1
नशा नेट के चढ़ल बा , आन्हर अछइत आँख
आपन घर खोंखड़ भइल , बहरी जामल पाँख
बहरी जामल पाँख , पतुरिया पूजल जाली
कमल कली के छोड़ , कटइला रोपे माली
सरबस गइल बिलाय , दमड़ी गइल चेट के
छँइटी चढ़ल कपार , चढ़ल जब नशा नेट के
आपन घर खोंखड़ भइल , बहरी जामल पाँख
बहरी जामल पाँख , पतुरिया पूजल जाली
कमल कली के छोड़ , कटइला रोपे माली
सरबस गइल बिलाय , दमड़ी गइल चेट के
छँइटी चढ़ल कपार , चढ़ल जब नशा नेट के
2**
( ** संझवत में भेजले बानी )
( ** संझवत में भेजले बानी )
घर के मालिक सभ सहे , शीत ताप बरसात
खुश लागे आठो पहर , जइसे पीपर पात
जइसे पीपर पात , नजर में भेद न लावे
सभको दे आराम , खुदे बरमाशा गावे
बृद्ध देत आशीष , प्यार पावे नाबालिक
रसिक राह आसान , करेला घर के मालिक
खुश लागे आठो पहर , जइसे पीपर पात
जइसे पीपर पात , नजर में भेद न लावे
सभको दे आराम , खुदे बरमाशा गावे
बृद्ध देत आशीष , प्यार पावे नाबालिक
रसिक राह आसान , करेला घर के मालिक
3
राते सपना देखनीं , जामल हमरो पाँख ।
दिनहूँ में ना नींदरी , बंद रहेला आँख।
बंद रहेला आँख , अकिल असमानें नापे।
सात समुन्दर पार , कामना गड़ही मापे।
मन में एके वाक् , हर घरी साँझ पराते
होखब हम आबाद , आज सुख सानबि राते।
दिनहूँ में ना नींदरी , बंद रहेला आँख।
बंद रहेला आँख , अकिल असमानें नापे।
सात समुन्दर पार , कामना गड़ही मापे।
मन में एके वाक् , हर घरी साँझ पराते
होखब हम आबाद , आज सुख सानबि राते।
4** ( ग्राम टुडे )
अक्षर अक्षर ज्ञान बा , पात
पात परमेश
वाणी में माँ शारदा , हर प्राणी सर्वेश
हर प्राणी सर्वेश , समय के महिमा बाटे
घूरा पर के फूल , शिवालय सर पो साटे
सभके कर कल्याण , चलाये कबो न नस्तर
गटके ग्रीवा गरल , सुधा परसे पंचक्षर
वाणी में माँ शारदा , हर प्राणी सर्वेश
हर प्राणी सर्वेश , समय के महिमा बाटे
घूरा पर के फूल , शिवालय सर पो साटे
सभके कर कल्याण , चलाये कबो न नस्तर
गटके ग्रीवा गरल , सुधा परसे पंचक्षर
5**
गोबर
भरल दिमाग में, कइसे
सूझी राह।
गुरु
गइले परयाग लग, सिस
के धइलसि ग्राह।
सिस
के धइलसि ग्राह, ज्ञान
के हँड़िया फूटल।
कइसे
उबरी जान, पसेवा
सभकर छूटल।
झूठ
बजावे ढोल, साँच
के लटकल थोबर।
से
लोगो पतियाय, मगज
में गाँजल गोबर।
6** ( ग्राम टुडे )
आपन आपन साँच बा , आपन
आपन झूठ
क्रीड़ा कहीं पसंद बा , कतहीं बानर मूठ
कतहीं बानर मूठ , सभे बा अपने दरबा
दोष दिखावे लोग , लूट ले सर्वेसर्वा
दोसर करे पुकार , त बन जाये झट नागन
जइसे कुंठित नार , बाढ़ देखेले आपन
क्रीड़ा कहीं पसंद बा , कतहीं बानर मूठ
कतहीं बानर मूठ , सभे बा अपने दरबा
दोष दिखावे लोग , लूट ले सर्वेसर्वा
दोसर करे पुकार , त बन जाये झट नागन
जइसे कुंठित नार , बाढ़ देखेले आपन
7** ( ग्राम टुडे )
फँसरी
डालल ठीक ना, मन
पऽ राखीं जोर
कसीं
खाट के ओरचन, सुतरी
छान सँगोर
सुतरी
छान सँगोर, हिया
में हरि के धरलीं
पउआ
पाटी ठोक , चूर
के चौबन करलीं
रेसा
छोड़े साथ , न
अइठन आई रसरी
धावल
अइहें राम, निवारे
गर के फँसरी।
8
काम
सतावे आम बा , काहे
के अवसाद
सभकर
एके हाल बा, बिगरल
मुँह के स्वाद
बिगरल
मुँह के स्वाद, हूब
अब तन में नाहीं
मन
के अनगढ़ चाल , उमिरियो
करे बिसाही
करे
न तन संवाद , हरिन-मन
कुरचे धावे
रसिक
ल माला हाथ , जा
घरी काम सतावे
9
लागत
बा मरले बिया , झटके
अइसन लात
रितु
बसंत में का भइल , दरद
करे मय गात
दरद
करे मय गात , न
बाबा बात बतावस
अपना
के भगवंत , आन
अछरंग लगावस
लउकत
नइखे राह , जोस
जियरा दागत बा
अब
ना होय उड़ान, भभिख
चउपट लागत बा
10
जौ भर भी कम केहु ना , सबहिन हवे महंत
बोली में मधु घोरि के , बउँचट बनले संत
बउँचट बनले संत , मौनिहाँ रूप बनइले
चढ़ल चढ़ावा चोख , चेलवो छान तुरइले
उड़ल अकासे धूर , कहानी गढ़ले अनुचर
बोका बनल महान , बिजानी रहले जौ भर।
बोली में मधु घोरि के , बउँचट बनले संत
बउँचट बनले संत , मौनिहाँ रूप बनइले
चढ़ल चढ़ावा चोख , चेलवो छान तुरइले
उड़ल अकासे धूर , कहानी गढ़ले अनुचर
बोका बनल महान , बिजानी रहले जौ भर।
11**
साँच ह तरुअरि आम के , पाके
लोग जुड़ाय।
बिखइल बनफल झूठ हऽ , चिखते मारल जाय ।
चिखते मारल जाय , न कवनों गुनगन अन्दर।
सत के पकड़ी पोंछ , बनी ऊ मस्त कलन्दर।
भंडा जइहें फूट , जे जरि में लागी आँच।
पल-पल निखरी आभ , सुबरन सम चमकी साँच।
बिखइल बनफल झूठ हऽ , चिखते मारल जाय ।
चिखते मारल जाय , न कवनों गुनगन अन्दर।
सत के पकड़ी पोंछ , बनी ऊ मस्त कलन्दर।
भंडा जइहें फूट , जे जरि में लागी आँच।
पल-पल निखरी आभ , सुबरन सम चमकी साँच।
12
बुद्धि केरि परताप हऽ , बनले मुरुख बिलार।
बनरा रोटी खा गइल , भारी परलसि रार।
भारी परलसि रार , कपट के बेंवत लागल
इहई ह उपचार , जोम में जिन जन पागल।
मियाँ क लागल नोट , मेहर पइली परिशुद्धि।
जब अंधा बिस्वास, त बम बम बोलिहें बुद्धि।
बनरा रोटी खा गइल , भारी परलसि रार।
भारी परलसि रार , कपट के बेंवत लागल
इहई ह उपचार , जोम में जिन जन पागल।
मियाँ क लागल नोट , मेहर पइली परिशुद्धि।
जब अंधा बिस्वास, त बम बम बोलिहें बुद्धि।
13**
छनभंगुर एह देह में , दुर्गुण
भरल हजार
भरमल तुलसी लाश के , भइले नाव सवार
भइले नाव सवार , साँप के रसरी जनले
तिरिया के तन मोह , रूह से जादे मनले
पवले जब दुत्कार , त अंदर बोलल झिंगुर
जरल जोत जयकार , अमर भइलसि छनभंगुर
भरमल तुलसी लाश के , भइले नाव सवार
भइले नाव सवार , साँप के रसरी जनले
तिरिया के तन मोह , रूह से जादे मनले
पवले जब दुत्कार , त अंदर बोलल झिंगुर
जरल जोत जयकार , अमर भइलसि छनभंगुर
14 ** ( ग्राम टुडे )
कुरसी के ई खेल बा , सबकुछ बाटे पाक
घुरहू के कीमत बढ़ल , पहिले रहले खाक
पहिले रहले खाक , सवतिया डाह समाइल
लौड़ी के पद पाक , शरम सब ताक धराइल
मनी प्लांट परधान , कोई पूजे न तुलसी
कइसे भी मिल जाय , सँवारे किस्मत कुरसी
घुरहू के कीमत बढ़ल , पहिले रहले खाक
पहिले रहले खाक , सवतिया डाह समाइल
लौड़ी के पद पाक , शरम सब ताक धराइल
मनी प्लांट परधान , कोई पूजे न तुलसी
कइसे भी मिल जाय , सँवारे किस्मत कुरसी
15**
कोहनाइल ना ठीक ह , हँसत रहीं सरकार।
चार दिना के जिन्दगी , कर लीं सभसे प्यार।
कर लीं सबसे प्यार , सभे से ईजति पाइब।
सहब बात संघात , सवांगी नेक कहाइब।
जरि से जाइबि दूर , लगी फुनगी मुरुझाइल।
सटीं हिया के पास , तजीं कुढ़ल कोहनाइल।
चार दिना के जिन्दगी , कर लीं सभसे प्यार।
कर लीं सबसे प्यार , सभे से ईजति पाइब।
सहब बात संघात , सवांगी नेक कहाइब।
जरि से जाइबि दूर , लगी फुनगी मुरुझाइल।
सटीं हिया के पास , तजीं कुढ़ल कोहनाइल।
16**
अपने बोअल काँट हऽ ,चूभत अपने गोड़
अएनक आइल सामने , काहें उठत मरोड़
काहें उठत मरोड़ , चोट जब लगे करेजा
अपने करनी आज , चाट खइले बा भेजा
दाँव प बाटे साख , नइखे दूध के धोअल
परते मुँह में छार , भइल बा अपने बोअल
अएनक आइल सामने , काहें उठत मरोड़
काहें उठत मरोड़ , चोट जब लगे करेजा
अपने करनी आज , चाट खइले बा भेजा
दाँव प बाटे साख , नइखे दूध के धोअल
परते मुँह में छार , भइल बा अपने बोअल
17
बड़ मुँहफटहा लोग बा, ईजति तार- ब-तार।
दुइ पइसाही लोग ही, पाइ रहल सत्कार।
पाइ रहल सत्कार, दुष्टता बनल नसेनी।
ऊपर-ऊपर चुस्त, नदारत नीचे पेनी।
बाटे एक उपाय, लगाईं कसके झटहा।
तबहीं कस में होय, दुष्टजन बड़ मुँहफटहा।
दुइ पइसाही लोग ही, पाइ रहल सत्कार।
पाइ रहल सत्कार, दुष्टता बनल नसेनी।
ऊपर-ऊपर चुस्त, नदारत नीचे पेनी।
बाटे एक उपाय, लगाईं कसके झटहा।
तबहीं कस में होय, दुष्टजन बड़ मुँहफटहा।
18
कुकुर भुकौवल होत बा , संग
सखी सरपंच
मुँह पर तनिक लगाम ना , दूषित होता मंच
दूषित होता मंच , कबो निष्कर्ष न निकले
गलफर फाटे आप , ताप से शीशा पिघले
बात सरस हो पंच , बजे पग छम छम नूपुर
चहकत रहे समाज , ना भौंके पथ में कुकुर
मुँह पर तनिक लगाम ना , दूषित होता मंच
दूषित होता मंच , कबो निष्कर्ष न निकले
गलफर फाटे आप , ताप से शीशा पिघले
बात सरस हो पंच , बजे पग छम छम नूपुर
चहकत रहे समाज , ना भौंके पथ में कुकुर
19** ( ग्राम टुडे )
पतई गिरल जमीन पर , देलस
कुछ संदेश
जिनिगी बीतल नाचते , नाचत छूटल देश
नाचत छूटल देश , न कवनो शिकवा बाटे
जीयत देनी छाँह , मरत तन धरती साटे
जीवन मरन सुभाव , सृष्टि के हउए सत ई
बिरिथा बाटे मोह , मनुज बन जा तू पतई
जिनिगी बीतल नाचते , नाचत छूटल देश
नाचत छूटल देश , न कवनो शिकवा बाटे
जीयत देनी छाँह , मरत तन धरती साटे
जीवन मरन सुभाव , सृष्टि के हउए सत ई
बिरिथा बाटे मोह , मनुज बन जा तू पतई
20
पत्थर दिल बा लोग के , करे
सदा उतपात
गले लगाके प्यार से , करे भितरिया घात
करे भितरिया घात , लात के भूत न भागे
बिन जुतियवले नाथ , मतलबी पूत न जागे
करे रसिक आगाह , हाथ में लोग क नश्तर
बधिक अलाय-बलाय , राह में डाले पत्थर
गले लगाके प्यार से , करे भितरिया घात
करे भितरिया घात , लात के भूत न भागे
बिन जुतियवले नाथ , मतलबी पूत न जागे
करे रसिक आगाह , हाथ में लोग क नश्तर
बधिक अलाय-बलाय , राह में डाले पत्थर
21
मन के निर्मल दोस्त से , रसिक
मिलावे हाथ ,
दिल के पट पट-पट खुलल , मिलल सनेही साथ
मिलल सनेही साथ , माथ सम्मान से उठल,
ईस्सर रचि संजोग, सहज मन के सुर जूटल।
ज्ञान भइल गहिराह , तार झनकल जब तन के ,
रसिक दिनेश उजास , जुगुत मिलले जे मन के ।
दिल के पट पट-पट खुलल , मिलल सनेही साथ
मिलल सनेही साथ , माथ सम्मान से उठल,
ईस्सर रचि संजोग, सहज मन के सुर जूटल।
ज्ञान भइल गहिराह , तार झनकल जब तन के ,
रसिक दिनेश उजास , जुगुत मिलले जे मन के ।
22
शिक्षित लो के सोंच में , लउकत
आज दरार
नफरत के फन बा उठल , छटपटात बा प्यार
छटपटात बा प्यार , यार भी बनले दुश्मन
दाँत क रोटी दूर , बात में होखल अनबन
समय अभी बा सोच , मनुजता होखे रक्षित
ना त होइहें नाश , हार पछितइहें शिक्षित
नफरत के फन बा उठल , छटपटात बा प्यार
छटपटात बा प्यार , यार भी बनले दुश्मन
दाँत क रोटी दूर , बात में होखल अनबन
समय अभी बा सोच , मनुजता होखे रक्षित
ना त होइहें नाश , हार पछितइहें शिक्षित
23
चाभी
दे दऽ लाल के , चलऽ
रसिक के पास
बाकी
जिनिगी जश्न में , रोज
रही मधुमास
रोज
रही मधुमास , संग
में चतुरी तिरिया
वर्तमान
बा खास , रोग
ना आई भिरिया
लोग
करी उपहास , देख
के मारी गाभी
सुतिहऽ
चद्दर तान , न
लीहऽ कबहूँ चाभी
24
नीयत में जब खोट बा , डगमग
होय यकीन
ईश्वर भी मुँह फेरिहें , खींच ल पाई तीन
खींच ल पाई तीन , बीन ना बाजी मन में
मुफुते माल सँगोर , बरक्कत होखी धन में?
बनी पूत भठियार , बाप के फूंकी जीयत
रसिक कहे बरजोर , सुधारऽ आपन नीयत
ईश्वर भी मुँह फेरिहें , खींच ल पाई तीन
खींच ल पाई तीन , बीन ना बाजी मन में
मुफुते माल सँगोर , बरक्कत होखी धन में?
बनी पूत भठियार , बाप के फूंकी जीयत
रसिक कहे बरजोर , सुधारऽ आपन नीयत
25
बेचारे
पति का करस , पत्नी
मिललि कटाह ।
बाते-बाते
मात दे , जिनिगी
कइलि बिदाह।।
जिनिगी
कइलि बिदाह, अंत
ना फ़रमाइश के ।
बलम
चलीसा पार, बहुरिया
मध बाइस के ।।
भइलन
अस बदहाल, फिरस
सगरी मतिमारे।
धनी
अर्हावस काज , पुरावस
पति बेचारे।।
26
जिनिगी
हरपल हऽ उतिम, हरपल
जिनिगी जंग।
कहईं
राहे काँट-कुश, कहईं
रंग-विरंग।
कहईं
रंग-विरंग, कबो
इतिहान सरेखे।
चंचल
मन के साध, बुद्धि
से जोखे-लेखे।
मंजिल
टेढ़ी खीर, जरे
हर पग पऽ चिनिगी।
होखे
मन निरदुंद, सफल
कट जाए जिनिगी।
27
28
मचल बवंडर मगज में , उल्टा
भइल विचार।
जनमजात बैरी लगे , जे नान्हें के यार।
जे नान्हें के यार , लगे बेदर्द विदाही।
भलहीं मूअसु लाख , मगर भरिहें ना हाही।
पद पावर परधान , नीयत ना कहईं बचल।
भइल सवतिया डाह , खलबली भीतरे मचल।
जनमजात बैरी लगे , जे नान्हें के यार।
जे नान्हें के यार , लगे बेदर्द विदाही।
भलहीं मूअसु लाख , मगर भरिहें ना हाही।
पद पावर परधान , नीयत ना कहईं बचल।
भइल सवतिया डाह , खलबली भीतरे मचल।
29
बेलन
जइसन यंत्र से , पत्नी
जी मुसकाय ।
पियवा
लगे सुहावना , इधर-उधर
ना जाय ।।
इधर-उधर
ना जाय , समय
पर घर हीं आवे ।
विधुवदनी
को देख , नजर
ना कहीं मिलावे ।।
जब
भी पड़े कपार , रहे
काबू में तन मन ।
देशी
हर्बल अस्त्र , रसोई
का है बेलन ।।
30
बतकूचन के पेर के , आईं रस निकालीं
भर भर अँजुरि पीयल जा , गिने के ना प्याली
गिने के ना प्याली , भइया बबुआ लो आव
पी के रसगर बात , साथी आनंद मनाव
जिनिगी बा अनमोल, न भरीह पानी लोचन
आपस में जब प्रेम , सफल होई बतकूचन
भर भर अँजुरि पीयल जा , गिने के ना प्याली
गिने के ना प्याली , भइया बबुआ लो आव
पी के रसगर बात , साथी आनंद मनाव
जिनिगी बा अनमोल, न भरीह पानी लोचन
आपस में जब प्रेम , सफल होई बतकूचन
31
सुनके
निरनय न्याय के , मनवा
चक्कर खाय
नैतिकता
के नाम पर , बाबाजी
शरमाय
बाबाजी
शरमाय , अमरिका
भारत भइले
पाप
गइल उधियाय , न्याय
क अंगुरी धइले
हित
अनहित अधिकार , स्वयं
अपनाओ चुनके
धुंध
होत उजियार , न्याय
के निरनय सुनके
32
बुद्धि
में खलबली मचल , टूटल
दिल के तार
जीव
पड़ल बा फेर में , खोज
रहल बा प्यार
खोज
रहल बा प्यार , हे
प्रभु राह देखाईं
भटकल
बा जे लोग , ईश
रउआ समझाईं
फैलल
बा दुर्गंध , आके
करवाईं शुद्धि
अवते
नेक विचार , निर्मल
हो जाई बुद्धि
33
पैदल
पथ पर घूमिये , साँसों
का अभ्यास
चिंता
को चट कीजिये , हप्ता
में उपवास
हप्ता
में उपवास , रोग
से छुट्टी पायें
जिह्वा
दें आदेश , शक्कर
न हाथ लगाये
थोड़ा
सा हो ध्यान , भाल
पर टीका संदल
भइया
भउजी साथ , दूब
पर चलना पैदल
34
राजनीति के खेल में , नइखे केहू बैर
नेउर बोलल साँप से , भइया सब बा खैर
भइया सब बा खैर , आदमी नइखे चोखा
हँसके जब बतियाय , तs बुझीह करी धोखा
नेता लोग किसान , जहर की करते खेती
साथ मेमना शेर , निभावे सह राजनीति
नेउर बोलल साँप से , भइया सब बा खैर
भइया सब बा खैर , आदमी नइखे चोखा
हँसके जब बतियाय , तs बुझीह करी धोखा
नेता लोग किसान , जहर की करते खेती
साथ मेमना शेर , निभावे सह राजनीति
35
आफत
आवे गाँव में , हमहीं
बचीं सनाथ
हमरे
घर मे संपदा , बचे
पलस्तर पाथ
बचे
पलस्तर पाथ , जगत
के हमहीं स्वामी
इनर
परी हो साथ , बनीं
हम धनपति नामी
बाँचल
खूचल लोग , दउरले
हाँफत आवे
रब
से बा फरियाद , फिर
नहीं आफत आवे
36
मुखिया
के सभ दोष बा , आपन
करनी नेक
आफत
में करते नमन , संशय
रहे अनेक
संशय
रहे अनेक , लोग
लगावे तोहमत
उत्तम
करे विचार , न
होखे केहू सहमत
अपना
गोड़े काँट , रहे
पग पग पर दुखिया
काटे
चानी रोज , भरे
करजा के मुखिया
37
फूलतुरन
के देखके , कहे
पुष्प कर जोर
रे
निरदइया कर दया , मत
दे गला ममोर
मत
दे गला ममोर , अभी
बिहँसे दे हमके
खुद
सँउपब हम गात , चढ़इहे
सर पो रब के
ना
मनबे तऽ रोज , सरापब
हम मजबूरन
आपन
चाल सुधार , दइब
से डर फूलतुरन
38
लामा लामा बोल के , सियरम जी मशहूर
संगी साथी के शबद, कइलस भंडाफोर
कइलस भंडाफोर , थुराइल गतरी गतरी
झूठ पराइल गाँव , साँच के उमगल छतरी
शोभित सब संस्कार , पहिन के सच के जामा
सगरे हो उजियार , मंत्रणा लामा लामा
संगी साथी के शबद, कइलस भंडाफोर
कइलस भंडाफोर , थुराइल गतरी गतरी
झूठ पराइल गाँव , साँच के उमगल छतरी
शोभित सब संस्कार , पहिन के सच के जामा
सगरे हो उजियार , मंत्रणा लामा लामा
39
मन
में उपजे ज़लजला , इकसे
तुरही बोल
करिया
दिल उज्जर बसन , स्वारथ
करे किलोल
स्वारथ
करे किलोल , साधुता
मन ना आये
खुद
अपने को सदा , शिरोमणि
संत बताये
पाये
नित सम्मान , रची
प्रपंच जन-जन में
रसिक
कहे कर जोर , प्रेम
उपजाओ मन में
40
बिसकरमा
भगवान के , विनय
करीं कर जोर
जिनिगी
के हर मंच के , देव
करीं अंजोर
करीं
देव अंजोर , धरा
से गगन मिलवनी
कल
पुर्जा करमात , चौदह
भुवन देखवनी
तकनीकी
ऐश्वर्य , सुहावन
लागे परमा
रसिक
नवाये माथ , बोल
जय हे बिसकरमा
41
टोना-वोना ना चली , जेकर मन मजबूत
जे बा हारल पाप से , आप लपेटी सूत
आप लपेटी सूत , आत्मबल गड़हा जाई
होनी बा बलवान , पार्थ से कहे कन्हाई
अटल सत्य बा मौत , कबो ना होला बौना
दिल में राखीं राम , व्यर्थ के टोना-वोना
जे बा हारल पाप से , आप लपेटी सूत
आप लपेटी सूत , आत्मबल गड़हा जाई
होनी बा बलवान , पार्थ से कहे कन्हाई
अटल सत्य बा मौत , कबो ना होला बौना
दिल में राखीं राम , व्यर्थ के टोना-वोना
42
तन दुअरे
सभ एक बा , मन बहुतेरे घाट
संत समागम
जब मिले , अचके बदले ठाट
अचके
बदले ठाट , समर्पण आवे जबहीं
होत अन्हरिया
साफ , कमल खिल जाये तबहीं
गरजे गगन
विमान , गलइचा लागे पुअरे
लगे
सुहाना फंद , श्रेष्ठ पहुँचे तन दुअरे
43
हलचल होला मगज में , दिल दइमारा रोय
अपने चढ़े तुरंग पो , कतिने मँगिया धोय
कतिने मँगिया धोय , न माने कहना ककरो
रोज करे उत्पात , लोग रोवेला सगरो
मुँह में पान चबाय , पहिरले कुर्ता मलमल
रसिक मंद मुसुकाय , मगज में होखे हलचल
अपने चढ़े तुरंग पो , कतिने मँगिया धोय
कतिने मँगिया धोय , न माने कहना ककरो
रोज करे उत्पात , लोग रोवेला सगरो
मुँह में पान चबाय , पहिरले कुर्ता मलमल
रसिक मंद मुसुकाय , मगज में होखे हलचल
44
ज्ञान
क गगरी भरल बा , भगती
नइखे पास
जिनिगी
के सुख ना मिलल , आठो
पहर उदास
आठो
पहर उदास , आस
ना छूटल अबहीं
कर
प्रभु से अरदास , न
होवे तृष्णा कबहीं
बेमतलब
के बंध , लोग
दउरत बा सगरी
जा
दिन खाली हाथ , तँवाई
ज्ञान क गगरी
45
अरकच
बथुआ डाल के , मेमोरी
भइल फुल
के
अइसन गलती कइल , या
अपने बा भूल
या
अपने बा भूल , मोबाइल
ठप गइल बा
जिनिगी
के ह असूल , भरे
में घात भइल बा
जगह
न राखी पेट , अन्न
रह जाई अधकच
खाली
होई हाथ , खजाना
साथे अरकच
46
जीअत बोवसि काँटकुस , मुअते जोरसि नात।
चिक्कन चुलबुल बात से , करस भितरिया घात
करस भितरिया घात , लात के भूत न मानस
अपने बनस सुजान , आन क बुद्धू जानस
जिनिगी पलपल जाय , चाय फोकट में पीअत
कइलन ना कल्याण , कबो ऊ अपने जीअत।
चिक्कन चुलबुल बात से , करस भितरिया घात
करस भितरिया घात , लात के भूत न मानस
अपने बनस सुजान , आन क बुद्धू जानस
जिनिगी पलपल जाय , चाय फोकट में पीअत
कइलन ना कल्याण , कबो ऊ अपने जीअत।
47
भोजपुरी भाखा सरस , डाले अमृत कान ।
भाईचारा प्रेम से, एकर बा पहिचान ।
एकर बा पहिचान , जगत में धूम मचावे ।
अपने घर में लोग, बेवजह नजर लगावे ।
माई के सनमान , देल बा बहुत जरूरी ।
सनमत बा सब लोग , त बोलीं जय भोजपुरी ।
भाईचारा प्रेम से, एकर बा पहिचान ।
एकर बा पहिचान , जगत में धूम मचावे ।
अपने घर में लोग, बेवजह नजर लगावे ।
माई के सनमान , देल बा बहुत जरूरी ।
सनमत बा सब लोग , त बोलीं जय भोजपुरी ।
48
सरसावन सुनते लगे , भाव न होय भदेस ।
रचना में हो सादगी , देवे शुभ संदेश ।
देवे शुभ संदेश , नारि-नर सबहिन भाए ।
बिना हिचक संवाद , सभे निज भाव बताए ।
पुरुखन के ई बात , लगे अति ही मनभावन ।
बढ़े लोग में प्यार , सुने हिय सुर सरसावन।
रचना में हो सादगी , देवे शुभ संदेश ।
देवे शुभ संदेश , नारि-नर सबहिन भाए ।
बिना हिचक संवाद , सभे निज भाव बताए ।
पुरुखन के ई बात , लगे अति ही मनभावन ।
बढ़े लोग में प्यार , सुने हिय सुर सरसावन।
49
नंगापन के जोर बा , लउके लोग उघार
इत्र मले कबहूँ भइल , मछरीगंध निवार
मछरीगंध निवार , न केहू खाए मछरी
अपने घर के दाल , हींग के छौका सगरी
मुट्ठीभर बा लोग , दिखावत बेशर्मीपन
अगर न दीहीं भाव , दूर होखी नंगापन।
इत्र मले कबहूँ भइल , मछरीगंध निवार
मछरीगंध निवार , न केहू खाए मछरी
अपने घर के दाल , हींग के छौका सगरी
मुट्ठीभर बा लोग , दिखावत बेशर्मीपन
अगर न दीहीं भाव , दूर होखी नंगापन।
50
के पूछत बा बाप के , सभके पेंशन भूख
पानी जड़ में ना परल , ठूँठ भइल अब रूख
ठूँठ भइल अब रूख , गात ना पतई अइहें
कह बसावन हाल , का घरे घेंवा खइहें
बाजत रहे मृदंग , राग सब एके गा के
हहरत छूटल प्राण , न जनलें आपन बा के
पानी जड़ में ना परल , ठूँठ भइल अब रूख
ठूँठ भइल अब रूख , गात ना पतई अइहें
कह बसावन हाल , का घरे घेंवा खइहें
बाजत रहे मृदंग , राग सब एके गा के
हहरत छूटल प्राण , न जनलें आपन बा के
51
शहखर्ची कंजूस के , साल माथ बा एक
खुश होय जग में घूमे , दूजा गल्ला टेक
दूजा गल्ला टेक , नोट के रखे तिजोरी
हहरे बाल गनेश , हाथ ना लगे कटोरी
सुबह-सुबह में मिले , दाल रोटी के पर्ची
मौज उडाये पूत , पिता जेकर शहखर्ची
खुश होय जग में घूमे , दूजा गल्ला टेक
दूजा गल्ला टेक , नोट के रखे तिजोरी
हहरे बाल गनेश , हाथ ना लगे कटोरी
सुबह-सुबह में मिले , दाल रोटी के पर्ची
मौज उडाये पूत , पिता जेकर शहखर्ची
52
जरत
जीभ फोरा परल , मरलसि
जांगर बान
आपन
सभ कुछ सौंप के , सिरिकी
मुंजी तान
सिरिकी
मुंजी तान , बनल
ना कबो बसेरा
देर
से खुलल आँख , लगावे
काहें घेरा
अपन
चुहानी भूर , कमाई
लउके निगरत
रसिक
बचावऽ लाज , इहाँ
बा लोगवा जरत
53
कउआ के हाथे पड़ल, सोना के तलवार
काट रहल बा कोंख से , उपजल प्रेम अपार
उपज प्रेम अपार , मिलल बा बर बकडेरा
हाथे रेख बिहून , लगवलस राहू डेरा
बाटे कवन उपाय , बतावे पंडित नउआ
बा दुर्गंध दहेज , ले गइल मोती कउआ
काट रहल बा कोंख से , उपजल प्रेम अपार
उपज प्रेम अपार , मिलल बा बर बकडेरा
हाथे रेख बिहून , लगवलस राहू डेरा
बाटे कवन उपाय , बतावे पंडित नउआ
बा दुर्गंध दहेज , ले गइल मोती कउआ
54
मन के साँच सपूत के , पूजे सब संसार
जे सोझा आँखी परल , ओकर बेड़ा पार
ओकर बेड़ा पार , लगावे गला हुलस के
जरनिहार जर जाय , देखते प्रेम झुलस के
जे भी गइले पास , देखले अपनापन के
देखत नैन जुड़ाय , तृप्ति होखेला मन के
जे सोझा आँखी परल , ओकर बेड़ा पार
ओकर बेड़ा पार , लगावे गला हुलस के
जरनिहार जर जाय , देखते प्रेम झुलस के
जे भी गइले पास , देखले अपनापन के
देखत नैन जुड़ाय , तृप्ति होखेला मन के
55
बतरस
करत कृपा भइल , मिलल
अनोखा ज्ञान
दूब
दरख्त क आड़ में , ताने
अपन वितान
ताने
अपन वितान , मान
सनमान बढ़ावे
करिया
उज्जर लोग , बइठ
के थकन मिटावे
राजा
भा हो रंक , रसिक
सभ बाटे समरस
एके
माई लाल , करे
आपस में बतरस
56
विद्वत्
जन के संग से , जड़
भी पाए मान।
थोड़ी-सी
फुर्सत मिले , करना
उनका ध्यान।
करना
उनका ध्यान , मिलेगी
संपद् सारी।
अहं
भाव हो नष्ट , जुड़ेगी
रब से यारी।
मन
में हों शुभ भाव , जगत
से हो अपनापन।
अंतस्तम
मिट जाय , संग
हो जब विद्वत् जन।
57
मनई मन के सोंच हऽ , कइसे करीं विकास
ऊपर चढ़ीं पहाड़ पो , नीचे काटीं घास
नीचे काटीं घास , आस अनका ना लागी
आपन भल अवकात , दरद दलिद्दर भागी
पोंछ पकड़ ना ठीक , घँघोरे कादो कदई
अपने मन महराज, बइठल भुईंए मनई
ऊपर चढ़ीं पहाड़ पो , नीचे काटीं घास
नीचे काटीं घास , आस अनका ना लागी
आपन भल अवकात , दरद दलिद्दर भागी
पोंछ पकड़ ना ठीक , घँघोरे कादो कदई
अपने मन महराज, बइठल भुईंए मनई
58
विद्वानन के पुछ नहीं, राजा के दरबार
विष्णु गुप्त के कोप से , नंद वंश संहार
नंद वंश संहार, चाणक्य कूटनीति से
सब चमचों की हार , हुयी जो राजनीति से
सफल होत सिद्धांत , तेज दिखता है आनन
नेता नम्र सुभाव , कद्र करता विद्वानन
विष्णु गुप्त के कोप से , नंद वंश संहार
नंद वंश संहार, चाणक्य कूटनीति से
सब चमचों की हार , हुयी जो राजनीति से
सफल होत सिद्धांत , तेज दिखता है आनन
नेता नम्र सुभाव , कद्र करता विद्वानन
59
बंधन मन के ठीक ना , लोग जास अझुराय।
हिय अइँठे पिंड़ुरी चढ़े , पोर-पोर छपिटाय।
पोर-पोर छपिटाय , बेअगर धउगे बहरी।
भीतर झाँक न पाय , जहाँ पर पीरा गहरी।
चौपट पामर संग , लगाइबि जबले चन्दन ।
कबो न होई मुक्त , कठिन दुनिया के बन्धन।
60
सहस मने स्वीकार बा , नीमन बाउर बात।
ऊ नर जिनिगी में कबो , कइसे खाई मात।
कइसे खाई मात , विराजी सभके दिल में।
चमकत रही लिलार , मान पाई महफिल में।
चाहत रखीं सँगोर , गोड़ ओढ़ने भर रहस।
मिली दिव्य परसाद , दुसह बोली जिन्ह सहस।
61
रच्छा में हतिया भइल , लागल रसरी साँप
पछतावा हाथे लगल , बढ़त गइल संताप
बढ़त गइल संताप , भइल जल्दी में गलती
लाखन करीं उपाय , चले ना कवनों चलती
लागल जइसे आज , बेपरदा खलिहा कच्छा
भइलसि बन्द बकार , अकारथ गइलसि रच्छा
62
कुलभूषण भोजपुरी के , मिलल आज आशीष
हमरा
के अइसन लगल , जइसे
मिलले ईश
जइसे
मिलले ईश , वांछना
पूरा भइलसि
फाटल
हिया कुहेस , खिलल
मन दुविधा गइलसि
सिर
पर रखलें हाथ , भइया
मिसिर बृजभूषण
धन्य
रसिक के भाग , भेंटि
भाषा कुलभूषण।
63
सूफ़ी
संत फकीर के , सूर्य
सरीखा चाल
दीप्तिमान
जग को करे , करके
उन्नत भाल
करके
उन्नत भाल , लगे
जस पावन गंगा
होत
सबेरे दरस , चित्त
हो जाये चंगा
सतसंगत
परभाव , त्यागे
जन बेवकूफ़ी
प्यार
और सद्भाव , सिखाया
करते सूफ़ी
64
रंगमंच प जिनिगी के , आगे बा अनजान
थिरकत पाँव फिसल गइल , पहुँचल घरे मसान
पहुँचल घरे मसान , अकड़न फिर भी ना गइल
नेत अनेत उगाह , बाटे बक्सा में धइल
खाली हाथ पयान , जीयत जन करे प्रपंच
नीयति के सब खेल , बा सजावल रंगमंच
65
कागा कवनि कसूर से कोमल भइल न गात।
काहे ला सतलोक में पावेलऽ तिल भात।
पावेलऽ तिल भात कुचचाली मिलले साथी।
भवँजाले अझुराय कहसि मूसन के हाथी।
जे देखसि रति तोर कहालन मनुज अभागा।
तू हउवऽ बड़भागि भुशण्डि तूहें कागा।
66
लोगवा बाटे स्वार्थी, झुक जाला तत्काल
सिर पो जब लाठी बजे , करिया होला भाल
करिया होला भाल , चाल ना केहु सुधारे
आफत पड़ते चोर , शिवाला डेरा डारे
रसिक बतावस राह , स्वार्थ के छोड़ऽ रोगवा
मन से करब प्रणाम , प्यार पथ चली लोगवा
67
पाँड़ेजी
के पेट में , उठल
बवंडर तेज
खिंचड़ी
खाइल ठीक बा , शंखनाद
परहेज
शंखनाद
परहेज , छुड़छुड़ी
छूटे लागी
अगल
बगल के लोग , नाक
सिकोरले भागी
होई
अगर अनेत , त
लगिहें लो काँड़े जी
घर
में हो आराम , समझीं
कुछू पाँड़ेजी
68
रहलन
हँसत प्रसंग पर , उकसल
रहल ह नार
छिलबिल
भइली आसनी , बिन
बरखा बौछार
बिन
बरखा बौछार , रसिक
जी धूप जलवले
गंध
गइल उधियाय , पाँडे
क लाज बचवले
जय
जय हो श्रीराम , जबर
जयकार करवलन
रसिक
दिनेश सुभाष , पाँड़ेजी
हँसत रहलन
69
मुफुत
माल चँपले रहन , पिछला
रात गंभीर
करवट
फेरलन रात भर , थिर
ना भइल शरीर
थिर
ना भइल शरीर , चहुँपले
पडिताई में
खइलन
खीर दरेर , दरकलन
चतुराई में
बाँचत
पाठ पुरान , अपान
मचवलस नु कुफुत
किरिया
खइलन ढ़ेर , माल
नहीं खींचब मुफुत
70
पत्नीजी
जब बोलती , होती
बोली बंद
डाँट
मुझे ऐसी लगे , सरस
रहा मधुछंद
सरस
रहा मधुछंद , मगज
कुछ नहीं समाये
थरथर
काँपे पैर , याद
नानी की आये
सदा
रहा हूँ मौन , कहूँ
बीती अपनीजी
मैं
तो करता काम , मजे
करती पत्नीजी
71
नैतिकता
के बात पऽ , सइ-सइगो
उपदेस
संस्कार
जोहत फिरीं , गइल
बिबेक बिदेस
गइल
बिबेक बिदेस , ताक
पऽ रखले प्रानी
मानवता
के प्रश्न , तंगदिल
निठुरी बानी
आवे
मुश्किल वक्त , निदाने
भइल नापता
उघरल
छद्म लिबास , सिकुरली
सभ नैतिकता
72
दरियादिल इंसान के , नीयत होला साफ ।
प्रेम भरल संवाद से , रसगर देला बाफ ।।
रसगर देला बाफ , करम के सभकुछ जाने ।
गोतिया भाई कुटुंब , प्यार के सोती जाने ।।
इचिको नाहीं रोस , भले हो बैरी महफ़िल ।
भला करे भगवान , भूमि पर हो दरियादिल।।
73
टहल टिकोरा सभ गइल , स्वारथ के सिर ताज । रसना में रस ना रहल , जीभ खुजावत खाज ।।
जीभ खुजावत खाज , पड़ल संबंध प डाका ।
पूत घुमावे स्वान , पिता घर खाये धक्का ।।
रसिक कहे कर जोर ,कष्ट तनि सह लऽ थोरा ।
मुरदाबा असबाब ,पिता बिन टहल टिकोरा ।।
74
भलहीं तन होखे बिलग, मन से होय जुड़ाँव।
पिय अनते परदेश में , हिय उरझे वा गाँव ।।
हिय उरझे वा गाँव, सूधि आवे बचपन की ।
थिरकन लागे पाँव,भेद मिटिगा पचपन की।।
बरगद बिरिछ बधार, आँख के सोझे असहीं।
गिनती ग्यारह नवाँ , बनीं उतपाती भलहीं ।।
75
जिनिगी में सुख ना मिली , मन जब रही उदास ।प्रेम भरल संवाद से , रसगर देला बाफ ।।
रसगर देला बाफ , करम के सभकुछ जाने ।
गोतिया भाई कुटुंब , प्यार के सोती जाने ।।
इचिको नाहीं रोस , भले हो बैरी महफ़िल ।
भला करे भगवान , भूमि पर हो दरियादिल।।
73
टहल टिकोरा सभ गइल , स्वारथ के सिर ताज । रसना में रस ना रहल , जीभ खुजावत खाज ।।
जीभ खुजावत खाज , पड़ल संबंध प डाका ।
पूत घुमावे स्वान , पिता घर खाये धक्का ।।
रसिक कहे कर जोर ,कष्ट तनि सह लऽ थोरा ।
मुरदाबा असबाब ,पिता बिन टहल टिकोरा ।।
74
भलहीं तन होखे बिलग, मन से होय जुड़ाँव।
पिय अनते परदेश में , हिय उरझे वा गाँव ।।
हिय उरझे वा गाँव, सूधि आवे बचपन की ।
थिरकन लागे पाँव,भेद मिटिगा पचपन की।।
बरगद बिरिछ बधार, आँख के सोझे असहीं।
गिनती ग्यारह नवाँ , बनीं उतपाती भलहीं ।।
75
दो कौड़ी के आदमी , करी रोज परिहास ।।
करी रोज परिहास , कष्ट तन पर जब आई ।
बोझल अपने पाप , नसीहत दीही भाई।।
होई सकल बिनास, जेह दिन धधकी चिनिगी ।
रसिक बतावे बात , करम से सुधरी जिनिगी ।।
~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~
76
जे आइल जइबे करी , तनिक समय बा पास ।
परिवर्तन पगुरी करे , रहे सदा अहसास ।।
रहे सदा अहसास , फैल जा खुशबू बनके ।
सुन्दर बा संसार, चलऽ सज-धज के तन के ।।
नीयत नेक सलाह , रहे ना मुख मुरझाइल ।
रसिक सुनावऽ राग, मीत बन जा जे आइल ।।
77
सरबस धन खखरी भइल, रजऊ भइले संत ।
माघो में तन मन तवे, पारा चढ़े बेअंत ।।
पारा चढ़े बेअंत, रात कटवावन लागे ।
कतनो कसीं लगाम, तुरग मन सरपट भागे ।।
कवनो करीं उपाय, सजन ना आवे कगरी ।
रसिक बतावऽ राह, भइल सरबस धन खखरी ।।
78
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