लगन चालू बा -1
सुन्नर कनिया चाहीं एगो परमेसर पति के माने
घरके चाभी रखे हाथ में सास ससुर के सनमाने
चाहे तऽ घर महरी लावे चाहे महरी दूर रखे
देवर संगे करे ठिठोली ननदी के भी पहिचाने
दहेज ना चाहीं एको पाई
शर्त बा सुन्नर मिले लुगाई
घरके बबुआ बा कोहिनूर
कनिया चाहीं सरग के हूर
होखे गुनवंती मृगनैनी
जे से छोड़स बबुआ खैनी
मृदुभाषी जे मिली बहुरिया
हाथ न लागी पाउच पुड़िया
कान खोलके सुनो हसीनों
बबुआ ना जइहन कैसीनो
पढ़े लिखे में बावन वीर
आन के धन से खालन खीर
जे इनकर जोड़ी लगवाई
दीहें दिल से दुआ कन्हाई
लगन चालू बा -2
खाये गइनी भोज
करे लगनी ओज
मन कहे कि झोरऽ
पेट कहे तनि डऽरऽ
बात बात में बात बढ़ गइल
मन के पारा ढ़ेर चढ़ गइल
पँवरत रहे जवन कठवतिया
ओके आपन बनवले संघतिया
पेट के उपर पड़ल पाला
करे लागल रात में हाला
मनवा जाके चुहान लुकाइल
पेट के उपर आफत आइल
अब ना करब अनेत ए भइया
जान बचाव रसिक कन्हइया
पूड़ी के पंजरा ना जाइब
रसगुल्ला से दूरी बनाइब
आलूदम के दम निकालब
चटनी के चक्कर में डालब
मटर पनीर के बऽही नीर
जब ना छुअब ओकर शरीर
सतमेझरा सब्जी ना खाइब
रायता से हम काम चलाइब
अबकी बेर बचावऽ राम
बाँच जाइब तऽ होई प्रणाम
लगन चालू बा -3
ए बबुआ तनि सजके आवऽ ,अगुआ आइल बाड़े
हित के सोझा मुँह मत खोलिह , ना तऽ गिरबऽ खाड़े
बड़ा भाग से एही लगने , हाड़े हरदी लागी
घरके के अब सनमान बढ़ी , आ दुख दलिदर भागी
बढ़ल जात बा तोर उमरिया , अब का पइसा करबे
बिना बहुरिया बइठल बाप क , मूँग करेजे दरबे ?
नगदी भेंटी ना फटफटिया , हुकुम बा सरकार के
बड़ा भाग से अगुआ आइल , जगल भाग दुआर के
ना करबे ते शादी तऽ का , रोजे हाड़ ठठइबे
ए बबुआ बाबू माई के , कइसे पार लगइबे
रसिक बाबा फेर ना मिलिहन , सस्ते में फरिअइहन
बा जुगाड़ उनुकर समाज में , साझा ब्याह करइहन
लगन चालू बा - 4
कउआ के हाथे पड़ल, सोना के तरुआर
काट रहल बा कोंख से , उपजल प्रेम अपार
उपजल प्रेम अपार , मिलल बा बर बकडेरा
हाथे रेख बिहून , लगवलस राहू डेरा
बाटे कवन उपाय , बतावे पंडित नउआ
बा दुर्गंध दहेज , ले गइल मोती कउआ
दुखिया घर के धीयरी , तोपल नीच कहाय
टाँग उघरले जे घुमे , पइसा पूजल जाय
ए सुगना का जुगुत बा , तोड़ल जाये बान्ह
आँखि पुतरिया ना चढ़स , कबहूँ भइया कान्ह
लगन चालू बा -5
मिलल अठन्नी तिलका भइया खरचा करिहें दसगुन
गाँव गिरामिन रोज बैठके चाह चभोरस थूथुन
खखरी होई ईजति भइया जब ना रही नटंकी
सांझ सबेरे लोटा ले ले धाँगस द्वार छटंकी
बड़का बस के के पूछेला कार कारवाँ साजे
रोजे भोरे गेंठी खोलत पूत पिता से बाजे
कुकुरभोज में के पूछत बा किन अइले किन गइले
जे धइले कर थरिया रामा उहे भवध्धी भइले
छत्तीस गो अइलसि फटफटिया रहे दुआरे लागल
भोरे भँइस पेन्हावे खातिर अधरतिए में भागल
फूफा मामा खास घराती दूल्हा समधी बचले
ओ से जादे भड़दारी सन आपन स्वांग ह रचले
लगन चालू बा -6
शादी व्याह में अगुआई के
होला बड़ा महत्व
फिर अगुआ जूतियावल जाले
मिले न जब अपनत्व
ब्याह करावल पुन्न काम ह
पार कसहुओं लागस
लट्ठ लड़ावस समधी समधी
अगुआ जंगल भागस
बेटहा के ढाढस दिहलन कि
बतीस अभरण भेंटी
ओने बेटी घर कहि अइलन
जाके तनिका टेंटीं
बड़हन बाप पूत इकलौता
अनधन अनघा बाटे
दाबी दिहले रहबि अइसहीं
कतिनो कावा काटे
भइल कटाउझ शादी में तऽ
गुरहत्थी ना होखल
अगुआ आग लगा के पंचों
अपने दुअरे खोखल
घोघ फुला के समधी रूसल
ईजति खखरी भइले
आगत दुरगत निहिचै जानी
अगुआ भाग परइले
गठबंधन ना टूटल कबहू
पूरा भइल बेयालिस साल
कंचन अब कुंदन बन गइली
रसिक क चमके लागल भाल
लगन चालू बा -7
लउकत रहे परेम परस्पर पत्तल पाँति परोसे में
अब त भोजन भेंट रहल बा भइया राम भरोसे में
पेट बेचारा सोचत बा का खाईं का छोड़ीं
एने लउके गाजर हलुआ ओने दीखे मंगौड़ी
खाए से पहिले भर जाता चाट सॉस से पेट प्रिये
तुहें बतावऽ बिन कुल्चा के कइसे होखे तोस प्रिये
उत्तर दखिन के मिलाप बा छप्पन भोग धराइल बा
जीभ जरुरत का समझेला ओकर मन मन भरुआइल बा
राम दुहाई कइसे छोड़ीं कठवतिया जे पँवरत बा
रुक जाईं तनिका सा रउआ अंदर पेड़ा सँवरत बा
चमचम चमके, काजू कतली मिल्क केक मुस्काए
घेवर के घर धूम मचल बा खुरचन जिया जराए
हऊ देखीं सतमेंझर सब्जी अइंठत बाड़े देह पनीर
परवर दम के पावर देखीं ढ़र ढ़र आँखिन ढ़रके नीर
कतिना ले हम भनीं बखानी बा अनंत पइसा के माया
जीभ सीखावन कब मानेला ? तड़प रहल बा सुन्नर काया
लगन चालू बा- 8
बबुआजी ससुरारी गइलें , छरपत ऊँचा खाला
मन में टिसुना लागल रहुवे , भेंटी मुरुग मसाला
हलुआ पूरी देख बिदुकले , वेज न चाहीं हमरा
रोज करेनी योग साधना , अलगे चाहीं कमरा
होटल से आइल खरीद के , दुई मुरुगन के बोटी
पुरहर मरिचा झोंकल रहले , खइलें घँसकल टोंटी
लोटा लेके बबुआ डललन , खेते आपन डेरा
रह रह मुरुगा बोले भइया , फिर फिर लागे फेरा
अब ना रूठब खाये खातिर , इज्जत खखरी भइले
सूखल लिट्टी और चबेना , राह निमनका धइलें
योग साधना माटी मिलले , कमरा मुँह बिजुकावे
जे बाबा के बात न माने , मोका पर पछितावे
लगन चालू बा- 9
छेका भइल मुहूरत सोधल , तिलक और बियाह के
दुन्नो कुल के मिलन भइल बा , चली सभे निबाह के
पाँच लाख फटफटिया एगो , सबसे पहिले चाहीं
बाप के बड़का मुँह बवाइल , चर्चा कवनो नाहीं
दरद बा कतना बेटिहा के , केहू नइखे जानत
आपन छोंण भरे के चाहीं , बा अइसन पर लानत
मय पइसा चुगता कर दिहले , बाँचल बीस हजारी
बाप त बड़का मुँह बवले बा , नाहीं चली उधारी
मय तिलकहरू बइठल बाड़ें , दउरा दउरी होता
हाथ जोर मनवउअल होता , होके तनी अलोता
बेटहा के हुँकार कान में , साफे साफ सुनाता
मौन समाधी लिहलस अगुआ , तिलकहरू छपिटाता
आलू दम के गंध नाक में , मुँह से लार गिरावे
खुसुर फुसुर सभ करे कान में , बेटहा क गरियावे
लगन चालू बा -10
ससुरारी में बइठल बइठल , पंचामृत के पीयस
दसो अंगुरी घीव डुबवले , सरगे जिनिगी जीयस
पहिला अमृत सरहज साली, हँस हँस के बतियावे
दूसरा अमृत तेल लगाके, साला जब नहवावे
तिजा अमृत चादर तान के , मन मुराद मिटिकावे
चौथा अमृत चंचल चित्त ह , काबू कबो न आवे
ससुरारी में घर घर घूसल , सरहज से फरमावे
पाँचम अमृत छपन भोग हऽ , छन छन मिले मसाला
ससुरारी में पंचामृत के , सुख द हे नन्दलाला
लगन चालू बा -11
भइया गइलन अगुआई में, भकड़ल मिलल बतासा
एके टूकी कटले रहलें , कइलस पेट तमासा
रहे मनउती अगुआ आवे , बर बरनाठ भइल बा
एक बरस से बक्सा भीतर , गुरहा माल धइल बा
बड़ा भाग से दिन लौटल बा , अगुआ दुअरे अइले
घर में माल खजाना बाटे , पुरहर स्वागत कइले
तस्तरिया में साजल रहले , बिस्कुट बासल निमकी
बूढ़ बतासा के शरार प , मछियो कइसे भिनकी
सूंघत बिस्कुट अगुआ बिदकल, प्लेट क रखलस नीचे
करे इशारा इक दूजा के , रह रह कुर्ता खींचे
लागत बा असवो रह जइहें , हाड़े हरद न लागी
जबले ना आई रसगुल्ला , संकट तोर न भागी
लगन चालू बा -12
पहले सब तोपल रहे , अब हो गइल उघार
ना त ओइसन गाँव बा , न ओइसन ससुरार
न ओइसन ससुरार , प्यार सब भइल नदारत
बा एकल परिवार , मेहरी सकल विशारद
आपन आपन राग , अलापत बाबा कहले
जीजा गुण के खान , रहन ससुरारी पहले
साली सरहज गाँव के , लागत रहे झुमेल
मर्यादा में प्रेम के , रहे होत अटखेल
रहे होत अटखेल , रहे पद ऊँचा पहुना
जब जाये सरकार , कहे लो अवरू रहु ना
छप्पन भोग प्रकार , तश्तरी रहे न खाली
ऊ नइखे ससुरार , न बाड़ी सरहज साली
लगन चालू बा-13
दो मुँह वाला लोग बा , धरती पर भगवान
सतुआ गठरी बान्ह के , मटर पनीर नवान
सुन्नर कनिया देख के , शादी के उतजोग
मरलस सोना जूत से , बढ़ल पुरनका रोग
पूत क चाहीं छलबिली , बाप कहे कि पुरहर
माई के मनमोहिनी , छवफुटही आ छरहर
छाँटत छाँटत कनिया क , भइलन बर बरनाठ
मुखड़ा के पानी उड़ल, ठठरी लागे काठ
लेके ऐनक हाथ में, आपन रूप सँवारs
चौंसठ कला प्रवीण के , तब बाबु दुत्कारऽ
नारी जाति क नमन बा , मत खोजs कुछ और
जे सनमानी प्रेम से , तेकर सिर पऽ मौर।
धन जन बल के रोब से , रसिक नशा में चूर
के बा अइसन जगत में, जे ना चाटल धूर
रिश्ता के बड़ मोल बा , प्रेम क हो आधार
लेन देन में मेख बा , भेजऽ नदिया पार
लगन चालू बा- 14
लागल ठकठेन , आगे कइसे बढ़ी बात
लइका कइसन बाटे ,
कइसन बाटे ओकर जात पात
लइका कइसन बाटे
अगुआ से पूछत बाड़े लइका के बाप हो
अइसन ना होखे कवनो लाग जाये पाप हो
लागे जाये पाप
सुने में आइल बा कि हउए कुजात
लइका कइसन बाटे
कइसन बाटे ओकर जात पात
लइका कइसन बाटे
भोरहीं से लागल रहे कुटना कुटाही में
काम रहे ओकर काँट बोए रोज राही में
बोए रोज राही में
कर दिहलस बतिया से दिलवा में घात
लइका कइसन बाटे
कइसन बाटे ओकर जात पात
लइका कइसन बाटे
कहलस कि रोगवा ह उनुकर खानदानी
बाकी परिवार रोजे रोज काटे चानी
रोज काटे चानी
करेला दुआरी आके मीठे मीठे बात
लइका कइसन बाटे
कइसन बाटे ओकर जात पात
लइका कइसन बाटे
रसिक बाबा रोवताड़े कुटनन के चाल से
दूर रहीह भइया मोरे एहनी के जाल से
एहनी के जाल से
छँवड़ा उनवान हउए जानेला जमात
लइका निमन बाटे
निमन बाटे ओकर जात पात
लइका निमन बाटे
लगन चालू बा -15
राम सिया के चुपके छुपके मिलन भइल फुलवारी में
नैना चार बदाइल एने पूरब अलँग बधारी में
रहे सिराती मेला सबहीं जात रहे शंकर के धाम
रह रहके सिहरावन लागे कबहूँ छाहाँ कबहूँ घाम
कहल रहे पियरकी साड़ी पेन्हले बबुनी रहीहें
दूरे से देखीह ए बाबू बात न कुछऊ कहिहें
भौचक होके देखत रहलीं रंग पियरका राही में
मन में लावा फूटत रहे मृगलोचन के चाह में
देखत देखत राह पहुँचनी भोले बाबा दुआरी प
अचके में अँखिया पथराइल टिकल पीयरकी सारी प
पड़ल दिखाई मांग में सेनुर चढ़ल भड़ेसर उतरल
अइसन लागल दो हजार के नोट ह चूहा कुतरल
थाकल हारल भुखल पियासल गइनी हलुअइया के पास
फिरसे देखनी रंग पीयरका मन में जागल हमरो आस
ई बबुनी त गपकत रहली गरम जिलेबी गुरही
हँसके नजर झुका लिहलह ऊ देखि तुरावत पगही
मुँह लटका के घुमे लगनीं पियर पियर सगरो लउकल
जइसे सरबस खेत उमगि के सरसो फूल पियर सँउपल
मन के बात बता ना पवनी हम अपना परिवार के
देखनी ना सूरत बनिता के पहिले घूंघट उघार के
सेज प गइनी पहिला रात त चमकल कनवा के बाली
काँपत हाँथ जब घूंघट उठवनी रही जिलेबिया वाली
लगन चालू बा -16
ना भेंटी चरपहिया गाड़ी , बाबा के पटिअवले बा
सरकार के नियत साफ बताके , अगुआ सभ निपटवले बा
नगद नारायन भेंटत रहे , रोज रोज कटुए चानी
मोछे घीव लगे बेटहा क , बेटिहा करे कुर्बानी
थू थू होता सभ्य समाजे , तिलक दहेज प्रथा के
स्नेह मिलन के बहुत बड़ाई , समझे लोग व्यथा के
एक साथ सौ शादी होता , खरच बा खदेराइल
हमहूँ सोंचीं तुहऊँ सोंचs , अवगुण रहे पराइल
लोग का कही धके धसोरs , असली के गठजोड़s
बर कनिया के जिनिगी सुधरे , प्रेम क नाता जोड़s
बेटा बेटी एके मानs , सुघर समाज बनावs
घर में आइल बिटिया के तू , गर्भ से मत बिलगाव
लगन चालू बा -17
बेटी के बियाह में तबाह भइले बाबूजी
कइले न कवनो उतजोग हो
बेटहा के हिरदेया पसीजबो न कइलस
बढ़ता दहेजवा के रोग हो
रहिती जे बेटी त घेंटी दबइते लोग
बनल बाड़े पुर पुरधान हो
लूर लछन ज्ञान गुन हेंठा धराइल बा
पइसा बनल बा महान हो
ए बाबा नाहीं हम अगिनी में जरबो
नाही करब हमहुँ बियाह हो
तोहरो दिहलका पदेस हम ना भूलब
होखी नाहीं सूरत सियाह हो
दुलहा जे मिलिहन नेत धरम के
दुनो कुल के होइहें मिलान हो
खुश होइहें रसिक बाबा खुश होइहें देवता
खुश होइहें सिरी भगवान हो
लगन चालू बा -18
आजी कहली बाबाजी से , अंत समय आइल बा
देखे खातिर नतिन पतोहू , मनवा अकुलाइल बा
अभी उमरिया काँचा ओकर , बारह बरिस क बाटे
आजी नाहीं बतिया मनली , बाबा लगलें डाँटे
काँच कली के पकठाए दऽ , गाँछ के मत सुखवाव
एकइस इचिको अगते ना , बबुआ दुलह बनावs
आजी रउओ अंत समय में , कुछ नीमन काम करीं
लोभ मोह ममता के छोड़ीं , ईश्वर के ध्यान धरीं
शादी के मतलब समझे दीं, पहिले खूब पढ़ाईं
तब बबुआ बबुनी के रावा , माथे मउर चढ़ाईं
लगन चालू बा- 19
अभिएँ तऽ खोलले रहलीं हँ , कइसे कुकुरा ले भागल
जम के होखत रहे गवनई , रातो भर सबहिन जागल
तिलके खातिर रहे किनाइल , बाटा वाला जूता
भीड़ भाड़ से अलगे रहनी , धइले रहीं अलोता
देखनीं न कहँवा से आइल , लेके कहाँ पराइल
नइखे ढूकत मोर मगज में , कुकुरा के इस्टाइल
बायाँ गोड़ क ले भागल बा , दहिना जीभ बिरावे
खीसी आग बबूला होके , जूता के बिलगावे
जसहीं फेंकल परती देने , रसिक झपटलन उहँवा
रसिक क हितवा पास बुलाके , पुछलस दोसर कहँवा
काँपे लगले जब पूछले त , कहले हम का जानीं
मरलस गल पो हुमच चमेटा , दिहलन साँच बखानी
भँइस क नादे जूता बडुए , खाँची से बा तोपल
एह पलान के मुखिया दोसर , उनके हऽ ई रोपल
ए बबुआ हऽ नाम दुअरिका , करत रहीं पल्हवानी
तोहरा जस नवहा के रोज , पियावत रहीं हम पानी
लगन चालू बा -20
बेटिहा ह परदेशी ओके नीमन रिश्ता चाहीं
राउर लइका सइ में एके करब मनाहीं नाहीं
तिलक नाहिं दी फूटल कौड़ी बाकी दानी हउवे
दुनहूँ हाथ खोल के राखीं कहब एक दिन रहुवे
भेजले बा हमरा के पहिले लिस्ट बनावे खातिर
दान कोकरा चाहीं कउची के के रही बाराती
चाहीं जोरी रिश्ता त हमरा के बतलाईं
अगिले हफ्ते वायुयान से पाटी हिंहवे आई
हमरा कवनो लालच नइखे सेवक हईं समाजी
बने सलामत जोरी सभके इहई मनसा बा जी
लइका के चरपहिया चाहीं बाबूजी के ट्रैक्टर
करिया गोर गँवारिन अनपढ़ नइखे कवनो फैक्टर
घुड़सारी के हवें पुरोधा बाबा मंगले अरबी घोड़ी
आजीजी के चाहीं खाली दाँत सुनहुला जोड़ी
भइया कहले रे भकचोन्हर हमहुँ डूबकी मारब
साठ लाख के सूट पहीर के आपन पुरुखा तारब
चोन्हा क के भउजी कहली करबो नाहिं मनाहीं
हई देखीं गरदन बा सूना हार हँसुलिया चाहीं
सभके दीठ लगाके अगुआ विदेशी से बतियवले
हाँ में मुड़ी हिलावत गइले हँसके बात बतवले
डीलर से सब बुकिंग कइले आधा दाम दियाइल
हार हँसुलिया पेन्हले भउजो चलस राह अगराइल
एक दिन सुतले रात में सभके बूटी देल सुंघाई
सरबस लेके माल खजाना भोरे गइल पराई
छाती पीटत रोवे सभे लालच लंगटा कइलस
देबे वाला रहे खजाना राह गाँव के धइलस
लगन चालू बा -21
ए बबुआजी चलs बनारस , भरती मेला लागल बा
मय जवार के लइका सन के , भगिया उहँवा जागल बा
तुहऊँ बाडs हठ्ठा कठ्ठा , अंग अंग में जोश भरल
जिनिगी जनि तू व्यर्थ गँवावs , निपट गाँव में परल परल
बाबूजी से कहि द करिहें , भइवध भोज क तइयारी
वर्दी पहिर के जब आइब त , पाटी लेहब बरियारी
गाँव क लोगवा समझत रहे , हमरा के निपट अनाड़ी
आज से हमर नाम धराई , मुरारी लाल जोगाड़ी
रसिक मुरारी बइठ कार में , चलले भर्ती मेला में
मन में रहे उमंग बुझाई , आगे चलके खेला में
कवनो काम क पहिले बाबू , देव पितर पूजल जाला
तन मन धन से उनके दर पो , बबुआ हो सूतल जाला
सजल धजल पंडाल अनोखा , चउका बइठल कनिया
रसिक बतवलें सुनs मुरारी , ईहे तहरी धनिया
चारो ओरी मुड़ी घुमवलन , लउके लगल दुनाली
पंडित कहलन गाँठि जोरि के , भइली अब घरवाली
मन में इच्छा रहे कि बनिती , सीमा पर के हम प्रहरी
अइसन मरलस झिट्टी भगिया , घरे ले अइनी मेहरी
लगन चालू बा-22
बबुआ गइल बिदेस त बपसी , कतिना ना अगराइल रहलन
आई घरे खजाना मन में , सोच सोच बउराइल रहलन
पुरहर मिलिहें तिलक दहेजा , लोगनि के बतलावस
नवका जुग के रसिक ठहरले , बँसरी खूब बजावस
घर लिहले अइलन बनखेखर , सँउसे टांग उघारे
हाय हलो संग डैड कहे तब , धइलन हाथ कपारे
भोरे भोरे नीन खुले तब , मम्मी चाह चभावेली
हब्बी हब्बी कहिके बुचिया , बुचना से बतियावेली
तिलक दहेज के कउची कहब , ईजति भइल खँटाई
जियते भर में नरक पइसनीं , बिछल बथान चटाई
एह से नीमन बुड़बक बेटा , रोजे गोड़ दबावेला
होत फजीरे मात पिता के , आगे सीस झुकावेला।
लगन चालू बा -23
बर बरनाठ भइल झरनाठ होखे जात बा
एहु साल खलिहे जाई अइसन बुझात बा
लइका के बाप के बढ़ेला ब्लड प्रेशर रोज
अगुआ घमाइल बाड़े बबुआ सुस्तात बा
सभ कुछ भरल बाकी लइका तुतलाला
बात करे सोझ बाकी अँइच बुझाला
लाखों में एक बाकी चलेला ढ़कच के
बइठेला पाँत में खिंचेला हुमच के
घरी घरी लोटा उठावेला खेत में
अगुआ बोलावे ला घीव सूखे रेत में
बाबा के किरपा सभके पो बरसेला
चेला लो जिनिगी में कबो न तरसेला
जोड़ी लगा दिहले कनिया कजरवटी के
होई पुरनाहुत माई के भखवटी के
दुनो ओरि घर बाजे लागल शहनाई
खुश भइले देखके बाबाजी कन्हाई
लगन चालू बा - 24
रूसल बाड़न फूफा उनके चाहीं मोट दहेज
वजन में भारी होखे गर त कवनो ना परहेज़
चल अचल जे प्रचलन में बा उहे हमरा चाहीं
खुशी खुशी जे मिल जाई त हम ना करब मनाही
करिया रंग मिली त निमन दोसरो रंग से नइखे ओज
चार पैर से चली अगर तऽ पंच सितारा दिहब भोज
हाथ जोरके पाँव पकडले कहलन रसिक मंजूर बा
बाकी रउए लेके जाइब विनती फूफा हुजूर बा
चिंता जन करीं रउआ सभ केहू के ना कष्ट दिहब
ससुरारी के भेंट ह रसगर सभके से स्पष्ट कहब
ए रसिक का गाँव छोडइब कहाँ से दिहब दहेज
ए चाचा चिंता मत करिह धन के रखब सहेज
फूफाजी दहेज में चल बा, चार पैर , तनी भारी बा
सभे डेराला जेकरा से ओकर इहो सवारी बा
गाँव में हमसे लोग डेराला हमरो चलती चलेला
नवहा लोग त हमरा सोझा आपन हाथ के मलेला
बाबा कहलें अरे रसिकवा कहाँ से आई पइसा
चिंता जन करीं ए बाबा दहेज दिआई भँइसा
लगन चालू बा -25
पिया मूँछमुंडा चलावे हीरोहुंडा
पहिरे बरमूंडा रे मोरी सखिया।
जबसे दहेज में मिलल फटफटिया
गोड़ बाटे बहरी सूते न खटिया
कइले बाटे सभ कुंडा, रे मोरी सखिया
पहिरे बरमूंडा रे मोरी सखिया।।
आगि लागो बजर परो लइले दहेज के
पिया कहाँ राखऽताड़े हमरा सहेज के
लागे गलियन के गुंडा, रे मोरी सखिया
पहिरे बरमूंडा रे मोरी सखिया।।
बाबा रसिक तनी तू समुझावऽ।
जिनिगी जिए के कुछ मरम बतावऽ
बने काहे भकभुंडा,रे मोरी सखिया
पहिरे बरमूंडा रे मोरी सखिया।।
रसिक
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