Friday, 27 September 2019

भोजपुरी दोहा




मन में भरल बिभेद बा, चतुरानन चौपाल ।
भेड़िया लउके शेर जस, ओढ़ झूठ के खाल ।।

का सूतल का जागरन, जब कइले मदपान।
कहाँ ज्ञान हमरा नियन, कहाँ सरिस रसखान?

माहुर मीठ जुबान के, समुझे कहवाँ लोग ।
छैल छबीली पातकी, मिलन बढ़ाये रोग ।।

दो पइसा संतोख के , रसिक चबावस पान ।
शीश महल में स्वान के, भउँकत निकसे प्रान ।।


ना होला ऊ मतलबी , जेकर दिल में राम
वैसे सज्जन को सदा , नित उठ करीं प्रणाम

होना जिन्दादिल सदा , गम को गोली मार ।
आज बनालो आपनो , कल की फिकिर बिसार ।।

बिथा सतावे रामजी , कवनि गति उध्दार ।
अँखिगर आन्हर हो गइल, चतुर्मास के मार ।।

जिनिगी दोजख में परल , सूझत नइखे राह ।
रतना गइली मायका , के करिहें परवाह ।।

भकसावन रतिया लगे , करिया मेघ अकास ।
तन के सगरो ठौर बा , मन के कहाँ निवास ?

पुतरी बइठलि भामिनी, डाढ पात सिहराय।
झिंगुर धुनि कंगन लगे, हियरे आस थिराय।।

चोट परे जब मूल पर , बल भुजंग बढ़ जाय ।
पलखत पा के जीव तब , छप्पर पर चढ़ जाय ।।

आपहुँ मरो बिलाय जग , खुले तिपथ का द्वार।
सुगना उड़े अकाश में , धरती पर सुख सार ।।

नदिया उफनत वेग से , ता में शव उतराय ।
शव से जब शिव मीलिहें , जड़ चेतन बिलगाय ।।

नोटा कोटा ले गइल , पानी परल पथार ।
भरल डाँठ बा अन्न से , बदबू भरल बधार ।।

******* 10

मन के बान्हन तूरिहें, सबद रूप भगवान।
इहे मंत्र के देशना , कहले सिद्ध सुजान।।

नीमन दिन के आस में, दिन-दिन दूबर गात ।
आगत के जनिते पिया, बनल रहित अहिवात ।।

राम नाम के जपन से , बानी बिख बिलगाय ।
मन से बानी कर्म से, किरपिन लेख मिटाय ।।

सतवादी बइठल रहस , कुलटा करसि किलोल ।
इहे रीति कलिकाल के, व्यर्थ बजावत लोल ।।

आतम नदिया प्रेम के, सरस सोत भगवंत ।
चौकस चौपट अस लगे, बुड़बक लागे संत ।।

जाड़ ना लागे सैंया के, जोग करीं बहु ढंग
टाट बिछौना खाट पर , गाँती गरवा अंग

राम नाम के जाप से , बानी बिख बिलगाय ।
मनसा वाचा कर्मणा , किरपिन लेख मिटाय ।।

प्रेम पयोधि आतमा , सोत मिले भगवंत ।
चउपट चौकस सा लगे , बुड़बक लागे संत ।।

सतवादी बइठल रहस , कुलटा करे किलोल ।
कलियुग के ई रीति हऽ , लोग बजावे लोल ।।

मन में हीं रखना सदा , अपने मन की बात ।
लोग कसेगें फब्तियाँ , कर दिल पर आघात ।।

********* 20

मन को तारे मंत्र है , शब्द रूप भगवान
अपनी-अपनी देशना , कहते सदा सुजान

जभो जभो परिवार के , पात पात लहराय ।
बूढ़ा बरगद छाँह तर , सभके मन हरसाय ।।

सभके जिनिगी राम जी , बढत रहे सद्भाव ।
इरिखा दोख दरख्त का , गड़े न भुइयाँ पाँव।।

पत्नी पूत परेम के , होय परस्पर मान।
सन्मति हो परिवार में , अपनापन के भान।।

प्रेम हाथ अमरित कलश , पीयत चढ़े खुमार
आपन सुधि बिसराय के , प्रीतम के गर हार

चलनी के चालल सभे , झटकरले बा सूप ।
केहू नइखे छोटहन , सबहिन बाटे भूप ।।

सिधवा करे त पाप बा , दुष्ट दिखावे राह।
पद पावर पइसा कहे , हमरे होई चाह।।

गैरों का चुंबन गरल , बेलन मार पसंद ।
अपनी बीबी कर्कशा , फिर भी सेहतमंद ।।

नैतिकता के बात पऽ , सइ-सइगो उपदेस
संस्कार जोहत फिरीं , गइल बिबेक बिदेस

प्यारी दीदी अंजुला, बारंबार प्रणाम ।
सौ बरसों तक जिन्दगी, करे नहीं विश्राम ।।

********* 30

गंगा मइया के शरण , आइल बानी आज ।
पुत्र पहरुआ हो सदा , सेवा केवल काज ।।

स्वारथ में सभ चल गइल , तन मन के अरमान ।
सोचल हमरो ना भइल , बचवन के उत्थान ।।

संग सखी सुख हो अधिक , बिछुड़त टूटे शाख ।
विरह व्यथा पल-पल रहे , बसंत लगे बैसाख ।।

हरपल पति पर जो तनी , वह पत्नी आदर्श।
मीठी वाणी बोल के , खाली कर दे पर्श।।

रिश्तों में रस तब मिले , जब हो प्रेम प्रगाढ़ ।
जिनिगी बीते जश्न में , जेठ भी लगे आषाढ़ ।।

शिक्षा उत्तम है वही , मिले ज्ञान का सार ।
जिसकी सीमा पेट तक , वह शिक्षा बेकार ।।

शिक्षा जीवन में सही , कर दे जो उपकार ।
शिक्षा बने विलासिता , मन पर करे प्रहार ।।

मोल नहीं उस सीख का , करे सदा उत्पात ।
कर्कश वाणी कान में , करे हृदय आघात ।।

रसना में रस हो सदा , मुख पर हो मुस्कान ।
अंतस में सरिता बहे , कोई नहीं अजान ।।

शिक्षा नाम न योग्यता , जो कागज बंध जाय ।
असली शिक्षा है सही , गिरते गले लगाय ।।

******** 40

रसिक रसायन देत है , जिह्वा लियो लगाय ।
सार्थक शब्द सुनाय के , मंद मंद मुस्काय ।।

सार्थक शब्द सुनाय के , सभके मन बस जाय ।
घिरिना घट से दूर कर , बंशी चैन बजाय ।।

बुद्धि में खलबली मचल , टूटल दिल के तार ।
जीव पड़ल बा फेर में , खोज रहल बा प्यार ।।

मन निवास बा गाँव में , पिया बसे परदेस ।
गँवई माटी नीक बा , काहें कहीं भदेस ।।

फूल मूल बा धूल में , गंध उड़े असमान ।
बबुआजी परदेश में , अँचरे माई जान ।।

पंच तत्व बा गाँव में , बसे पारखी दूर ।
मूलबंध के शोध से , उर्जा हो भरपूर ।।

मन के सोंच सुवास बा , तन ना करी आघात।
कमल कीच के ना छुवे , बा अचरज के बात ।।

गाँव गाईं शोर बा , घुरहू के घर राम ।
के बा अइसन शहर में , जे चहुँपल बा धाम ।।

संग-संग दोनों पले, अश्रु और मुस्कान।
एक हरे जीवन थकन, एक ईश वरदान।।

निर्मल जल-सी जिंदगी, अलग रूप आस्वाद।
मिश्री के रस में मधुर, माहुर में अवसाद।।

********50

तन के चरफर ठीक बा , मन पो लगे लगाम ।
सुखिया के घर सांत बा , दुखिया घर कुहराम ।।

सभके मन हरियर रहे , मंगल होय बिहान ।
मन के दुविधा दूर हो , लोग बने इंसान ।।

अहंकार पर्वत बड़ा , तारो हे गोपाल ।
निर्मल उच्च विचार का , मन आये भूचाल ।।

हम कहनीं त झूठ बड़ , राउर कथनीं साँच।
हमता के तोसन बदे , इचिको लगे न आँच।।

बा बिबेक बनगोंइठी , आसमान में दंभ।
तन के सत्ता साँच बा , इहे गड़ी मलखंभ।।

उज्जर धपधप वस्त्र बा , मन कारिख भँड़सार।
लंपट लठधर संग में , चहुँदिसि जय जयकार।।

चापलूस पीछे पड़ल , चाँपे अनघा अन्न।
अरकठिया के भाग में , उहे कसैला कन्न।।

सरग-तरैयन तूरि के , आन दिहें महराज।
कवन परोजन कष्ट के , परल खुजाईं खाज।।

सागर मथले पा रतन , मगज मथाई ज्ञान ।
धनतेरस शुभ कामना , बने सभे धनवान ।।

कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी , नरकासुर संधान ।
मुक्त करवले भामिनी , चकधारी भगवान ।।

*******60

काहें के चिंता करीं , जब मस्ती बा साथ ।
पर के चिंता छोड़के , पकड़ीं प्रभु के हाथ ।।

धर्म की धुरी प्रेम है , नफरत मन से टाल ।
मानवता को पुष्ट कर , उन्नत करो कपाल ।।

मास नवंबर सुखद हो , रखना गरम लिबास ।
साठा पाठा मत बनें , मन में रहे उजास ।।

रहना इसी जहान में , होना नहीं उदास ।
देख धरा के रूप को , ना करना उपहास ।।

मन मतवाला भृंग का , कली कली मँडराय ।
उत्पल अंक प्रवास कर , मंद मंद मुस्काय ।।

सबका मालिक एक है, अलग-अलग इंसान ।
कोई कपटी क्रूर है , कोई संत समान ।।

रावण रावण सब करे , रावण रूप हजार ।
सबके अंदर पैठ कर , रावण करे प्रहार ।।

आँख कान पट खोल दीं , मुँह के बंद कपाट ।
काने अंगुर डाल के , लोरकी गाईं खाट ।।


ब्रह्भचारिणी माँ करे , सब जन का कल्याण ।
औघड़ दानी के प्रिया , होखे मगज बिहान ।।

अइली माई गगन से , धइली धरती पाँव ।
शैलसुता के नाम से , पूजल जाली गाँव ।।

********70

चंद्रघंटा माई के , मणिपूरक बा वास ।
सिंह वाहिनी मात दे , दिव्य घोष अहसास ।।

माई के दरबार में , सभी तरह के लोग।
कोई माँगे बाहुबल , कोई सरबस भोग ।।

सूक्ष्म रूप स्वीकारिये, मन में रहे निवास ।
तन तुरंत दौड़े भले , मन अविचल का आस ।।

नव द्वारे को कर नमन , दसवाँ पुंज प्रकाश ।
ताहि द्वार से अंत में , सुगना उड़े आकाश ।।

खरा बात बोले सभी , खरा न सूने कोय ।
शब्द बान लागे हिया , आपा जल्दी खोय ।।

आमद बोली खर्च से , तेरी क्या औकात ।
मैं सूरज की रोशनी , तू अमावसी रात ।।

पूजा होत समाज में , डंका बाजे नाम ।
खर्च करे तबहीं बढ़े , आमद सुबहो शाम ।।

माया ममता छोड़ के, राधे राधे बोल ।
महाकाल के द्वार पर , दिल दरवाजा खोल ।।

सभ कुरसी के खेल बा , आन्हर लंगड़ यार ।
आफत में सभ साथ बा, बिल्ली कुकुर सियार ।।

राम मड़इया राम के , पुरहर बा संतोख।
ऊँच अटारी का कहीं , लउके खाली चोख ।।

**********80

खोजत खोजत राम के, खोंखड़ भइल शरीर ।
मन के खोंखा साफ ना , बढ़ल अंत में पीर ।।

साफ करत अनकर चुनर, खुद में हमता-दाग।
सभ गइले पूरब दिशा , हम रहनीं हतभाग ।।

मलय परस अनमोल बा , बिखधर आसन खास।
सज्जन नेक सुभाव से , दुजन लगाये आस ।।

शूल भरल सत के डगर, जबर जिगरिया जाय ।
जेकर हिरदय पुलपुला, छाहाँ परि पछिताय।।

उरझि परल भँवजाल में, चक्करघिन्नी प्रान।
दरस-परस झटकनि लगे, बिजुरी देह बितान।।

अंध गली की दौड़ में, जीवन हर पग प्रश्न।
छोड़ वांछना द्रव्य की, चलो मनाएँ जश्न।।

सभकर आशा लालसा, उहई खासमखास।
सजनी भर धरती रमस, उनुके संग हुलास।।

बिन आँजे काजर-कुजर, साँवरि चंचल नैन।
सखी कटारी का करी, चुनि-चुनि मारत सैन।

सभके चुनरी दाग बा , राउर चुनरी पाक ।
बंद तिजोरी माल बा , रउआ घर में फाँक ।।

दुनिया में सभ बा दुखी, आपन दुख पवनार ।
दु पइसा क लाई में , जगती सुख भरमार ।।

********90

देखल छोड़ द आन के , पइबऽ अद्भुत ज्ञान ।
खाली कर बिन गाँठ के, छोड़े सभी जहान ।।

दो कौपीन फकीर के , शहंशाह शरमाय ।
हीरा भरल सनूख के , झटके में ठुकराय ।।

गठरी रही जमीन पर , करनी जाई साथ ।
प्रेम क पोथी पाठ कर , रसिक नवावे माथ ।।

सभके उनुकर आस बा , ऊहे बाड़ी खास ।
धरती पर ऊहे रमस , उनुके संगत हास ।।

मंगलमय शुभकामना , सबका सुखद बिहान ।
रसिक बधाई लोहड़ी , खिचड़ी के सनमान ।।

मन के निरधन लोग बा , बोलत खरचे शब्द।
समय शाप सर पर चढ़े , दौलत उछले अब्द।।

इज्जत गइल बधार में , दगलस तन बड़बोल ।
नकली शेर दहाड़ के , बचा न पवलसि खोल ।।

खइलस फसल क खेत तब , झरगा कइलसि बाढ़ ।
दाँत तरे इकिड़ा पड़ल , लगल चिलाये दाढ़ ।।

पति में सबकुछ मिल गया , मालिक सेवादार ।
पूरा पैसा सौंप दे , फिर भी करज उधार ।।

भोरे भोर भुलइह जन , ए भइया भगवान।
सुभग सोच संदेश से , समहुत करऽ बिहान ।।

*******100

तन पर लागल चोट सभ , कुछ दिन में भर जाय ।
मन पर लागल चोट के , बाटे कवन उपाय ?

अद्भुत होला प्रेम रस , पियें ठूँठ हरियाय ।
मरणासन पर रामजी, मंद मंद मुस्काय ।।

चुगली चाकर चाकरी , पावत मन हरसाय।
दो कौड़ी के आदमी , पानी कनक चढ़ाय ।।

पाड़ा बनले जाड़ में , चतुरी के मति मंद ।
पाचन किरिया तेज बा , जाँचन किरिया बंद ।।

सेवा भाव सिखाइये , उत्तम बने समाज ।
पैसा तो दोयम रहे , प्रथम रहे गृहकाज ।।

उड़नपरी हँसके कहे , क्या लेंगे श्रीमान।
घर में आके मात से , खा मत मेरी जान ।।

सब पैसे का खेल है , करे दिखावा रोज ।
घर का खाना तुच्छ है , पिज्जा हट में भोज ।।

किसकी हम गलती कहें , यक्ष प्रश्न दुहराय ।
सोचो समझो बात को , रसिक पूछ शरमाय ।।

सेवा में सुख निहित है , चकमक के दिन चार ।
चाल समय पहचानिये , वक्त न मिले उधार ।।

शब्द कभी होता नहीं, उत्तम और निकृष्ट।
मन के भाव उकेरता , अपने अंदर पृष्ठ ।।

********110

प्रतिहारी होता नहीं , सत्ता प्रेम अखंड।
मैं हीं मैं दूजा नहीं , चाहे कष्ट प्रचंड ।।

हेरा-फेरी छोड़के , बदलो अपना भाव ।
पाप पुण्य देहज नहीं , ऊँचे जरे अलाव ।।

दो कौड़ी के आदमी , बात करे उधियान ।
दंतहीन रूखा वचन , खाय मगहिया पान ।।

जेकरा उपर दंभ बा , पल-भर क मेहमान ।
उड़ल चिरँइया शाख से , उज्जर वसन वितान ।।

जीयत मुर्गा बांग दे , मरे होत चटखार ।
पंथ पुजारी पादरी , पल पल करे पुकार ।।

चरवाहन के झुंड में , पोथी के उपहास ।
दिनकर बदरी में छिपे , करिया बादर खास ।।

अंजर-पंजर ढ़ील बा , सूखा परल जुबान ।
खंजड़ी खाला घर बजे , मुँह खोले मेहमान ।।

भावुक मन सौगात में , बाबूजी के प्यार ।
धरती से हरपल जुड़ल , हाउअन हमरो यार ।।

हेरा-फेरी का करे, पलछिन दक्षिण बाम ।
पाप-पुण्य देहज नहीं , मन की गति अविराम।।

व्यर्थ कइल बा चाकरी , पोंछ हिलावे जान।
हईं दुलरुआ नागरिक , मुफुती धन के ज्ञान ।।

*********120

शंकर ब्रह्म समान भये , अनलहक मंसूर ।
जे भी चहुँपल पास में, उनुकर बदलल सुर ।।

भल अनभल के भेद से , उपजल दुरजन पंथ ।
खेद लबेद जबेद के , माने असली ग्रंथ ।।

चंचल मन को थिर करे , चर्चा प्रभु श्रीराम ।
जहाँ जुटे गुणवंत जन , वहीं मिले विश्राम ।।

राम राम के बेरा में , सभके जय श्रीराम ।
सीता माता सुमिरि के , प्रभु के आईं काम ।।

मन में जब श्रीराम हों , भल अनभल बेकार ।
पूर्ण समर्पण से सदा , होता है उपकार ।।

चतुरई के चक्कर में , घरे घरे छिछिआस ।
आपन घरवा फूँक के , आन बुझावस प्यास ।।

सभके एके हाल बा , का वक्ता का मौन ।
तिरिया के तिरशूल से , कहवाँ बाँचल कौन?

नखरा धमकी धाक से , केहु न बाँचल यार ।
नरपुंगव नरके गमन , नार उतारे पार ।।

जेकरा मन में पाप बा , कइसे उतरी पार।
करि कदोर मन के अमल, मुक्त करावे नार ।।

एकरे के तिरिया चरित , कहलें लोग सुजान ।
रसिक टहलुआ नार के , कहीं सहित अभिमान ।।

*********130

धेला मेला में गइल , सांसत परल परान ।
राम दुआरी जे रहल , उनुके मुख मुस्कान ।।


मधुरी बानी बोलके, पइठीं हिय का पास।
धुर बैरी पँजरे रही , अइसन दिढ़ बिसवास ।।

जात-पाँत के ओट में, धूमिल होत बिबेक ।
मनुआँ सभसे ऊपरी, दोसर राह न नेक ।।

खोट निकालि सरेख में, ऊँचा कइले माथ ।
खुद बैरी खुद के बने, का दोसी रघुनाथ?

हमरे पूत सरेख बा , अनकर गोबर लीप ।
मेहराइल काठी जदि, का उजिअइहें दीप ।।

मन के मइल निकाल के , रसिक बजावे थाल ।
पूरनाहुत होई तभी , आपन आहुति डाल ।।









Thursday, 26 September 2019

सवैया

1
मोर पिया परदेश बसे घर घात लगाय लखे हुरियारा
मैं तरुनी तपलीन हिया खल खैंचत बान चले बरियारा
गात सघात बयार करे रितु घातक मास लगे भठियारा
हेह दिना यदि कंत नदारत धाय वसंत चढ़े मुड़ियारा

2
झूठ परोसत सान बढ़े त अकास मधे चरखा चलवाईं।
खेतन में अवनी असमान समुंदर पैप सदा डलवाईं।
भोजन ला जब सोर मचे तब काक-कुमार मुड़ेर बिठाईं।
आन्हर आँख गुड़ेर कहे छन में सभ काम कठोर कराईं।

3
कंत बसंत अनंत कथा सजनी रजनी
बनि गैल बिघाती।
अंग अनंग करे नखरा तन होखत बा सरकंड सँघाती।
डाल हिँडोल लली सुकली लखि देह बने पुरईन क पाती।
काँपत नार समेटत आँचर ओट करी उसुकावस बाती।

4
एक बिसातिन औसरि पा बृखभानु सुता गृह जा सकराहें।
साजि समान सुहागिन के बिछिया बिनुली कजरा करियाहें।
बूझत हाल सनेह सने सुर नैन नचा इचि रूप सराहें।
जानि क कान्ह क भेद अहीरनि हाथ करेज निकासत आहें।

5
साँवर रूप अनूप छटा लखि बान प्रसून चुभे हियरे में।
धा ललिता घर भीतर जा कहली चुरिहारिन हौ नियरे में।
नाकि क कील कटाह लगे गर मोतिनहार गड़े हियरे में।
मंथर चाल चले कटि खीन जनी गदरी निखरी उपरे में।

6

आँखि न मानस बाग सखी भटकी चलि जास सुदूर कहीं।
प्रांतर में बन के छिति छोर प धार नदी अथवा कतहीं।
फागुन के सभ रंग दिखे न दिखे हरिजी अलगे लगहीं।
ए बिधना अब एक उपाय कि देह तपा बन माँझ दहीं।
~ रसिक ~

# बाग = लगाम, बागडोर
छिति = क्षितिज
दहीं = जर जाईं

7

आँखिन नीन रहे गहिरी सखि भागल हा पियवा भिनुसारे।
देखत का रहलीं सपना बिलखीं बन माँझ फिरीं अकसारे ।
जोहत देहि प राखि चढ़े सभ बन्धु मिता दृग फेरि बिसारे।
खोजत ही रहलीं बहरी लिहतीं लखि आँतर की तिरिसा रे ।

8

कंत नहीं घर फागुन में असबाब लगे जस काँट बिछौना ।
मैं बिरही अखड़ेर मरूँ अरु गात भयी सलगा घट पौना



रूप बिसातिन देख

बृषभान लली लट खोल चली मध मारग श्याम मिले इतरे
बरसात क रात भयावन है यमुना जल वेग चले भितरे
ललिता कमला मटकाय चली कटि देख लली जर जा गतरे
सच श्याम बसे दिल मध्य सखी पर पूछत श्याम गये कत रे ।




सबरी चुन बेर रखी अगते सिरिराम लला अब भोग लगाईं



गरमी नरमी बरते न कभी तन ताप बढ़े नित जौ भ आगे


संचित आब पताल गया पशु पंछिन मानव 

अंजन चालीसा


शिव शक्ति के शरण में , अंजन गाथा गान ।
अमही बाँके गाँव के , भइलें पूत सुजान ।।

राधा मोहन चौबेजी के ।
पुष्प चढ़ाईं नीके नीके ।। 1।।
लोग सहेजीं अंजन थाती ।
अलख जगाईं होत पराती ।।2 ।।
गुड़ के भेली सरस सनेसा ।
दिव्य जोति के जाने देसा ।। 3 ।।
परमानंद मिले अमही में ।
जस पकवान बनल बा घी में ।। 4।।
मातृ शक्ति वंदन हर बारा ।
दे असीस हरखित बहुबारा ।।5 ।।
पूत पिता के पैर पखारे ।
भविता होत सदा उजियारे ।। 6 ।।
धरती उरवर सरस रसायन ।
हरपल जिनिगी हो मनसायन।। 7 ।।
भाखा भूमिक भवन भिखारी ।
शिथिल होत बढ़िहें दुख भारी ।। 8 ।।
चंचल चित्त न करहुँ तिवारी ।
चंदन चाब चना गुणकारी ।। 9 ।।
मधुरी बानी मेल करावे ।
अन परिचित के गले लगावे ।। 10 ।।

आस्था केन्द्रम सीस नवाईं ।
भाखा के सनमान बताईं ।। 11 ।।
दिव्य पुरुख के उत्तम बानी ।
राह दिखावे गुरुबल ज्ञानी ।। 12 ।।
नेह छोह पावे मिलला पर ।
परसे गंध पुहुप खिलला पर ।। 13 ।।
जोत बढ़ावे आँख क अंजन ।
ताज कवि भोजपुरिया अंजन ।। 14 ।।
तारागण में धुरुब समाना ।
कवि अंजन लख मन हरसाना ।। 15 ।।
प्रेम पारखी अद्भुत बानी ।
हँसमुख मुख मकरंद निशानी ।।16।।
वेद शास्त्र सिद्धांत विशारद ।
धवल चरित जस चमके पारद ।। 17 ।।
बा अफसोस दरस ना पवनी ।
सूक्ष्म रूप विस्तारित अवनी ।।18 ।।
पूत परस्पर प्रेम अगाधा ।
हरऽ नाथ उनुकर भव बाधा।। 19 ।।
सेवक जननी जनक दुलारा।
संस्कार ससरे संसारा ।। 20 ।।

धरा धूर के सीस चढ़ाईं ।
दिव्य शक्ति के पास बुलाईं ।। 21 ।।
वीणापाणी कर माथा पर ।
मुँह से निकसे ममता के स्वर ।। 22 ।।
बात बात में वेद बखाना ।
सादा जीवन बड़ बेख्याना ।। 23 ।।
राधा मोहन स्वयं सरूपा ।
उलिचत प्रेम प्रसंग अनूपा ।। 24 ।।
सगुन ब्रह्भ निरगुनिया गायन ।
शब्द लगे सुन्दर मनसायन ।। 25 ।।
ज्ञान क गगरी छलकत जाये ।
श्रोता सुनत अमर फल पाये ।। 26 ।।
तिसना तुच्छ तलैया भागे ।
भल संतोख सुहागिन लागे ।।27 ।।
ज्ञानवंत सिर तान उताना ।
ऊ रावरि प्रतिभा पहिचाना।। 28 ।।
रसिक नवांकुर जोरे पाणी।
सिद्ध करहुँ मम निर्मल वाणी ।। 29 ।।
रस के धनिक धुरंधर नायक ।
राउर गीत सदा मन लायक ।। 30 ।।

पुरुख एक अरु रूप अनेका ।
साधक सेवक सिद्ध भभूका ।। 31 ।।
रचना संतन के सुखकारी ।
पढ़त मिटाये दुविधा सारी ।। 32 ।।
उर के अंदर प्रेम अगाधा ।
भेंटत मिट जाये मन बाधा ।। 33 ।।
तात धरीछन गुरुवर राउर ।
मन उपजल कबहुँ ना बाउर।। 34 ।।
कुशल पारखी लछुमन पाठक ।
राधा मोहन अद्भुत साधक ।।35 ।।
जय जगदीश चंद्र माथुर की ।
अंजन नाम किन्ह कविवर की ।। 36 ।।
अमही बाँके जय जय ग्रामा ।
अंजन किरिति चले अविरामा ।। 37 ।।
प्रभावती देवी पद वंदन ।
शक्ति स्रोत माने कवि अंजन ।। 38 ।।
प्रेम सुमन रउआ के अरपित ।
जिनिगी भर हम रहब समरपित ।। 39 ।।
हे योगी ! साहित्य पुजारी ।
राउर रचना समय सँवारी ।। 40 ।।

नेह पुष्प अरपित करे , रसिक नवावे माथ ।
हम राउर सेवक सदा , रउआ श्री रघुनाथ।।







भोजपुरी चर्चा चलल , गाँवा गाईं शोर।
माई भाखा मान से , सबहीं भइल विभोर।।


रउरे बारे में लिखीं , का हमार औकात ।
दीप देखाईं दिन में , ई हमार जज़्बात।।

आस्था केन्द्रम जोस से , चढ़ल विचार विमान।
माटी के परभाव बा , ठूँठा फूँके जान ।।

भोजपुरी के मान ला , जुटले सज्जन ढ़ेर ।
उमगल प्रेम पहाड़ सन , इज्जत भइल घनेर ।।


बल बलराम राम मरजादा ,
सरस कृष्ण जस राउर जीवन ।
मात शारदे जीभ प रहली ,
गमकवली भाखा के उपवन ।।

दुर्गा माई दिव्य कृपा कर,
अद्भुत दृष्टि दान में दिहली ।
पूत के अपना उच्चासन प ,
देखत मन हीं मने बिहँसली ।



भोजपुरी







अँखिया
******
अँखिया मिलावे जब, अँखिया से अँखिया त
मनवा के भावना सँवार देले अँखिया

अँखिया के भाखा सभ , जानेला जहान लोग
कगरी चलेले त उजार देले अँखिया

एकटक सोझा-सोझी, बिलमे जे अँखिया त
दिलवा के दुअरा पुकार देले अँखिया

आँख देख रहिया में , चल जाले अँखिया त
रसिक के झट से लतार देले अँखिया

अँखिया के जोत से अलोत केहू होला त
तकिया के खोल से सवाल करे अँखिया

अचके में चल जाले सभा बिच अँखिया त
महल मोहल्ला में बवाल करे अँखिया

गगरी भ पानी जब गिर जाला आँखि से त
मनवा के गाँठ से निकाल देले अँखिया

तिनका के भार कबो सहे नाहीं आँख बाकी
दिलवा के भार के उछाल देले अँखिया

रसिक


फेसबुकिया रोग
************
जब से हमरा फेसबुकिया रोग लागल बा
तब से जिनिगी तबाह हो गइल बा
पुरा सुनला पो भी आधभेसरे बुझाता
एक दिन के बात ह
मलकिनी कहली
ए जी तनी !
कुकरवा चार गो सीटी मार दी
त बंद क देब
हम छत पो कपड़ा पसारे ज तानी
हमरा बंद क देब
ओसहीं सुनाइल जइसे
द्रोणाचार्य के,
" अश्वत्थामा नाम नरो •••••••• "
सुनाइल रहे
ओह घरी कृष्ण के शंख बाजल रहे
आ "बंद क देब" के पहिले
पोरफाइल के पतरा देखत रहीं
फटाफट मोबाईल हाथ में पकड़ले
आ पोरफाइल पो नजर अटकवले
घर में घूम घूम देखे लगनी
कवन चीज खुलल बा
जेकरा के बंद करेके
मलकिनी कहले बाड़ी
मने मने अगरात रहीं कि
आज मलकिनी के मोका ना मिली
हमरा में छीब काटेके
ना त कतनो निमन काम क दीं
छीब काटे के उनकर आदत रहे
पुरा घर छान मरनी
कवनो चीज खुला ना मिलल
या त ढ़कल रहे भा बंद रहे
हमरा आँखी के सोझा
कुकर चिचिआत रहे
हमरा से कहत रहे
अरे बुड़बक!
हम ही खुला बानी
जल्दी से बंद कर
ना त बकोटा जइबे
बाकि हमरा
कुकर के आवाज
ना सुनाइल
तले देखतिनी
मलकिनीया दउरल आवत बिया
हम पुछ देनी
का खुला बा
जेकरा के बन करेके कहले रहलु
तले उकहलस
तनि आपन मोबाइल दीं त
हम जननी कि
अपना नइहर से
बतियावे खातिर
मोबाईल मांगतिया
बाकि इ का
मोबाइल के त
पटकउआ मोड में चल गइल
बेचारा मोबाईल
आपन बोटी बोटी तुरवा के
टुकुर टुकुर ताकत रहे
आ हमरा के ललकारत रहे
मालिक! आपन मरदानगी दिखाईं
आ दुचार झाप मलकिनी के लगाईं
ललकार सुनके
हमार हाथ त उठल
बाकि तेवर देखते जुड़ गइल
अवरू कुछ पुछे से पहिलहीं
जबाब मिल गइल
इहे खुला रहे हम बन क देनी
आ एफ एम रेडियो शुरू हो गइल
इ मोबाइल ना हमार सौत हिअ
जब देखीं त एही में
लपटाईल रहतानी
जइसे घर में अवरू केहु
हइले नइखे।
हम चुप चाप टुकौर टुकुर
ताकत रहीं कबो मोबाईल के
त कबो मलकिनी के
बात सब समझ में आ गइल
सभ गजटेडई
गोबर में गड़ा गइल
पुरे घर में पता ना चलल कि
दिल जरला के गंध बा कि दाल
चुपचाप रसोई में जाके
कुकर खोलनी त भक मार देलस
पते ना चलल कि एह में
दाल बनत रहे
बिना कहले लाग गइनी
एक घंटा रगड़े में हाथ चढ़ गइल
आज हमार
फौजी वाला हिम्मत के
भरम टूट गइल
फिर से कुकर में दाल रखके
देखावे गइनी
एतना दाल ठीक नु बा
अइसे पुछनी जइसे
जंग के युद्ध बंदी होखीं
जबाब मिलल
सोझा से हटीं ना त••••
समझ गइनी
आज सबहरिये एकादशी व्रत बा
बाकि हम त व्रत ना करेनी
आ हिम्मत नइखे कि
बाजार जाके कुछ खालीं
सभके से निहोरा बा
चार गो समोसा भेजवा दीं हाली
केहुके लागत होखे
कि हमरा के
पढ़े बिना मन ना लागता
त एगो चालिस हजार वाला
हलुक फलुक मोबाइलो
भेजवा दीं
कहें से कि एक महिना
हमरा हिम्मत के
यथास्थान आवे में लाग जाई
तले विदा लेत बाड़े
बाबा रसिक कन्हाई
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~

मायका में भी मलकीनी के चैन नइखे हमेशा शक रहेला कि कहीं हमार पैर त ना बहक गइल, जब हमरा एह बात के पता चलल त चिठ्ठी लिकके उनका के समझावत बानी-
****************
इहाँ के लोगन के बात मत पतिअइह
आ उहाँ के लोगन से मत बतिअइहह
युग जमाना बहुते खराब बा
दोसरा के बढ़ंति देखके सभे तबाह बा
इ मत जनिह कि इहँवा कवनो खराब काम करब
तोहरे खातिर जियत बानी
तोहरे खातिर मरब
कवनो गलती हो जाई त रूसीह मत
तोहरा भीरी आइब त कवनो बात के कोसीह मत
तोहार याद हमरा के बहुते सतावत बा
इहाँ के लोग एने ओने जाये के रास्ता बतावत बा
बाकी तोहार परेम रास्ता रोक देता
पैर बढ़ल चाहे त बीचहीं में टोक देता
जहिया से गइल बाडु घर हीं में रहत बानी
घरहीं में लोगन के ताना बाना सहत बानी
तोहरा जतना दिन मन करे मायका में रह
तोहार छोटकी बहिन कईसन बाडी हालचाल कह
कन्हैया


वृहत विदूषक बोल के , सबका मन हर्षाय ।
रंगमंच के मंच पर , अनगिन थपरी पाय ।।
अनगिन थपरी पाय , ताज कबहूँ ना पाये ।
पटाक्षेप पर हास , कृत्य से शंख बजाये ।।
घंट विडाले बांध , खुश हो रहल बा मूषक ।
शरम हया के त्याग तृप्त हो वृहत विदूषक ।।


मय पांडे लोग मिलके कहलें , चलऽ तिवारी तूरे ऊख
अपने लोग डँडार प बइठल तिवारी चढले बूँट के रूख
चार ठो कुक्कुर खेतिहरवा के, चारो कोना लागल
खर खर खर खर खटाक ! सुनके, तिवारिये देने भागल
आइसो दादा जान बचाव, धाव धाव पाड़े आव
गोली मारों ऊख तुरला के एह कुकुरन से जान बचाव
मय पांड़े लो भाग परइले केहू भिरी ना आइल
अचके एगो गोड़ पकड़लस छावा भइल घावाहिल
कान पकड़लन अब ना करीहें पांडे संगें इयारी
चोरी के चक्कर में गइलन जेहल रसिक तिवारी


चार्जर नइखे पास में, छन छन कर ककुलाय।
मोबलइनी क रोग बा , बहुते मन अकुलाय।।

नेहिया लगाल सिरीराम से सुगनवा

होत भिनुसहरा पराती शुरूआती
मान कर ओकर जे मिलल बा थाती
मेहिया बनाल सिरीराम से सुगनवा ।।

रात निहारे
फुरसत के पल
सुध पिया की

देह के गुर्ही
किसान के करजा
छिछली खेल

स्वयं के साथ
अनंत का सफर
भय से मुक्ति

मुझको आदत लग चुकी है मुफ्त में खाने की।
आदमी हूँ काम का आजमा के देखिये ।।


जिनिगिया ना जाने का का दिखाई ।

जवानी के सपना , बुढ़ापा के थाती
बेयाधि बदन के, सतावे दिन राती
अंदर के खल उदबेगले बा ,
रह रह करे चढ़ाई ।
जिनिगिया ना जाने का का दिखाई ।।


ए बबुआ तूँ दारू छोडऽ

ई पुरखन के थाती ना हऽ
एह से आपन मुँह के मोड़ऽ ।
ए बबुआ तूँ दारू छोडऽ ।।



फीचलु अइसन जोर से , धऽ लेनी खरिहान।
भांड़ भँड़इती छोड़के , पवनी पावन ज्ञान ।।
पवनी पावन ज्ञान , राम में मन अझुराइल।
तन के तुमड़ी तोड़ , तपत तन सुगना आइल।।
अब ना लवटबि फेर , रेघारी अइसन खींचलु ।
तन मन भइल उजास , पाट पर अइसन फीचलु

श्वानन के पाटी बनी , होई आज जुटान ।
पट्टा जेकरा घेंघ में , ओकरे चली शान ।।
ओकरे चली शान , रात में ऊहे जागी ।
सांसत में जब प्रान , बेपुछले सभे भागी ।।
ऊहे चली उतान , सँवारी जे आनन के ।
गुटबंदी परहेज , रही हमनी श्वानन के ।।

घर घुसना घूमत रही , ना दी कवनो ज्ञान ।
जतिया तऽ अपने हवें , लागत नइखे श्वान ।।
लागत नइखे श्वान , हमेशा पोंछ हिलावे ।
मुख नाहीं बिख दंत, अदमी से मुँह चटावे ।।
रसिक नाम अधयच्छ , काम बा हड्डी चुसना
हरदम रही कंगाल , न होई ऊ घर घुसना



नयका के फेर में पुरनका पटुआइल बा,
भेंटल ना नयका पुरनको गइल हाथे से ।
रहे अझुराइल कादो अलोता के लत में ,
सोझा ना भइल कबो सालो भर साथे में ।



दिग्गज पीछे पीछे धावे, नवसिखुआ से अरज लगावे
सावन में जनमल सियार के , भादो लगे भकसावन

डइपरओ भी काम ना आइल
पवन देव झकझोरले,
शंख बजावत बहरी आके
सभके नाक भँभोरले
बनियाजी के नाव जे डूबल
पांडे जी उतरइले
श्रोता लोग अनवाध के मारे
आसन छोड़ परइले

तनी हइहो देखीं -

चाँप फफेली
अगते सतावल
अब ई झेली

आरे बम्मड़!
धर नस पकड़
दे दु तकड़

तोर तसला
छुअब हम काहें
होई नज़ला

ततैया छत्ता
जो जाके लुको हाली
कतो अलोता

जँगला झाँक
बछरुआ के बान्ह
हरही हाँक


मिली मिठाई
छकडल नु जाई
नाक बुड़ाके

पीपर पात

तेज ना होला
दर्पन में सूरज
बुझ रे अज



आदत खराब बाटे , उब काहें भइल बा
दिल के दुआर काहें , आनकेहू गइल बा ।

सुनतानी दोसरा के देख मुसुकात बाड़ऽ


तसला में पानी परी , जब कहिहें जुवराज ।
केहू कोठी के भरे , उनुके सिर पर ताज।।
उनुके सिर पर ताज , बैल बूढ़ा पिठवाही ।
धइलसि बछरू मेंहँ , केहु ना करी मनाही ।।
सोचल सभ बेकार , सुधारी अब के मसला ।
का करिहें श्रीराम , आँच से तलफे तसला ।।

सनेहिया के डोरिया पर के डोरा डाली
बात बनावल छोड़के घरे आजा हाली

पांडे अपना ससुरारी में खइलन खूब मलाई
होत फजीरे लोटा लेके घूमस बीच तराई
जजमनिका से नेवता आइल , अजुए पैर पुजाई
पांडे जी संकट में परले अब के शंख बजाई

अस्सी पर जब झूले कंटा
तब चले भोजपुरिया डंटा
जगह बदलके दिखे जवानी
भउरी में भरवावस पानी
लोग कहेला असिआइल बा
ताजा नइखे बसिआइल बा
बाबा के बल बुद्धि बाटे
देख तजुरबा लोगवा साटे
छूँछे नइखे बा भरपूर
बाबावा के बा बड़ा गरूर
नयका नवही कमर हिलावे
बाबावा अँखिये से बतियावे
दाँत नदारत तालू चोखा
कलम दिखावे रंग अनोखा
रसना रसिक क झूठ न बोले
सभके दिल दरवाजा खोले

कहऽत कहऽत कंठ झुराइल कहल न मानल कोई ।
विधना के जब चलल कुठारी सभे देत दिलजोई ।।

रूप जाल में भूप भरमले , भल भामा भुनसारी।
भजन भुलाइल भाँड़न सङ्हे , टूटल रब से यारी ।।

सोझा जब परतोख दिआइल , पल में पुहुप फुलाइल ।
भोगी से योगी बन गइले , अछर साथ जब आइल ।।




बान्ह देली गाँतिये से गतरी के कस के
हाथ नइखे हिलत लोग गिरत बाड़े हँस के

ढ़िमुलिया मार के गोड़ परी हम
ए म मलकिनी आवऽ
गाँठ खोल दऽ गरदन के
हमरो लाज बचावऽ
हीत मीत सभ करे मसखरी
दे दे चट चट ताली
लोग कहत बा हई कलाबिन
कन्हइया के घरवाली


हारल थाकल काम के मारल ,
पड़त पलंगिया निदरी आइल ।
पइसत पियवा के ना देखनी ,
खुलल आँख तऽ भाग पराइल ।

गिहिथिन गलबहियाँ दे बोली,
गरब गुमान न करीह ।
पियवा के पदचाप जे सुनीह ,
आपन छींका भरीह ।


हम बउरहिया जान ना पवनी ,
कहँवा करिखा लागल ।
करि उतजोग कोंख कुहुँकवनी ,


तनहा आये हैं जग में , अकेले चलते रहेंगे ।
समय का चक्र ऐसा है , कारवां बन नहीं सकता ।।

तेरी संगत में रहना , हे प्रिये ! कबूल नहीं है ।
सुना है साथ रहने पर , निगाहें मोड़ लेती हो ।।

हसरतें पाल रखा है , बड़ी वो दर्द देती है


आवेवाला बिना बोलवले आई
थाक हार के नैना लोर ढ़रकाई
उहे राह बतलाई उतर के मन में
तन मन धन जब हिया से सँउपल जाई
रसिक



मौका कभी न दीजिये , लोगों को सरकार
सपनों का सुख है क्षणिक,


सुन ए संघतिया कहीं साँचे साँचे बतिया
मेहरी कइलसि उधार , फोरलसि भोरहीं कपार
मेहरी काइलसि उधार ।।

कहले रहीं जात बानी काम खाति पटना
घट गइल बिचहीं में एगो बुरा घटना
एगो बुरा घटना
बइठल रहे बगले में कइके सिंगार



हौसला हो बुलंद
मरुभूमि में भी
आनंद हीं आनंद

मेहरी के डाँट भइया केहू नाहीं बाँटेला
सभ केहू एके टके रसिक देने ताकेला

मोंछ पर ताव देके सभा बीच बोलेला जे
मेहरी के डर से चुहनिये में झाँकेला

पतनी जी परनाम बा, रचि रचि लिखीं पाती
रूसा फूली छोड़ दऽ , करब ठकुरसुहाती

नइहर जबसे गइल बाडु , देह भइल बा बाती
पापी पेट पाप करवावे , दरद उठेला छाती

बिना काड के भोज में जाके, तूरत बानी पूड़ी
बात समझ ना आवे तबहुँ , दीं घुसेड़ हम मूड़ी

चिमटा बेलना अब ना टूटी कहल टिकोरा करब
बेकहले हम चौंका बरतन अउरी पानी भरब

घर में सभे पीटाला बाकी मोहड़ा प मुसुकाला
मनुआ बाटे रसिक के चेला ताल ठोक घिघियाला

वीर कहाला धरती पर जे बात करेला मेहरी के
अकड़ पकड़ सभ ढ़ीला होला लात परेला मेहरी के


कहते सदा सुजान , लोक मंगल हितकारी
उचरत हिया जुडाय , प्रेम पइसे प्रतिहारी
साधक सिद्ध सहाय, एक टक गिरे न पपनी



गाँव में नइखे लउकत गाँव ,
शहर भइल बा ठाँवे ठाँव ।

चूल्हा चउका बदल गइल बा , बदल गइल बा लोचन ।
लालटेन अब लउकत नइखे , लउके ना बतकूचन ।
सभके बेड़ी लागल पाँव ।
शहर भइल बा ठाँवे ठाँव ।।

घर के अंदर बंद बइठका , लाज शरम बा भागल ।
ससुरे सोझा शंख बजावे , बिया बहुरिया जाँचल ।।
उदास भइल निमिया के छाँव ।
शहर भइल बा ठाँवे ठाँव ।।

गुड़ के भेली मिलते नइखे , कोंहड़ भाजी भोजे ।
पनपियाड़ में पातर बरफी , देले मनई ओजे ।।
हिया से नइखे कतो लगाव ।
शहर भइल बा ठाँवे ठाँव ।।

हमरा घर में लोटा बाटे , तोहरा घरे थरिया।
आवऽ मिलके साझ कइल जा , आपन आपन परिया ।।
दूलम भइल सझिया बरताव ।
शहर भइल बा ठाँवे ठाँव ।।

छूट गइल बा हाथ से लउर , सेल फोन पकड़ाइल ।
हँसुआ टुकुर टुकुर ताकेला , हरभेस्टर बा आइल ।।
बढ़-चढ़ के लोग चले कुदाँव ।
शहर भइल बा ठाँवे ठाँव ।।

साड़ी सूट सहेजल जाता , मैक्सी टीशट आगे ।
बाबाजी के मोटा चश्मा , लेंस देखके भागे ।।
रसिक हऽ नयका सोत बहाव ।
शहर भइल बा ठाँवे ठाँव ।।



सटले रहब बबुआ हो तोहरा के दिल में
देखब हम रोज रोज तोहके महफ़िल में
माई सुरसती के असीस मिले तोहरा के

ए बबुआ स्वागत बा तोहरो परिवार में ।
कबहुँ दरार इहाँ पड़ी नाहीं प्यार में ।।

सभे बा बाबा चाचा भइया आ दीदीया
माई भोजपुरिया के लिलरा के बिंदिया
चमकेला सभ लो अमवसी अन्हार में ।
ए बबुआ स्वागत बा तोहरो परिवार में ।।

बोली से गोली ना केहू चलावेला
आन के भी सभ लोग अपने बतावेला





दूर रहला प भी आपस में मिला दे
भीरी अइला प दिल में कमल खिला दे
इहे जभो जभो परिवार के काम बा
सभ लो के बोली में मिसिरी मिला दे

भोजपुरी उड़ान लिही रउआ अगुआई में
पंजवार में बेयार बही रउआ अगुआई में
फुहरनपन के मुँह पर करिखा पोताई
भोजपुरिया लो बात कही रउआ अगुआई में

कान्हा के मन में उमंग उठी देख के
खुश होई अइसन जुटान के निरेख के
राउर असीस खाति पपीहा पियासल बा
देखता बेर बेर हथवा के रेख के
रसिक
मृदुल मनीषी कवि श्री अंजन
जस भोजन में छप्पन व्यंजन


भोजपुरी उड़ान लिही रउआ अगुआई में
पंजवार में बेयार बही रउआ अगुआई में
फुहरनपन के मुँह पर करिखा पोताई
भोजपुरिया लो बात कही रउआ अगुआई में

कान्हा के मन में उमंग उठी देख के
खुश होई अइसन जुटान के निरेख के
राउर असीस खाति पपीहा पियासल बा
देखता बेर बेर हथवा के रेख के
रसिक

भाखा प्रेम दीलिप के , चढ़ल रहो असमान ।
झंडा गाड़स नाम के , इहे हमर अरमान ।।

स्टार्टर जोर लगवलसि ,
खल खल के खाद खिअवलसि ।
भोजन भइल ओछवाही ,
पूड़ी चलल दुई गाही ।
पोलाव रहे भर थरिया ,
दस रसगर गोलू करिया ।
मत पूछीं का तरकारी ?
रहे मटर पनीर कुँवारी ।
पापड़ पट-पट पटियावे ,
चटनी चटकार लगावे ।
बरफ मलाई मुँह खोले ,
भरपेटा लेलऽ बोले ।
गाजर के हलुआ ललका ,
तुरलसि रेकाड़ पिछलका ।
पाटी में जसन मनवलसि ,
जमके जिभिया तहिअवलसि ।
राती में पेट पुकारे ,
लागल लो के ललकारे ।
अजवाइन चुप करवइलसि ,
तब गरदन जोर चिलइलसि ।
जब परले फेर तिवारी ,
पांड़े से कइले यारी ।
अहथिर होके मुसकइले ,
तब असली राज बतइले ।
भोज में रहीं खाखाइल ,
इयाद ना पेटवा आइल ।
अब ना होई नादानी ,
भरपेटा पीयब पानी ।







नया जमाना आइल बा ,
घुघुनी मुर्ही भुलाइल बा ।
चोखा माड़ भात सटकउआ ,
लउके ना तेली के पउआ ।।

अब पाउच में सभ भराता ,
नइखे लउकत लउर से नाता ।
हल्दीराम के भुजिया आइल ,
माई के नमकिन भुलाइल ।।

काठ के चटकी चटकत नइखे ,
गाय हेंड़ा से भटकत नइखे ।
दूध दूहके डेयरी जाता ,
अमूल के महंगा मक्खन किनाता ।।

माहटरजी के छड़ी हेराइल ,
ओह दिन से पपुआ पगलाइल ।
आइल जब जियो के सेट ,
बचवा से ना होला भेंट ।।

फगुआ चईता चुनरी धानी ,
बितल समइया के बा कहानी ।
पियत नइखे तेल चमरूआ ,
बनके बइठस बाबा उरूआ ।।

केहु ना सुने रसगर बात ,
रसिक के कुंद भइल जज्बात ।
शब्द शिरोमणी मलले हाथ ,
ऊँच भइल छूछबेहरा माथ ।।

केहु ना गावे राम रमईया
पईसा ला बा ताता थईया

कन्हैया प्रसाद तिवारी 'रसिक'
रहे सलामत सबकी दुनिया ,
पढ़े लिखे मुन्ना औ मुनिया ।
किरण सुबह की जोश जगाये ,
लछिमी जी सभके घर आये ।
रसिक


खास तरे के लो बा पढ़ले , खास तरे के लो पढ़ीहन
माई भाखा में विचार के , सारथक सुनर शब्द गढ़ीहन


भले लाख बेअंजन बाटे , स्वाद माई के थरिया बा ।
कवनो भाखा में बतिआईं , जरि हमार भोजपुरिया बा ।।

ना तीखा ना चटपट बाटे , सेहतमंद सुपाच्य भोजन
माई हाथ क लिट्टी - चोखा , रूचे ला सभ केहू के मन

चाहे केहू लोल बजावे ,


बल बलराम राम मरजादा ,
सरस कृष्ण जस राउर जीवन ।
मात शारदे जीभ प रहली ,
गमकवली भाखा के उपवन ।।

दुर्गा माई दिव्य कृपा कर,
अद्भुत दृष्टि दान में दिहली ।
पूत के अपना उच्चासन प ,
देखत मन हीं मने बिहँसली ।


जय भोजपुरी जय भोजपुरिया परिवार हऽ
भाखल भोजपुरी भाखा एकर विचार हऽ


बेलन जइसन यंत्र से , पत्नी जी मुसकाय ।
पियवा लगे सुहावना , इधर-उधर ना जाय ।।
इधर-उधर ना जाय , समय पर घर हीं आवे ।
विधुवदनी को देख , नजर ना कहीं मिलावे ।।
जब भी पड़े कपार , रहे काबू में तन मन ।
देशी हर्बल अस्त्र , रसोई का है बेलन ।।
~ रसिक ~

लदरल बिरिछ न ढ़ेला मरनी ,
कइनी ना कुछ काम गलत ।
तबो लोगवा ताना मारे ,
कवन गुनाहे बा नफरत ।।

सभके धनसुत देख धधइनी ,
केहू ना रहले अनजान ।
तबो लोगवा बान चलावे ,
निकुटी कहे करे अपमान ।।



चदरिया कहँवा दाग लगवलु ×2

सुतल रहलु महल अटारी
सेवक रहलेसन सरकारी
समय प सबकुछ मिलत रहुए

दुअरे बा बइठल चोर , ए सखी
दुअरे बा बइठल चोर।

आवत जात निहारें पल पल
कबो साँवर कबो गोर , ए सखी
दुअरे बा बइठल चोर।



भोरे कहीं राम - राम , बन जाई सभ काम,
छने-छने छछनत , केहू नाहीं रहिहें ।

मन के विकार भागी , तन में उमंग जागी,
शीतल बयार नित , जिनिगी में बहिहें ।

माई के चरनिया के , छुवला प भाग जागी,
भाई के सनेह धारे , असगुन दहिहें।

रसिक सुबोल बात , बेरि-बेरि दोहरावे,
मानऽ चाहे जनि मानऽ , ऊ तऽ रोज कहिहें।


बोलबों ना तोसे हम , हमरो से बोलिह ना,
दिलवा से दिलवा के , होए दीहऽ बतिया ।

अँखियाँ के भाखा तनी , अँखियाँ के पढ़े दीहऽ,
केहू ना रोकी-टोकी , एङ कटी रतिया।

कइसना सुजोग बाटे , दुनो जनी एके संगे,
आवेली ना अँखियाँ में , नीनरी सवतिया ।

हम गुनीं तोहरा के , तुहूँ गुनऽ हमरा के,
जुग-जुग जोड़ी रहे , बनल संघतिया ।



भूचाल , जाली , हाली , ठाली , निठाली ,दीवाली


टकटकी लगाके देखे दीहऽ
रूसा फूली जन करीहऽ
प्रेम पियासल दुनो उर बा
बात मामूली जन करीहऽ

जेकरा खातिर जनम भइल बा
ओकर नेह भुलाइब कइसे
कवनो गलती हो मोर बालम
दोख जुगाली जन करीहऽ

जिनिगी बा तऽ जश्न मनावऽ
चिंता मत कबहूँ चुनियावऽ
गम के कवनो भाव न दीहऽ
काम में हाली जन करीहऽ

समय समय पर समय के सुनीहऽ
कुसमय हाथ न धरीहऽ
जे बा तोहरा खातिर उमगल
जुबान के खाली जन करीहऽ


अँखिया मिलावे जब, अँखिया से अँखिया त
मनवा के भावना सँवार देले अँखिया

अँखिया के भाखा सभ , जानेला जहान लोग
कगरी चलेले त उजार देले अँखिया

एकटक सोझा-सोझी, बिलमे जे अँखिया त
दिलवा के दुअरा पुकार देले अँखिया

आँख देख रहिया में , चल जाले अँखिया त
रसिक के झट से लतार देले अँखिया


होखेले अलोत कबो अँखियाँ से हरि मोरे,
तकिया गिलाफ से सवाल करे अँखियाँ।

अचके में चलि जाले भरल सभा के बिचे,
गली आ मुहल्ला में बवाल करे अँखियाँ।

घइलन पानी जब टघरेला आँखियाँ से,
मनवा के मइल निकाल देले अँखिया।

तिनिको के भार कबो सहसि ना आँखि दुइ,
दिलवा के भार के उछाल देली अँखियाँ।

माई के जयकारा लगावत रहीं
भोजपुरी के पुहुप गमकावत रहीं
केहू कुछो कहे तऽ सुनीं प्यार से
नीक हुनर से चुनर चमकावत रहीं
रसिक

एक बंदर
एक और बंदर
एक बाहर
एक अंदर ।
एक बोला
दुनिया मुझको
बंदर कहती है।
दूसरे ने जबाब दिया
मैं दुनिया को ••••••
और विडम्बना तो यह है
कि दोनों शांत बैठे हैं ।





अमही में अइले विशाल त चेहरा उनुकर चमकल
हम तऽ जननी पकठा हवें रहेले असहीं बमकल
देखनी जब त हमरा लागल मधिम रहे गोराई
ओही बरन के धाक जमवले रहन रसिक कन्हाई
गुरगेठना हँसमुख जवान के बोली रहे कटाह
मंच प बइठल कवि लोगन के भइल सवतिया डाह
मार ढ़िमुलिया कुकुर भगाके जूता के दिहलन सनमान
रसिक देखके गदगद भइले चलत रहे बतिया के बान


माई के बेटा बिटोरले सनेहिया
मनवा के कइले विभोर
भाखा के सुनर सुरतिया सँवार देले
ले गइले गँउआ क ओर
एक एक सबद में रस रहे मिसिरी के
सुनला पऽ मनवा अघाय
कतिना बड़ाई करीं बाबु राकेश के
अमही में भइल अंजोर



मत बेचऽ भोजपुरिया सान


तेल भइल खतम जोतवा त जरते बा


साल भर बितला पो पांडे जी से मिले खाति
आइल बानी पटना में चलके बंगलोर से

गूगल बाबा कहले कि दोस्ती अटूट रही
डेरा हम डल्ले बानी तीन रात भोर से


भावना के भार , शब्द के तराजू
हम कहनी काजू , तूँ पढऽ पिआजू
बात के मेघ से , स्नेह के न सींचऽ
हेंठ करऽ तन के , मनवा के फींचऽ
लोल बजावे के , आदत पुरान बा
पढ़ल करऽ पुस्तक, उहे परधान बा
सुतेलऽ देर से , अबहूँ तऽ जागऽ
डंट बा कपार प , अबहूँ तऽ भागऽ
आन के बात से , नाहीं छेंटिअइह
हर बे अपना के , चक चौकस बतइह
रसिक जी कहिहें त , फोर देब फफेली
ऊ बाड़न बाभन , हम बानी तेली
सूखल सरसों से , तेल हम निकालीं
पंडित के पतरा , हमार घरवाली


सुर के सिंगार करे अइली माई सारदा
संउसे समाज में उजास भइल भइया


सगरी टाँग अड़ाईं जन
अड़ जाये तऽ हटाईं जन
फटफटिया पो फटफट क के
कबो स्टंट दिखाईं जन
बढ़ल उमिर में शक्ति छीन





ए बाबा कुछ चाहीं ?
जवन बुझाय देदऽ
हम ना करब मानाहीं

चाह चाहीं कि कॉफी
बिस्कुट चाहीं कि टॉफी
आ कि चाहीं काजू के पोलाव
जल्दी बताईं केकरा से बा लगाव

ठंढ़ा गरम नरम कठेल
बाबा कइलन रेलमपेल
उड़नपरी मुस्कान प बाबा
कहले भाग जगइलस
दुई हजार के बिल बनल तऽ
बाबा जी खिसिअइलन
पानी के पइसा ना लिहलु
खाये के बा कइसन दाम
पहिले कहले रहितु तऽ
हम ना करतीं अइसन काम
हम तऽ जानी मुफुती माल हऽ
मिलत बा भरपेटा
ना जननी मुस्कान के पीछे
लागी गहन चमेटा
चेट में रहे दस सई टकिया
बिल रहे बिसवार के
पुलिस पकड़ के साथ ले गइल
डांड में रसरी डार के
फोन लगवनी पांडेजी के
आईं फरियाईं ममिला
कइसे अमही गाँव में जाके
रसिक हिलइहें जिला ?
अब ना चढ़ब बिमान पो बबुआ
चढ़ते ठोकर लागल
भइल बेइजती लोग के सोझा
हमहीं रहनी पागल
मुफुती माल के देख कन्हइया
मन के जन ललचइह
आपन अनुभव सभ लोगन से
अमही जा के बतइह ।।


मन बा जवान तन झुर्री परल बा
दिलवा में जोस कूट कूट के भरल बा
मन बा त आव आजमा के तनी देख ल
हमरा में अमरित आ तोह में गरल बा


मन बा जवान बाकी तन घुरचाआइल बा
केकरो ना दिलवा के बतिया बुझाइल बा
लदरल बा फल देखऽ डाली में झोंप झोंप
पाकल बा पात काहें लोग अझुराइल बा



गोड़ तोहे लागिना गँउआ के डीहबाबा
अमही में बाटे जुटान ,
भोजपुरिया भाखा के बढ़ी आज सान।।

बीड़ा उठवले बाड़े सतीशजी पहरूआ
माई भोजपुरिया के हउअन दुलरूआ
संगीत सुभाष संगे सारथी मदन भाई
छेड़ीहन छपरहिया तान ,
भोजपुरिया भाखा के बढ़ी आज सान।।

दीन हीन छीन नाहीं भाखा भोजपुरी
सबका के साथ लेके चलल बा जरूरी
गावँ गाँईं जबले ना जगिहें जवान लोग
मिली ना भइया सम्मान
भोजपुरिया भाखा के बढ़ी आज सान।।

भइया सुरेश जी के माथ पो पगरिया
उदय नारायण धइले गाँव के डगरिया
मुरूगा बोले से पहिले जाग जाले हिरदानंद
करेला पराती गुनगान,
भोजपुरिया भाखा के बढ़ी आज सान।।

माया बहिनियन के माया बिचित्तर बा
माई के सम्मान खाति मानस पवित्तर बा
धरम के धाजा फहरावेली प्रियंका बहिनी
बोलि बोलि मधुरी जुबान,
भोजपुरिया भाखा के बढ़ी आज सान।।

अंजन बाबा के असीस धरे माथ लोग
फौजी कन्हइया के बनल बाटे शुभ जोग
पांडे दिनेश अरु संजय के नजरिया से
भरी भोजपुरी उड़ान
भोजपुरिया भाखा के बढ़ी आज सान।।
~ रसिक ~


पूछे त मुँह फेर लऽ , उमिर अवरु कमाई
तिन्ना होके दूध पीयऽ , बइठल जल दवाई

अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनल ठीक ना बा
आन के घर में झाँकल भइया नीक ना बा

घर में जे आवे ओकरा के नमन करऽ
हाथ जोर के करऽ विदाई अमन धरऽ

थरिया में लऽ अतने जतना पेट में जाये
करऽ अन्न के मान ना इचिको खेत बिगाये

रोटी सब्जी दाल से आपन पेट भरऽ
पइसा आवे पास तऽ नहीं गुमान करऽ

चढ़ल करजा उतरी कइसे मन में सोंचऽ
रोग भइल त झटपट ओकर जुलुफी नोंचऽ

मधुरी बानी बोलऽ कर्कस तजल करऽ
अदिमी के पहचान के पुठ्ठा हाथ धरऽ

आफत आवे केहू पर तऽ दउरल जइह
जसन मनावे बेरा थोरिका तुँ सुस्तइह

अनगुते जय राम राम के भजल करऽ
रसिक के संगे सभके मन में बसल करऽ


मुस्कान हृदय से गायब बा
खाली मुँह दाँत चिहारत बा
आपन आपन स्वारथ खातिर
अनकर मुँह लोग निहारत बा

घर बइठल सान बघरला से
कल्यान जगत के ना होई
तलफत अगनी के मान करऽ
दी तहरा के ऊ दिलजोई



बचवन के उत्थान , लहेंडा भइले चारो
बनल सभ देवदास


मंदिर के चौखट पर नहीं जाओ अनमने
आओ , किसी बेसहारे का सहारा बने


गइल बाड़ी नइहरे मेहरिया
देह में जहरिया बढ़ल ए राम।
के झारी झाडू से लहरिया
आन पो नजरिया गड़ल ए राम ।।

बाटे खरकटल लोटा थरिया
दुअरा पथरिया परल ए राम
जरल बा कराही तरकरिया
नाहीं आलू फरिया मिलल ए राम।।

नीमना पो सभे पुछवरिया
परे पो नजरिया फेरे ए राम
काजर के कोठरी शहरिया
दाग मोर चुनरिया लगल ए राम।।

कवन दो त बहल बा बेयरिया
बोली में जहरिया घोरे ए राम
रसिक बाबा लिखऽ तू शयरिया
सरस भोजपुरिया पगल ए राम

हरपल पति पर जो तनी , वह पत्नी आदर्श।
मीठी वाणी बोल के , खाली कर दे पर्श।।
खाली कर दे पर्श , पिया घोषित खर्चीला।
रंचमात्र प्रतिरोध , पसारे सौ-सौ लीला।
किन्तु समर्पित भाव , हृदय उजला - सा उत्पल
हुए रसिक परितृप्त , देख निश्छल मुख हरपल।


दुलुकी चलींजा नाथ , राम रस पीये खातिर
छोड़ दीं गिनती साथ , राम रस पीये खातिर।।

ढ़ेर कमइनी रुपेया पइसा
कहता जवानी नाता कइसा
चमकत चान देखा के कहे
काहें ककही बा हाथ , राम रस पीये खातिर ।।
दुलुकी चलींजा नाथ , राम रस पीये खातिर ।।

पार गइल बय साठ के उपर
कहल छोड़ दीं सुपर सुपर
गाँठ के गठरी खुल गइल बा
लउके लमहर पाथ , राम रस पीये खातिर ।।
दुलुकी चलींजा नाथ , राम रस पीये खातिर ।।

सकल खजाना ठाँवे रही
मुँह से सुगना कुछ ना कही
राम नाम सत नाहीं सिखलऽ
धाव धाव ए जगनाथ , राम रस पीये खातिर। ।
दुलुकी चलींजा नाथ , राम रस पीये खातिर ।।


सुधियाँ लेलऽ ए कन्हैया रहिया बानी हम अकेल
बानी हम अकेल ए कान्हा बानी हम अकेल
सुधियाँ लेलऽ ए कन्हैया रहिया बानी हम अकेल।।

भादो के अन्हरिया सूना सूना बा डगरिया
तोहरो बंशीया बोल करे मन में कुलेल ।।
सुधियाँ लेलऽ ए कन्हैया रहिया बानी हम अकेल।।

सास ससुर जेठ भाई मेहना मारे महरी माई
खाई पटल नाहीं अंदर बाहर चलेला ना रेल ।।
सुधियाँ लेलऽ ए कन्हैया रहिया बानी हम अकेल।।

आँख लागल बा बिहारी तन पो चले छूरी आरी
रोवे तोहरी दुलारी मतिया भइल बाटे फ़ेल।।
सुधियाँ लेलऽ ए कन्हैया रहिया बानी हम अकेल।।



हिरदानंद के गीत से हिरदा जुड़ा गइल
कविता के भाव में भुलइले कन्हइया
माई सुरसती जी बेर बेर बिनती बा
कलम के धार उनकर बढ़े सवइया
दाँव पेंच शब्दन के सनर सुमंगल हो
मिसिरी समुंदर के पानी घोराये
सुनेवाला आसन से टसमस हिले नाहीं
नाग फुफकार जाके सुरति समाये




ओझा जी अझुराइल बाड़े , सुटुकल फिरस सतीश।
बबुआ तन्मय नोकरी धइले , धर भर करे अशीष।
रसिक के रछया कइली बेटी , माई केरि कहर से।
बृजमोहन के मुहँ ककुलाता , बोले ला दुपहर से।
सूतल शेर सुरेश भयकड़ा , कवन जने जगावस।
हिरदानन मधुरे कुछ गावस , सभके दिल बहलावस।
दइबा दया दिलीप प राखसु ,घरनी के दुख हरसु।
नवही लोगन अपने घर में , चौका चूल्हा करसु।
बछरू लो जादे जनि छरपे , लगने मिली मिठाई।
आज जनमदिन सिरी किसुन के , सभ लो जूटि मानीं।
खबर धमाकेदार आजु के , फैलल गाँवाँगाईं।
हाथ जोरि के कहे कन्हैया , जै भोजपुरिया माई


अनका घरवा पेट पोखरा , अपना घर में टुइयाँ।
मिलल गलइचा नींद पराइल ,घर में सूतस भुइयाँ।
हमरा घर में आग लगाके , मंद-मंद मुसुकाले।
हितई में नदकोले हूरस , तनिको ना सकुचाले।
केकरा से आपन दुख कहीं , सबहीं काटे धावे।
मलकिनियाँ के पाठ पढ़ा के , घर में आग लगावे।
बन्द बा हमरा घरे चूल्हा , मुसरी पेटे दउरे।
मीत हउअऽ तऽ भेजऽ कुछऊ , नइखे लिट्टी भउरे।
सोना अस हमरा धनिया से , हउ बतिया बतला दिहलन।
लौह बेलना नया खरीदी , उनका हाथ धरा दिहलन।
टभकत बा माथा के गूमड़ , अँगुरी पोर टटाता।
रार मचल घर रौरव भइले , जिनिगी नरक बुझाता।


हाय दइया तोहरी सुरतिया सतावे

नजर न लागे मोर फूट जाये अँखिया
मोहे सुरतिया पो बेर बेर सखियाँ
हाय दइया दिल के दरदिया बढ़ावे ।।

चाल मस्तानी कमाल करे मुस्की
जइसे बुझाला रूहअफ़जा के चुस्की
हाय दइया नैना ना नैना लड़ावे ।।

चश्मा के चाल चलन नीक नाहीं लागे
अँखिया के भाखा के अँखिया ना भाखे
हाय दइया रसिकवा ना मोके समझावे।।


झाकाझूमर में झूमका झटक दिहल ।

बड़ा अरमान रहे पेन्हतीं दुतल्ला
पड़ल ना हमरो बुनुकियो से पाला
तिलक के माल सभ गपक लिहल
झाकाझूमर में झूमका झटक दिहल ।।

बाबूजी के रहीं हम अँखिया के पुतरी
जननी ना पपीया ई पाँख मोर कुतरी




डंडा लेके खोजत बाड़ी कवन पढ़वले पाठ बा
पहिले पियवा पँवरत रहे अब लउकत झरनाठ बा
ना जाने केकरा से कइलस लेदरा वाला इयारी
हमरा के विस्फोटक कहे खुद तलवार दुधारी
रसिक


मरले बिआ मेहरी लाते हमरा के चहेट के
आटा नीयन फुलवरा के रखले बिया फेंट के

गरम कराही तेल में मूड़ी हमर डलाई
लाग गइल लुत्ती बरूद में अब लगले फट जाई

कइसे कलम उठाईं भइया हाथ बन्हाइल पट्टी
जुलुमी चटकन मरले बिआ सुन्न भइल कनपट्टी

पेट में चूहा कूद रहल बा भोजन भइल नदारत
देह बारूदी के बतिया से छीड़ल बा महँभारत

बीन संगीत बजावस एने मजिगर हमर कुटाई
अइसन फुंकलन कान में मंतर भगली छोड़ लुगाई

जनतीं अइसन धोखा होई ना करतीं हम यारी
थपरी पीटत लोगवा हँसे खइलन लात तिवारी

हमहु मोका खोजते बानी सरफ डाल झपिलाइब
आवे दीहीं मास नवंबर बढ़िया से बतलाइब

अइसन चुन चुन चुगली करब चउका चना चबइहें
जब जब देखिहन मलकिनी के दाबत पोंछ परइहें



नैतिकता के बात पऽ , सइ-सइगो उपदेस
संस्कार जोहत फिरीं , गइल बिबेक बिदेस
गइल बिबेक बिदेस , ताक पऽ रखले प्रानी
मानवता के प्रश्न , तंगदिल निठुरी बानी
आवे मुश्किल वक्त , निदाने भइल नापता
उघरल छद्म लिबास , सिकुरली सभ नैतिकता

शिक्षा उत्तम है वही , मिले ज्ञान का सार
जिसकी सीमा पेट तक , वह शिक्षा बेकार
वह शिक्षा बेकार , कुटिलता जो उपजाए
अहं भाव अतिरेक , गर्त में लेती जाए
मद लोलुपता त्याग , जिंदगी भले परीक्षा
नम्र निवेदक रसिक , दान में दे दो शिक्षा


शिक्षा जीवन में सही , कर दे जो उपकार
शिक्षा बने विलासिता , मन पर करे प्रहार
मन पर करे प्रहार , कुटिलता आगे आये
अहं भाव अतिरेक , गर्त में जल्द गिराये
शिक्षा मद से दूर , पात्र हो कर में भिक्षा
नम्र निवेदक रसिक , दान में दे दे शिक्षा


सार्थक शब्द सुनाय के , सभके मन बस जाय
घिरिना घट से दूर कर , बंशी चैन बजाय
बंशी चैन बजाय , हिया अवसाद मिटाईं
कटु वचन संदेश ,



तिस्ता के निधन पर
*****
अँखिया से बहे पवनार हो
करेजवा निकाल लिहलु धीयरी ।
माई के ना सुनलु पुकार हो
करेजवा निकाल लिहलु धीयरी

ताज रहु मय भोजपुरियन के नयका
छन भर में तींत काहें क दिहलु खयका
काहें कइल विधाता अइसन रार हो
करेजवा निकाल लिहलु धीयरी


बुद्धि में खलबली मचल , टूटल दिल के तार
जीव पड़ल बा फेर में , खोज रहल बा प्यार
खोज रहल बा प्यार , हे प्रभु राह देखाईं
भटकल बा जे लोग , ईश रउआ समझाईं
फैलल बा दुर्गंध , आके करवाईं शुद्धि
अवते नेक विचार , निर्मल हो जाई बुद्धि
~ रसिक ~


एलोपैथी दवा दरवान बाटे गेट में।
लाज लागे मोहे हउ बतिया बतावे में
धनिया के हमर तकलीफ ना बुझाता।
जलदी से बैद जी बताईं कउनो ओसधी।


मुश्किल घड़ी में रउए पो विश्वास बा
हे नाथ ! सनाथ बनाईं इहे आस बा

नैतिकता के नाम पर , बनत लोग चालाक
संस्कार में सार नहीं , होत विवेक हलाक
होत विवेक हलाक , ताक पर देखे प्राणी
मानवता के नाम , मूक हो जाये वाणी
आवे मुश्किल समय , निदान के नइखे पता
छद्म छली के रूप , सिमट जाई नैतिकता

अब चरवाहा उहे नइखे जे दे दे भेंड के बली
देखके ओकरा मचल बाटे भेड़ियन में खलबली

अकसर आवस चाहे झुंड में डाँड़ प बाजी डंडा
फेंकरत फिरिहन गली गली में फूट गइल बा भंडा

ई चरवाहा चौकस बाटे चारो ओर बा नजर
कवनो भेड़िया भोंक ना पइहन हो जाई धूमगजर

छटपटात बा मिलत नइखे खाये के माँस के लोथा
लोग देत बा लउर देखाके फेंकल महुआ चोंथा


कमर में कसाव ना रिसाव बाटे नाक से
अँड़सल बा पेट में राह नइखे निकले के

पांड़े घरे पूड़ी तहिआई लेनी तान के
तबहीं से मचल बा तबाही काल्ह शाम से

रहे रसगुल्ला त रस से फिसल गइल
जगहा बनाई लेल आपन ऊ पेट में
आलूदम दउरि रहल भागे खातिर बहरी
एलोपैथी दवा दरवान बाटे गेट में
बबुआ दिनेश तुहें कवनो उपाय करऽ
मुफुत के माल भेंटे वाला बाटे कल्हुए
अइसना निदान करऽ इचि ना दरद होखे
आईं ना कबहुँ हम केहू के लपेट में

कट कट करे दाँत भुजुना चबावे में
लाज लागे मोहे हउ बतिया बतावे में
पानी लागल हाथ में बा गोड़ लंगड़ाता
धनिया के हमर तकलीफ ना बुझाता
जलदी से बैद जी बताईं ना दवाई
घरे जाके उनका के तनी समुझाईं

लोगवा कहेला कि बउराइल बा बुढ़ारी में
जाइल चाहे रोज रोज अपना ससुरारी में
परिकल बा खाये खाति महुआ के लाटा
बाकि ससुरारी में खइले बा सरहज से चाँटा



डँकरेले गइया धाव धाव ए कन्हैया तनि रक्षा करऽ
पाछा परल ओकरे कसइया तनि रक्षा करऽ

लोगवा कहेला ओकरा दूधवा के अमरित
फिर काहें करेला लो ओकरा से अनहित
ओकरा से अनहित
छोपनी लगवले बाटे सभके रुपइया
तनि रक्षा करऽ
पाछा परल ओकरे कसइया तनि रक्षा करऽ।।

रोंवा रोंवा बसेलन गइया के देव हो
काहें लो लगावें ओकरा देहिया में लेव हो
देहिया में लेव हो
काहें ना उजागर होता घर आँगनइया
तनि रक्षा करऽ
पाछा परल हमरो कसइया तनि रक्षा करऽ।।

पोंछिया पकड़ के बैतरनी लोग लांघेला
रोज रोज गइया से लो पंचगब्य मांगेला
पंचगब्य मांगेला
करेलन कन्हैया रोज गइया सेवकइया
तनि रक्षा करऽ
पाछा परल हमरो कसइया तनि रक्षा करऽ


गइया के गोबरा से अँगना लिपाला
होखेला सभ शुभ काम हो
पूजा में दूधवा बन जाला अमरित
बिहँसे ले चारो धाम हो


दीदीया बुचिया पुष्पवा के ई राखी ह
एह धागा में अरथ बा गहिरा
ई कबीरदास के साखी ह

भले तन से दूर बा दिल्ली
दिल से दूरी खाक बा
बाबूजी माई से अधिका
एह बहिनियन के साख बा
भाई से बाजू बा बड़हन
परला पो बैसाखी ह
एह धागा में अरथ बा गहिरा
ई कबीरदास के साखी ह।।

बधाई हो बधाई ओझा संजयजी भाई
शतक लगवनी विदेश के कमाई
जभो जभो के शान बढ़वनी
रसिक कन्हैया मन हर्षाई


घुमता भुखाइल भेड़िया ए भइया
हिरनी के हो फेर में
अपना बिहनिया के हथवा पकड़ लऽ
फँसल बिया अन्हेर में

सिसिकत बिया तोहार ललमुनिया
बाज लगवले घात बा
पलखत पानी के नोच ली पँखिया
अइसन हमरो बुझात बा
कइसे उड़ीं असमाने ए भइया
संझिया अवरु सबेर में

पाँख बढ़ाइब चोंच पजाइब
हमहु करब अब वार हो
जे निरदइया पंजरा अइहें
ओकर करब संघार हो
तनिका सा हँथवा पीठीया प रखदऽ
भेज देहब नरक के ढ़ेर में

काँच कपास के तार न तुरीह
बहिनी के ई पुकार बा
एके जनम ना जनम जनम तक
भइया बहिनी के प्यार बा
लेई के बलइया धागा कलइया
फेंकिहऽ जन तू लथेर में

रूप क जाल में जे परल ऊ बिलाइल
नकली के चक्कर में असली भुलाइल
हाथे ना लागल ना मिलल नैन सुख
दुविधा में दउरत दोज़ख़ भेंटाइल


निकलल बघवा माँद से , मिरिगन में हड़कंप
सोलर से अब चल रहल , देखऽ नीमन पंप

सोझिया बानर मरले बा , देखऽ आज गुलाटी




जिह्वा पर माँ शारदे , मन में उच्च विचार
सार्थक शब्द उचार हो , मंगलमय व्यवहार

शब्द माना कि भेजे में शब्द का खजाना है
फिर भी शब्द काफी नही, बहुत कुछ अनजाना है
शब्द शोभा नही देता है, सिर्फ शब्दकोष में
शब्द शोभता है जब निकलता है होश मे।
शब्द से उत्पति, लय होता सब शब्द मे
गुंजता है शब्द एक, निर्निमेष अब्द मे
शब्द ही से मानव, मानवता को पावे है
दुर्जन को भूतल पर, शब्द ही बनावे है
शब्द ही से काम बने, काम को बिगाडे शब्द
शब्द ही से जीते युद्ध, युद्ध मे पछाडे शब्द
शब्द के प्रभाव से कोई नही छूटा है
शब्द ने ही दुनिया से चैन सुख लूटा है
शब्द ही है दुनिया, और शब्द ही भगवान है
शब्द ही फरिस्ता और शब्द ही शैतान है
पहचानो उस शब्द को, जो गूँजता है निर्निमेष
वही शब्द हरता है, तन मन का सब क्लेश।





शब्द
****
शब्द माना कि भेजे में शब्द का खजाना है
फिर भी शब्द काफी नही, बहुत कुछ अनजाना है
शब्द शोभा नही देता है, सिर्फ शब्दकोष में
शब्द शोभता है जब निकलता है होश मे।
शब्द से उत्पति, लय होता सब शब्द मे
गुंजता है शब्द एक, निर्निमेष अब्द मे
शब्द ही से मानव, मानवता को पावे है
दुर्जन को भूतल पर, शब्द ही बनावे है
शब्द ही से काम बने, काम को बिगाडे शब्द
शब्द ही से जीते युद्ध, युद्ध मे पछाडे शब्द
शब्द के प्रभाव से कोई नही छूटा है
शब्द ने ही दुनिया से चैन सुख लूटा है
शब्द ही है दुनिया, और शब्द ही भगवान है
शब्द ही फरिस्ता और शब्द ही शैतान है
पहचानो उस शब्द को, जो गूँजता है निर्निमेष
वही शब्द हरता है, तन मन का सब क्लेश।
कन्हैया

शब्द मरहम आ शब्द बान ह
आँखि के पुतरी आ परान ह
शब्द में जगत अझुराइल बा
शब्द तलवार खातिर म्यान ह

शब्द के शान में कोताही केहू जन करे
शब्द के जाने से मनाही केहू जन करे
शब्द सुघराई के संजोये राखल जाये
शब्द के सरिया से तबाही केहू जन करे

आन अन्न में देवता , देवी पेय पदार्थ
शुभ होखे जजमान के , करे सदा परमार्थ 

भोजपुरी 1


मोबाइल
*******
खा गया सुख चैन सारा , हाथ में आया मोबाइल
बढ़ गयी हैं दूरियाँ अब , घर तलक आया मोबाइल।
हो गए अनजान आशिक , मैं तो सच्ची कह रहा हूँ
ढेर सारा दर्द लेकर , आ गया दर पर मोबाइल

दोस्तों की महफ़िलों में क्या खूब गुजरा था जमाना
साथ ही बैठे रहे कल सांस पर पसरा मोबाइल।
दस कदम के फासले पर यार की दुनिया बसी है
सन्न सी अधखुली आँखें गजल का मिसरा मोबाइल।
घूमता अहले सहर था पैर फिसलें दूब की दरी
दाब शोणित चढ़ा ऊपर हाथ थरथर धर मोबाइल।
रसिक साजन छोड़ दे अब अँखियाँ लड़ाना गैर संग
देख बीबी पास बैठी हाथ में जकड़े मोबाइल।

के पी तिवारी


परिचय
नमः कन्हैया प्रसाद तिवारी " रसिक "
गाँव: हथडीहाँ
पोस्ट: सकरी रामनगर ( हसन बाजार )
थाना : दावथ
जिला : रोहतास

नोट : फिलहाल हम बैंगलोर में रहेनी ।

जब लोग जुटी तब रंग चढ़ी,
अरु भोजपुरी सनमान बढ़ी।
सभ आपस में मिलिहें-जुलिहें,
सहभाव के रीति मिसाल गढ़ी।




चूपे रहला में भलाई बा
लोग इहाँ काटत मलाई बा
जेकर जुबान पो तीर कमान
आ कर में दीयासलाई बा

राम के मुखौटा में रावण घूम रहल बा
जनता जनार्दन के चरण चूम रहल बा
साध्वी सीता के भावना से खेले खातिर
बेर बेर आपन रूप के जूम (zoom) रहल बा


Unspoken languages spoken by agiles
are tears and smiles


संझिये के बेरा से अनेरा काहें भइल
तनी बोलऽ ए सजनवा रतिया रहबऽ कि ना ।।

बिधना बनवले जोड़ी कवन बाटे मजबूरी
दूरी काहें तु बढ़वल भेद खोलबऽ कि ना ।।

काटे धा वे सेज संइया कइनी परहेज
अब ना होखता अंगेज





षष्ठी सूर्योपासना, तीन दिवस त्योहार।
मनसा-वाचा-कर्मणा, तन-मन का उपचार।

स्व साक्षात्कार
सार्वभौम स्वयंभू
शरणागति


गाँव के विकास खाति बदलल जरूरी बा


देह शिवाला देह देव बा , देहिए चारो धाम ।
देहि भूलि के भरमत भागे , जोगिया आठहुँ याम।।

एहि देह में दइब-बसेरा , भीतर जाके देखऽ ।
लउकी मय ब्रह्मांड ब्रह्म के , अंतर आँख निरेखऽ ।।


सभके मन हरियर रहे , मंगल होय बिहान ।
मन के दुविधा दूर हो , लोग बने इंसान ।।
लोग बने इंसान , प्रेम का पदक बँटाये ।
नारी का सम्मान , स्वर्ण से मोल बढ़ाये ।
सहजे मुफुती माल , अगते केहू न लपके ।
भरल रहे भंडार , खजाना घर में सभके

आईं तनी अजमावल जाय
दोस्ती का हऽ बतावल जाय
कबो बोली के गोली लग जाय तऽ
दिल के दुआर पो रंगोली बनावल जाय


कलुष काल ना गाल बजावे ,
राम नाम जब मुख पर आवे ।
सीताराम रसायन बूटी ,
बैर भाव मन से ले छुट्टी ।।


जवानी के झमेला में बुढ़वा धराइल बा
बुधनवा के जनमे से बुद्धि पकठाइल बा

बुढ़ऊ के बोली पर चल जाता गोली देखीं
नान्हे में सुलछना त चतुुरी कहाइल बा

पचासी के उमिर में पूड़ी पो टूट परस
पँचवे में पाड़े जी के धीरज धराइल बा

कत कहीं हाल हम रसिक बेवहार के
तुरही बजावे मन तन गर्हुआइल बा



पुरंदर के नखरा हेरा गइल छन में
परबत के पल में उठवले कन्हइया

सात दिन पवनार लगले बहावे जब
ग्वाल बाल ढ़ोर सभ बचवले कन्हइया

चुटकी भर टस मस भइल ना सुविधा
खीर पूड़ी ग्वाल के खियवलन कन्हइया

एका में बल बा साकार कइले गिरधर
इनर के पगरी झुकवलन कन्हइया


लाज बचाई कृष्ण ने , कुपित हुए जब इन्द्र


आज भी तिलकहरू के लाइन लग जाई ।
एतना सुनके सांझ खानि दुगो तिलकहरू चहुँप गइलन
फिर का ? बबुआजी के बहुरिया बेलना से बतियावे लगली । आ कहली, हे बेलन देवता ,
जे हमरा घर में डाका डाली ,
उनुकर भेजा करऽ खाली ।
बबुआ के बोली बदल गइल आ अगुआ के दाल जल गइल ।


मलकिनी हई दुर्गा जी हम हईं शेर
ऊ हई बहेलिया हम हईं बेटर
दाह ना लागेला पर्स के सतावे में
बाकी हँस देली इचिका त हो जाईं ढ़ेर


कानन कोंख कुजन का डेरा ,
कुपित कंक कुम्हलाये ।
कंकड़ मारत उड़े परिंदा,
बनमाली मुस्काये ।।

अपने आप गेह में जाके
छोड़े माल खजाना ।
बहुरि लवट ना अइहें बन में
बाटे सभ अनजाना ।।

चतुर शिकारी जाल बिछवले
डलले पुरहर दाना ।
जे जाई बन रास रचावे
मिली कतो न ठिकाना ।।

कइसे कहीं कि रस गगरी बा
उलिचत आन सबेरे।
ठोपे ठोपे ठाड़ दुआरी
भेंवत गात अनेरे ।।



दुर्गम राह सुगम चलवैया
साथ निभावे सुघर खेवैया



भले तन के पाँव में बेड़ी , मन तुरंग कबहुँ ना अकड़े
पथ में परबत आवे कतिनो , आगे बढ़े , कबो ना झगड़े
शांत सरोवर में पड़ जाई , एगो ढेला धीर धरीं
लहर सतह पर उमगी बाकि , ताल भितरिया ना बिगड़े

रामदुअरिया मुरुगा बोलल , भइल भोर अगवानी।
आजा संगे बुतरू जागल , सुगहन राति परानी ।।
घुमरी खेले काल चकरिया , गोल-गोल घुरनाइल।
अनछूअल साबुत कतहीं बा , कतो धूरि भुसुराइल।।
कहीं डाढ़ि में अँखुआ फूटल , पुहुप कहीं मुसुकाइल ।।
एक फली कुछ कँचगर कोमल , आन कहीं पकठाइल।
परकिति बइठल बिंब रचावे , कीरति बनल अनोखा।।
पानी भीतर अगिन लुकारी , झाँकल किरिन झरोखा।
छिटपुट बदरी आसमान में , पीछे परल इँजोरा।।
सुगना के संसर्गे आते , समुद उठल हिलकोरा।।

परानी = भाग जाना
घुरनाइल = चक्कर काटना
भुसुराइल = भुरभुरा
पुहुप = पुष्प


अहले भोरे ठाड़ कछारे , लउकल एक अजूबा।
बीच समंदर खेलत रहुवे , लालरंग पनडुब्बा ।
तरे सतह पर, गोता मारे , मलिमलि देह नहाए।
लगे हकासल खलिहा पेटे , चुनचुन तम के खाए।
छुधा शांत करि बहरी झाँकल , चलल खेत हरजोरी।
गाछ बिरछ लतई फुलवा सभ , उमगल आँगन खोरी।
रसिक





बाबा दिहले बेलना ऊ हम नाहीं तेजबो
बलमुआ कइसे कूटब रे मोरी सखिया
हमार जिया बोले रे मोरी सखिया

घरवा दुअरिया अँगना ओसारा




दीपोत्सव के आइल बारी
देत बधाई रसिक तिवारी
रहीं जरावत जोत से जोत
घर में पइसे खुशी के सोत



आत्म चिंतन
मन रहे अकेला
भोर के बेला
सूरज सहचरी
मन में हरियरी


बुर्ज पो लागे
सोझा लउकस
रवि अलबेला
तन के छूए





बाबा गूगल क देले, बतिया के बतंगड़
अइसन बजरल देह पो , कि हो गइनी लंगड़

जानेलु हमके लिखनी , लिखाइल जान मारेलु
रउआ कहाँ जातानी , कहाइल हमें जारेलु


केहु कहे बजरंगबली के , किरिपा हमरे ऊपर।
कहल केहु कि शंकरजी ले , हम बरियारा भू पर।
छूँछ रसिक छछबेहर बनि के , सबके से बतियावस
आठो याम बिना ईंधन के , चाॅपर रोज उड़ावस।

पूछत रहीं हम कि जानतारु
लिखा गइल जान मारेलु

भागल बा विबेकवा गाँवे हमनी के छोड़ के




हम हईं उत्तम पति
पत्नी के इशारा पो नाचेगी
फेसबुक पो लिखल सभ
चुप्पे चोरी बेचेनी
हम शेर हईं ऊ दुरूगा माई
का मजाल जे बात उठाईं
फेसबुक पो आवत नइखीं
चौबीस घंटा टहल बजाईं


पत्थर में डाल दे जान
यही है ईश्वर की पहचान




बुरबक बनके रहल ठीक बा
शीत ताप सब सहल ठीक बा
बइठल माछी मारे से तऽ
प्यार सिंधु में बहल ठीक बा
रसिक


शनि सोम अतवार मोबाइल , दुश्मन रिश्तेदार मोबाइल
बाप मतारी लगे दुधारी , मन के पहरेदार मोबाइल

पास पड़ोसी लागे दोषी अइसन छवले बा मदहोशी
सरवन बेटा दूर परइले , मरले बा तलवार मोबाइल

रक्तचाप चीनी धड़कन दिल , साथ रहेला आपस में मिल
योग जाप सभ छूट गइल बा , जीये के आधार मोबाइल


केकरा से कहीं दुख मिले नाहीं कबो सुख
बेलना चलावतिया हमरो मेहरिया ।।

दुरूगा भवानी बन शेर के सवारी करे
रोज लतियावतिया हमरो मेहरिया ।।

फेफरी परल बाटे भिरी नाहीं तनी साटे
रकति रोवावतिया हमरो मेहरिया ।।

गजटेड बोका बानी खूब करे मनमानी
हाड़ चटकावतिया हमरो मेहरिया ।।



रोना-धोना छोड़ दो , जश्न मनाओ यार
हाथ मिलाना सीख लो , कहता है सरदार
कहता है सरदार , स्वयं को उम्दा मानो
हीन भावना त्याग , शान से सीना तानो
सत्य करो स्वीकार , भूल जा जादू-टोना
जीवन है अनमोल , गलत है रोना-धोना


सुकवा के उगतहीं , चौंकि चले पौन-पंथी,
उत्तरी तलइया में , नहाले तीनडँड़िया,
कजरी रम्हाति बिया , निरखि के बछरू के
पोंछ ठाड़ कुरुचेली , अँकरे के पड़िया।
काँचे नीनि चुरूंगन , चहके उमंग भरि
घंटा धुनि गूंजे सुन , बाबाजी के मढ़िया
उषा के लिलार बिन्दी , ललछौहीं दीपति से
पुरुबी आकाशे जड़े , मूँगा कौन गढ़िया?


तीर्थ धाम कर लो सारे पर मंजिल नहीं मिलेगी
अपने अंदर भ्रमण करो तो घर में आँख खुलेगी

पूर्ण समर्पण जिस दिन होगा बाजेगी शहनाई
सत रज तम सब मिट जायेगा अंतस शून्य सगाई


भाखा भोजपुरिया के कम जन आँक भाई
एकरे भरोसे कहऽ छतरी छवाइल बा

गोदी में बइठि के आकाशबेल लहरे ले
ओसहीं तोहार आज मति भरमाइल बा

मेरुदंड टूट जाई आना-कानी करबऽ तऽ
बाड़ऽ तू भभूका काहे जीव छपिटाइल बा

चाउर बा पुरान पंथ खाति तू संगोर लऽ
ना तऽ होई घोरमठ्ठा असहीं बुझाइल बा



बेटी आपन , बहू पराई , हरपल होई हाथापाई
आपन माई मोती झारी , पति के माई घर में भारी ।
बेटा कुल में जोत जरावे , अनकर घर बिटिया बिलगावे ।
बहू बेकहली पाले परल , सास के मुँह से निकसे जहर ।
बेटा मेहर के गुन गावे , पोंछा घरे दमाद लगावे ।
समझ न आवे बेटा बाउर , कइसे भइल जँवाई जाउर
बदलऽ आपन सोंच कन्हइया , नीमन होई तबे समइया

सास बहू के बेटी माने , बहू सास के माई
घरसे तबहीं जाई जहमत , साँच बात बा भाई

अनबोलता क दिल मिलल , बोलता


थके-माँदे नँवमाथ सूरुज चलल जाले,
धरती आकाश मधे पसरे सँवर रंग।
बन के तलाई में ललाई काँपे थोरी-थोरी,
झुरमुट ओटे कुछ चिरईं करेली जंग।
खेतवा के आरी कहीं दादुर भुजंग धरे,
साँसत के टर्र धुनि सुनि सिहरेला अंग।
क्षितिज के छोरि चारु ओरि होखे धूँआ-धूँआ।
टापाटोईं तरई से भरेली आकाश गंग।


लागे अँखिया के धाह , बाटे लोगवा तबाह
नइखे कौनो परवाह , भोरहरिया में

लागे धरती धमस , मन रहेला ना वश
जमल जाता खून नस , दुपहरिया में

चाँटा मारेले अनंग , गोर गोर बाटे रंग
पीयले बिना चढ़े भंग , फरहरिये में

जूड़ा चिरँई के खोंता , रटे राम राम तोंता
जाप आठो पहर होता , मुसेहरिये में


पैर पखारत पपुआ पाकल खइनी मलत माहाराज
बेग उठाके चलल बबुआ दुशमन बने अनाज

फोकटचन गिरधारी मिलले कइले बंटाधार
आपस में पटरी बइठेला हवें लंगोटिया यार

एक के घर में खीर बनेला दूजा घर में जाउर
बा मजाल जे कह दे केहू उनही लोग के बाउर



करे देश के काज


जलहरण। 32 मात्रा। अंत में (।।)

कल्हुए झरोखे चढ़ि चाननी के चदरी में,
रजनी चोन्हात रही तनिका-सा बन ठन।

अइसे समुझि परे अँचरा के डोलले से,
सिहरि समीर मदमत्त धावे रन बन।

पूनो के उजास से दमके देह बदरी के,
लपकि झपकि लिपटावेली पवन तन।

खुलि जाला ब्रह्मरंध्र सुधारस पीयले से,
शरद निशा के कर परस जीवन धन।



सारी गलती देश की , मुझे हो रहा देर
रक्षक तो भगवान हैं , शासन में अंधेर

चलनी में सौ छेद बा , पानी ठहर न पाय
परशासन के कारने , जान हजारों जाय




हई देखीं अगुआ के माथ चकराइल बा
कुचुरन के दुनो ओरीं तम्मू तनाइल बा

बेटिहा से कहे कि लइका हऽ काना
लइकी के लागेला हरकत बचकाना
दुनो ओरि पीन मारि दीयर में पराइल बा
हई देखीं अगुआ के माथ चकराइल बा ।।

लइका के बोली के लोग नाहीं बुझेला
लइकी के



एह जिनिगिया के काहें जिया करतारऽ
अपना पो काहें गुमान करतारऽ

भारा भखाइल रहे आवेला तोहरा
अइल तऽ छँट गइल जिनिगी से कोहरा
बड़ होके काहें परेशान करतारऽ


सोचल बात दिमाग में , ना जाई बेकार
समय बहुत बलवान बा , करीं तनि इंतजार
करीं तनि इंतजार , सोच ना खाली जाई
रही नेक ईमान , लोग सभ पीछे धाई
हिम्मत कबो न हार , छोड़ दे कचरा कोचल
होई काल्ह बिहान , आँख के सोझा सोचल




हौसला बुलंद रही त ना परी पाला


बतावऽ ए विधना का हो रहल बा
समुझता सभ लोग तबो बेकहल बा


तान सुनली मुरलिया के भोरे भोरे
छोड़ सजना के सजनी पराई गइली

जलता रहे चिराग प्रेम का
तेल की कभी कमी न हो


पोता के हम संगें रहब
वाट्सएप के टाटा कहब



भुखल पेट पंडित नाऊ लो , जादोजी घर गइलन
सभ चालाकी जादोजी तब , चुटकी बजत भुलइलन

ए जजमानी जादोजी के , भइल भूत के भान बा
ऐरू गैरू भूत न हउए , बड़का ऊ हनुमान बा
गदा मार के जादोजी के , बनवलसि पेट कोठार
पूजा पाठ न होई जबले , जाई नाहीं हेंठार
शुभ मुहूर्त में पाठ न होई , घर के अन्न ओराई
बिन खइले भरपेटा उनुकर , मस्तक रोज फोराई
जादोजी से कहली तऽ ऊ , मंद मंद मुसुकइले
पंडित जी के फेर में पर के , आपन मुंड मुड़इले
जादोजी के अकिल हेराइल , घर में आइल तबाही
पंडित जी के मना ना कइले , नउआ देलस गवाही
पंडित नाऊ आँख मिलाके , जादो घरे लो पावल
खाँटी घी में हलुआ पूड़ी , छलीगर दही जमावल
दुई मन चाउर दछिना मिलल , नगद मिलल एकावन
असली घीव के भोजन रहे , मजिगर आ मनभावन
सतनारायन काथा होई , तबहीं किसमत जागी
बारह पूरनमासी पूरा , तबे भूतवा भागी
हिरदानंद विशाल चेत जा , रसिक से जन ल पंगा
पाप न छूटी सात जनम में , हजार नहइब गंगा




दादाजी हुक्का पियस , पापा धइले नेट
मम्मीजी के गोद से , कहिया होई भेंट
भइया बइठल खाट पो ,


स्वाति राजकुमार की

सब पर माँ ममता बरसाये



साधू बनके सोने की लंका में रहता


सफाई के अइसन बोखार चढ़ल बा
गोर मरद के माँग बढ़ल बा

भोरे भोरे कहली ऊ कि झाँवा रगड़ नहाईं
फिर चूना के लेप लगाके ओके धूप सुखाईं

लगते चूना दोदरा उठल भइल मुँह भकाऊँ
गोरका के चक्कर में करे करियावा हाऊ हाऊ

दसवाँ दिन जब चोंइटा छूटल मुँह भइल चितकाबर
ना करिया ना गोरे भइले लागस अब बिछखापर



चंचल चक्षु चारु चपला सा , ताने भौंह कमान
बिंबा अधर सुधा रस सरसे , हरषे सकल जहान


मी टू में धराइल बाड़ें रिंकिया के पापा
हाहो दइया होत बाटे घर में सियापा


तनी आव रे बिचरवा आव।
का लिखीं ई बतलाव?
कलम हाथ कुछ सूझत नइखे
इचि खोपरिया खजुलाव।

झूठो रार बढ़ावत बा लो',
आपुस में गरिआवत बा लो',
सुनल न चाहे बतिया साँची,
अनकथ पचरा गावत बा लो'।
आठो घरी वंचना जारी,
इन्ह झूठन के झुठलाव।

अपना घर में बमबम भोला,
अनकर घर बारूद के गोला,
छापा परे पथल कोइला पो,
ओढ़ि चले सतवादी चोला।
सजलसि मोरपंख में कागा,
भगता बन फिरे बिलाव।


चउक प अइले सियरम पंडित
सखियन संग सियारी मंडित
कहलन पंडित हईं नायाब
ज्ञान से सभके दिहनीं दाब
देखऽ लो सरकारी सोत
ए से सभकर बढ़लस जोत
कागज के पतरी दिखलवलें
अपना केरि सरेख बतवलें
हिरदानन इनरे में गिरलें
सियरू पंडित दाँत चिअरलें
डाँड़े रसरी बान्हऽ भाय
मारि हुमाचा खींचल जाय
ऊपर अइले उबरल जान
सियरू पंडित बड़ बुधिमान
जर-ज्वार में चरचा भारी
एकदिन तरकुल चढ़े तिवारी
नीचे तकते भइलसि भान
कंठे में अझुराइल प्रान
भर हियाव चिचिआए लगले
देखते लो किंचिआए लगले
सुनि के सियरू धावल अइले
अवते आपन मगज लगवले
तरकुल प सीढ़ी लगवइलें
रसिक डाँड़ रसरी बन्हवइलें
दस जन मिलिके मरले झोंका
भुद से धबकल बजल भड़ोका


खाँटी भोजपुरी के बखान होई अमही में
अठारह ग्यारह जुटान होई अमही में

भाखा भोजपुरी बा जरूरी काहें लोग जानी
ज्ञानी लोग बोलिहें तऽ ज्ञान होई अमही में

दुनिया आभासी बाकी लोगवा बा सचहुँ के
सोझा सोझी सभसे मिलान होई अमही में

अंजनजी अनुभूति के आत्मा संतुष्ट होई
दुनो दिव्य नाम के सम्मान होई अमही में

रसिक

खुश होते थे दंपती , पति दिखते भगवान
अब तो पत्नी लग रही , खड्ग निकाले म्यान
खड्ग निकाले म्यान , सामने है बेचारा
सबकुछ दे दी दान , दीन दीखे दुखियारा
बदल गया है वक्त , बहू नहले पे दहले
इज्जत की पहचान , मूँछ होती थी पहले

तेरी गरीबी
ऊँचाई देती मझे
दान करके
जान जाये जमाना
एक सेल्फी दे देना
कन्हैया

छोड़िके गुमान लाव स्वामीजी से नेहिया
दिने दिने दुबर होता उमिरिया के देहिया


भइया भाखा भोजपुरिया सजइब कि ना
अठारह नवंबर के अमही में अइब कि ना


पलक में खार ना आए
कुछ ऐसे कर्म हों जग में।
जमाना पीर ना पाए
सँभल ऐसे चलो मग में।
पूर्वजों से मिली तुमको
विरासत नेकनीयती की।
संचरित है वही शोणित
तेरे हर वक्त रग-रग में।


चाकू मारा जब कोई सहन किया सब पीर
नफरत के एक फूल से घायल हुआ शरीर
आशा की उज्वल किरन छोड़ गयी निज गात
जीने से क्या फायदा अपने करे आघात


जरता जवानी जइसे खनहन पात जी
सैंया बिना उमड़ेला आँखि बरसात जी
उपकार कइलका पहिले के, सरग में सीढ़ी लगवता
उमर बढ़ल अब जहमत लागे , बाबावा मुँह छिपावता

हीरो बनके पैंतीस में जे फेंकल रहे जाल
अब पैंसठ में पचरा गा के करत बाटे हलाल




आईं अबहीं खाइल जाव गुरहा गरम बताशा
दस बरीस के बाद नु होई मी टू खेल तमाशा
रसिक

तनी बोलऽ प्रेम के बोली , ना तऽ होई छीछालेदर
मारल जइबऽ एने ओने , अवरू घर में घुसी दलिद्दर

रोइब फूँका फारि तऽ बाबा के बोलावे के परी
छोड़ के नयका राह लौटके घरवा आवे के परी

इज्जत पुरुखन क बा कमाई , फेंकब वापस लौट न आई



ज्ञान के गगरी भरल नइखे , झूठे डफ पीटाता
माई बहिन क इज्जत रोजे , सरेआम बिकाता
पीएचडी क डिग्री लेके , पपुआ पान बनावे
बड़े शान से अपना के ऊ , सुरसती पूत बतावे
रसिक


बूझन बाबा गाँव में , बाड़ें बड़ बिदवान
कवनो भी आफत परल , उनुके पास निदान

कलुआ गिरल इनार में , दिहलन मगज प जोर
सीढ़ी डाल इनार में , डाँड़ में बन्हलन डोर

जोर लगाके हई सा , कइले बाबा शोर
खिंचत भुभुन टूट गइल , कहलस गम बा थोर

पूजल गइले गाँव में , बाबाजी पुरधान
बुद्धि के बलिहारी बा , उच्च कोटि के ज्ञान

बिरिजा पासी चढ़ गइल , तरकुल तूरे ताड़
पतई ध के लटकल बा , बाटे अलग पछाड़

बाबा आके जुगुत लगवले , लोगन से बतिया के
डाँड़े ओके बान्हऽ रसरी , कह देलन समझा के

सीढ़ी लागल ताड़ पेड़ पो , कमर जोर बन्हाइल
जय श्रीराम क लागल नारा , झट से भुँइया आइल

दाँत चिहरले आँख तड़ेरले , बिरिजा गइल सुरधाम
सुविधा सरग क भोग रहल बा , परी संगे आराम

होकर बड़ा सपूत ने , कर ली प्रेम विवाह
पढ़ी लिखी पत्नी मिली, मम्मी हुई तबाह
मम्मी हुई तबाह , बहू ना माने कहना
हीन भावना व्याप्त , साथ है मुश्किल रहना
सास न छोड़े अकड़ , बीते दिन मचिया सोकर
पुत्रवधू हैरान , बिलखे विदूषी होकर


बेलन फोरे माथ के , करम फोरे रफाल
ए बाबा किरिपा करीं , मुड़ी गड़ाइल खाल

केकरा पो करीं विश्वास हो सभे बा दुशमनवा
छोड़ देनी कइल हम आस हो केहू नइखे समनवा

नाया पुरान सभे टाही लगवले बा
मुफुत के माल मिले लार टपकवले बा
काटेला आन खेत घास हो मोर तड़पे परनवा

संजय दुलरूआ सिरिफ दुख हमार बुझेलन
हमरा ला लोगवा से दिन रात जुझेलन
उसे त बाड़न हमार खास हो सभे बा दुशमनवा ।।



जय भोजपुरी जय भोजपुरिया हम कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक रउआ सभके स्वागत करत बानी । 18 नवंबर 2018 के गोपालगंज जिला के भोरे प्रखंड के जिगना दूबे पोस्ट के अमही मिश्र गाँव में भोजपुरिया जुटान हो रहल बा ।रउआ सभ से हाथ जोड़ के आग्रह बा सभ कोई एह भोजपुरिया महाकुंभ में जरूर आईं ।साफ सुथरा भोजपुरी के आनंद लेबे खातिर । एह उतसो मे भोजपुरी के ब्याख्यान बिदवान


हाथ जोर बिनती बा परीं माई पँउआ
बड़ा नीक लागे सतीशजी के गँउआ

कार्तिक शुक्ल पक्ष तिथि बाटे दशमी
दिन अवतार शोभी अमही के रश्मि
जगमग करे लागी गलियो के झँउआ
बड़ा नीक लागे सतीशजी के गँउआ ।।

जय भोजपुरिया परिवार उहाँ जुटिहें
उतसो भोजपुरी के आनंद लोग लुटिहें
करीहें विदवान उँचा माई के नँउआ
बड़ा नीक लागे सतीशजी के गँउआ

प्रीति संजोली राकेश शशि अइहें
मदनजी मंचवा के शोभा बढ़इहें
नेवता पेठावे सभके नेटवाला नउआ
बड़ा नीक लागे सतीशजी के गँउआ



प्यारी साथ तनी चले दऽ हमके
साथ रहब तऽ सेवा कऽरब
गोड़ दबाइब जमके
प्यारी साथ तनी चले दऽ हमके ।।


कहते करेजा फाटे पियवा ना संगें बाटे
नयका मोबाइले निशानी बा बलमुआ

गाँव में दुतल्ला घर डमरू बाजे दुआर
सभ शास्त्र दर्शन के ज्ञानी बा बलमुआ

सिंधु एके साथ मिली पियवा के तन खिली
घड़ी में लकीर अभिमानी बा बलमुआ

शालीग्राम धोई पीहीं पतिवर्ता हम हईं
आदि देव रक्षा करीं दानी बा बलमुआ

चारो वेद पाठ करे अविरल जोत जरे
सभ अंग योगवा के ज्ञानी बा बलमुआ


लाठी रहे हाथ मोटा, कबूला के पँखिया


नवरातर में नौ दिन होखेला पूजइया
बड़ा नीक लागेला माई के नइया ।।

जगत जननी रउआ हईं जग तारन



के केकरा के सहता
सभ केहू दिन रात
अपने धुन में रहता
के केकरा के सहता ।।

बबुआ के बाबूजी लागतारे बाउर
माई के डँटला पो खात बाड़े माहुर





जनितीं कि होइत हमरा संगें अइसन घतिया
मनतीं ना बतिया तोहरो जिगरी संघतिया

काठ के करेज क के सहतानी साँसत
सभे देखे तन केहू मन नइखे बाँचत


खरा बात बोले सभी , खरा न सूने कोय
शब्द बान लागे हिया , आपा जल्दी खोय
आपा जल्दी खोय , जाय अपनापन छन में
लगे करेजा बान , कलुषता उपजे मन में
मतिया मारी जाय , जख्म दे जिगरी गहरा
हो मधु सिक्त जुबान ,

रसिक

आइल बा सीमा पो संकट बड़ भारी
जायेद हमरा के एहो प्रान प्यारी



नथुनिया हेरा गइल हाय मोरे सैंया

हमरो नथुनिया में हीरा जड़ल रहे
दाम रहे सोना से सवैया ।।
नथुनिया हेरा गइल हाय मोरे सैंया ।।



मैं के भीतर भीड़ समाइल
मैं के समझ में कुछ न आइल
कटल सोर तऽ मैं मैं करते
फुनगी के पतई मुरझाइल
रसिक

देशवा के हमनी के शान बानीजा
देखीं दुनिया में कइसे महान बानीजा



सभ खेला बा पइसवा के
जे अपना से अपनापन छोड़ावता
आ आन के आपन बतावता
दिल के भाखा लोग भुला गइल बा
आ अरथ के अरथी पर लो बन्हा गइल बा
इज्जत हाल का कहाला नइखे शउर
अपने से धरे लोग अपने माथे मउर
पइसा बा त जयमाल बा
ना तऽ लोग कंगाल बा
कुँवार लइकी अब कोंहड़ा के भाती नइखे
चाँद पो जात बिया
कंधा से कंधा मिलाके
फाइटर पलेन उड़ावत बाड़ी धीया

तरसावऽ जन बालम बतिया बनाके
दस साल हो गइल गवना कराके ।।

मुँह के देखाई उधार बाटे अबहीं
सिकरी बनावे के करार रहे तबहीं
चलतानी चानी के चीज चमका के
तरसावऽ जन बालम बतिया बनाके

आइल ना कबहीं ऊ मजिगर समइया
छूँछही के दे देल दु बेर बधइया
काम तूँ बना लेल मोहे फुसलाके ।
तरसावऽ जन बालम बतिया बनाके ।।

हमरा के छोडऽ तूँ बुचियन के देखऽ
चान नियन मुखड़ा के जी भर निरेखऽ
इतराइल जाई अब बेटी पढ़ाके ।
तरसावऽ जन बालम बतिया बनाके ।।



झूमका दुतल्ला चाहीं सउर अगोराई
दे के दस टकिया जन भउजी टरकाईं ।
झुमका दुतल्ला चाहीं सउर अगोराई ।।

बाड़ा रे रकटना से वंश बढ़िआइल बा
बीस बरिस बाद घरे खुशी ढ़ेर आइल बा
सोनवा के हार दे दऽ हमुँ झमकाईं ।
झुमका दुतल्ला चाहीं सउर अगोराई ।।

राम करस बबुआजी दिने दिन बढ़स
नीमन कमाई से चोटी पो चढ़स
देत बानी तोहरा के अनघा बधाई ।
झुमका दुतल्ला चाहीं सउर अगोराई ।।

बबुआ के चूम लेली गोदिया उठाके
ननदी के खुश कइली सिंकड़ी पेन्हाके
गोतिन लो गावे खेलवना बधाई
झुमका दुतल्ला चाहीं सउर अगोराई ।।


कबो माटी पो महल त कबो माटी में सुताई
ना जाने ई जिनिगी कवन कवन रंग देखाई

झूठो के लोग गुमान करेला अपना काया पो
झटपट रीझ जाला लोग कुदरत के माया पो
बाकी उहें पट खुलेला जे आइल बा से जाई
ना जाने ई जिनिगी कवन कवन रंग देखाई



प्रकृति का मित्र बनो
सबसे विचित्र बनो
पाँव हो जमीन पर
गगन में इत्र बनो
~ रसिक ~






नुमाइश हमें भी अच्छा लगता है
पर वजूद को गिरवी रख कर नहीं


गाय के लोगवा गोरू कहे कुकुर के कहे पूत
माई घर में काई काँछस मेहरी काते सूत
कइसन आइल उलट जमाना धूरी जोर बराता
असली माल क मान न होला नकली खूब बिकाता
रसिक


प्यार जीये के जरिया हऽ
प्यार माटी के नरिया हऽ
दु दिल क आपस में बान्हेला
प्यार राधा के सँवरिया हऽ
रसिक





दिल दरवाजा खोल , नेह का दीप जलाओ


जीतो दिल मुस्कान से , फैलाओ ये रोग
नमन करो परमातमा , श्रेष्ठ बने संयोग



आगे बढ़के बनऽ सरेख
तुरिके पगहा बदलऽ भेख
राम रतन धन आगे मिली
मिट जाई जिनिगी के मेख़

भोजपुरी 2




दोहा नइखे

ए रँवो तनी बोलीं ना

मन करे अगुआनी के खाना के नास दीं
कुकुर के झउरा में ओहनी के फाँस दीं



*************

चान जस चमकस विकास , हरदी कुटले बानी ।

बबुआ विकासजी के जान से जादा जनले बानी
दिने दिने करस उजास, हरदी कुटले बानी ।।

अवाइन ज्वाइन से नजर उतारस माई
बाबुजी के पगरी ऊँचास, हरदी कुटले बानी ।।

सातो रे बहिनिया के पुजीले चरनिया के
बबुआ के लागे ना बतास, हरदी कुटले बानी ।।

***************

गेहुँम के नइखे दरकार , मेंथा रोपले बानी
पइसा के होई भरमार , मेंथा रोपले बानी

एही रे मेंथवा से बाल बच्चा मौज करे
मौज करे हमरो रिश्तेदार, मेंथा रोपले बानी

मुफुत के बिजुरी से दन दना दन मोटर चले
कोड़नी करेला बनिहार, मेंथा रोपले बानी

केतना बड़ाई करीं दसो नोह घीव में बाटे
चमके लुगाई के लिलार, मेंथा रोपले बानी





मंजूर ना समुंदर के , हाथ गोड़ चलावल
शांत होके अइब त सिर पर बैठाई
रसिक
राम राम के बेला में सबके बा परनाम
दईब दया से चमके चेहरा बनल रहे सब काम
गम के दरिया पुल बन्हाये खुशहाली के दउरे रेल
केहु ना हो बदरंग ए भईया सुबह करावे सबसे मेल
~ कन्हैया


पत्थर प दूब नाहीं सागर से पनिवट ।
बात के बतंगड़ से लोग ना बिगड़िहें ।।
झूठ के मिलावट से महल अटारी बने।
साँच के बयार बही छने मे उजड़िहें ।।
बिराग श्मशान छूट जाई घर गइला प ।
हम के प्रभाव पा के लोगवा अकड़िहें ।।
रसिक के बात मान करम कुकाठ छोड़ ।
जादे अझुरइला से लोगवा लतड़िहें ।।

फूल खिली त एक दिन झुरइबे करी
पात पीपर के कबहुँ थिरइबे करी
ए जिनिगी के का बा भरोसा रसिक
ई समइया त सभके धिरइबे करी


मत्तगयंद

कंत बसंत अनंत कथा सजनी रजनी
बनि गैल बिघाती।
अंग अनंग करे नखरा तन होखत बा सरकंड सँघाती।
डाल हिँडोल लली सुकली लखि देह बने पुरईन क पाती।
काँपत नार समेटत आँचर ओट करी उसुकावस बाती।
~ रसिक ~


बुद्धि के बरियारी कहीं कि ज्ञान के हतेयारी
मानर पुजवावे खातिर डीजे खोजात बा।

गला लगावल ठीक बा , दिल से दिल मिल जाय ।
मुँह बिजुकावल ठीक ना , हाथ खजाना आय ।।
हाथ खजाना आय , लोग औकात प आवे । अपना के चालाक , आन के मूर्ख बतावे ।।

तेगा से अगते कलम चलित, तऽ जहर-जंग होइत काहे ?
हम से पहिले गम खाइत तऽ, अपुआ आपा खोइत काहे?
राम दुआरे सेवक बनिके, सुमिरन करिते जे रामरतन ।
भैंस क आगे बीन बजाके , पपुआ पछुआ धोइत काहे?

उल्टी लत लागल ए भइया ,
सेतिहा माल उड़ावे के ।
के आपन के गैर बुझाता ,
दुनिया के बतलावे के ।
देशवा मोरा सोन चिरइयाँ
कुछ लो घात लगवले बा ।
मोका आइल बा बम बोलs
फिन से लाज बचावे के


शारदा भवानी माई, विनती करे कन्हाई
मन के विकार धोईं , सकल समाज के

इरिखा से लोग मरे , मन प ना काबू करे
अँखियाँ से लोर ढ़रे , हाल देखि आज के

साँच प ना आवे आँच , झूठ के न नंग नाँच
केहू के ना जान जाये , भरे में बेयाज के

बेटा-बेटी पढ़े-लिखे , नीके-नीके गुन सीखे
करे लो बड़ाई रोज , बबुआ के काज के

~ रसिक ~


जब ले भेंटी सीटी मारी
मोका पा के काम बिगारी
बीच भँवर में नाव क जगहा
अपने सुगना बंसी डारी

जब ले भेंटी मारी सीटी
दोसर खाली थपरी पीटी
जहिया ना कहब त लोगवा
पलखत पाके मारी झिट्टी

दिल कहलसि बतियाव तनिका
दिमाग कहे निपटाव जल्दी
दिल दिमाग में मेल ना भइल
सोचीं समझीं सत्य उगल दीं
~ रसिक ~

कौल करार कनस्तर गइल
अब त जिनिगी फोंफी भइल
परुआ बैल कोंखियावल जाता
खुद के सही बता़वल जाता

जन जा विदेश सैंया करे खातिर नोकरी
घर में ना कमी बाटे बाबा के बा टोपरी

कोड़ीह कमइह खइह बनीह किसान हो
किसनवे से बढी अपना देशवा के सान हो
गड़ल बा खजाना लइह भरि भरि धोकरी

देता सरकार अब सुविधा हजार हो
नाया नाया सुविधा के होता अविष्कार हो



सोझा आवे में जे दिन पोर पोर जलेला
ओह दिन के लोग पोर पोर जल दिन कहेला

जीयल कइलसि मोहाल
दिने राति खोजता सिपहिया ।

पियवा से चुपे चोरी नोट तहिअवनी
सखिया सलेहर मिली सच के छुपवनी
अचके में कइलसि बेहाल
दिने राति खोजता सिपहिया ।



आव ए मलकिनी
हई गुलाब लेल
दिन गुलाबी बा
भर हफ्ता पगलाये के बा
आ चउदह फरवरी के
कुंभ नहाये के बा


माई सुरसती जी के , चरन में माथ धरीं
जय भोजपुरी कहे , मय भोजपुरिया

बोली में मिठास घोरे , हुलसेला पोरे पोरे
बाबूजी के गोड़ धरे , मय भोजपुरिया

आन जाने इचिको ना , सभके करेज रहे
काम करे, डरे नाहीं , मय भोजपुरिया

ओही भोजपुरिया के होखता जुटान भाई
नेवता दियाता जुटे मय भोजपुरिया


हाथ बान्ह के राशन बाँटे
उल्टा चोर कोतवाल को डांटे


साँच के आँच बरदास ना होला
लोग के चाहीं भाँग के गोला


सभ कुरसी के खेल बा , आन्हर लंगड़ यार ।
आफत में सभ साथ बा, बिल्ली कुकुर सियार ।।
बिल्ली कुकुर सियार , सुबह गावे परभाती ।
फोंफी फूँके काक , कबूतर बाज दे पाती



बितल जाता रोज दिन

रहि रहि जीयरा जरावेला फगुनवा


अजगुत लउकल अजगर के घर
नेउर नाल बजावे,
मिरिग मधे मृगराज मगन हो
बन में जग्ग करावे ।
चुटरी ले गुलदस्ता चलली
बिलरू के अगवानी,
गहुमन बेंग घरे फुफकारत
लावसि भरि-भरि पानी।
बगुला भगत रामधुन गावस
मछरी मुरकी पारे,
नीन तेज बादुर बदजायी
बनठन चलल सकारे।
घोघी बान्ह हुँड़ार चबेनी
पड़रू सङ्हे खेले,
भेंड झुंड से तनिका ताने
घूमे राति अकेले।
पुछलें भोलानाथ बताईं
अचरज कइसे होता?
बानर पुनुई पेड़ बनावे
काहें चिरइन खोंता ?
एके सुर में सभजन कहलें
बन आइल इक पंडा,
उहे सभे के सकदम कइलसि
लेके सत के डंडा।

कहलें भोलेनाथ बतावऽ
के झूठा के सच्चा?
कइसे एकर निरनय होई
पकठाइल भा कच्चा?
सभ लो दसखत करे करार पऽ
ओके मार भगाइब,
के करिहनि अगुआई बोलऽ
ओ से हाथ मिलाइब।
बनल रही ई भइवध ना तऽ
प्रेम पनारे जाई,
होखे अगर कबूल तऽ कहऽ
अबहीं गले लगाईं।
अतिना सुनते सभजन छटकल
मंच भइल बा रीता,
कहे कन्हैया सोझ बात ई
भल मीठा भल तीता।


एने ओने दुनो ओरि भइया सतीश हो
दुलहिन के उजुबुक आ हमर भाई ईश हो
बैंक वाला लउकत बा तन से कंगाल हो
धँसली बाटे जबड़ा में ओकर चिकन गाल हो
देखऽ रिसिआइल बाड़ें केश खउराइल बा
हउअन चुहाड़ हमरा ओसहीं बुझाइल बा
गाल बाटे पुआ जइसन पूरी काहें कहेला
देखते निरोग काया नाक ओकर बहेला
बेटिहा विबेक बेलबटम पेन्हके नाचेले
बबुआ विबेक मोर वेद रोज बाँचेले
देखऽ हऊ पगरियावाला खा के करे पगुरी
बाबाजी दुअरिका के धइले बाटे अंगुरी

सफर में कट गये तैंतालीस बसंत, तकरार कम न हुआ
होता रहा नित नया वाग्युद्ध पर नयन नम न हुआ
कटु वचनों के तीर निरंतर चलते रहे दोनो तरफ से
दागते रहे रॉकेट, अनार लेकिन पटाखा कभी बम न हुआ


तेतालीस बरीस पहिले खुलके हँसले रहीं
तबसे अब तक हँसी प टैक्स भरत बानी
का कहीं केकरा से कहीं कइसे कहीं
हाथ बा बान्हल ए से फैक्स करत बानी



चेहरा प हँसी नाहीं सभ कुछ बा मनाही
अजुए के दिन एगो घटल रहे घटना

उनइस छिहत्तर साल चानी प के उडल बाल

घञ


चालीस तीन पहिले के एगो बाटे घटना

आदि भवानी शेष महेश गनेस के सिर नाईं
कुँवर कुमार कर जोर बिनयी हम एह महफिल में आईं
सुर देवी माई सुरसती रउए शरन में बानी
कंठ बिराजीं आके मइया तब हम शंख बजाईं

राम सिया सुमिरो नित सुबहे, शंकर अवरू भवानी
सेवक रसिक समरपित तन मन, धन अरू सकल निसानी
संत जनन सुरसरी सभ सरिता , पावन पवन नूरानी










आगे आगे चोंच चलावे
ओके लो अगुआ बतलावे
बइठल बइठल पान चबावे
ओके लो अगुआ बतलावे
दाब ओलार अँगेज करावे
ओके लो अगुआ बतलावे
छः के छब्बीस कह समझावे
ओके लो अगुआ बतलावे
बेटहा बेटिहा झउर करावे
ओके लो अगुआ बतलावे


एने ओने जन देखऽ इहे ह अगुआवा
बड़े बड़े आँख जाइसे ताकता ऊरूआवा
बतबनावना भसुरवा देखऽ पी के ढिमिलात बा
चोरवले बा जिलेबी ए से मुँह चटचटात बा
बम्बेवाला भसुरा के भारी भइल पेट बा
बंगलोर वाला भसुरा गाड़ी काहें लेट बा
दाँत नइखे मुँहवा मे गते गते खात बा
टपर टपर बोले लबलबिया बुझात बा
मोछवाला भसुरा भुलाइल बा बिदेस में
टुकुर टुकुर मुँह देखे नवहिन के रेस में
नटुरा भसुरावा बइठल नेटा पोंछे नाक के
खेखर नीयन हँसत बाटे छने छने ताक के
दुलहा के छोट भाई ठर्रा लेके बइठल बा
कुकुरा के संगें काहे ओकर देहिया अंइठल बा



रउआ घरे जाइब तऽ का का खिआइब
हमरा घरे आइब तऽ का लेके आइब

दोस्त हईं तऽ दुआर प अइबे करब
जवन पुआ पकवान मिली खइबे करब
हमरा घरे आईं थरिया भर लेके
दोस्ती निभावे खातिर सभ धरबे करब

नेता खइहें चाय पकौड़ा
खुद पर मत बरसे दऽ कोड़ा
प्रेम परस्पर जन बिलगावऽ
आवऽ मिलके जोत जलावऽ


छोड़के गइल केकरा भरोसा 18
परोसा नाहीं बाहर में मिली 18
रोपलऽ जे नया फूल गेंदा 17
पटवला बिना फूल ना खिली 16

बियाबान में बल मिलल, अइनी रउआ साथ
लमहर पथ दूबर भइल , जब फैलवनी हाथ
जब फैलवनी हाथ , बढ़ल हिम्मत चरगुन्ना
गावे मेघ-मल्हार , मगन मन ले झुनझुन्ना
पावन भइल परान, पाँखि लागल जहान में
हमरो मिटल पियास , पाई घन बियाबान में

लागत बा मरले बिया , झटके अइसन लात
रितु बसंत में का भइल , दरद करे मय गात
दरद करे मय गात , न बाबा बात बतावस
अपना के भगवंत , आन अछरंग लगावस
लउकत नइखे राह , जोस जियरा दागत बा
अब ना होय उड़ान, भभिख चउपट लागत बा

काम सतावल आम बा , काहे के अवसाद
सभकर एके हाल बा, बिगरल मुँह के स्वाद ।
बिगरल मुँह के स्वाद, हूब अब तन में नाहीं ।
मन के अनगढ़ चाल , उमिरियो करे बिसाही
करे न तन संवाद , हरिन-मन कुरचे धावे।
रसिक ल माला हाथ , जा घरी काम सतावे ।

फँसरी डालल ठीक ना, मन पऽ राखीं जोर।
कसीं खाट के ओरचन, सुतरी छान सँगोर।
सुतरी छान सँगोर, हिए में हरि के धरलीं।
पउआ पाटी ठोक , चूर के चौबन करलीं।
रेसा छोड़े साथ , न अइठन आई रसरी।
धावल अइहें राम, निवारे गर के फँसरी।


दस में मिलल नौ
हमके चाहीं परसेंट सौ
आपन करनी काठ के हाँड़ी
कबहुँ ना कुछ पाकल
तोहर पतुकी आँच लगाके
जाता चूल्हा झांकल




ढ़िबरी के पेनी में जइसे अन्हार बा ।
पिया बिन ए सखी ओसहीं सिंगार बा ।।


अपना मन के बात चली तऽ, सभ लो थपरी पीटी
साँच बात बतियावल जा तऽ , छिपके मारी झिट्टी
अपने करम के फल मिले तऽ , आन नजर खराब बा
नाली में मुँह अउन्हल बाड़न , ढरल पेट शराब बा


शांति घर में बइठल रहीं
भाव आइल घनघोर
अइसन लागल सुनर रचना
नाचत बा मन में मोर
जसहीं धोवनी हाथ का कहीं
भावो साथ धोआइल
छाती पीटत रह गइनी हम
लवट के फिर ना आइल


दुनिया से लाज बा
अइसने समाज बा

कइसे आईं सोझा सैंया, सासूजी अंगनवाँ जी
देखतीं सुरतिया राउर , छछने परनवा जी ।।

रतिया के बतिया से चोट बड़ा लागल बा
देखे खातिर दिनवा में



परदा में कुछ हो रहल , मुंड मुंड मति भिन्न
देख देख अंतर्वसन , लोग हो रहे खिन्न
लोग हो रहे खिन्न , समझ में कुछ ना आवे
कोई कहे अनर्थ , कोई मन भ्रम बतावे
धोबिया करे काम , पड़े न वसन पे गरदा
उपजल मने विकार , पड़ल बुद्धि प परदा
~ रसिक ~

नाम तिरंगा रंग पाँच बा ,
अचरज होता बोले में ।
बाकी बतिया साँच कहीले
कठुआ लागे बोले में ।।

रंग पहिलका केशरिया बा
रग रग जोस जगावेला
उज्जर रंग बीच में बडुए
शांति मार्ग समझावेला
सरहद पर तैनात सिपाही
पग पग लगल टटोले में ।।

हरा रंग बा खुशहाली के
मिट्टी के महिमा गावे
चउथा रंग चक्र विकास के
सागर नीला बतलावे
चक विकास के मोद मनावे
सरपट पथ पऽ डोले में ।।

बबुआ सीमा पर जागल बा
देखके दुसमन काँपता
घात लगाके गोली दागे
आवते सोझा भागता
पँचवा रंग रक्त के धब्बा
दिखल तिरंगा खोले में ।।
~ रसिक ~


जेकरा के हम गोद खेलवनी उहे कइलसि घात ।
देत रहीं परतोख पुन्य के उहे बिगड़लसि बात ।।



कल जो सरकारी दफ्तर में देह चुराते थे
आज अपने दफ्तर में वफादारी की पाठ पढ़ाते हैं ।

क्या ये देश उनका नहीं है ?


के साधू के जोगी ?
के स्वस्थ के जोगी ?

सधल बा जे ऊ साधू
जागल बा जे ऊ जोगी
अपने आप में मस्त स्वस्थ बा
रोवत रहे हरदम ऊ रोगी


जब मोका मिले
विचार के अदला-बदली
क लेबे के चाहीं

दुर्गेश मिसिरजी के घर
जुटल लोग कवि प्रवर
श्रेष्ठ कविवर दादा राश
सुनवनी आपन वृतांत खास
राजेंद्र जी राही
देखवनी आपन सियाही
का कहीं कवि जवाहर लाल के
पढ़नी कविता कमाल के

भावुक होके विभा दीदी
सभके आँख भिंजवली
और रसिक बबुआ के सिर पर
आपन हाथ लगवली

सेवा में तत्पर रहे
दुर्गेश मिश्र परिवार ।
अपनापन पुरहर मिलल
सपना भइल साकार।।







सनेहिया के थाती हम कहँवा संगोरीं
जभो जभो जागल परिवार के अगोरीं


बतिया के निमन आगाज रखीह
हमरो सेनुरवा के लाज रखीह
छलकत जवनिया के ताख रखीह
सवतिनिया के रहिया में काँट रखीह
आँचरा के पतरा में रहब हम बन्हाइल
देखब ना गोरी हो तोहार कुम्हलाइल
हमरा पो तुहु बिसवास रखीह
चढ़ल जवनिया आबाद रखीह
छलकत जवनिया के ताख रखीह
सवतिनिया के रहिया में काँट रखीह।।
छछनेला तोहरा ला हमरो परान हो
जब जब मेरेल नजरिया के बान हो
कसके पकड़ले तु रास रखीह
रतिया के बतिया इयाद रखीह।।
हमरा पो तुहु बिसवास रखीह
चढ़ल जवनिया आबाद रखीह।।
करब ना कबहु करम से नादानी
छलकी ना कतही जवनिया के पानी
आपन कमरिया कटाह रखीह
हँसके रसिक से संवाद रखीह
छलकत जवनिया के ताख रखीह
सवतिनिया के रहिया में काँट रखीह।।

भामा भरम मिटवले बाड़ी
दरपन आज दिखवले बाड़ी
साठ बरिस के हम हो गइनी
हमरा के बतलवले बाड़ी

मुँह के चउकठ टूट गइल बा
चढ़ल अटारी झूठ भइल बा
पाणिग्रहण से गरहन लागी
अब ना जिनिगी सरपट भागी

आपन औकात भुलाईं जन
जौहर झूठो देखाईं जन
हम जानीं कतिना पानी में
तरुआर प धार चढ़ाईं जन



बेचारे पति का करस , पत्नी मिललि कटाह ।
बाते-बाते मात दे , जिनिगी कइलि बिदाह।।
जिनिगी कइलि बिदाह, अंत ना फ़रमाइश के ।
बलम चलीसा पार , बहुरिया मध बाइस के ।।
भइलन अस बदहाल, फिरस सगरी मतिमारे।
धनी अर्हावस काज , पुरावस पति बेचारे।।
~ रसिक ~

जवन बा तव हबेखऽ
आन के जन निरेखऽ
दइब समरदसी हवें
पर के दुख भी देखऽ









दागदार सभके चुनर,
राउर परम पवित्र।
आन घरे फाँकाकसी,
रावरि चित्र-विचित्र।।

लोग अवरि होइहें दुखी,
आपन बिपत धनेर।
जिनिगी भरि लगले रहल,
सै से कम के फेर।।

छाड़ि निहारल आन के,
खुदहीं के पहिचान।
गाँठि गेंठि हिंहईं रही,
पीछे छुटी जहान।।

रहि जाई गठरी हिहें,
करनी जाई संग।
पढ़ लीं पोथी प्रेम के,
रसिक लगइहें अंग।।




सभके बदन में आग बा

त्रिविध ताप
पसरे तन पर
उपाय करऽ ।

चलऽ लगावे
तिरबेनी में गोता
बान्हऽ मोटरी ।

तन बा कुंभ
मन कर्म वचन
तीनों के तारऽ ।

काल के गाल
जिन्दगी करे जंग
रहो मलंग





जिनिगी हरपल हऽ उतिम, हरपल जिनिगी जंग।
कहईं राहे काँट-कुश, कहईं रंग-विरंग।
कहईं रंग-विरंग, कबो इतिहान सरेखे।
चंचल मन के साध, बुद्धि से जोखे-लेखे।
मंजिल टेढ़ी खीर, जरे हर पग पऽ चिनिगी।
होखे मन निरदुंद, सफल कट जाए जिनिगी।




काजर नइखी कइले , अँखिये कजरारी हऽ
अस्त्र के का जरूरत , कनखिये कटारी हऽ
बिजुरी के झटका जस , करेंट मारस झट से
भवजाल में फँसाके , परान लेली पट से


बेचारे पति का करस , पत्नी मिललि कटाह ।
बाते-बाते मात दे , जिनिगी कइलि बिदाह।।
जिनिगी कइलि बिदाह, अंत ना फ़रमाइश के ।
बलम चलीसा पार, बहुरिया मध बाइस के ।।
भइलन अस बदहाल, फिरस सगरी मतिमारे।
धनी अर्हावस काज , पुरावस पति बेचारे।।


गोबर भरल दिमाग में, कइसे सूझी राह।
गुरु गइले परयाग लग, सिस के धइलसि ग्राह।
सिस के धइलसि ग्राह, ज्ञान के हँड़िया फूटल।
कइसे उबरी जान, पसेना सभकर छूटल।
झूठ बजावे ढोल, साँच के लटकल थोबर।
से लोगो पतियाय, मगज में गाँजल गोबर।
~रसिक ~

सबका मालिक एक है,
सत्य वचन सुविचार ।
संसय मन में ना रहे ,
दिल में हो उद्गार ।।
~ रसिक ~


बोले तो मुँहफट न बोले तो गूंगा ।
कहानी सभी की हीं उलझन भरी है ।।

एगो घूँघट डलले आवे
दूजा घूँघट डालल जाला
दरब दियाला मुँह देखाई
रूप देख लो डाले माला
डोली लेके चले कहँरिया
अर्थी आपन कान्ह उठावे
सगुन उठेला हरदी लागे
जात घरी मय तन पियराला
रसिक


नई फसल के गुर चूरा से ,
खिचड़ी आज मनाईं ।
राजनीति के रहरेठा से ,
जमके करीं धुनाई ।।
प्रेम भाव जे बिसरल कहऊँ,
ओके हिये लगाईं ।
कहे रसिक कि संक्रांति के
खूब पतंग उड़ाईं ।।

~ रसिक ~

आपके सुवास से सुवासित मैं हो गया
विचार के स्पंदन में मन मेरा खो गया
आनन पर हास लिये खास आप लगते हो
आपका व्यक्तित्व देख आपका हीं हो गया


आपके नाम संग जी लगाना चाहता था
पर सुना है दिल को दिखावा पसंद नहीं

दिल मिले दिल से मुहब्बत की लीक है
आशिक के


फलनिया के लइकी के चार गो लइकन से बा चक्कर
चिलनिया के पतोह सास के घर में देले टक्कर
बुढ़वा रसिक बनल बा बछरू देखते आँख मिलावेला





दर्द को मत कुरेदो
बहुत गहरा है
वैसे तो जीवन
दीखता सुनहरा है
पर प्रत्येक मोड़ पर टाँके है
फूल अभी खिला नहीं
काँटे ही काँटे हैं
कन्हैया

दीहीं लाख बधाई रविशंकर तिवारी के
भोजपुरिया बिहारी के ना ।

युग युग जीय बबुआ ढ़ेर
सुख में बिते रोज सबेर
किरिपा बरसत रहे शंभु त्रिपुरारी के
भोजपुरिया बिहारी के ना ।

जौ जौ आगर मिले स्नेह
आफत आवे ना कबहुँ गेह
सर पे हाथ बा सुरसती महतारी के ।
भोजपुरिया बिहारी के ना ।

देले असीस सतीश सुभाष
पूरा होखे तोहरो आस
लेलऽ खाँची भर सनेह रसिक तिवारी के
भोजपुरिया बिहारी के ना ।






जार्जेट के साड़ी प पीयर बा बूटी

धन कुबेर समझे नहीं , स्वेद बूँद का मोल ।
लक्ष्मी वाहन ना दिखे ,


झूठ के पहाड़ बनता तऽ बने दऽ,
जरला से सोना के कीमत कम ना होला ।

दिल और दिमाग में बस तूँ हीं तूँ रहते हो
अंजान बनके मुझसे कुछ भी नहीं कहते हो
दिल के रिश्ते को दिल क्यों न मानता है

ये रिश्ता है जब दिल का तो दिल क्यों नहीं मानता है

शहर के धन होशियारी में
गाँव के धन कियारी में

अपने पडोसियों को कभी गिरने न दिया
इसलिए वो शख्स महान है

जलने से सोना को डर कैसा ?
भस्म बनकर भी महत्ता कायम रखता है ।

हरि बोल रे मनवा घरी घरी ।
बाड़ ना कबहुँ खेतवा चरी ।।

मन में विचार के ताँता लागल बा
काहें दो पकड़ला पो परा जाता
रसिक
स्वागत बा सरकार राउर

पति में सबकुछ मिल गया , मालिक सेवादार ।
पूरा पैसा सौंप दे , फिर भी करज उधार ।।
फिर भी करज उधार , रोज फरमाइस होला ।
चिंता चढ़े कपार , रोज मासा से तोला ।।


भाव के संभालऽ
लगाव बढ़ जाई
उतरल भँड़ेहर
फिर से चढ़ जाई


मउअत से डर काहें,
जिनिगी के जसन काहें ना?
घुट-घुटके जीए से
मउअत रहता ना बदल ली
अबहीं खुलिके हँस लऽ
लोगन के दिल में बस लऽ
कउआ नहान से भगवान ना भड़किहें
लइका बन जा भगवान ना घुड़किहें ।


मन में विचार के ताँता लागल बा
काहें दो पकड़ला पो परा जाता
रसिक


जेकरा के हम पाठ पढ़वनी उहे पाठ पढ़ावत बा
जेके खातिर बिगहा बेचनी उहे टाँग अड़ावत बा
आन भरोसे आगे बढ़ल परहित समझ ना आवेला
पेट साटके खोभ कटारी तबहुँ आपन बतावेला


जल्दी करऽ जाये के तैयारी इयारी में लस अब नइखे


भोजपुरी के मान्यता , दीहीं ए सरकार ।
कोटि लोग के आसरा, जल्दी करीं साकार ।।


चढ़ल भँड़ेहर उतर गइल
पपुआ खा के पलर गइल
माई के तपसेया सभ
घुंसारी में लहर गइल

पढ़ाई में तेज रहे
पापा के करेज रहे
सिधवा श्रीमान जस
लड़ाई परहेज रहे


दिलवा में माई के बसेरा बा ए सैंया जी
उनुके आशीर्वाद से सबेरा बा ए सैंया जी

भोरे भोरे माई के सिंगार हम करेनी
चुनरी चूड़ी सेनुर लाले मंगिया में भरेनी
बिना माई सगरे अन्हेरा बा ए सैंया जी ।।

सातो रे बहिनिया के शक्ति लोग जानेला




नयका साल
नयकी बहुरिया
हर्षित हिना

कल्हुए ऊ साल गइल
भीतर ले साल गइल।

सालो भर साथ रहल
सुख दुःख के बात कहल
अचके में पपनी प
पानी ऊ डाल गइल ।

कहला के मनलसि के?
जनलसि ऊ सबहिन के
आपन बनावहीं में
पेट तनी खाल भइल ।

अब ना ऊ कबो मिली
नाहीं ओकर तन हिली
करनी से जन-जन के
साँसत में डाल गइल


अँखिया के सोझा रहब जिनिगी के राह में


मी के ला दऽ मोबाइल हमार पिया
हमरो बदली इस्टाइल हमार पिया


गये साल को दर्द दो अपना
नये साल साकार हो सपना
बैर भाव सब भस्मीभूत हो









सरसों साग मकइया रोटी ,
भर जाड़ा नीके सरपोटीं ।
गरमा गरम दूध के साथे ,
गुड़ मिलाके भूँइयाँ लोटीं ।।

ऊपर पुअरा नीचे पुअरा
ओढ़न और बिछावन पुअरा
लेवा जगदेवा कहलाला
देसी एसी होला पुअरा




कइसे लहलहाई गमला
जब छापर परल बा कमला


चोखा खा के ऊब भइल बा
अब लोगन के चोखा चाहीं
काया रोग रहित बा सभके
अब लोगन के पोखा चाहीं
आगे बढ़िके काम न होई
बाछा बैल हरिस अवगाहीं
बपसी बलु खोभाड़ अगोरस
बबुआ रामझरोखा चाहीं

चोखा = एक ब्यंजन
चोखा = बाँक, चटखारा , नीमन
अवगाहीं = निकाल बाहर।
पोखा =पुष्ट, पोढ़ाइल
झरोखा = खिड़की
रामझरोखा = ए सी ( एयर कंडीशनर)



ढेला ओइँछि आपन दुख के,
करऽ पुरनका साल विदाई ।
सुख-समृद्धि संतान प्रफुल्लित ,
नया बरिस नूतन छवि छाई।।
बीत गइल ऊ बात बिसारऽ ,
आगे पाँय बढ़ावल जाई ।
का राखल बा मुँह लटकवले ,
सबहिन के समुझावल जाई ।।


उदबेगले बा उल्टी करब
अनका कान्ह बनुखिआ धरब
जब आई खुद माथे ऊपर
पोंछ सटाके सरपट धरब

टिटकारी प काँखस भरकस
हुरवठलो प तनिक न सरकस
भरल नाद में गवत देखते
पोंछ उठा अलबत्ते छरकस

करिया मुँह पो कजरी कइलसि
पान मगहिया मुँह में धइलसि
धपधप उज्जर कोट पहिन के
गाँव के दखिन भाग परइलसि




रेंड़ी गिनके तिथि बतावस , छिंक मारके जतरा




एहि नयका साल
कुछ करऽ
अइसन कमाल
जेकरा से चमके
माई के भाल

रोकऽ रकतपात
भेव मिटे जात-पाँत
घरके बहुरिया
जरे जनि
राखऽ ना जाँत-जाँत

किसान कठुआए जन
बिसमाद ना रहे मन
आन के भरोसे ना
उजियाय कवनो तन

स्वेद बहे खून ना
शोर रहे सून ना
फौजिन के छाती पर
तमगा चढ़े
प्रसून ना

बेटिन के राह-बाट
बिरिधन के ठाट-खाट
हरदम निर्बाध रहे
शासन, समाज के
उन्नति के साध रहे



दिखावा के जिनिगी
हथौड़ा कपार पर
सिंगार-पटार सभ
बइठल किछार पर
जर जमीन के ऊपरे बा लउकत
एही विकास प बबुआ बा फउकत
रंग पहिलके ठीक रहे
अब तऽ बुझाते नइखे
लाल बा कि पियर
खाली लिखा जाता कागज प
हैलो माई डियर
कादो कहल जाता कि
बबुआ अप-टू-डेट बा
हमरा त बुझाता ल
सबकुछ अगतहीं से सेट बा
ए बाबा, आँखि मूँने से पहिले
आँख मूँन लऽ।
~ रसिक ~

लाल चाका देखके भोर के भरम हो जाला ।
धूप में रहला पो ताजा भी नरम हो जाला
हम तऽ फिरिज के कठुआइल सब्जी हईं
खाये से पहिले इचिका गरम हो जाला

आना-कानी ना मनमानी , लइकन संगे लइका हो जा ।
छोड़ऽ बुढ़ऊ बात पुरानी , कर मोबाइल लेके खो जा ।
जोड़-घटाव आ गुना भागा , जाड़ा में कठुआए दीहऽ ।
करऽ आपन सोच रूहानी, जनमतुआ जस पावन होजा ।

अंग लगला पो जियरा जुड़ाइल रहे ।
रतिया कइसे कटल लो भुलाइल रहे
एह परिवार में बाटे जादू भरल
सोझा अइला प मनवा थिराइल रहे

का बताईं कि केतना खजाना मिलल
चान क देख दिल में कुमुदिनी खिलल
रहे देह राह में कचटाइल तऽ का
केहू जगे से अपना न इचिको हिलल

रसिक

मलि मलि अंग नहाय
कामिनी फुर्सत के पल

हाय दैया अचके में छूटल घरिलवा

पिया दिल में समाके दिल तोड़ देलऽ
काहें मुँह मोड़ लेलऽ ना

चरचा होता गाँवे गाँव , तोहर टिकत नइखे पाँव
कादो नाता सवतिया से जोड़ लेलऽ ।
काहें मुँह मोड़ लेलऽ ना ।।

जबले रहीं हम कुँवार ,रोज कोड़ऽ तूँ दुआर
जोड़ि नेहिया के गरदन मरोड़ देलऽ
काहें मुँह मोड़ लेलऽ ना ।।

जाके करब हम रिपोट, रउआ मन में बा खोट
काहें प्रीति के बबलु तूँ छोड़ देलऽ
काहें मुँह मोड़ लेलऽ ना ।।


मन में बैठा
जल थल अंबर
प्रकृति प्रिया


जिनिगी के मैदान में पँइचा उधार ना होला
आपन पूँजी लगवले बिना बेपार ना होला
लोग त सपना देखेला तरई तूरके लइतीं
बाकी बे पगलइले सपना साकार ना होला

छोड़ीं लिखल अरकच बथुआ राम नाम गुन गावल जाय
जिनिगी के सुख बा एही में मन के भरम मिटावल जाय



मुख दुर्गंध
वस्त्र मनमोहक
उपला ज्ञान

जाति की जंग
खोया है जनतंत्र
भैंस को बीन

छूदर लोग
भभीख के मालिक
यक्ष सवाल

मुँह मुखौटा
वचन सुभाषित
हाथ कटारी

भूआ उड़ल
किरपिन के भोज
भूखा बाभन

भूल गइनी
विचार के मेला में
आपन रूप

मन में बैठा
जल थल अंबर
प्रकृति प्रिया

भकभउँजा
छेहर जिनिगी के

जे भइया के नाच नचावे ,
उनुकर महिमा कान्हा गावे ।
भइया राम सिया भौजाई ,
माथ झुकावे अनुज कन्हाई ।
जिनिगी में ना बाधा आये ,
ढ़रकत सांझ अनत सुख पाये ।
आजु क दिन गंगा जस पावन ,
सौवा साल लगी मनभावन ।
जय जय जय गंगा महरानी,
भइया भाभी काटस चानी ।


मुँह खरकटल बा लोसन लगाली
पाटी खाति तैयार होईं हाली



बेटी के बिआह खाति बाबूजी तबाह बाड़ें ।
बेटा मोबाइल प इन्टरनेट चलावता ।।

हाड़ तूरि काम क के छोंड़ भरस घर के।
अपना के छँवड़ा अपटूडेट बतावता ।।

हड़री में पेंडुरी चढ़ जाता उठला पर ।
जवानी के जोम में ऊ सेंट गमकावता ।।

कबो कबो
का दो हो जाला




विचार नइखे मिलत कि माल नइखे मिलत
नीति अनीति को कौन सोचता है ?
प्रीत की रीति किसे पसंद है
सबके सब


किच-किच बधार बा
पड़त फुहार बा
तनि तनि लउकता
घेरले अन्हार बा
माटी के चपल पेन्ह
चलता मँगरूआ
काठी मेहराइल बा
बंद बा दोकान सभ
बाबा के लागल बा
बीड़ी के तलब



सरिता के समुंदर से भेंट हो गइल
इसपरेस रहे जवन बुलेट हो गइल




खुशी के पल
विचरे गगन में
मन परिंदा

रसिक

केकरा मिली फयदा ?
आसमान के परिंदा के ,
कि धरती के बसिंदा के ।
दाना छिंटाइल बा
छँवड़ा भुखाइल बा
बींडी पी के खटिया प
बाप लोंढ़िआइल बा
माई के करेज फाटे
बिनतिया भोरे से
दोसर ना बिन लेबे
बबुआ अगोरता
मुरूगा के बोली से
जीयरा कचोटता ।


मतिया ना काम करे माथा चकराइल बा
ठूँठ भइल जिनिगी पो काल मेंड़राइल बा

बात माने घरनी न , बबुआ सम्मान करे
राति खा बँड़ेर देखि , जियरा डेराइल बा

मन के मुराद मन हीं में कुम्हिलाई गइल



लोग कहेला कि बुढ़वा सठिआइल बा
आँखि के सोझा सभ बिगहा बेचाता
निमिया डार पर गिद्ध के बा खोंता


। । ऽ । । ऽ । । ऽ । । ऽ

पढ़ि के मन में अनुराग उगे ,
अस पाठ पढ़ावल नीमन बा ।
जवना जुगुती सभ लोग जगे ,
अस बात बतावल नीमन बा ।
सच पूछि त पीर भरे मन से ,
उधियान सरीसहिं खौलत बा ।
चिपका उनुका क हिया भितरे ,
कुछ बात बढ़ावल नीमन बा ।

खल खल के मानुख धरती पर ,
अपने हीं धुन में मस्त रहे ।
दोसर के बात चलाइब ना ,
अपने करनी से पस्त रहे ।
अरकठिया तन कठुआइल बा,
सरकार क असरे ढींढ़ भरी ।
ऊ ताकस रोज बँडेरी पर ,
मलिकाँव मिलल जे व्यस्त रहे ।





केकरा से करीं बात , लोगवा लगावे घात
रहि रहि जीयरा डेराल मोर बाबूजी

दुअरे प दुख खाड़ , अचके में टूटे डाढ़
कोल्हू जस जिनिगी पेराला मोर बाबूजी


केकरा प करब भरोसा , परोसा में प्यार ना मिली ।

सभ लोग लागल बाटे अपने हीं फेर में
रूप रंग रूपेया बा असहीं अनेर में
कोइला के खदान में कछार ना मिली ।।
हो परोसा में प्यार ना मिली ।।

जिनिगी जवानी में नादानी ढ़ेर कइले बा
संझिया खा सभ आके गरदन धइले बा
चाभे ला चुहानी में सुतार ना मिली ।।
हो परोसा में प्यार ना मिली ।।

एक हीं उपाय बाटे मनवा के मार दऽ
तनवा के तुरही बजावल अब टार दऽ
कान्हा जस तोहके इयार ना मिली ।।
हो परोसा में प्यार ना मिली ।।


हमरा आदत लागल बा मुफुत में खाये के ।
बिसवास ना होखे तऽ आजमा के देख लऽ ।।



चार दिन ला नइहर गइनी , घर के भइल कबाड़ा।
साँच-साँच पूछीं त हमके , झारे लगैं पहाड़ा ?

चीनी चाय चबेनी चटनी , चारे दिन में चट भइलस।
चूल्हा पर चीकट बइठल बा ,भरल सिलेंडर पट गइलस।

का पेटे भन्सार झोंकाइल , कि भंभा पेट समाइल।
बोलऽ ना तऽ देब कपारे , खोरनाठी खपचाइल।

थर-थर काँपत हाँथ जोड़ के , कहलें कथा तिवारी ।
हमरो नइखे दोष खखोरनी , ई परिनाम इयारी ।

पाँच गो पांड़े आइल रहलें , कहलें जसन मनाइँजा।
घर में नइखीं काली माई , रूचिगर भोग लगाइँजा।

हम ना जननी चारे दिन में , लवटि के अइबू घरे।
एक महीना कह के गइलू , नइहर अपना चरे।

अब ना होई कवनो गलती , आगे टहल बतावऽ।
कहली अब पाँचों पँड़वन से , घरवा के चमकावऽ।