मन में भरल बिभेद बा, चतुरानन चौपाल ।
भेड़िया लउके शेर जस, ओढ़ झूठ के खाल ।।
का सूतल का जागरन, जब कइले मदपान।
कहाँ ज्ञान हमरा नियन, कहाँ सरिस रसखान?
माहुर मीठ जुबान के, समुझे कहवाँ लोग ।
छैल छबीली पातकी, मिलन बढ़ाये रोग ।।
दो पइसा संतोख के , रसिक चबावस पान ।
शीश महल में स्वान के, भउँकत निकसे प्रान ।।
सभे बिसारल नेक के , ओछा चढ़ल कपार।
दुइ पइसा के लोभ में , होता बंटाधार ।।
साँच आँच मद्धिम भइल , झूठ करे सिंगार ।
रसना में माहुर भरल , दुर्लभ भइल पियार ।।
जेकर हाथे माल बा, आन्हर अछइत आँखि ।
चमगुदरी अस खोह में, उलुटे कइले पाँखि ।।
चूल्हा प खिंचड़ी चढ़ल , लकड़ी ताल नहाय ।
पाँत परोसत प्यार से , रसना मन बहलाय ।।
राम राम के बेरा में , सभके जय श्रीराम ।
सीता माता सुमिरि के , प्रभु के आईं काम ।।
मन में जब श्रीराम हों , भल अनभल बेकार ।
पूर्ण समर्पण से सदा , होता है उपकार ।।
अच्छे दिन के आस का , करो नहीं आगाज़ ।
वर्तमान पहचान लो , सबसे अच्छा आज ।।
मन में हीं रखना सदा , अपने मन की बात
लोग कसेगें फब्तियाँ , कर दिल पर आघात
डाल पात विस्तार हो , वृक्ष लगाओ खास
पर्यावरण पवित्रता , रहे मनुज अहसास
माई के बा विश्व में , ममता बड़ा महान ।
माई ना त दुनिया में , सभ बाटे सुनसान ।।
गगन चिरइयाँ उड़ गइल , झरलसि भुइयाँ पाँखि।
लागल रहली टकटकी , भरि-भरि आइल आँखि ।।
के बतलाई रामजी , बउरहिया के राह।
कवनि देस जाके बसल , जिनिगी भइल तबाह।।
सारी कोरी ना रहल , माथा भइल उघार ।
छोड़ बिगहटा सेंत में , भगले मोर भतार ।।
कुकुर झेंझ लगले रहल , अंडज पिंडज गात ।
सभ बाटे संसार में , खुदे पताइल पात ।।
रातोदिन पहरा परे , तबहूँ पइसल चोर।
चुटुकी ना बाजल इची , भागल सभे बिटोर
गैरों का चुंबन गरल , बेलन मार पसंद ।
अपनी बीबी कर्कशा , फिर भी सेहतमंद ।।
मंजिल जब नजदीक हो , मत अकुताना यार ।
प्रेम पथिक के मार्ग में , पग पग कष्ट हजार ।।
गंगा मइया के शरण , आइल बानी आज ।
पुत्र पहरुआ हो सदा , सेवा केवल काज ।।
शिक्षा जीवन में सही , कर दे जो उपकार
शिक्षा बने विलासिता , मन पर करे प्रहार
मोल नहीं उस सीख का , करे सदा उत्पात
कर्कश वाणी कान में , करे हृदय आघात
रसना में रस हो सदा , मुख पर हो मुस्कान
अंतस में सरिता बहे , कोई नहीं अजान
शिक्षा नाम न योग्यता , जो कागज बंध जाय
असली शिक्षा है सही , गिरते गले लगाय
रसिक रसायन देत है , जिह्वा लियो लगाय
सार्थक शब्द सुनाय के , मंद मंद मुस्काय
तन चंचलता ठीक है , मन पर लगे लगाम
सुखीराम बँसी फूँके , दुखिया घर कुहराम
संग-संग दोनों पले, अश्रु और मुस्कान।
एक हरे जीवन थकन, एक ईश वरदान।
निर्मल जल-सी जिंदगी, अलग रूप आस्वाद।
मिश्री के रस में मधुर, माहुर में अवसाद
तन के चरफर ठीक बा , मन पो लगे लगाम
सुखिया के घर सांत बा , दुखिया घर कुहराम
देह शिवाला देह देव है , देह में चारो धाम ।
देह भूलके बाहर दौड़े , क्यों तू आठो याम।।
सब भाई को प्रेम का , दे बहना उपहार
भाई के दिल में रहे , आजीवन तक प्यार
अहंकार पर्वत बड़ा , तारो हे गोपाल ।
निर्मल उच्च विचार का , मन आये भूचाल ।।
दीपोत्सव त्यौहार में , सबका हो कल्याण
पर्यावरण पुकार है , धरती का हो त्राण
दरस दिखाके चल दिये , चेतन हुआ उजास ।
मन की गति ऐसी चली , चहुँदिस हुआ प्रकाश
आप कहें वो झूठ है , मैं कहता हूँ सत्य
ये जुबान है अहं की , बोल रहे हैं भृत्य
शांत सरोवर कंकरी, तल पर उठे तरंग
मनसा वाचा कर्मणा , रहे न तंद्रा संग
रहे न तंद्रा संग , समझ से सेतु बनायें
सत्य नसेनी पास , स्वयं को शृंग चढ़ायें
हो अद्भुत अहसास ,
मिटे निज ज्ञान से भ्रांति
धुरी धर्म की प्रेम है , नफरत मन से टाल
मानवता को पुष्ट कर , उन्नत करो कपाल
हाहो दैया जन करऽ ,
रोना-धोना छोड़ दो , जश्न मनाओ यार
हाथ मिलाना सीख लो , कहता है सरदार
कहता है सरदार , स्वयं को उम्दा मानो
हीन भावना त्याग , शान से सीना तानो
सत्य करो स्वीकार , भूल जा जादू-टोना
जीवन है अनमोल , गलत है रोना-धोना
रहे के बा जहान में , काहें ला हथजोर
आपन करम सुधार के , रोज सँवारऽ भोर
रसिक
जिसके अथक प्रयास से , भारत हुआ अखंड
ऐसे सत्य सपूत को ,
लौह पुरुष को नमन है , बढ़े देश की शान
खंड खंड प्रचंड हुआ , भारत देश महान
पगडंडी अच्छी भली , आम जनों की राह
राजमार्ग से कम नहीं , प्रथम पथिक की चाह
जिसके कर में कलम है , दुनिया दे सम्मान
शख्स अपरिचित ना रहा , है यह ज्ञान विधान
मन में औषध लालसा , जामल पात लमेर ।
का बिधना के कोप बा , या टिसुना के फेर ।।
चढ़ल बँड़ेरी चाँदनी, शीतल भइल पठार
रजनी के घर रोष बा , प्रिय जन दूर दुआर
पुस्तक पढ़ना ठीक है , बढ़े निरंतर ज्ञान
कलम हाथ में जब रहे , लोग नहीं अनजान
लोर आँख क काफी बा , हाल बतावे खाति
पुछिह जन कइसन बानी , कहत फाटी छाती
खुश रहना इंसान की , फ़ितरत मेरे यार
रोना-धोना छोड़ दो , सुन्दर है संसार
चटक चाँदनी रात में , सुधा कराती पान
गायब नभ से मेघ हैं , पिया मिलन का भान
सोंच गरीबी मगज में , और नबाबी ठाट
गिरने की संभावना , खड़े रहे हैं पाट
अगते जे खउरा रहे , गउरा बऽनल आज
खरिका से मुँह खोदके , जगहे जगह पुजात
पत्ता पत्ता देव हैं , अक्षर अक्षर ज्ञान
अंदर का तोता जगे, रब से हो पहचान
मेरे साजन आपसे , सात जन्म का साथ
प्रिय तेरे गठबंध से , आलोकित है पाथ
तन मन धन अपना नहीं , पाया सबने दान
देनेवाला और है , उसको हीं पहचान
मानव मन की वेदना / चाहना , रावण को दे मार
किन्तु राम की देशवा, करे नहीं स्वीकार
देखो रावण जल गया , देकर अद्भुत ज्ञान
होगा नीति खिलाफ जो , देगा अपनी जान
हुआ भयंकर हादसा , औचक निकला प्राण
खाक हुआ रावण जला , छोड़ बेतुका बाण
रावण रावण सब करे , रावण रूप हजार
सबके अंदर पैठ कर , रावण करे प्रहार
चंदन घिस शीतल भया , तन को मिला आराम
हृदय एक प्रभु के लिये , मन पाये विश्राम
दुविधा में सब दौड़ते , मन में रहे न धीर
कहे कन्हैया सोंच लो , बात बडी गंभीर
बाहर दौड असीम है , अंदर बंद कपाट
सहज भेंट भगवान का , हँस हँसकर तू बाँट
माटी तन खाए यही , मन को मिले प्रसाद
सहज सहेजे बहुरिया , तनिक नही अवसाद
रम के कारन गम मिला , हुए आज बदनाम
चौथा पन में रसिक को , मिला न कोई धाम
पिज्जा बर्गर छोड़ के , मांगे चूड़ा दही
माई रे तनि देख ले , इहे पतोहू सही
ईश्वर के समराज में , नइखे कवनो खोट
सभे शरण में जाइके , पावें पुरहर रोट
पाहन जाई पेट में , बनके निकसी धूर
दुविधा में ललमी रहे , काहें करीं गरूर
बैठी रहना बगल में , पूरन होगी आस
चंद्रमुखी चारु चपला , दिल में करो निवास
साँच बात बोले सभी , साँच न सूने कोय
शब्द बान लागे हिया , धीरज जल्दी खोय
ईश्वर अल्ला एक हैं , जिसका मन हो साफ
प्रेम गेह ना भेद है , ईश्वर का इंसाफ
मानवता के छोड़के , स्वारथ में लपटाय
मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ , हीरा हाथ गँवाय
संत संग में सरग बा, मन के भरम मिटाय
जे ना जानल मरम ई, सिर धुनि धुनि पछताय
नीयत में जब खोट बा , डगमग करी यकीन
ईश्वर भी मुँह फेरिहें , खींच ल पाई तीन
मन के निशछल लोग बा , धरती पर भगवान
आभा मंडल दिव्य बा , संत जनन पहचान
कुर्सी मिलते आँख पो , चर्बी आवे धाय
जब कुर्सी से दूर हो , गदहा बाप बनाय
जात पाँत के झउर में , बुद्धि गइल चकराय
सोपट मारग खुरदुरा , उल्टा पड़े सुनाय
पनही चढ़ल कपार पो , ई केकर बा दोष
देख मुड़ेरा गिद्ध के , आवत नइखे होश
आपन भाई भइल बा , परछतिये हत्यार
गलबहियाँ दे प्यार से , करे भितरिया वार
घूर भरल बा मगज में , बोलत बहुत बसाय
रसिक मिलावस हाथ तऽ , बोले में सकुचाय
जहमत जिनिगी बा जियत, मुअला पो मुस्टंड
रोज मलीदा ना मिलल , भइल रूप परचंड
बइठल रहीं जमीन पो , कबो न लागी चोट
अहंकार पहुँची गगन , मन में उपजी खोट
पोर पकड़ले बाप के , चढ़ले पूत विमान
अब लागस घर बीगना , कस के मरले तान
पहले खुद को देखिये , फिर देना आदेश
अपना घर जब साफ हो , फल देगा उपदेश
तन मन में रमता रहे , माह पाक रमजान
सब मिलकर स्वागत करें , भाई देत अज़ान
भाईचारा सीख लो , ईश्वर अल्ला एक
ईद मुबारक हो सखा , रंग फाग में फेक
सत के साथे जीत बा , ई गीता के ज्ञान
मूरख जन तन के बली , उच्च कोटि अभिमान
लेबे कबो डकार ना , पेट क नइखे थाह
बोली से अमरित चुवे , मने सौतिया डाह
लोगन क बेवहार में , खल खल के बा रंग
काम से पहिले मन भर , काम क बाद पतंग
दिन के राजा रात में, करे चाकरी गैर
अपने रोपल गाँछ से , सौ सौ जनम क बैर
बुद्धि दिहल विधाता के , गिरवी पर के हाथ
चारु चंद्र की चाँदनी , फिर भी धूमिल पाथ
नजर हटावल ठीक ना , ढ़ोर जोर घरबार
नजर चुकल दंड़क बने , सभकुछ भइल उजार
जीवन का यह सूत्र है , नित उठ रहो नवीन
मनसा वाचा कर्मणा , होय न पल भर क्षीण
पथबाधा खुद रचि लिहल, सिकुरल दिल इंसान।
दिल के साँकल खोलते, सोझे दिखे सुजान।
पइसा खोजत हेंठ में , ढ़ाही मरले यार
बिजुरी के खंभा मिलल , लागल चोट कपार
चरण स्पर्श स्वीकारिये , दें मुझको आशीष
मंगलमय हो आपका , शिर हो हाथ हरीश
मन में हो शुभकामना , वाणी में रस धार
मात शारदे जीभ पर , निश्चित है उद्धार
ज्ञानी लो अनजान बा , कतिना बाटे ज्ञान
एही से लोगवा कहे , ज्ञानी होत महान
राधा कान्हा दो नहीं , एक रूह दो गात
राधे की सुमिरन करो , कान्हा से मुलकात
रसिक कन्हैया नाम से , अंतर पट खुल जाय
सार्थक वाणी हो सदा , जन्म सफल हो जाय
जिनिगी के भवजलधि में , बीच भँवर उतराय
जे ना समझल प्रेम के , उतरत डूबल जाय
सोचल सभ बेकार बा , विधना के सभ खेल
कबो चढ़ावे शिखर पर , कबो चढ़ावे ठेल
मन में ना संताप हो , ईश एक आधार
सभ खेला के सारथी , उहे लगावे पार
दौड़ लगाना छोड़ दो , चौराहे पर यार
अपने अंदर झाँक लो , वही है सृजनहार
ताता-थैया हो रहा , पंख लगे हैं पाँव
महल बनाये चौगुना , मिली न कोई ठाँव
गर्व गिराओ गगन से , मिट्टी का दो साथ
मिट्टी में अंतर्निहित , विधना के सब हाथ
शून्य अकेले छोड़ दो , देना अंक को टार
शून्य पूर्ण द्वय एक है , पूर्ण शून्य विस्तार
मन में अगर हुलास हो , कभी न होय थकान
मंजिल पाकर हीं रहे , मानव वही महान
सावन में सूखा पड़ल , पानी खोजे खेत
मंगरु के बीबी मरल , फाँकत फाँकत रेत
बचवा बाहर ना गइल , रुकल बाढ़ से रेल
कइसन बाटे ए रसिक , ई विधना के खेल
परल ओठ पो फेफरी , मनवा भइल उदास
किरसक कँहरत कहर से , भानु करस परिहास
बिटिया के कइसे करब , बोलीं पीयर हाथ
फसल फफूंदी लग गइल , पीर न छोड़े साथ
माया ममता छोड़ के, राधे राधे बोल
महाकाल के द्वार पर , दिल दरवाजा खोल
चंचल चितवन चारु मुख , चाँद चमक शरमाय
गोरी तेरा ग़मज़दा , गरदन फाँस लगाय
नैन नशीले होश में, कर देते मदहोश
बाँके चितवन गर चले , ठंढ़ा पड़ता जोश
सीख गुरु की उत्तम है , मध्यम होत शरीर
अधम होत अवहेलना , बढ़ जाता है पीर
लागल मनवा राम से , बिरिथा लउके चाम
चतुर चिरइयाँ उड़ गइल , गठरी लेके दाम
स्वारथ के कीरा डँसल, पइसा बा पुरधान
मूँड़ी अइँठसि फूल के, छीन रहल मुस्कान
माली के मन में कलुष , आन लगावे घात
पद पइसा के कारने , दाग लगावे जात
दो पइसा के लोभ में , अदमी करे अनेत
खाई खोदे बीच में , बान्ह न पावे सेत
जीवन में ऐसे रहें , जल की जो तासीर
हिम तुषार वाष्पन तपन , अनुकूलन तदबीर
कंकड़ पत्थर राह में , क्या करना परवाह
गलबाँहीं देते चलो , केवल मंजिल चाह
निकल गइल बहरी अधम , करते खोज सरेख
गुनिया के हत्थे चढ़ल , बदलल घटिया भेख
जब तक सर पर हाथ बा , करब न कबो निराश
प्रेम सहित सेवा करब , भोजपुरी के खास
बूझत दीया जर गइल , मिलल नेह इमदाद
पैंसठ के पग में पड़ल , खिलल कली आबाद
माई के मुख पर हँसी , रब दे आशीर्वाद ।
पिता अगर संतुष्ट हैं , जिनिगी जिन्दावाद ।
लता लौंग चर्बी चढ़ल , पतझड़ भइल कपार
टिमकी फेंकल पेट में , भइलसि जीभ लबार
प्यार मुहब्बत पैंतरा , हरपल बदले रोज
रक्तचाप मधुमेह के , पलटी खाये डोज
बदरी गरजे उदर में , मय निगार बा बंद
आफत में जियरा पड़ल , मतिया भइलसि मंद
कमर काम नइखे करत , घुटना करे कुलेल
जब ओके मोका मिलल , चलत बिगाड़े खेल
मोटा चश्मा चढ़ गइल , काने लागल ठेप
प्राणवायु के सुँघनी , पल-पल बदले खेप
करनी हो ऐसी रसिक, लोग करें नित याद।
जहाँ रहें सरसे सुमन, रब से यह फरियाद।
सौम्य भाव वाणी मधुर, हिय से हिय की बात।
पलक बिछाये लोग हों, ऐसी हो जज़्बात ।
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