Thursday, 31 January 2019

हिन्दी कुंडलियाँ




1

अपने अपने पाप का सब हैं भागीदार 
कोई कहता कृषक हूँ कोई पहरेदार 
कोई पहरेदार पीछ में करे गुलामी 
गर खुल जाये चोंच अभी आ जाय सुनामी 
धरती पर है पैर गगन के देखे सपने
गले लगाओ यार बना लो दिलवर अपने 

2



रतिपति के शर चाप से कौशिक हुए अधीर।
देख मेनका सामने आहत हुआ शरीर।
आहत हुआ शरीर भाल पर बूंदें जल की।
देहयष्टि की धार बही मर्यादा कल की।
बंद विवेक कपाट भ्रमित हो चुका शीर्ष यति।
इच्छाएँ बलवान सिद्ध पर हँसता रतिपति।

3



भोले ने जब वर दिए , भस्मा मन अभिमान।
जगजननी के रूप पर , आँखें हुई मलान।
आँखे हुईं मलान , रूद्र भी छले गए थे।
उस कृतघ्न के कर्म , पुण्यफल चले गए थे।
नृत्ययुक्ति में उलझ , देह से निकले शोले,
भस्मासुर का अंत , मिले गौरी से भोले। 

4

चिता जलाके देश का सेंक रहे हैं रोट
नेता बने हिमायती पाले मन में खोट
पाले मन में खोट चकाचक पहन सफेदा
हक जनता का छीनभर रहे अपनी मेदा
रसिक न कोई गैर साथ ले चले मिलाके
नेता खेले खेल सत्य का चिता जलाके 

5
  
निर्मल मन करुणा भरा प्रेमपूर्ण अवदान।
मानवता परिपुष्ट हो सब हों चतुर सुजान
सब हों चतुर सुजान स्वच्छ हों भीतर बाहर
हिंस्र वृत्ति हो नष्ट रहे मिलजुल मृग नाहर
संसय सब मिट जाय शमित मन रहे अचंचल
रचें धरा पर स्वर्ग सभी हों निश्छल निर्मल

6



दिल से दिल मिलता रहे मन में ना कुछ चाह
हिय में ऐसे मीत के लेता रसिक पनाह
लेता रसिक पनाह वचन नित सुन्दर लागे
ना हो कोई बात तीर सा उर में लागे
आओ मिलके रहें प्रेम से हमसब हिलमिल
करके नफरत दूर , मिलाएँ सब दिल से दिल

7

दादा बोले पौत्र से , रखना नीयत साफ
नेकी कभी न भूलना , खुद करना इंसाफ
खुद करना इंसाफ , देश का कर्ज चुकाना
ना करना अपवित्र , सोच को श्रेष्ठ बनाना
सबसे पहले देश , बराबर राजा प्यादा
अभी बाँध लो गाँठ , सही समझाते दादा

8

शुद्ध प्रेम से पूर्ण हो मंगलमय यह भोर
सबका हिय हुलसित रहे कृपा करे चितचोर 
कृपा करे चितचोर समय नहीं रोके पाँव
रहे परस्पर साथ ना कोई मारे दाँव
बेटा बेटी शान बने परिपूर्ण प्रबुद्ध
चढ़े गगन पर ज्ञान हो अंदर बाहर शुद्ध

9

चौसर बिछा विभेद का नेता खेलें खेल।
जो पहले थे जिगर में आज हुए बेमेल।
आज हुए बेमेल घिनौनी हरकत करते।
जिसके थे वे शिष्य आँख में आँसू भरते।
शिकवा किससे करें माथ पटकें किसके दर।
नेता मालामाल पसारे भेदक चौसर

10

सघन अगर संकल्प हो दैव कृपा हो जाय
धुल जाए मन का कलुष मानुष गले लगाय
मानुष गले लगाय प्रीत की बहती गंगा
निर्मल होये गात विमल बन मन हो चंगा
आवे शुद्ध विचार मुग्ध हो करते नर्तन
सार तत्व अपनाय संकल्प हो अगर सघन

11


पढ़ि के पिंगल शास्त्र को लोग बने विद्वान।
पर मट्ठा भी मह सकें उतना भी ना ज्ञान।
उतना भी ना ज्ञान बघारें अपनी शेखी
सतपथ है बेकार करें इसकी अनदेखी
फैला खूब वितान किंतु कुछ रखा न गढ़ के
मात्र अहं की तुष्टि रह गए कोरे पढ़ि के।

12


चार दिनों की चाँदनीफिर अंधेरी रात
सम्मुख वैरी देख के एक हुए जज़्बात
एक हुए जज़्बात प्रेम का नहीं घरौंदा
मुखड़े पर मुस्कान विवशता का है सौदा
भावी कौन बताय रहेगा क्या व्यावहार ?
नेता होगा कौन या दिन खुशियों के चार

13

सरकारी संस्थान मेंतरह तरह के लोग
वे करते हैं ना कभीबुद्धि का उपयोग
बुद्धि का उपयोग पड़े ना कभी जरूरत
माछी मारे बैठ दीखते जैसे मूरत
कैसे मिले अनाज मुफ्त कैसे तरकारी
वेग काम की मंद , होत दफ्तर सरकारी

14


बना मसौदा फंड का , आनन पर मुस्कान
आया नगद न समय पर , चेहरा हुआ म्लान
चेहरा हुआ म्लान , मसौदा जम के भेजा
अगर न आया फंड , चाक हो रहा कलेजा
अधिकारी फरमान , शब्द दे तोड़ घरौंदा
आफत में है जान , हाड़ अब बना मसौदा

15


पत्थर दिल पल्ले पड़ादिया बहुत आघात
कर्म करे नापाक वहचिकनी चुपड़ी बात
चिकनी चुपड़ी बातसदा जीवन रस चूसे
जो ना माने बात काल कोठारी ठूंसे
करता दीखे प्यारपास में रखता नश्तर 
सत्ता पर आसीनजिगर है उसका पत्थर 

16


बेटा मेरा कम नहीं कितना करूँ बखान
लड़की से उलझी नजर खिली सास मुस्कान
खिली सास मुस्कान ठीक की साड़ी पल्लू
लड़का है गुणवान तनिक सा दीखे कल्लू
दिया राम ने रूप न कोई बाँधे फेंटा
घी का लड्डू टेढ़ जँवाई राजा बेटा

17


सैंया रूठे ए सखी! चढ़ आया मधुमास।
कैसे मन धीरज धरूँ दहके पीर पलाश।
दहके पीर पलाश नसेनी चढ़ी चाहना।
कैसे पाऊँ श्रांति बढ़ी ही जाय दाहना।
होली में हुड़दंग मचावे रोज कन्हैया।
गोरी कोमल देह लरजती जाए सैंया।

18

सैंया रूठे ए सखी , आया ऋतु बसंत
कैसे मन धीरज धरूँ , नहीं दर्द का अंत
नहीं दर्द का अंत , नसेनी चढ़ी वेदना
कैसे पाऊँ थाह , पिया के साथ सेत ना
होली में हुड़दंग , मचावे रोज कन्हैया
गोरी बदन छुपाय , दूर हैं फौजी सैंया

19

दिल में तेरी याद है , सरहद पर है ध्यान
रहे सुहागिन देश की , नारी सदा सुजान
नारी सदा सुजान , राग मैं देशी गाऊँ
सबके मुख मुस्कान , मधुर वो गीत सुनाऊँ
खुशी मिली है खास , रंग में रहूँगा शामिल
लागे गाल गुलाल , खिलेगा प्रिय तेरा दिल

20


कर जोरी विनती करूँ , रहे सलामत गात
देश भक्त बनके करोतू बारूद से बात
तू बारूद से बात , दुश्मन बच नहीं पाये
करो नकाम प्रयास , छुपा हो घात लगाये
तेरे पीछे खड़ी , साथ देने को गोरी
कभी न भूलो फर्ज , करूँ विनती कर जोरी

21

सजना सब बेकार है अगर मिले ना आँख
सुन्दरता क्या जानताउल्लू बैठा शाख
उल्लू बैठा शाख प्रेम का मर्म न जाने
दीखे नहीं उजास तो कैसे रब पहिचाने
सुन्दरता में सृष्टि लोग सब चाहे मिलना
पीकर प्रेम पयोधि चाहती कुदरत सजना 

22

बीवी कड़वी सी लगे साली रस की खान
और पड़ोसन की गति सोच समझ पहचान
सोच समझ पहचाननहीं तो हो सिर गंजा
रक्षा करे भगवानमिले न कभी भी पंजा
ससुरारी की शान मिली है तुझको टीवी
समय बिताओ यार देखकर अपनी बीवी 

23


मानव स्वार्थी तू बड़ा काट दिया बन बौर
लखठूंठे तन से दिया मीठे फल का कौर
मीठे फल का कौर धरा का दिल है दरिया
नाहक दी है घोंप स्वार्थ के खातिर सरिया
करना तू संकोच बनो मत मन से दानव
प्रेमी बन जा यार जनम से तू है मानव

24

सब होता विपरीत है , जब हो हीन विचार
दूध-दही को छोड़ के , करे तुच्छ आहार
करे तुच्छ आहार , सुगंधी मूर्छा लाए
जहाँ मिले दुर्गंध , बसेरा वहीं बनाए
मैला मन तन श्वेत , सँवारे नारी के लब
अज अंगूरी नित्य , दोष दे ईश्वर को सब

25

माहुर बोली में भरा , नियत लगे है खोट
अपना था वह दे दिया , जाते जाते चोट
जाते जाते चोट , वमन कर दी विष सारी
सभी देखते रहे , घोंप दी हृदय कटारी
खायी गहरी चोट , मिले जब पूरे पाहुर
घोली मिश्री नहीं , नफरती घोली माहुर

26

पत्नी अदरक सी लगे , कड़वा कर दे स्वाद
पर अपने तासीर से , कर दे दूर मवाद
कर दे दूर मवाद , वचन कड़वा सा लागे
रसिक झुकाये सीस , कष्ट पल में सब  भागे
घर में है सुख शांति , सही है उसकी करनी
करूँ बड़ाई रोज , ओज की दरिया पत्नी

27

शिक्षा उत्तम है वही , मिले ज्ञान का सार
जिसकी सीमा पेट तक , वह शिक्षा बेकार
वह शिक्षा बेकार , कुटिलता जो उपजाए
अहं भाव अतिरेक , गर्त में लेती जाए
मद लोलुपता त्याग , जिंदगी भले परीक्षा
नम्र निवेदक रसिक , दान में दे दो भिक्षा

28

ओढ़ लबादा सत्य का , झूठ चले इतराय
पग पग पर ख्याति मिले , अंध भक्त अधिकाय
अंध भक्त अधिकाय , समय का लगे थपेड़ा
नीर क्षीर हो न्याय , उखाड़े कृषक लमेरा
अपना अपना भाग्य , मिला है थोड़ा ज्यादा
जंबुक चला जुबान , शेर का ओढ़ लबादा

29

रोना-धोना छोड़ दो , जश्न मनाओ यार
हाथ मिलाना सीख लो , कहता है सरदार
कहता है सरदार , स्वयं को उम्दा मानो
हीन भावना त्याग , शान से सीना तानो
सत्य करो स्वीकार , भूल जा जादू-टोना
जीवन है अनमोल , गलत है रोना-धोना

30

घर की खिड़की खोलिये , अंदर आय सुवास
आसपास हो केवड़ा , खुशियों का अहसास
खुशियों का अहसास , पवन का हल्का झोंका
जीवन में आनंद , उमगना किसने रोका
करो आज आगाज़ , नहीं हो चिंता पर की
अपना दामन साफ , खोलिये खिडक़ी घर की

31


खाते हैं वे देश का , करते अरि गुणगान । 
घर बैठे जयचंद का , पहले करो निदान।। 
पहले करो निदान , जहर फैला ना पाएँ। 
वीरों की ललकार , ख़्वाब में सुन थर्राएँ।। 
दुनिया करे सलाम , शत्रु भी गुन गाते हैं । 
अभिनंदन का शौर्य, देख अरि भय खाते हैं।। 

32

लोकतंत्र के यज्ञ में , डालें समिधा शुद्ध । 
मान बढ़ेगा देश का , होंगे लोग प्रबुद्ध ।। 
होंगे लोग प्रबुद्ध , बजेगा जग में डंका । 
जल थल नभ में जोर , नहीं है कोई शंका ।। 
भेदन लक्ष्य अचूक , सराहें सफल यंत्र के । 
क्षुद्र लोग टरकाय , बचायें लोकतंत्र के ।। 

33


कमल कीच में खिल गया, भौंरे भरे उड़ान। बदजुबान बदतर हुआ, गई गर्त में शान ।। 
गई गर्त में शान , अकड़ सब टूट गई है । 
सहज सत्य पहचान, सुनहरी भोर हुई है ।। 
कर दो अहं किनार, पड़े ना सत्य बीच में । 
विधि का यही विधान , खिला है कमल कीच में ।। 

34


कृष्ण सुदामा का मिलन , मित्र चरित्र महान ।
चाउर मुट्ठी चार में, दे दी सकल जहान ।।
दे दी सकल जहान , मित्र पग अँसुवन धोये ।
कर बचपन की याद , कन्हैया मन में खोये ।।
बिहँसा मय ब्रह्माण्ड, चकित हो देखी भामा ।
गाँठ न पड़े विचार, मित्र जस कृष्ण सुदामा ।।

35


भारत का सिर मौर है, जम्मू औ' कश्मीर।
एक ध्वजा एक ही हृदय, एक रही तकदीर ।।
एक रही तकदीर , उसी पर सबको चलना ।
संविधान अब एक , सभी की रक्षा करना ।।
मेरा तेरा छोड़ , करेगा वहाँ तिजारत ।
जन्नत का नासूर , हरेगा मेरा भारत ।।


36

जौ जौ आगर प्रेम हो , मुदित रहे संसार ।
नफरत माटी में दबे , मिले लोग अँकवार ।।
मिले लोग अँकवार, मधु मुस्कान हो मुख पर ।
नयना बहे न नीर, गीत हो लब पे अक्सर ।।
मौसम हो अनुकूल, फसल हो प्रतिशत सौ सौ ।
नये वर्ष नव गान , बढ़े बिटिया नित जौ जौ ।।

37

ऊपरवाला हीं सही , करता है सब काम ।
किसकी कहाँ पुकार है, तुरत बताये नाम ।।
तुरत बताये नाम, किसी से भेद न करता ।
जड़ जंगम जंजाल, जगत को जागृत करता ।।
सर्वोपरि कल्याण, तीनो लोक में शाला ।
मुझको उसपर नाज, श्रेष्ठ है ऊपरवाला ।।


38

होली पावन पर्व पर , नफरत गड्ढा डाल ।
प्रेम रंग मन पर चढ़े, मलिए गाल गुलाल ।।
मलिए गाल गुलाल, करोना से मत डरिए ।
देते रहिए दाद, जोश में कमी न करिए ।।
सबको दे सम्मान, सरस मधु रसना घोली ।
रसिक परस्पर मिलें, आज होली है होली।।

39

मन निरमल अति उज्जरो, तन कल्मष के खान।
जस परिछाँही बस्तु सम, महज भिन्नता भान।
 महज भिन्नता भान, चित्त के पीर न बूझे।
दीखे अधर दरार, हिया रस सोत न सूझे ।।
गावे वेद पुरान, निरंतर जिनकर गुन-गन।
रसिक युगल महराज, रहे पदलीन निरत मन।।

40





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