन में सही , कर दे जो उपकार
शिक्षा बने विलासिता , मन पर करे प्रहार
मन पर करे प्रहार , कुटिलता आगे आये
अहं भाव अतिरेक , गर्त में जल्द गिराये
शिक्षा मद से दूर , पात्र हो कर में भिक्षा
नम्र निवेदक रसिक , दान में दे दे शिक्षा
सार्थक शब्द सुनाय के , सभके मन बस जाय
घिरिना घट से दूर कर , बंशी चैन बजाय
बंशी चैन बजाय , हिया अवसाद मिटाईं
कटु वचन संदेश ,
तिस्ता के निधन पर
*****
अँखिया से बहे पवनार हो
करेजवा निकाल लिहलु धीयरी ।
माई के ना सुनलु पुकार हो
करेजवा निकाल लिहलु धीयरी
ताज रहु मय भोजपुरियन के नयका
छन भर में तींत काहें क दिहलु खयका
काहें कइल विधाता अइसन रार हो
करेजवा निकाल लिहलु धीयरी
बुद्धि में खलबली मचल , टूटल दिल के तार
जीव पड़ल बा फेर में , खोज रहल बा प्यार
खोज रहल बा प्यार , हे प्रभु राह देखाईं
भटकल बा जे लोग , ईश रउआ समझाईं
फैलल बा दुर्गंध , आके करवाईं शुद्धि
अवते नेक विचार , निर्मल हो जाई बुद्धि
~ रसिक ~
एलोपैथी दवा दरवान बाटे गेट में।
लाज लागे मोहे हउ बतिया बतावे में
धनिया के हमर तकलीफ ना बुझाता।
जलदी से बैद जी बताईं कउनो ओसधी।
मुश्किल घड़ी में रउए पो विश्वास बा
हे नाथ ! सनाथ बनाईं इहे आस बा
नैतिकता के नाम पर , बनत लोग चालाक
संस्कार में सार नहीं , होत विवेक हलाक
होत विवेक हलाक , ताक पर देखे प्राणी
मानवता के नाम , मूक हो जाये वाणी
आवे मुश्किल समय , निदान के नइखे पता
छद्म छली के रूप , सिमट जाई नैतिकता
अब चरवाहा उहे नइखे जे दे दे भेंड के बली
देखके ओकरा मचल बाटे भेड़ियन में खलबली
अकसर आवस चाहे झुंड में डाँड़ प बाजी डंडा
फेंकरत फिरिहन गली गली में फूट गइल बा भंडा
ई चरवाहा चौकस बाटे चारो ओर बा नजर
कवनो भेड़िया भोंक ना पइहन हो जाई धूमगजर
छटपटात बा मिलत नइखे खाये के माँस के लोथा
लोग देत बा लउर देखाके फेंकल महुआ चोंथा
कमर में कसाव ना रिसाव बाटे नाक से
अँड़सल बा पेट में राह नइखे निकले के
पांड़े घरे पूड़ी तहिआई लेनी तान के
तबहीं से मचल बा तबाही काल्ह शाम से
रहे रसगुल्ला त रस से फिसल गइल
जगहा बनाई लेल आपन ऊ पेट में
आलूदम दउरि रहल भागे खातिर बहरी
एलोपैथी दवा दरवान बाटे गेट में
बबुआ दिनेश तुहें कवनो उपाय करऽ
मुफुत के माल भेंटे वाला बाटे कल्हुए
अइसना निदान करऽ इचि ना दरद होखे
आईं ना कबहुँ हम केहू के लपेट में
कट कट करे दाँत भुजुना चबावे में
लाज लागे मोहे हउ बतिया बतावे में
पानी लागल हाथ में बा गोड़ लंगड़ाता
धनिया के हमर तकलीफ ना बुझाता
जलदी से बैद जी बताईं ना दवाई
घरे जाके उनका के तनी समुझाईं
लोगवा कहेला कि बउराइल बा बुढ़ारी में
जाइल चाहे रोज रोज अपना ससुरारी में
परिकल बा खाये खाति महुआ के लाटा
बाकि ससुरारी में खइले बा सरहज से चाँटा
डँकरेले गइया धाव धाव ए कन्हैया तनि रक्षा करऽ
पाछा परल ओकरे कसइया तनि रक्षा करऽ
लोगवा कहेला ओकरा दूधवा के अमरित
फिर काहें करेला लो ओकरा से अनहित
ओकरा से अनहित
छोपनी लगवले बाटे सभके रुपइया
तनि रक्षा करऽ
पाछा परल ओकरे कसइया तनि रक्षा करऽ।।
रोंवा रोंवा बसेलन गइया के देव हो
काहें लो लगावें ओकरा देहिया में लेव हो
देहिया में लेव हो
काहें ना उजागर होता घर आँगनइया
तनि रक्षा करऽ
पाछा परल हमरो कसइया तनि रक्षा करऽ।।
पोंछिया पकड़ के बैतरनी लोग लांघेला
रोज रोज गइया से लो पंचगब्य मांगेला
पंचगब्य मांगेला
करेलन कन्हैया रोज गइया सेवकइया
तनि रक्षा करऽ
पाछा परल हमरो कसइया तनि रक्षा करऽ
गइया के गोबरा से अँगना लिपाला
होखेला सभ शुभ काम हो
पूजा में दूधवा बन जाला अमरित
बिहँसे ले चारो धाम हो
दीदीया बुचिया पुष्पवा के ई राखी ह
एह धागा में अरथ बा गहिरा
ई कबीरदास के साखी ह
भले तन से दूर बा दिल्ली
दिल से दूरी खाक बा
बाबूजी माई से अधिका
एह बहिनियन के साख बा
भाई से बाजू बा बड़हन
परला पो बैसाखी ह
एह धागा में अरथ बा गहिरा
ई कबीरदास के साखी ह।।
बधाई हो बधाई ओझा संजयजी भाई
शतक लगवनी विदेश के कमाई
जभो जभो के शान बढ़वनी
रसिक कन्हैया मन हर्षाई
घुमता भुखाइल भेड़िया ए भइया
हिरनी के हो फेर में
अपना बिहनिया के हथवा पकड़ लऽ
फँसल बिया अन्हेर में
सिसिकत बिया तोहार ललमुनिया
बाज लगवले घात बा
पलखत पानी के नोच ली पँखिया
अइसन हमरो बुझात बा
कइसे उड़ीं असमाने ए भइया
संझिया अवरु सबेर में
पाँख बढ़ाइब चोंच पजाइब
हमहु करब अब वार हो
जे निरदइया पंजरा अइहें
ओकर करब संघार हो
तनिका सा हँथवा पीठीया प रखदऽ
भेज देहब नरक के ढ़ेर में
काँच कपास के तार न तुरीह
बहिनी के ई पुकार बा
एके जनम ना जनम जनम तक
भइया बहिनी के प्यार बा
लेई के बलइया धागा कलइया
फेंकिहऽ जन तू लथेर में
रूप क जाल में जे परल ऊ बिलाइल
नकली के चक्कर में असली भुलाइल
हाथे ना लागल ना मिलल नैन सुख
दुविधा में दउरत दोज़ख़ भेंटाइल
निकलल बघवा माँद से , मिरिगन में हड़कंप
सोलर से अब चल रहल , देखऽ नीमन पंप
सोझिया बानर मरले बा , देखऽ आज गुलाटी
जिह्वा पर माँ शारदे , मन में उच्च विचार
सार्थक शब्द उचार हो , मंगलमय व्यवहार
शब्द माना कि भेजे में शब्द का खजाना है
फिर भी शब्द काफी नही, बहुत कुछ अनजाना है
शब्द शोभा नही देता है, सिर्फ शब्दकोष में
शब्द शोभता है जब निकलता है होश मे।
शब्द से उत्पति, लय होता सब शब्द मे
गुंजता है शब्द एक, निर्निमेष अब्द मे
शब्द ही से मानव, मानवता को पावे है
दुर्जन को भूतल पर, शब्द ही बनावे है
शब्द ही से काम बने, काम को बिगाडे शब्द
शब्द ही से जीते युद्ध, युद्ध मे पछाडे शब्द
शब्द के प्रभाव से कोई नही छूटा है
शब्द ने ही दुनिया से चैन सुख लूटा है
शब्द ही है दुनिया, और शब्द ही भगवान है
शब्द ही फरिस्ता और शब्द ही शैतान है
पहचानो उस शब्द को, जो गूँजता है निर्निमेष
वही शब्द हरता है, तन मन का सब क्लेश।
शब्द
****
शब्द माना कि भेजे में शब्द का खजाना है
फिर भी शब्द काफी नही, बहुत कुछ अनजाना है
शब्द शोभा नही देता है, सिर्फ शब्दकोष में
शब्द शोभता है जब निकलता है होश मे।
शब्द से उत्पति, लय होता सब शब्द मे
गुंजता है शब्द एक, निर्निमेष अब्द मे
शब्द ही से मानव, मानवता को पावे है
दुर्जन को भूतल पर, शब्द ही बनावे है
शब्द ही से काम बने, काम को बिगाडे शब्द
शब्द ही से जीते युद्ध, युद्ध मे पछाडे शब्द
शब्द के प्रभाव से कोई नही छूटा है
शब्द ने ही दुनिया से चैन सुख लूटा है
शब्द ही है दुनिया, और शब्द ही भगवान है
शब्द ही फरिस्ता और शब्द ही शैतान है
पहचानो उस शब्द को, जो गूँजता है निर्निमेष
वही शब्द हरता है, तन मन का सब क्लेश।
कन्हैया
शब्द मरहम आ शब्द बान ह
आँखि के पुतरी आ परान ह
शब्द में जगत अझुराइल बा
शब्द तलवार खातिर म्यान ह
शब्द के शान में कोताही केहू जन करे
शब्द के जाने से मनाही केहू जन करे
शब्द सुघराई के संजोये राखल जाये
शब्द के सरिया से तबाही केहू जन करे
आन अन्न में देवता , देवी पेय पदार्थ
शुभ होखे जजमान के , करे सदा परमार्थ