Thursday, 26 September 2019

सवैया

1
मोर पिया परदेश बसे घर घात लगाय लखे हुरियारा
मैं तरुनी तपलीन हिया खल खैंचत बान चले बरियारा
गात सघात बयार करे रितु घातक मास लगे भठियारा
हेह दिना यदि कंत नदारत धाय वसंत चढ़े मुड़ियारा

2
झूठ परोसत सान बढ़े त अकास मधे चरखा चलवाईं।
खेतन में अवनी असमान समुंदर पैप सदा डलवाईं।
भोजन ला जब सोर मचे तब काक-कुमार मुड़ेर बिठाईं।
आन्हर आँख गुड़ेर कहे छन में सभ काम कठोर कराईं।

3
कंत बसंत अनंत कथा सजनी रजनी
बनि गैल बिघाती।
अंग अनंग करे नखरा तन होखत बा सरकंड सँघाती।
डाल हिँडोल लली सुकली लखि देह बने पुरईन क पाती।
काँपत नार समेटत आँचर ओट करी उसुकावस बाती।

4
एक बिसातिन औसरि पा बृखभानु सुता गृह जा सकराहें।
साजि समान सुहागिन के बिछिया बिनुली कजरा करियाहें।
बूझत हाल सनेह सने सुर नैन नचा इचि रूप सराहें।
जानि क कान्ह क भेद अहीरनि हाथ करेज निकासत आहें।

5
साँवर रूप अनूप छटा लखि बान प्रसून चुभे हियरे में।
धा ललिता घर भीतर जा कहली चुरिहारिन हौ नियरे में।
नाकि क कील कटाह लगे गर मोतिनहार गड़े हियरे में।
मंथर चाल चले कटि खीन जनी गदरी निखरी उपरे में।

6

आँखि न मानस बाग सखी भटकी चलि जास सुदूर कहीं।
प्रांतर में बन के छिति छोर प धार नदी अथवा कतहीं।
फागुन के सभ रंग दिखे न दिखे हरिजी अलगे लगहीं।
ए बिधना अब एक उपाय कि देह तपा बन माँझ दहीं।
~ रसिक ~

# बाग = लगाम, बागडोर
छिति = क्षितिज
दहीं = जर जाईं

7

आँखिन नीन रहे गहिरी सखि भागल हा पियवा भिनुसारे।
देखत का रहलीं सपना बिलखीं बन माँझ फिरीं अकसारे ।
जोहत देहि प राखि चढ़े सभ बन्धु मिता दृग फेरि बिसारे।
खोजत ही रहलीं बहरी लिहतीं लखि आँतर की तिरिसा रे ।

8

कंत नहीं घर फागुन में असबाब लगे जस काँट बिछौना ।
मैं बिरही अखड़ेर मरूँ अरु गात भयी सलगा घट पौना



रूप बिसातिन देख

बृषभान लली लट खोल चली मध मारग श्याम मिले इतरे
बरसात क रात भयावन है यमुना जल वेग चले भितरे
ललिता कमला मटकाय चली कटि देख लली जर जा गतरे
सच श्याम बसे दिल मध्य सखी पर पूछत श्याम गये कत रे ।




सबरी चुन बेर रखी अगते सिरिराम लला अब भोग लगाईं



गरमी नरमी बरते न कभी तन ताप बढ़े नित जौ भ आगे


संचित आब पताल गया पशु पंछिन मानव 

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