जे जल्दी खाई उ बरतन धोई आज बिटोरन बहुत खुश बाड़न। उनका प्रोविडेन्ट फन्ड के पईसा उनका एकाउन्ट में जमा हो गइल बा। पास बुक पो चढ़ावे खातिर भोरहीं बैंक निकल गइलन ह।मलकिनी कहते रह गइली कि तनि नाश्ता कर लीं बाकी खुशी के मारे उनकर भूख परा गइल रहे, कहलन कि आ के नाश्ता कर लेब।बैंक खुलते पहिला आदमी रहले एह से फटाफट काम हो गइल । सबसे पहिले पचास हजार रूपेया मलकिनी के गहना किने खातिर निकललन, फिर पासबुक अपडेट कराके घर के रास्ता ले लेलन। साइकिल चलाके गइल रहले एह से घरे आवत -आवत पेट में चूहा भगदड़ मचावे लगलन स।घर में घुसते मलकिनी से कहलन कि फटाफट खाना निकाल$, बड़ी जोर से भूख लागल बा । मलकिनी झिंझुआ के कहली- इहे लत राउर ठीक ना लागेला। बाहर से अइला पो तनि हाथ गोड़ धो लेबे के चाहीं त रउआ सीधे कपार पो चढ़ गइनी। जाईं,पहिले हाथ गोड़ धो के आईं। बिटोरनो कम ना रहले , बाथरूम जा के पाँचो अंगुरी पानी में डुबा के गोड़ पो छिरिक लेलन। असहीं गोड़ धोवाला जाके निमन तरी गोड़ धोके आईं। बिटोरन भुनभुनात फिर गइलन आ खीसी पुरा बल्टी के पानी गोड़ पो उझिल लेलन।आज मलकिनिओ खुश रहली। दू किलो दूध फारके छेना के सब्जी , पूड़ी आ पोलाव बनवले रही। बिटोरन के रसोई के सुगंध से मन गदगद हो गइल रहे। दूगो थरिया में खाना परोस के मलकिनी ले अइली आ बिटोरन से कहली, सुनी आज खाना खाये से पहिले एगो शर्त बा । जल्दी जल्दी बताव का शर्त बा बड़ी जोर से भूख लागल बा, बटोरन पनीर के सब्जी में फूंक मारत कहले।मलकिनी कहली - " पेंशन के पइसा आइल बा जे हम कहब से होई जे खाना खा के पहिले उठी ऊहे बरत धोई " बिटोरन खुशी खुशी शर्त के मान लेलन, उ त जानत रहन कि मलकिनी जल्दी जल्दी खा लेली आ उनका खाये में बहुत देर लागेला। काहें से कि खाते खाते बंवारा हाथ से नेटवो चलावेलन, मने मने खुश भइलन कि एह में कवन दिक्कत बा, आज आराम से नेट से भेंट होई । बाकी उनका ई पता ना रहे कि मलकिनियो नहला पो दहला बाड़ी, पहिल हीं पूड़ी पनीर चिखे में भर थरिया खिंच लेले बाड़ी। सुबहे बिना नाश्ता कइले निकल गइल रहलें। लौट के बारह बजे अइलें त बड़ा भूख लागल रहे। मलकिनी खाना देके इ शर्त रख देली कि " जे जल्दी खाई उ बरतन धोई " बिटोरनो शर्त मान लेहलें। उनका ना पता रहे कि उनकर पेट भरल बा। एहसे दुनो परानी धीरे धीरे मिचिरावे लागल लो। आधा घंटा हो गइल बाकी केहुके पुरहर कौर अंदर ना गइल। बिटोरन के भूख चरम सीमा पो रहे आ खाना सोझा रहे बाकि बरतन धोये के डर से भूख दबा के रखले रहलें। जब बरदास ना भइल त कहलें-
काहें टुंगियावत बाड़ू, पेट बुझाता भरल
हमरा अइसन लागे जइसे अंतड़ी जाता जरल
अब ना अइसन शर्त लगाइब ना आपा हम खोइब
खात बानी हम जल्दी जल्दी हमहीं बरतन धोइब
बाकि तनिका ई बतलाव के इ गुल खिलवले बा
तू त हउ दिमाग से पैदल राह ई के देखलवले बा
हँसके बोलली प्रान पियारी फेसबुक से यारी बा
ह केहू रसिक नाम के उहे अकिल बतवले बा
अइसन नोक झोंक मरद मेहरारू में रोज रोज चलत रहे। कभी बिटोरन उसका देत रहन त कभी उनकर मल किनी बाकी कभी घर में किली ना नोकात रहे, साँझ होत होत सभ ममिला सुलझ जात रहे। बिटोरन के मेहरारू एकदम सोझबक रही, एक बे के बात ह जब लोग जवान रहे। बिटोरन नोकरी से जब घरे अइलन त मलकिनी उनका के देखके घूघ तान लेली आ आँगन में पटिहाठ बिछाके ओह पो एगो चदर डाल देहली। फिर अपना लइका से कहली, रे बबुआ बाबूजी से कह दे बइठे के, तले पानी लेके आवत बानी। पानी खाटी के आगे तिपाई पोे रख देली आ आँचर दूनो हाथ से पकड़ के पाँच बेर गोड़ लगली। चूँकि लइकवो माई के लूगा पकड़के संगे रहे एहसे बिटोरन मलकिनी से छेड़खानी ना कइलन। पानी देके मलकिनी घर में घुस गइली आ केवाड़ी के ओट से बतियावे लगली।सामाचार पूछे से पहिले अपना लइका से कहली , ए बबुआ पूछ त अब कहिया जायेके बा बाहारा । मलकिनी के बात सुनके त हँसी आवत होई बाकी उनका पूछे में उनकर दर्द छलकत रहे। पड़ोस में रहेवाला चहेटुआ दिल्ली एगो कंपनी में काम करत रहे आ आच्छा खासा पइसा कमात रहे, ओकरे कमिनी से ओकर बाबूजी पक्का के घर बना लेले रहन । फिर चहेटुआ के बियाह हो गइल। नोकरी के नाम पो तिलक दहेज भी बाबूजी अइँठ लेले रहन (हम दहेज के बिरोध करत बानी) , बियाह के बाद चहेटुआ दिल्ली ना गइल जब ओकर बाबूजी नोकरी पो जायेके कहस त कवनो ना कवनो बहाना बनाके महटिया जाय । बाबूजी बात के समझ गइलन फिर पूछल छोड़ देलन । आज चहेटुआ दिहाड़ी मजदूरी करत बा । ओहुमें कबो कबो काम ना मिले त छुछहीं हाथे लौट आवत रहे। गाँव मे लहेंड़वन के संगत मे परके पहिले त चुपे चोरी बाकी अब परगट पिये लागल बा आ जवना मेहरारू के रूप जाल में फंसके नोकरी छोड़ देले रहे , पी के अइला पो ओही मेहरारू खूब लतियावत बा। बिटोरन के घरे अइला पो उनकर मलकिनियो के मन में डर समा गइल कि कहीं इहो त नोकरिया ना छोड़ देलन। बाकी ऊ अच्छी तरह से जानत रही कि बिटोरन अइसन ना करीहें। शादी के बारह बरीस हो गइल आ दस बरीस के लइको बा। बिटोरन नोकरी छोड़के ना अइहें। बाकी जेकरा से जादा प्यार रहेला नु ओकरा बारे में आदमी उल्टा ही सोचेला। इहे हाल बिटोरन बो के रहे।एने बिटोरन भर रहता इहे सोचत आवत रहन कि घरे जाके सबसे पहिले मलकिनिया के अंकवारी में भर लेब, बाकि जब देखलन कि मलकिनिया त लइकवे के अंकवारी में सटल बिया त चढ़ल भड़ेसर उतर गइल। एक दिन बिटोरन बो के भाई आइल रहे त दोकान से ताजा ताजा जिलेबी मंगाके भाई के सोझा रख देली आ पुछली, " ए बाचावा अभिये भेंट क लीं कि पानी पियला के बाद। तोरा जवन मन करे तवन कर हम कुछो ना कहब। फिर का झट से भाई के गोड़ पकड़ के हिटोरन बो राग ध के भेंट करे लगली।भेंट करे में अपना घर के हाल चाल बता देली फिर मैका के हाल-चाल पूछ लेली।बीच- बीच में भाई उनका सवाल के जबाबो दे देत रहे। बाचावा रे बाचावा जिनिगी के बोझ ना सहात बा रे बाचावा। भाई : का हो गइल काहें उदास बाड़िस? गइले कमाए दिल्ली चिठ्ठियो ना भेजेलन, रही रही मन हुटहुटात बा रे बाचावा। भेजले रहन रूपेया जवन सभ खउराये लागल, केनियो से आमद नइखे लउकत रे बाचावा। भाई: फिर अगिला महीना भेज दिहन चिंता मत कर। कह आपन हाल चाल कइसे बड़ तोहार लाल, कइसन बाड़े बाबूजी आ माई रे बाचावा। भाई : सभे ठीक बा । चाचा के चुनवटी में काजर पार के धइले रहीं, बड़ुए कि खतम होई गइल बा रे बाचावा। भाई : अभी बहुत बा। सखी हमार आइल रही भाई के बियाहावा में, बाड़ी अबहीं इहँवे कि गइली रे बाचावा। भाई: ना अभी नइखी गइल। एक दिन बिटोरन बो कहली - ए जी हमरो के दिल्ली ले ना चलीं। बिटोरन कहलन कि एगो शर्त पो , आ ऊ शर्त इ बा कि केहु तोहरा नइहर के लउकी त तु फुका फारके भेंट ना करबु। कइसे ना करब जी माया नू फाटे लागेला। अब तक से बिटोरन बो दिल्ली के दुआर ना देखली। अाज बिटोरन नोकरी से रिटायर हो गइल बाड़न आ जवना लइका के मलकिनी पेट में सटले रहत रही ऊ आपन मेहरारू लेके दिल्ली चल गइल बा। घर में अकेले दुनो बेकती रहत बा। अपना मलकिनी के बिटोरन कबो उदास ना देखल चाहस, एह से रोज कुछ ना कुछ मजाक करत रहेलन। मलकिनी जब तक ले ना हँसेली तब तक ऊ हँसावे के कोशिश करेलन । दू दिन से मलकिनी उदास रही। कतनो कोशिश कइला पो उनकर उदासी ना गइल रहे त बिटोरन आपन दोस्त रसिक के साथ बात करके ई आइडिया निकललन। पास बुक में त कहिये चढ़ गइल रहे पीएफ के पइसा बाकि मलकिनी खतिर नाटक करे के परल आ खुद के अपने से हरवलन। आज मलकिनी खुश बाड़ी अपना जीत पर आ बिटोरन के मन में संतोष बा अपना आइडिया के पूरा होखत देख के।
कन्हैया प्रसाद रसिक
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